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Showing posts from December, 2025

राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (NFIW): महिलाओं की आवाज और मेरी जीवन यात्रा

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राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (NFIW): महिलाओं की आवाज और मेरी जीवन यात्रा राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (एनएफआईडब्ल्यू) भारत में महिलाओं का एक प्रमुख संगठन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आजादी के मूल्यों, भारतीय संविधान के सिद्धांतों—लोकतंत्र, सर्वधर्म समभाव (धर्मनिरपेक्षता) और समाजवाद की रक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। इस संगठन की स्थापना 4 जून 1954 को हुई थी, जब महिला आत्म रक्षा समिति की कई प्रमुख नेत्रियों, जिनमें प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसिफ़ अली शामिल थीं, ने इसे गठित किया। यह एक अग्रणी महिला संगठन है, जो महिलाओं के अधिकारों, समानता और सामाजिक अन्यायों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध है।        पिछले सात दशकों में, एनएफआईडब्ल्यू ने महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों, सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ और दक्षिण एशिया में शांति के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। यह संगठन विमेंस इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन से संबद्ध है और भारत की महिलाओं की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूत बनाता रहा है। मेरा यह सौभाग्य रहा है कि अपनी बाल्यावस्था ...

राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (NFIW): महिलाओं की आवाज और मेरी जीवन यात्रा

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राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (NFIW): महिलाओं की आवाज और मेरी जीवन यात्रा राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ (एनएफआईडब्ल्यू) भारत में महिलाओं का एक प्रमुख संगठन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आजादी के मूल्यों, भारतीय संविधान के सिद्धांतों—लोकतंत्र, सर्वधर्म समभाव (धर्मनिरपेक्षता) और समाजवाद की रक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। इस संगठन की स्थापना 4 जून 1954 को हुई थी, जब महिला आत्म रक्षा समिति की कई प्रमुख नेत्रियों, जिनमें प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसिफ़ अली शामिल थीं, ने इसे गठित किया। यह एक अग्रणी महिला संगठन है, जो महिलाओं के अधिकारों, समानता और सामाजिक अन्यायों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध है।        पिछले सात दशकों में, एनएफआईडब्ल्यू ने महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों, सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ और दक्षिण एशिया में शांति के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। यह संगठन विमेंस इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन से संबद्ध है और भारत की महिलाओं की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूत बनाता रहा है। मेरा यह सौभाग्य रहा है कि अपनी बाल्यावस्था से ही मुझे इस संगठन को न...

मंजुल भारद्वाज से दोस्ती: एक वैचारिक यात्रा.

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मंजुल भारद्वाज से दोस्ती: एक वैचारिक यात्रा.        मंजुल भारद्वाज से मेरी दोस्ती की कहानी एक वैचारिक साझेदारी की तरह है, जो समय के साथ मजबूत होती गई। हम दोनों पिछले 6-7 वर्षों से एक-दूसरे से परिचित हैं, लेकिन साक्षात मुलाकात पहली बार कल मुंबई में हुई। इस मुलाकात में ऐसा लगा मानो हम रोजाना मिलते-जुलते रहे हों। कोई औपचारिकता नहीं, बस एक सहज और गहरा जुड़ाव। कोविड महामारी के दौरान, जब सारी दुनिया ठहर-सी गई थी, तब 'नित्यनुतन वार्ता' में वे शामिल हुए थे। उस समय से ही हमारे बीच एक विचारधारात्मक पुल बनना शुरू हो गया था। ● मुलाकात का सिलसिला: हमारी इस मुलाकात का श्रेय कुछ विशेष लोगों को जाता है, जो इस रिश्ते की कड़ी बने। विशेष रूप से यायावर स्मृति और अद्वैत ने इस सिलसिले को जोड़ा। पिछले महीने, मंजुल जी की एक सहयोगी अश्विनी अपने पति के साथ अपने सुपुत्र ओम के दाखिले के सिलसिले में पानीपत आईं। उनके व्यवहार ने इस रिश्ते को और अधिक मजबूत किया। अश्विनी ने मुझे और मेरी पत्नी को माता-पिता का सम्मान दिया, जो हृदयस्पर्शी था। यह साबित करता है कि बेटी, बहन औ...

मंजुल भारद्वाज से दोस्ती: एक वैचारिक यात्रा.

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मंजुल भारद्वाज से दोस्ती: एक वैचारिक यात्रा.        मंजुल भारद्वाज से मेरी दोस्ती की कहानी एक वैचारिक साझेदारी की तरह है, जो समय के साथ मजबूत होती गई। हम दोनों पिछले 6-7 वर्षों से एक-दूसरे से परिचित हैं, लेकिन साक्षात मुलाकात पहली बार कल मुंबई में हुई। इस मुलाकात में ऐसा लगा मानो हम रोजाना मिलते-जुलते रहे हों। कोई औपचारिकता नहीं, बस एक सहज और गहरा जुड़ाव। कोविड महामारी के दौरान, जब सारी दुनिया ठहर-सी गई थी, तब 'नित्यनुतन वार्ता' में वे शामिल हुए थे। उस समय से ही हमारे बीच एक विचारधारात्मक पुल बनना शुरू हो गया था। ● मुलाकात का सिलसिला: हमारी इस मुलाकात का श्रेय कुछ विशेष लोगों को जाता है, जो इस रिश्ते की कड़ी बने। विशेष रूप से यायावर स्मृति और अद्वैत ने इस सिलसिले को जोड़ा। पिछले महीने, मंजुल जी की एक सहयोगी अश्विनी अपने पति के साथ अपने सुपुत्र ओम के दाखिले के सिलसिले में पानीपत आईं। उनके व्यवहार ने इस रिश्ते को और अधिक मजबूत किया। अश्विनी ने मुझे और मेरी पत्नी को माता-पिता का सम्मान दिया, जो हृदयस्पर्शी था। यह साबित करता है कि बेटी, बहन औ...

ईश्वर की अस्तित्व पर बहस: परंपरा, दर्शन और निरर्थकता

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ईश्वर की अस्तित्व पर बहस: परंपरा, दर्शन और निरर्थकता आजकल सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में जावेद अख्तर और एक मौलवी (मुफ्ती शमैल नदवी) के बीच हुई चर्चा की खूब चर्चा हो रही है। यह बहस "ईश्वर का अस्तित्व क्यों है?" विषय पर केंद्रित थी, जहां जावेद अख्तर ने अनीश्वरवादी (एथीस्ट) दृष्टिकोण अपनाया, जबकि मौलवी ने धार्मिक तर्कों से ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने की कोशिश की। इस बहस में जावेद अख्तर को कुछ लोगों ने तर्कपूर्ण और विनम्र बताया, जबकि मौलवी के तर्कों को शब्दजाल से भरा हुआ माना गया।हालांकि, कुछ पक्षों ने जावेद अख्तर को काफिर और शैतान तक कहा, जिससे पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम तक रद्द हो गया। यह बहस न केवल धार्मिक भावनाओं को उकसाती है, बल्कि हमें अपनी सांस्कृतिक परंपराओं पर विचार करने के लिए मजबूर करती है। शास्त्रार्थ, अर्थात् शास्त्रों पर आधारित तर्कपूर्ण चर्चा, हमारी भारतीय संस्कृति की एक स्वस्थ और प्राचीन परंपरा रही है। प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि, दार्शनिक और विद्वान विभिन्न मतों पर खुलकर बहस करते थे। यह परंपरा न केवल ज्ञान की वृद्धि करती थी, बल्कि समाज को सं...