मानवसे महात्मा की सफर - डॉ. चत्रभुजभाई बी. राजपरा
मानव से महात्मा का सफर आइए, जब गांधीजी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का फिर से समय आ गया है, तो उसी के साथ स्वतंत्रता के उस काल को एक बार फिर स्मरण करें। भारत को स्वतंत्रता देने की अंग्रेज़ सरकार की ज़रा भी इच्छा नहीं थी। लेकिन अब वे इस देश को संभाल पाने में असमर्थ हो चुके थे। इसलिए “मैं मरूँ, पर तुम्हें विधवा कर दूँ” की नीति पर चलते हुए यदि अखंड भारत के टुकड़े किए गए, तो उसके लिए केवल और केवल अंग्रेज़ ही ज़िम्मेदार थे। अंग्रेज़ भली-भाँति समझते थे कि पाकिस्तान की माँग के मार्ग में यदि कोई सबसे बड़ा अवरोध है, तो वह केवल गांधीजी ही हैं। इसलिए स्वतंत्रता से पहले ही गांधीजी को मुसलमानों का और जिन्ना को हिंदू समाज का शत्रु घोषित कर दिया गया। यहाँ अंग्रेज़ों की कूटनीति सफल हो गई। जिन्ना के मन में यह दृढ़ कर दिया गया कि पाकिस्तान के बिना मुसलमान समाज का उद्धार संभव नहीं है। वहीं हिंदू समाज के मन में यह बात लगातार ठूँसी जाती रही कि मुसलमान उनका शत्रु है। भारत को आज़ादी मिली, स्वतंत्रता मिली; लेकिन इस स्वतंत्रता की बहुत बड़ी कीमत इस धरती को चुकानी पड़ी। हिंदू–मुस्लिम समाज क...