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बच्चों की कहानियां

 🐱🐭 बिल्ली और चूहे की दोस्ती एक बार की बात है। एक सुंदर-से घर में मम्मी-पापा अपने दो बच्चों के साथ रहते थे। बेटा बारह साल का था और बेटी नौ साल की। दोनों भाई-बहन बहुत प्यारे थे और उन्हें जानवरों से भी बहुत प्यार था। उनके घर में एक सुंदर-सी बिल्ली भी रहती थी। उसका नाम था मिन्नी। मिन्नी को अपने ऊपर बहुत घमंड था। वह दिनभर घर में ऐसे घूमती, जैसे पूरे घर की मालकिन वही हो! लेकिन उसी घर में एक छोटा-सा चूहा भी रहता था। वह बहुत समझदार और फुर्तीला था। उसका छोटा-सा बिल था, जिसमें वह खतरा देखते ही घुस जाता था। एक दिन मिन्नी को पता चल गया कि घर में चूहा भी रहता है। मिन्नी ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए कहा— “अच्छा! तो मेरे घर में चूहा भी रहता है! अब देखना, मैं उसे कैसे पकड़ती हूँ!” बेचारा चूहा यह सुनकर घबरा गया। वह मन ही मन बोला— “हे भगवान! अब तो मेरी शामत आ गई। यह बिल्ली मुझे चैन से जीने नहीं देगी।” मिन्नी कई बार चूहे को पकड़ने दौड़ी, लेकिन चूहा भी बहुत चालाक था। जैसे ही मिन्नी झपटी— फुर्रर्र! चूहा बिल में! मिन्नी बोली— “अरे! फिर बच गया!” चूहा अंदर से हँसते हुए बोला— “मिन्नी जी, पहले मुझे पकड...

Arya College, Panipat

आर्य कॉलेज पानीपत : मेरी स्मृतियों, मेरी विरासत और मेरे संकल्प की यात्रा जब-जब मैं अपनी किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ने के उस दौर को याद करता हूँ, मेरी स्मृतियों में सबसे पहले जिन स्थानों की तस्वीर उभरती है, उनमें आर्य कॉलेज, पानीपत का स्थान अत्यंत विशेष है। इस कॉलेज के परिसर में कदम रखते ही आज भी मुझे ऐसा अनुभव होता है, जैसे समय की धारा पीछे लौट गई हो और मैं फिर उसी किशोर अवस्था में पहुंच गया हूँ, जब आंखों में सपने थे, मन में जिज्ञासा थी और जीवन के रास्ते धीरे-धीरे खुल रहे थे। मेरा जन्म वर्ष 1957 में हुआ, लेकिन आर्य समाज और उससे जुड़े संस्थानों से मेरे परिवार का संबंध मुझसे कई वर्ष पहले का है। मेरे पिता आर्य समाज, पानीपत से लगभग 1940 के आसपास जुड़े और बाद में उन्होंने अनेक वर्षों तक आर्य समाज के पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दीं। हमारा परिवार आर्य समाज की विचारधारा, शिक्षा, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों से गहरे रूप में जुड़ा रहा है। इसी पारिवारिक वातावरण के कारण मेरा आर्य कॉलेज से परिचय बहुत छोटी उम्र में ही हो गया था। लगभग 1962 से मैं अपने माता-पिता ...

भगत सिंह पर लेख

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भगत सिंह के परिवार की आर्य समाजी विरासत और उनके क्रांतिकारी विचारों की पृष्ठभूमि शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को समझने के लिए केवल उनके क्रांतिकारी जीवन और बलिदान को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके व्यक्तित्व की जड़ें उस परिवार और सामाजिक वातावरण में गहराई से जुड़ी थीं, जिसमें देशभक्ति, सामाजिक सुधार, शिक्षा, धार्मिक चेतना और अंग्रेजी शासन के प्रति असहमति साथ-साथ विकसित हो रही थी। भगत सिंह का पैतृक संबंध पंजाब के खटकड़ कलां से था। बाद में परिवार लायलपुर जिले की नहर कॉलोनी में जाकर बसा और Chak No. 105 Banga में रहने लगा। इसी बंगा में 28 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अभिलेख में भी उनके जन्मस्थान के रूप में 105 Chak Banga, जड़ांवाला तहसील, लायलपुर जिला दर्ज है। परिवार में देशभक्ति की परंपरा भगत सिंह के दादा सरदार अर्जन सिंह परिवार के प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। राष्ट्रीय अभिलेखागार की सामग्री उन्हें एक बड़े भू-स्वामी और प्रतिष्ठित सिख परिवार के सदस्य के रूप में वर्णित करती है। परिवार की पिछली पीढ़ियों का संबंध सिख परंपरा और पंजाब के राजनीतिक-...

From BRICS to the United Nations: A Call for Non-Alignment, Disarmament and World Peace (Hindi-English)- Ram Mohan Rai

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BRICS से संयुक्त राष्ट्र तक : विश्व शांति के लिए गुटनिरपेक्षता और निशस्त्रीकरण की पुकार आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें संवाद, गुटनिरपेक्षता और निशस्त्रीकरण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन और उसके तुरंत बाद न्यूयॉर्क में चल रहे संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन को केवल दो अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों घटनाएं आज की बदलती विश्व व्यवस्था, आर्थिक संबंधों, युद्ध और शांति के प्रश्न तथा बहुध्रुवीय विश्व की उभरती आवश्यकता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुए BRICS सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन सहित अनेक देशों के नेता और प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके कुछ ही दिनों बाद न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का उच्चस्तरीय सप्ताह शुरू हुआ है। 193 सदस्य देशों के प्रतिनिधि इस विश्व मंच पर अपने-अपने देशों की प्राथमिकताओं और चिंताओं को ...

विश्व गुरु नहीं, विश्व मित्र.

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यह कैसा नया भारत? हमें विश्वगुरु नहीं, विश्वमित्र बनना है      भारत को विश्वगुरु बनाने की चर्चा आज बहुत जोर-शोर से हो रही है, लेकिन हमें ईमानदारी से यह भी सोचना होगा कि हम दुनिया के सामने किस तरह का भारत प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वगुरु होने का अर्थ शक्ति का प्रदर्शन, ऊँची आवाज़, भीड़ और दूसरों को असहज करना नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, करुणा और विनम्रता से दुनिया का विश्वास जीतना है। पेरिस के एफिल टावर पर महिलाओं की अनुपस्थिति को लेकर धार्मिक साधुओं की ओर से की गई कथित टिप्पणियों ने भारत की छवि और हमारी सामाजिक सोच को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस भारत की परंपरा में स्त्री सम्मान, विविधता और सह-अस्तित्व को महत्वपूर्ण स्थान मिला है, यदि उसी भारत की पहचान दुनिया के सामने संकीर्णता के रूप में प्रस्तुत होने लगे तो यह चिंता का विषय है। दूसरी ओर, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों में बसे भारतीय अपने धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव पूरे उत्साह से मनाते हैं। मुहर्रम, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और जगन्नाथ यात्रा जैसे अवसरों पर हजारों लोग सड़कों पर निकलते हैं। अपनी संस्...

नानू की पोटली

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नानू की पोटली से निकली बचपन की कहानियाँ   मेरे प्यारे नाती- नातिन,  जब मैं तुम्हें ये कहानियाँ सुनाऊँगा तो शायद तुम्हें लगेगा कि नानू भी कभी बच्चा था! आज जब तुम मुझे देखते हो तो शायद तुम्हें एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जो बहुत कुछ जानता-समझता है, गंभीर बातें करता है, लोगों से मिलता है और अपने काम में व्यस्त रहता है। लेकिन मेरे भीतर कहीं एक छोटा-सा बच्चा आज भी रहता है—जो शरारत करता था, खेलता था, झूठ बोलकर बच निकलने की कोशिश करता था, डाँट खाता था, कभी प्यार पाता था और कभी अपनी किसी छोटी-सी उपलब्धि पर बहुत खुश हो जाता था। उसी बच्चे को मैंने इन कहानियों में फिर से खोजने की कोशिश की है। ये कहानियाँ मेरे जीवन के उन दिनों की हैं, जब मुझे अपनी दुनिया बहुत बड़ी लगती थी और मेरी उम्र बहुत छोटी थी। लगभग चार वर्ष की उम्र से लेकर चौदह वर्ष तक के वे दिन, जिन्हें मेरी स्मृति ने अपने भीतर कहीं सुरक्षित रखा है। कुछ घटनाएँ मुझे बिल्कुल साफ-साफ याद हैं, कुछ धुंधली हैं और कुछ को शायद समय ने अपनी कल्पना का थोड़ा रंग दे दिया है। लेकिन इन सबमें एक चीज बिल्कुल सच्ची है—उन दिनों का मेरा मन। म...