उजबेकिस्तान की यात्रा
ताशकंद की ओर मेरी पहली उड़ान -1 रूस जाने की मेरी कहानी अपने आप में अत्यंत रोचक, रोमांचकारी और अविस्मरणीय है। आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ तो मन उत्साह और आनंद से भर उठता है। एक दिन प्रातःकाल हमारे घर जिला पानीपत की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सचिव कॉमरेड रघबीर सिंह जी आए। वे मेरे पिता स्वर्गीय मास्टर सीताराम जी के छात्र रह चुके थे और परिवार से उनका आत्मीय संबंध था। आते ही उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राममोहन, कुछ ही दिनों बाद तुम्हें सोवियत संघ (रूस) जाना है।" यह समाचार सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय मेरे लिए विदेश यात्रा किसी स्वप्न से कम नहीं थी। मैं भोलेपन में यह समझता था कि जैसे रेल का टिकट लेकर हम ट्रेन में बैठ जाते हैं, उसी प्रकार हवाई जहाज में भी बैठ जाया जाता होगा। तभी उन्होंने बताया कि विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट आवश्यक होता है। "पासपोर्ट" शब्द मेरे लिए बिल्कुल नया था। मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और यात्रा में केवल दस दिन शेष थे। भागदौड़ शुरू हुई। चंडीगढ़ के एक मित्र की सहायता से मेरा पासपोर्ट आवेदन तो हो गया, लेकिन स...