विश्व गुरु नहीं, विश्व मित्र.
यह कैसा नया भारत? हमें विश्वगुरु नहीं, विश्वमित्र बनना है भारत को विश्वगुरु बनाने की चर्चा आज बहुत जोर-शोर से हो रही है, लेकिन हमें ईमानदारी से यह भी सोचना होगा कि हम दुनिया के सामने किस तरह का भारत प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वगुरु होने का अर्थ शक्ति का प्रदर्शन, ऊँची आवाज़, भीड़ और दूसरों को असहज करना नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, करुणा और विनम्रता से दुनिया का विश्वास जीतना है। पेरिस के एफिल टावर पर महिलाओं की अनुपस्थिति को लेकर धार्मिक साधुओं की ओर से की गई कथित टिप्पणियों ने भारत की छवि और हमारी सामाजिक सोच को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस भारत की परंपरा में स्त्री सम्मान, विविधता और सह-अस्तित्व को महत्वपूर्ण स्थान मिला है, यदि उसी भारत की पहचान दुनिया के सामने संकीर्णता के रूप में प्रस्तुत होने लगे तो यह चिंता का विषय है। दूसरी ओर, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों में बसे भारतीय अपने धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव पूरे उत्साह से मनाते हैं। मुहर्रम, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और जगन्नाथ यात्रा जैसे अवसरों पर हजारों लोग सड़कों पर निकलते हैं। अपनी संस्...