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विश्व गुरु नहीं, विश्व मित्र.

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यह कैसा नया भारत? हमें विश्वगुरु नहीं, विश्वमित्र बनना है      भारत को विश्वगुरु बनाने की चर्चा आज बहुत जोर-शोर से हो रही है, लेकिन हमें ईमानदारी से यह भी सोचना होगा कि हम दुनिया के सामने किस तरह का भारत प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वगुरु होने का अर्थ शक्ति का प्रदर्शन, ऊँची आवाज़, भीड़ और दूसरों को असहज करना नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, करुणा और विनम्रता से दुनिया का विश्वास जीतना है। पेरिस के एफिल टावर पर महिलाओं की अनुपस्थिति को लेकर धार्मिक साधुओं की ओर से की गई कथित टिप्पणियों ने भारत की छवि और हमारी सामाजिक सोच को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस भारत की परंपरा में स्त्री सम्मान, विविधता और सह-अस्तित्व को महत्वपूर्ण स्थान मिला है, यदि उसी भारत की पहचान दुनिया के सामने संकीर्णता के रूप में प्रस्तुत होने लगे तो यह चिंता का विषय है। दूसरी ओर, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों में बसे भारतीय अपने धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव पूरे उत्साह से मनाते हैं। मुहर्रम, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और जगन्नाथ यात्रा जैसे अवसरों पर हजारों लोग सड़कों पर निकलते हैं। अपनी संस्...

नानू की पोटली

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नानू की पोटली से निकली बचपन की कहानियाँ  अद्विका, ayaansh, श्रेयम और मेरे प्यारे नाती-पोतों, जब मैं तुम्हें ये कहानियाँ सुनाऊँगा तो शायद तुम्हें लगेगा कि नानू भी कभी बच्चा था! आज जब तुम मुझे देखते हो तो शायद तुम्हें एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जो बहुत कुछ जानता-समझता है, गंभीर बातें करता है, लोगों से मिलता है और अपने काम में व्यस्त रहता है। लेकिन मेरे भीतर कहीं एक छोटा-सा बच्चा आज भी रहता है—जो शरारत करता था, खेलता था, झूठ बोलकर बच निकलने की कोशिश करता था, डाँट खाता था, कभी प्यार पाता था और कभी अपनी किसी छोटी-सी उपलब्धि पर बहुत खुश हो जाता था। उसी बच्चे को मैंने इन कहानियों में फिर से खोजने की कोशिश की है। ये कहानियाँ मेरे जीवन के उन दिनों की हैं, जब मुझे अपनी दुनिया बहुत बड़ी लगती थी और मेरी उम्र बहुत छोटी थी। लगभग चार वर्ष की उम्र से लेकर चौदह वर्ष तक के वे दिन, जिन्हें मेरी स्मृति ने अपने भीतर कहीं सुरक्षित रखा है। कुछ घटनाएँ मुझे बिल्कुल साफ-साफ याद हैं, कुछ धुंधली हैं और कुछ को शायद समय ने अपनी कल्पना का थोड़ा रंग दे दिया है। लेकिन इन सबमें एक चीज बिल्कुल सच्ची है—उन...