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सलाम प्रीपदावातेल(Преподаватель) रईसा करिमोवना

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सलाम प्रीपदावातेल(Преподаватель) रईसा करिमोवना सन 1980-81 में मुझे तत्कालीन सोवियत संघ, आज के उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताश्कंद में लगभग आठ माह तक अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह समय मेरे जीवन के सबसे स्मरणीय और भावनात्मक अध्यायों में से एक है। विदेशी धरती पर शिक्षा, नए लोग, नई संस्कृति और नई भाषा—सब कुछ मेरे लिए बिल्कुल नया था। परंतु उन अनजाने दिनों में यदि किसी ने मातृत्व, स्नेह और आत्मीयता का स्पर्श दिया, तो वे थीं मेरी रूसी भाषा की शिक्षिका—रईसा करिमोवना। वे अधेड़ आयु की, अत्यंत सरल, वात्सल्यपूर्ण और प्रसन्नचित्त महिला थीं। हमारी पहली ही कक्षा रूसी भाषा की लगी। उन्होंने बड़े स्नेह से हमें बताया कि रूसी में शिक्षिका को “प्रीपदावातेल” कहा जाता है और इसलिए हमें उन्हें “प्रीपदावातेल रईसा करिमोवना” कहकर संबोधित करना चाहिए। उसी दिन उन्होंने हमें रूसी वर्णमाला सिखानी आरम्भ की। आश्चर्य यह था कि वे अल्फाबेट्स हमें बहुत सहज और सरल लगे। पहले ही दिन हम ताश्कंद के “मुख्य मार्केट” क्षेत्र में घूमने गए। वहाँ एक ऊँची इमारत पर रूसी भाषा में बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था। अर्थ तो मै...

" कृष्णावतारम" फिल्म समीक्षा

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हाल ही में " कृष्णावतारम" फिल्म को पीवीआर थियेटर, पानीपत में देखने का अवसर मिला। यह केवल एक पौराणिक फिल्म भर नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों, प्रेम, नारी-शक्ति और धर्म के गूढ़ पक्षों को आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करने का एक अत्यंत सराहनीय प्रयास है। फिल्म की कथा भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल, वृन्दावन, गोकुल और ब्रज की रासलीलाओं से आरम्भ होकर उनके विराट एवं लोककल्याणकारी स्वरूप तक पहुँचती है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण को “आप्त पुरुष” कहा था — अर्थात ऐसा व्यक्तित्व जिसने जीवन भर कोई पाप नहीं किया। यह फिल्म उसी दृष्टि को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। सामान्यतः श्रीकृष्ण के चरित्र को केवल प्रेम-लीलाओं तक सीमित कर देखा जाता है, किन्तु इस फिल्म का कथानक उनके नीति, धर्म, करुणा, दूरदर्शिता और लोकमंगलकारी व्यक्तित्व को भी समान गहराई से उद्घाटित करता है। फिल्म में राधारानी के शाश्वत प्रेम के साथ-साथ रुक्मिणी और विशेष रूप से सत्यभामा के चरित्र को जिस गंभीरता और गरिमा के साथ चित्रित किया गया है, वह अत्यंत...

पानीपत का इतिहास

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  सन 2013 में मुझे लाहौर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ मेरी भेंट हमारे पानीपत के प्रतिष्ठित बुजुर्ग एवं तत्कालीन राजनेता डॉ. मुबशर हसन से हुई। इस आत्मीय मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझे “हयात-ए-नू” की एक फोटोस्टेट प्रति भेंट की, जो उर्दू भाषा में थी। यह विशेष पत्रिका वर्ष 1938 में हाली मुस्लिम हाई स्कूल के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रकाशित की गई थी। इसका संपादन मलिक मोहम्मद द्वारा किया गया था। पत्रिका के संपादक मंडल में अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व सम्मिलित थे, जिनमें प्रसिद्ध फिल्म लेखक एवं निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस पत्रिका-रूप पुस्तक में पानीपत के इतिहास को अत्यंत प्रमुखता एवं विस्तार के साथ प्रस्तुत किया गया है। मैंने इसके हिन्दी अनुवाद के उद्देश्य से यह प्रति प्रसिद्ध गांधीवादी साहित्यकार एवं पट्टी कल्याणा आश्रम से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “ग्राम भावना ” के संपादक श्री जौहर को सौंप दी। उन्होंने अत्यंत निष्ठा और परिश्रम के साथ इसका हिन्दी अनुवाद किया। इसके पश्चात मैंने यह अनुवाद पानीपत के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लेखक श्री दीप...