" कृष्णावतारम" फिल्म समीक्षा
हाल ही में " कृष्णावतारम" फिल्म को पीवीआर थियेटर, पानीपत में देखने का अवसर मिला। यह केवल एक पौराणिक फिल्म भर नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों, प्रेम, नारी-शक्ति और धर्म के गूढ़ पक्षों को आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करने का एक अत्यंत सराहनीय प्रयास है। फिल्म की कथा भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल, वृन्दावन, गोकुल और ब्रज की रासलीलाओं से आरम्भ होकर उनके विराट एवं लोककल्याणकारी स्वरूप तक पहुँचती है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण को “आप्त पुरुष” कहा था — अर्थात ऐसा व्यक्तित्व जिसने जीवन भर कोई पाप नहीं किया। यह फिल्म उसी दृष्टि को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। सामान्यतः श्रीकृष्ण के चरित्र को केवल प्रेम-लीलाओं तक सीमित कर देखा जाता है, किन्तु इस फिल्म का कथानक उनके नीति, धर्म, करुणा, दूरदर्शिता और लोकमंगलकारी व्यक्तित्व को भी समान गहराई से उद्घाटित करता है। फिल्म में राधारानी के शाश्वत प्रेम के साथ-साथ रुक्मिणी और विशेष रूप से सत्यभामा के चरित्र को जिस गंभीरता और गरिमा के साथ चित्रित किया गया है, वह अत्यंत...