"लिखे जो मैंने ख़त तुम्हें" , वह ज़ख़ीरा है— एक अनमोल ख़ज़ाना, जो मैंने और उस समय मेरी होने वाली पत्नी, कृष्णा कांता ने, हमारे रिश्ते के बीज बोने से लेकर शादी होने तक के तीन सालों (1981-83) में आपस में लिखा था। उस दौर में न मोबाइल था, न व्हाट्सएप, न इंस्टाग्राम, न कोई सोशल मीडिया। सिर्फ़ कागज़ की सादगी, स्याही की गंध और दिल की धड़कनों की आवाज़ थी। मैं उन दिनों पानीपत में रहता था और इसी दौरान लगभग नौ महीने तक सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में घूमता रहा— कभी मॉस्को की बर्फ़ीली सड़कों पर, कभी लेनिनग्राद के पुलों के नीचे, कभी कीव की पुरानी गलियों में, तो कभी ताशकंद की चौड़ी सड़कों और समरकंद की प्राचीन नीली मस्जिदों के साये में, और कभी बुखारा की संकरी गलियों और प्राचीन मदरसों की रहस्यमयी हवा में। वहीं कृष्णा कांता उदयपुर की झीलों, महलों और चांदनी रातों के बीच अपनी दुनिया बुन रही थीं। फिर भी, हम दोनों ने मिलकर लगभग 125 पत्र लिखे। हर पत्र में सिर्फ़ प्रेम ही नहीं था, बल्कि दो युवा दिलों की गहरी समझ भी उभर रही थी। हर पत्र यात्रा का वृतांत थामेरे पत्रों में सोवियत संघ की ठंडी हवाओं, ताशकंद की ऊर्जा, समरकंद की ऐतिहासिक भव्यता और बुखारा की प्राचीन आत्मा की कहानी थी, उनके पत्रों में उदयपुर की चांदनी रातों, झीलों की लहरों और पीला पड़े महलों की महक थी। एक पत्र भारत एक स्थान से दूसरे तक पहुँचने में चार दिन लगते थे, और विदेश पहुँचने में नौ से पंद्रह दिन। फिर भी, हर पत्र इंतज़ार की मिठास और मिलन की उम्मीद लेकर आता था। ये पत्र सिर्फ़ प्रेम-पत्र नहीं थे। ये दो आत्माओं के बीच की वह अदृश्य डोर थी, जिसने हमें एक-दूसरे को समझने, जानने और अपनाने का मौका दिया। ये पत्र हमारी यात्रा के साक्षी हैं— भौगोलिक दूरी के बावजूद करीब आते दो दिलों की कहानी। आज मैं इन सभी पत्रों को संजोकर, थोड़ा सा एडिट करके, एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाने की योजना बना रहा हूँ। क्योंकि ये सिर्फ़ हमारे नहीं, बल्कि उस पुराने, शुद्ध और गहरे प्रेम के दौर के भी साक्षी हैं— जब प्यार लिखा जाता था, इंतज़ार किया जाता था, और हर पत्र एक नया अध्याय बन जाता था। ये किताब उन सबके लिए होगी, जो आज भी मानते हैं कि सच्चा प्रेम शब्दों में बसा होता है, और दूरी उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि और मजबूत बनाती है। राम मोहन राय, पानीपत/28.03.2026
"लिखे जो मैंने ख़त तुम्हें" , वह ज़ख़ीरा है— एक अनमोल ख़ज़ाना, जो मैंने और उस समय मेरी होने वाली पत्नी, कृष्णा कांता ने, हमारे रिश्ते के बीज बोने से लेकर शादी होने तक के तीन सालों (1981-83) में आपस में लिखा था। उस दौर में न मोबाइल था, न व्हाट्सएप, न इंस्टाग्राम, न कोई सोशल मीडिया। सिर्फ़ कागज़ की सादगी, स्याही की गंध और दिल की धड़कनों की आवाज़ थी। मैं उन दिनों पानीपत में रहता था और इसी दौरान लगभग नौ महीने तक सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में घूमता रहा— कभी मॉस्को की बर्फ़ीली सड़कों पर, कभी लेनिनग्राद के पुलों के नीचे, कभी कीव की पुरानी गलियों में, तो कभी ताशकंद की चौड़ी सड़कों और समरकंद की प्राचीन नीली मस्जिदों के साये में, और कभी बुखारा की संकरी गलियों और प्राचीन मदरसों की रहस्यमयी हवा में। वहीं कृष्णा कांता उदयपुर की झीलों, महलों और चांदनी रातों के बीच अपनी दुनिया बुन रही थीं। फिर भी, हम दोनों ने मिलकर लगभग 125 पत्र लिखे। हर पत्र में...