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उजबेकिस्तान से दोस्ती के नाम-राम मोहन राय

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  समर्पण       उन सभी उज़्बेक मित्रों, शिक्षकों और शुभचिंतकों को, जिन्होंने सन् 1980-81 में अपने स्नेह, आत्मीयता और सहयोग से मुझे यह अनुभव कराया कि मित्रता की कोई सीमा नहीं होती, न भाषा की, न भूगोल की। विशेष रूप से मेरी आदरणीय शिक्षिका रईसा करिमोवना को, जिनके स्नेहिल मार्गदर्शन, प्रेरणा और अपनत्व ने मेरे उज़्बेकिस्तान प्रवास को जीवन की अविस्मरणीय धरोहर बना दिया। उनकी स्मृति और सम्मान में यह पुस्तक "उज़्बेकिस्तान से दोस्ती के नाम" सादर समर्पित। प्राक्कथन समय का अपना एक अद्भुत स्वभाव होता है। वह बीत तो जाता है, परंतु अपने पीछे स्मृतियों के ऐसे पदचिह्न छोड़ जाता है जो वर्षों बाद भी मन की धरती पर वैसे ही ताज़ा बने रहते हैं। मेरे जीवन की ऐसी ही एक अमूल्य स्मृति है—सन् 1980-81 में सोवियत उज़्बेकिस्तान में बिताए गए वे आठ महीने, जिन्होंने मेरे दृष्टिकोण, अनुभवों और जीवन-बोध को नई दिशा दी। आज उस यात्रा को लगभग छियालीस वर्ष बीत चुके हैं। जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। शिक्षा, व्यवसाय, परिवार और सामाजिक दायित्वों के बीच उज़्बेकिस्तान की स्मृतियाँ कहीं मन के एक शा...