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हेमवती नंदन बहुगुणा: विचार, व्यक्तित्व और राजनीतिक द्वंद्व का एक अध्याय

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हेमवती नंदन बहुगुणा: विचार, व्यक्तित्व और राजनीतिक द्वंद्व का एक अध्याय भारतीय राजनीति के इतिहास में हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अपने समय में समाजवादी सोच, संगठन क्षमता और जनसंपर्क के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई। विद्यार्थी जीवन से ही मैं उनके व्यक्तित्व और विचारधारा से अत्यंत प्रभावित रहा। उनके भीतर समाजवाद के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और जनहित के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण दिखाई देता था। यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी ने देश में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए— प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण  जन और वितरण प्रणाली को मजबूत करने जैसे कदमों ने भारत की सामाजिक-आर्थिक दिशा को नई दिशा दी। 1971 के चुनाव में “गरीबी हटाओ” के नारे के साथ मिली उनकी ऐतिहासिक विजय ने देश में एक नई आशा का संचार किया। उस समय उनके साथ कई प्रखर समाजवादी विचारक और नेता जुड़े थे, जिनमें पी.एन. हक्सर, चंद्रजीत यादव, के.आर. गणेश, नंदिनी सत्पथी और स्वयं बहुगुणा जी प्रमुख थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में बहुगुणा जी का कार्यकाल एक नई ऊर्जा और परिवर्तन की ल...

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मर्यादा और सम्मान का महत्व

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अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मर्यादा और सम्मान का महत्व हाल के समय में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत के संदर्भ में दिए गए कुछ कथनों ने स्वाभाविक रूप से भारतीय जनमानस को आहत किया है। किसी भी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा दूसरे संप्रभु देश के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी न केवल असम्मानजनक प्रतीत होती है, बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी अनुचित मानी जाती है। भारत, जिसे हम India के नाम से जानते हैं, केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और भावनाओं का केंद्र है। हमारे शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”, अर्थात् माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। यह भावना हर भारतीय के हृदय में गहराई से निहित है। भारत और अमेरिका के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से सहयोग और साझेदारी पर आधारित रहे हैं। दोनों देशों ने समय-समय पर वैश्विक शांति, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में साथ काम किया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सदैव भारत-अमेरिका संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में सकारात्मक पहल की है। ऐसे में किसी भी प्रकार की तीखी या...

माइंडसेट बदले-समाज बदले

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आजकल विवाह योग्य लड़कियां शादी से कतरा रही हैं। परिवारों में हिंसा का माहौल उन्हें दाम्पत्य जीवन में कदम रखने से डरा रहा है। रोजाना समाचार पत्रों में नित्य प्रति किसी न किसी की हत्या, मारपीट और घरेलू हिंसा की घटनाएं छाई रहती हैं। विवाहोपरांत मुकदमेबाजी से अदालतें भरी पड़ी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे समाचारों से मन व्यथित होता है कि हमने किस प्रकार का समाज बना दिया है। एक बार कोर्ट में एक महिला जज से बतौर वकील रूबरू होने का अवसर मिला। जज महोदया ने कहा कि पहले लड़कियों में सहने की ताकत होती थी, जो अब नहीं रही। मेरा उत्तर था कि उनमें जुल्म सहने की सहनशीलता होती थी, पर अब क्योंकि वे जुल्म सहना नहीं चाहतीं, इसलिए उन पर इल्जाम लगाया जाता है। इस जवाब से जज महोदया निरुत्तर रह गईं। असल सवाल माइंडसेट बदलने का है। हिंसा और डर का माहौल: भारतीय समाज में घरेलू हिंसा एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या 4,45,256 थी, जिसमें पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता (धारा 498A) के म...

श्रीमती मीरा कुमार के साथ विशेष साक्षात्कार

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श्रीमती मीरा कुमार के साथ विशेष साक्षात्कार स्थान: श्रीमती मीरा कुमार का निवास, दिल्ली   दिनांक: 18.04.2026  (श्री डी.पी. राय के सौजन्य से)   साक्षात्कारकर्ता: एडवोकेट राम मोहन (सामाजिक कार्यकर्ता) एवं श्रीमती कृष्णा कांता साक्षात्कारकर्ता: आदरणीया श्रीमती मीरा कुमार जी, सबसे पहले आपको और आपके परिवार को हमारा हार्दिक नमन। आज हम आपके पिता, स्वतंत्रता सेनानी, महान समाज सुधारक और पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम जी के जीवन और योगदान पर आपसे बात करना चाहते हैं।  मीरा कुमार: स्वागत है आप दोनों का। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आप बाबूजी के जीवन से जुड़े स्मृतियों और उनके योगदान को जानने आए हैं। साक्षात्कारकर्ता: आप अक्सर अपने पिता से स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के बारे में पूछा करती थीं। उन्होंने जातिगत उत्पीड़न का शिकार होते हुए भी राष्ट्र के लिए क्यों संघर्ष किया? क्या उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि पहले छुआछूत समाप्त हो, फिर आजादी? मीरा कुमार:हाँ, मैं बचपन में अक्सर पिताजी से पूछती थी — “पिताजी, जब आपको खुद स्कूल में दृष्टि से अलग देखा जाता था, छ...

"इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता: हिंसा की बजाय संवाद की राह चुनने का स्वागत" "We Welcome the US-Iran Peace Talks in Islamabad and Prays for Its Success"

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"इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता: हिंसा की बजाय संवाद की राह चुनने का स्वागत" इस्लामाबाद में आज अमेरिका और ईरान के बीच हो रही शांति वार्ता का हम सभी शांति कर्मी पूरे मन से स्वागत करते है। हम इस ऐतिहासिक प्रयास की सफलता की हार्दिक कामना करते हैं। जब दुनिया युद्ध की आग में जल रही थी, तब पाकिस्तान की भूमि पर ये बातचीत की उम्मीद की किरण जग रही है। यह वार्ता न सिर्फ दो देशों के बीच, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और विश्व शांति के लिए एक नई शुरुआत साबित हो सकती है। हमारी पूज्य निर्मला देशपांडे जी हमेशा कहा करती थीं — “गोली नहीं- बोली चाहिए, युद्ध नहीं- बुद्ध चाहिए, जंग नहीं- अमन चाहिए”। आज इन शब्दों की प्रासंगिकता और भी गहरी लग रही है। गोली की जगह बोली, युद्ध की जगह बुद्धिमत्ता और जंग की जगह अमन — यही वह रास्ता है जो मानवता को बचाता है। हिंसा कभी कोई समस्या हल नहीं करती, वह तो सिर्फ और समस्याएं पैदा करती है। संवाद ही एकमात्र रास्ता है जो सम्मान के साथ मतभेदों को सुलझा सकता है। इस युद्ध में जो अनगिनत निरपराध लोग मारे गए, उनमें सबसे ज्यादा दर्द स्कूली बच्चों, मासूम महिला...

ईरानी जनता: महात्मा गांधी के सत्याग्रह की याद दिलाती एक मिसाल

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ईरानी जनता: महात्मा गांधी के सत्याग्रह की याद दिलाती एक मिसाल हाल के दिनों में मध्य पूर्व की स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को परमाणु कार्यक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर सख्त ultimatum दिया है। उन्होंने खुलकर धमकी दी कि अगर ईरान उनकी शर्तें नहीं मानता तो देश के पावर प्लांट्स, ब्रिजेस और अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट कर दिया जाएगा, जिससे "एक सभ्यता रातोंरात मर सकती है"। इस धमकी के जवाब में ईरानी सरकार ने युवाओं, छात्रों, एथलीट्स और आम नागरिकों से अपील की कि वे देश के पावर प्लांट्स के चारों ओर मानव श्रृंखला (human chain) बनाएं। यह अपील सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं थी। 7 अप्रैल 2026 को ईरान के कई शहरों में—अहवाज, बुशहर, तेहरान और अन्य जगहों पर—हजारों लोग पावर प्लांट्स और ब्रिजेस के सामने खड़े हो गए। उन्होंने हाथों में हाथ डालकर एक लंबी मानव दीवार बना दी। राज्य मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर वीडियो वायरल हुए, जिसमें युवा, महिलाएं और बच्चे भी शामिल दिखे। ईरानी उप युवा मामलों के मंत्री अलीर...

शांति की आग: गोली नहीं, बोली चाहिए

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शांति की आग: गोली नहीं, बोली चाहिए    बारिश के तूफान की तरह, दुनिया में चल रही जंगों का शोर भी लगातार सुनाई दे रहा है। और फिर भी, कुछ लोग—जिन्हें युद्ध सिर्फ़ एक "तमाशा" लगता है—खुशी से कहते हैं, "वाह, कितना रोमांचक!"। लेकिन मैंने देखा है वो दर्द। वो बच्चे जो भूख से तड़पते हैं, वो माँएँ जो बेघर होकर डर में जीती हैं, वो किसान जो फसल खराब होने से रातें काटते हैं।   हम सब—चाहे हम शहर में ऐश की जिंदगी जी रहे हों, या सिर्फ़ स्क्रॉल करते रहें—उस बेबसी से अलग नहीं हैं। परपीड़ा हमारी ही पीड़ा है। अगर हमने इस आग को नहीं बुझाया, तो ये हमारे घरों को भी जला देगी।   मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे 34 साल तक निर्मला देश पांडे दीदी के साथ काम करने का मौका मिला। वो संत विनोबा भावे की मानस पुत्री थीं—भूदान की पैदल यात्रा से शुरू करके दक्षिण एशिया तक, जम्मू-कश्मीर के आतंकपीड़ित इलाकों से लेकर बिहार के जहानाबाद और महाराष्ट्र के नक्सल क्षेत्रों तक। हम साथ गए, साथ चले, साथ सुने।   दीदी कहती थीं: "युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए। जंग नहीं, अमन चाहिए। गोली नहीं, बोली ...