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Letter of Sympathy to Iranian Embassy on Hon'ble Ayatollah Khamenei's Demise, by the Gandhi Global Family.

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Your Excellency Mohammad Fathali,   Ambassador Extraordinary and Plenipotentiary of the Islamic Republic of Iran to India, On behalf of the Gandhi Global Family, an international forum dedicated to promoting peace, non-violence, humanism, and the timeless principles of Mahatma Gandhi, I extend our heartfelt and profound condolences to you, the Government and people of the Islamic Republic of Iran, and all those who revered the late Imam Ayatollah Ruhollah Khomeini. We join the Iranian nation in mourning the loss of a visionary leader whose life and legacy profoundly shaped the course of history. Imam Khomeini stood as a symbol of courage, resilience, and unwavering commitment to justice, self-determination, and the dignity of his people. His leadership during a transformative era inspired millions worldwide in their pursuit of sovereignty and moral integrity. Though our paths draw from the eternal teachings of non-violence and truth as embodied by Mahatma Gandhi, w...

शांति की वो कामना, जो युद्ध की आग में जल रही है -nityanootan.blogspot.com/05.03.2026

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शांति की वो कामना, जो युद्ध की आग में जल रही है  आज दुनिया दो तरफ़ खड़ी है—एक तरफ़ अमेरिका-इज़राइल की मिसाइलें, दूसरी तरफ़ ईरान की जवाबी गूँज। स्कूलों पर हमले, जलपोतों का विनाश, बच्चे मलबे में, माँएँ रोती हुईं। और बीच में वो पुराना बहाना—"Everything is fair in love and war"।   पर सच ये है—युद्ध में कुछ भी "fair" नहीं होता। स्कूल पर हमला युद्ध अपराध है। बच्चे मरते हैं, तो इंसानियत मर जाती है। ईरान कमज़ोर हुआ है, पर सरेंडर नहीं करेगा। अमेरिका की बातें प्रोपगैंडा हैं—कुछ दिन में खत्म हो जाएगा, ये सिर्फ़ घरेलू समर्थन के लिए।   फिर भी, एक आवाज़ है जो चुप नहीं—भारत की। वो कहती है: अहिंसा, प्रेम, सहयोग। हम चाहते हैं कि सूरज सबको रोशनी दे, चाँदनी सबको सुकून, हवा सबको ठंडक, पानी सबको मिठास—बिना किसी की लाश पर।   ये कामना आसान नहीं। सत्ता, तेल, हथियार—ये सब अभी भी मज़बूत हैं। लेकिन इतिहास गवाह है—युद्ध रुके हैं। यूरोप में, अफ्रीका में। तो क्यों नहीं पूरी दुनिया में?   अगर हम सब मिलकर कहें—"हम युद्ध नहीं चाहते"—तो कोई सरकार इसे अनदेखा नहीं क...

●भारत-ईरान: पुरानी दोस्ती, आज की चुनौतियाँ -nityanootan.blogspot.com/03.03.2026

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●भारत-ईरान: पुरानी दोस्ती, आज की चुनौतियाँ भारत और ईरान का रिश्ता सिर्फ पड़ोसियों का नहीं—यह हजारों साल पुरानी जड़ों का है। आर्यन संस्कृति, फारसी-संस्कृत भाषा, अग्नि पूजा, नवरोज़-बसंत, शतरंज-चतुरंग—सबमें एक-दूसरे की छाप। इतिहास में अचेमेनिड साम्राज्य ने सिंध तक पहुंचा, मुग़लों ने फारसी को दरबार की भाषा बनाया, और आजादी के बाद भी ईरान ने हमें तेल, चाबहार पोर्ट और क्षेत्रीय संतुलन दिया।     ●लेकिन आज जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले किए हैं, तो भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए? नैतिकता कहती है—जिस पर जुल्म हो रहा है, उसके साथ खड़े हो। गुटनिरपेक्षता का मतलब चुप्पी नहीं—सही के साथ बोलना है। ईरान ने हमेशा भारत को दोस्त माना; अब हमारी बारी है।  ●फिर भी हकीकत कड़वी है। मोदी सरकार ने हमलों की निंदा नहीं की—बस "चिंता" जताई, "संयम" कहा। क्यों? क्योंकि 90 लाख भारतीय मध्य- पूर्व में काम करते हैं—उनकी जान पहले। तेल कीमतें उछल रही हैं, चाबहार पोर्ट पर काम रुक सकता है। इसराइल से डिफेंस और टेक, अमेरिका से ट्रेड—सब दांव पर।   ●तो क्या करें? चुप रहना "स्मार्ट" ...

विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज: लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा. Voice Against Foreign Interference: Defending Democracy and Sovereignty

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विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज: लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा  आज विश्व में राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। मैं न तो खुमैनी का समर्थक हूं और न ही किसी भी प्रकार की मजहबी कट्टर शासन व्यवस्था का। हम तो उस समय भी ईरान के रजा पहलवी के निरंकुश शासन का विरोध कर रहे थे, जब वह राजशाही के नाम पर लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रहे थे। लेकिन हम इस बात के जरूर समर्थक हैं कि प्रत्येक देश के नागरिकों को अपने लिए शासन व्यवस्था चुनने का अधिकार है, न कि कोई अन्य देश उनके भविष्य को तय करे। हमने अफगानिस्तान, लीबिया, सूडान और इराक का हश्र देखा है कि किस प्रकार वहां की सत्ता को लोगों को एक अच्छी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था देने के नाम पर ठगा गया। आज वहां घोर निरंकुश धार्मांध व्यवस्था कायम हो गई है। आज सवाल किसी हिंदू-मुस्लिम या शिया-सुन्नी का नहीं होकर जनता के अपने शासन का है। क्या हमारी किस्मत का फैसला कोई सैन्य दृष्टि से संपन्न ताकतें करेंगी या हम खुद करेंगे? सवाल हमारी संप्रभुता का है। इसलिए हम सद्दाम, लीबिया के शासक गद्दाफी और खुमैनी की ...

पानीपत के अतिथि मजदूरों की पीड़ा: नागरिक मंच की अपील – शीघ्र समाधान जरूरी

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पानीपत के अतिथि मजदूरों की पीड़ा: नागरिक मंच की अपील – शीघ्र समाधान जरूरी पानीपत सैकड़ों वर्षों से हाथकरघा उद्योग का गढ़ रहा है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में पानीपत रिफाइनरी और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) ने इस ऐतिहासिक शहर को औद्योगिक नक्शे पर नई ऊंचाई दी है। इन बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए, परंतु इनके साथ ही एक गंभीर समस्या भी उभरी है – प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थिति। आज पानीपत के अधिकांश कारखानों और रिफाइनरी में काम करने वाले मजदूर विभिन्न प्रांतों से आए अतिथि मजदूर हैं। ये लोग अपने घर-बार, परिवार छोड़कर यहां आते हैं, लेकिन उन्हें बेहद कम मजदूरी और अत्यंत अस्वास्थ्यकर (अनहाइजीनिक) वातावरण में रहना पड़ता है। कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। जब लॉकडाउन लगा तो इनमें से अधिकांश मजदूर बिना किसी परिवहन साधन के, भूखे-प्यासे अपने गांवों की ओर पैदल निकल पड़े। कारण साफ था – वे ठेकेदारों के तहत अनरजिस्टर्ड मजदूर थे। न कोई लिखित अनुबंध, न कोई सामाजिक सुरक्षा, न ही कोई सरकारी मदद। एक समय था जब पानिपत के कारखानों में मजदूरों...

"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" nityanootan.blogspot.com/25.02.2026

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"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" – समय आ गया है बच्चों को इन आवासीय गुरुकुलों, मदरसों और ईसाई धार्मिक प्रशिक्षण स्कूलों  से मुक्त करने का ●भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के लिए होने लगे तो चुप रहना अपराध है। हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर प्रयागराज में POCSO एक्ट के तहत यौन शोषण के आरोप लगे हैं, लेकिन सवाल किसी एक व्यक्ति या एक आश्रम का नहीं है। सवाल उन हजारों आवासीय धार्मिक संस्थानों का है – हिंदू गुरुकुलों, मुस्लिम मदरसो, ईसाई चर्च स्कूलों और मठ-आश्रमों का – जहां लंबे समय से बच्चों (खासकर नाबालिग लड़कों और लड़कियों) तथा महिलाओं (ननों, शिष्याओं, देवदासियों) के खिलाफ यौन शोषण की शिकायतें बार-बार आ रही हैं। कई मामलों में कोर्ट में केस दर्ज हुए, दोषियों को सजा भी मिली, लेकिन समस्या जड़ से नहीं उखड़ी। यह कोई प्राचीन या मिथकीय बात नहीं है – यह आज की वास्तविकता है।  ●गुरुकुल और हिंदू आश्रमों में शोषण क...

कमजोर वर्गों की सुरक्षा: एक गंभीर प्रश्न. Nityanootan.blogspot.com/23.02.2026

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कमजोर वर्गों की सुरक्षा: एक गंभीर प्रश्न 1982-83 के आसपास, मैंने प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली से दिल्ली में उनके कार्यालय में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान मैंने उनसे अनुरोध किया कि वह पानीपत आएं, जहां हम एक बड़ी सभा का आयोजन करना चाहते थे। अरुणा जी मुस्कुराईं और बातचीत आगे बढ़ी। लेकिन 1984 में पानीपत में फरवरी के महीने में भयंकर सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ। इसके परिणामस्वरूप, अनेक सिख भाइयों पर हमले हुए, गुरुद्वारों को जलाया गया, उनकी संपत्तियों को लूट लिया गया और कई लोग घायल हुए। जब अरुणा जी को इन घटनाओं का पता चला, तो वह पानीपत आईं। मेरा कार्य था उन्हें रिसीव करना और उन तमाम घटनास्थलों पर ले जाना। दुर्भाग्यवश, उनके एक्सीडेंट के कारण उनकी एक टांग में फ्रैक्चर था। बड़ी मुश्किल से वह गाड़ी से उतरीं। मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें ले जाने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने मुझसे एक सवाल किया, "तुम तो कहते थे कि तुम्हारे पास बहुत आदमी हैं, पर वह आदमी कहां थे जब इन अल्पसंख्यक सिखों पर हमले हो रहे थे?" यह प्रश्न मेरे लिए चुनौती बन गया, और उसके ब...