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विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज: लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा. Voice Against Foreign Interference: Defending Democracy and Sovereignty

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विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज: लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा  आज विश्व में राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। मैं न तो खुमैनी का समर्थक हूं और न ही किसी भी प्रकार की मजहबी कट्टर शासन व्यवस्था का। हम तो उस समय भी ईरान के रजा पहलवी के निरंकुश शासन का विरोध कर रहे थे, जब वह राजशाही के नाम पर लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रहे थे। लेकिन हम इस बात के जरूर समर्थक हैं कि प्रत्येक देश के नागरिकों को अपने लिए शासन व्यवस्था चुनने का अधिकार है, न कि कोई अन्य देश उनके भविष्य को तय करे। हमने अफगानिस्तान, लीबिया, सूडान और इराक का हश्र देखा है कि किस प्रकार वहां की सत्ता को लोगों को एक अच्छी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था देने के नाम पर ठगा गया। आज वहां घोर निरंकुश धार्मांध व्यवस्था कायम हो गई है। आज सवाल किसी हिंदू-मुस्लिम या शिया-सुन्नी का नहीं होकर जनता के अपने शासन का है। क्या हमारी किस्मत का फैसला कोई सैन्य दृष्टि से संपन्न ताकतें करेंगी या हम खुद करेंगे? सवाल हमारी संप्रभुता का है। इसलिए हम सद्दाम, लीबिया के शासक गद्दाफी और खुमैनी की ...

पानीपत के अतिथि मजदूरों की पीड़ा: नागरिक मंच की अपील – शीघ्र समाधान जरूरी

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पानीपत के अतिथि मजदूरों की पीड़ा: नागरिक मंच की अपील – शीघ्र समाधान जरूरी पानीपत सैकड़ों वर्षों से हाथकरघा उद्योग का गढ़ रहा है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में पानीपत रिफाइनरी और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) ने इस ऐतिहासिक शहर को औद्योगिक नक्शे पर नई ऊंचाई दी है। इन बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए, परंतु इनके साथ ही एक गंभीर समस्या भी उभरी है – प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थिति। आज पानीपत के अधिकांश कारखानों और रिफाइनरी में काम करने वाले मजदूर विभिन्न प्रांतों से आए अतिथि मजदूर हैं। ये लोग अपने घर-बार, परिवार छोड़कर यहां आते हैं, लेकिन उन्हें बेहद कम मजदूरी और अत्यंत अस्वास्थ्यकर (अनहाइजीनिक) वातावरण में रहना पड़ता है। कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। जब लॉकडाउन लगा तो इनमें से अधिकांश मजदूर बिना किसी परिवहन साधन के, भूखे-प्यासे अपने गांवों की ओर पैदल निकल पड़े। कारण साफ था – वे ठेकेदारों के तहत अनरजिस्टर्ड मजदूर थे। न कोई लिखित अनुबंध, न कोई सामाजिक सुरक्षा, न ही कोई सरकारी मदद। एक समय था जब पानिपत के कारखानों में मजदूरों...

"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" nityanootan.blogspot.com/25.02.2026

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"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" – समय आ गया है बच्चों को इन आवासीय गुरुकुलों, मदरसों और ईसाई धार्मिक प्रशिक्षण स्कूलों  से मुक्त करने का ●भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के लिए होने लगे तो चुप रहना अपराध है। हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर प्रयागराज में POCSO एक्ट के तहत यौन शोषण के आरोप लगे हैं, लेकिन सवाल किसी एक व्यक्ति या एक आश्रम का नहीं है। सवाल उन हजारों आवासीय धार्मिक संस्थानों का है – हिंदू गुरुकुलों, मुस्लिम मदरसो, ईसाई चर्च स्कूलों और मठ-आश्रमों का – जहां लंबे समय से बच्चों (खासकर नाबालिग लड़कों और लड़कियों) तथा महिलाओं (ननों, शिष्याओं, देवदासियों) के खिलाफ यौन शोषण की शिकायतें बार-बार आ रही हैं। कई मामलों में कोर्ट में केस दर्ज हुए, दोषियों को सजा भी मिली, लेकिन समस्या जड़ से नहीं उखड़ी। यह कोई प्राचीन या मिथकीय बात नहीं है – यह आज की वास्तविकता है।  ●गुरुकुल और हिंदू आश्रमों में शोषण क...

कमजोर वर्गों की सुरक्षा: एक गंभीर प्रश्न. Nityanootan.blogspot.com/23.02.2026

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कमजोर वर्गों की सुरक्षा: एक गंभीर प्रश्न 1982-83 के आसपास, मैंने प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली से दिल्ली में उनके कार्यालय में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान मैंने उनसे अनुरोध किया कि वह पानीपत आएं, जहां हम एक बड़ी सभा का आयोजन करना चाहते थे। अरुणा जी मुस्कुराईं और बातचीत आगे बढ़ी। लेकिन 1984 में पानीपत में फरवरी के महीने में भयंकर सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ। इसके परिणामस्वरूप, अनेक सिख भाइयों पर हमले हुए, गुरुद्वारों को जलाया गया, उनकी संपत्तियों को लूट लिया गया और कई लोग घायल हुए। जब अरुणा जी को इन घटनाओं का पता चला, तो वह पानीपत आईं। मेरा कार्य था उन्हें रिसीव करना और उन तमाम घटनास्थलों पर ले जाना। दुर्भाग्यवश, उनके एक्सीडेंट के कारण उनकी एक टांग में फ्रैक्चर था। बड़ी मुश्किल से वह गाड़ी से उतरीं। मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें ले जाने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने मुझसे एक सवाल किया, "तुम तो कहते थे कि तुम्हारे पास बहुत आदमी हैं, पर वह आदमी कहां थे जब इन अल्पसंख्यक सिखों पर हमले हो रहे थे?" यह प्रश्न मेरे लिए चुनौती बन गया, और उसके ब...

"महात्मा गांधी: एक निडर सत्य का संदेश"

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"महात्मा गांधी: एक निडर सत्य का संदेश" ●आज सुबह की बातचीत में हमने महात्मा गांधी के विचारों को फिर से जीवित किया। गांधीजी कोई मजबूरी नहीं थे—वे एक धांत मजबूती थे। अहिंसा उनके लिए कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा हथियार थी। हमने देखा कि कैसे सत्याग्रह, धैर्य और सामूहिक दबाव से क्रूर से क्रूर ताकत भी झुक सकती है। किसान आंदोलन इसका जीता-जागता प्रमाण है—बिना हिंसा के सरकार को झुकना पड़ा, क्योंकि जनता एकजुट थी। लेकिन सवाल उठता है: क्या अहिंसा हर जगह काम करती है? अगर सामने वाला बिना शर्म का तानाशाह हो, तो क्या सिर्फ सत्य बोलने से जीत मिलेगी? जवाब है—नहीं। अहिंसा तभी विजयी होती है, जब उसके साथ समय, धैर्य और वैश्विक दबाव जुड़े हों। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग—सबने यही किया। उन्होंने अहिंसा को नैतिक ताकत दी, लेकिन असल दबाव था—आर्थिक प्रतिबंध, जनचेतना और अंतरराष्ट्रीय निंदा। ●भारत में आज भी ये रास्ता प्रासंगिक है। कश्मीर हो या नॉर्थ-ईस्ट, अहिंसात्मक प्रतिकार ने बहुत कुछ बदला, लेकिन सशस्त्र ताकत के सामने अकेला व्यक्ति नहीं टिकता। इसलिए जरूरत है—सामूहिक शक्ति की। देश में...

"हम सब कहते हैं 'उज्ज्वल भारत', Ram Mohan Rai/16.02.2026

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"हम सब कहते हैं 'उज्ज्वल भारत', लेकिन आज सुबह-सुबह 80 प्रतिशत लोग उठकर बस एक सवाल सोचते हैं—'आज राशन मिलेगा या नहीं?' अमेरिका से डील हुई, टैरिफ घटे—माल निर्यात बढ़ेगा। लेकिन किसान? वो जो पहले से ही कर्ज़ में डूबा है, अब सस्ते अमेरिकी सोयाबीन, कॉर्न, चिकन से अपना बाजार गँवा देगा। वो पाँच किलो अनाज से आगे कभी नहीं निकलेगा। रूस से तेल छोड़ना—कहते हैं 'स्ट्रैटेजी' है। पर सच्चाई? अमेरिकी तेल 30 % महँगा है। हमारे पेट्रोल-पंपों की कीमत बढ़ेगी, ट्रक वाले ड्राइवरों की कमाई घटेगी, दूध-सब्जी महँगी हो जाएगी। फिर भी चुप्पी। चीन से क्या लेना? वो गरीबी खत्म करने की मशीन है—हर गाँव में फैक्ट्री, स्कूल, अस्पताल। हम? 'फ्री राशन' और 'मेक इन इंडिया' का पोस्टर। एक तरफ़ दुनिया देखती है, दूसरी तरफ़ गाँवों में बच्चे ड्रॉपआउट हो जाते हैं। इगो छोड़ो। दुनिया से दोस्ती करो, पर अपनी जड़ें मजबूत करो। वरना ये 'विश्वगुरु' का सपना, बस सोशल मीडिया का ठुनका बनके रह जाएगा।" Ram Mohan Rai. Nityanootan.blogspot.com/ 16.02.2026

●बांग्लादेश चुनाव: साम्प्रदायिक तत्वों की हार, भारत-विरोधी शक्तियों का पतन और नई सरकार की चुनौतियां - राम मोहन राय (नित्यनूतन - 14.02.2026)

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●बांग्लादेश चुनाव: साम्प्रदायिक तत्वों की हार, भारत-विरोधी शक्तियों का पतन और नई सरकार की चुनौतियां बांग्लादेश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों ने न केवल देश की राजनीतिक दिशा को एक नया मोड़ दिया है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव डाला है। इन चुनावों को अप्रत्यक्ष रूप से अति साम्प्रदायिक तत्वों और भारत-विरोधी पार्टियों की हार के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह जीत पूर्ण रूप से लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विजय नहीं है। बांग्लादेश की जनता के सामने जब दो प्रमुख राजनीतिक ताकतों में से एक को चुनने की मजबूरी थी, तो उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को अपना समर्थन दिया। इस लेख में हम इन चुनावों के ऐतिहासिक संदर्भ, प्रमुख खिलाड़ियों की भूमिका, हार-जीत के कारणों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।  ●ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बीएनपी का उदय और शेख मुजीब का युग बीएनपी की स्थापना को समझने के लिए हमें बांग्लादेश के इतिहास में झांकना होगा। यह पार्टी जनरल जिया उर रहमान द्वारा 1978 में स्थापित की गई थी, जो शेख मु...