जंग: समस्या खुद है, समाधान शांति है - राम मोहन राय/12.03.2026
“जंग तो खुद ही एक मसला है,
यह मसलों का हल क्या होगी?”
ये शायर की पंक्तियाँ हर दौर में सच्ची साबित होती रही हैं। चाहे प्राचीन काल हो, मध्य युग हो या आज का आधुनिक विश्व, युद्ध कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सका। बल्कि युद्ध स्वयं सबसे बड़ा मसला बनकर खड़ा होता है। आज जब दुनिया के विभिन्न कोनों में संघर्ष जारी हैं, तो उन लड़ाइयों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे हम भी उसकी छाया महसूस कर रहे हैं। यह छाया अब धीरे-धीरे हर घर तक पहुँच रही है।
दूर के मैदानों में गोले चल रहे हैं, तो क्या हमारा क्या लेना-देना? यह सोच आज गलत साबित हो रही है। लड़ाई के मैदानों से दूर रहने वाले देशों को शायद लगता हो कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। विशेषकर उन देशों में जो युद्ध क्षेत्रों के पड़ोसी या ऊर्जा आपूर्ति के महत्वपूर्ण केंद्र हैं, वहाँ का असर बिना सीधे शामिल हुए भी साफ़ दिखाई दे रहा है। भारत जैसे देश में, जहाँ लाखों-करोड़ों आम नागरिक रोज़मर्रा की जिंदगी जी रहे हैं, युद्ध की लहरें अब घर-घर तक पहुँचने लगी हैं।
पहला असर तो गैस की किल्लत के रूप में सामने आया। घरेलू सिलिंडर महँगे हो रहे हैं, रसोई की चूल्हा ठंडा पड़ रहा है। धीरे-धीरे यह असर पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, परिवहन महँगा हो रहा है, सब्जी-फल, दूध और रोज़ की जरूरत की चीजें महँगी हो रही हैं। आवागमन प्रभावित हो रहा है, व्यापार ठप पड़ रहा है और अर्थव्यवस्था की रगें काँप रही हैं। कल तक जो युद्ध “उनका” लगता था, आज वह “हमारा” बनता जा रहा है। हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी विचारधारा या मजहब का हो, इसकी गिरफ्त में आने वाला है।
लेकिन सबसे खतरनाक असर तो हमारे समाज में पनप रही नफरत की आग पर पड़ रहा है। देश के अंदर कुछ लोग किसी पक्ष में खड़े होकर युद्ध को “मजा” की चीज समझ रहे हैं। सोशल मीडिया पर जश्न मनाया जा रहा है, भाषण दिए जा रहे हैं, जैसे कोई खेल हो रहा हो। लेकिन यह कोई खेल नहीं है। यह मानवता का अपमान है। लड़ाई कोई तमाशा नहीं कि “वे लड़ रहे हैं, हमारा क्या लेना-देना”। असल में यह हर उस माँ का आँसू है जिसका बेटा युद्ध में खो गया, हर उस बच्चे का सपना है जिसका स्कूल बमों से उड़ गया, और हर उस परिवार का भविष्य है जो आज भूख और बेरोजगारी से जूझ रहा है।
इतिहास गवाह है – प्रथम विश्व युद्ध के बाद जिस महामारी और आर्थिक संकट ने दुनिया को झकझोर दिया, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो परमाणु भय ने मानवता को डरा दिया, वही भय आज फिर सिर उठा रहा है। युद्ध कभी किसी को विजेता नहीं बनाता; वह सबको हारने पर मजबूर कर देता है। आज के वैश्विक गाँव में कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता। एक जगह का आगज़न पूरे विश्व को जला सकता है।
तो क्या करें? चुपचाप बैठे रहें? नहीं! अब समय है कि हर व्यक्ति शांति आंदोलन का हिस्सा बने। हमें शांति का परचम लहराना होगा। हमें नारे बुलंद करने होंगे, लेकिन नारे भी शक्तिशाली और सार्थक:
गोली नहीं – बोली चाहिए!
जंग नहीं – अमन चाहिए!
युद्ध नहीं – बुद्ध चाहिए!
ये नारे सिर्फ दीवारों पर नहीं, बल्कि दिलों में उतरने चाहिए। स्कूलों में, कॉलेजों में, बाजारों में, मंदिरों-मस्जिदों-गुरुद्वारों-चर्चों में, हर जगह ये आवाज़ गूँजनी चाहिए। युवा पीढ़ी को समझना होगा कि असली बहादुरी तो शांति बनाए रखने में है, न कि युद्ध छेड़ने में। महिलाएँ, जो युद्ध का सबसे बड़ा शिकार होती हैं, उन्हें आगे आना होगा। किसान, मजदूर, शिक्षक, डॉक्टर – हर वर्ग को एकजुट होकर कहना होगा – “हम युद्ध नहीं चाहते, हम अमन चाहते हैं।”
सरकारों से भी अपील है – कूटनीति को प्राथमिकता दें, संवाद का रास्ता अपनाएँ। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति की आवाज़ मजबूत करें। लेकिन असली बदलाव तो हम आम नागरिकों से आएगा। जब हर घर से शांति की मांग उठेगी, तब ही दुनिया सुनेंगी।
आइए, आज से ही शुरू करें। अपने मोबाइल के बजाय शांति का संदेश फैलाएँ। अपने बच्चों को नफरत नहीं, मानवता सिखाएँ। पड़ोसियों से बात करें, न कि लड़ें। याद रखें – जंग खुद एक मसला है, इसका हल सिर्फ शांति है।
शांति का परचम लहराओ, अमन की बोली बोलो।
युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए – यही है सच्ची जीत।
यह लेख सिर्फ शब्द नहीं, एक पुकार है। एक पुकार हर उस इंसान के लिए जो आज महँगाई, अशांति और भय में जी रहा है। आइए, मिलकर इस पुकार को चीख बना दें। क्योंकि जब पूरा विश्व शांति का गान गाएगा, तभी असली विकास और खुशहाली आएगी।
राम मोहन राय.
Nityanootan.blogspot.com
12.03.2026
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