किसान आंदोलन और युवा

 किसान आंदोलन के हृदयंगम स्थल सिंघु बॉर्डर,दिल्ली जाने का मौका मिला। काफी चहलकदमी थी। हर एक गांव, खाप एवं किसानी समुदाय के जगह जगह या तो तंबू लगे थे अथवा ट्रैक्टर ट्रॉली पर ही घर बनाए गए थे। ये सभी जगह देश के प्रेरक किसान नेताओं के चित्रों से सुसज्जित थी। उसी समय मेरी नजर दो-तीन तंबुओं के एक बड़े समूह स्थल पर पड़ी, जहां शहीद भगत सिंह का बहुत ही आकर्षक चित्र लगा हुआ था। हम बरबस उस चित्र की ओर आकर्षित होकर वहां गए तो पाया वहां कुर्सियों पर काशीपुर (उत्तराखंड) से आई दो नवयुवतियां जोकि  आधुनिक परिवेश में ही नहीं थी ,अपितु हाव भाव में भी  थीं तथा चंडीगढ़ से आये एक युवक से बात कर रही थीं। मेरी उत्सुकता उनकी बातें सुनने की हुई कि ऐसे हालात में ये क्या बात कर रहे हैं? पर मुझे ताज्जुब हुआ कि उनकी बातचीत, का विषय सांप्रदायिकता जातीयता एवं राष्ट्रवाद था। मैं भी हौसला करके उनकी बातचीत में शामिल हो गया। उनकी बातों और तर्कों से मैं अत्यंत प्रभावित रहा। बातचीत में ही मैंने यह जानना चाहा कि वे किस संगठन से हैं अथवा किस विचारधारा से हैं तो यह पाया कि उनका किसी भी संगठन से संबंध नहीं है न ही किसी विचारधारा से कोई लेना- देना । इस पर मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई कि जिस तरह कि वे परिपक्व बातें कर रहे थे कि ऐसा हो नहीं सकता कि उनकी कोई राजनीतिक वैचारिक पृष्ठभूमि न हो, परंतु वे यह बताने में सफल रहे कि किसान आंदोलन से पहले वे सामान्य जन की तरह प्रधानमंत्री जी की विचारधारा से प्रभावित रहे थे। पर अब उनका यह तिलिस्म टूट चुका है।

          मुझे, सिंघु बॉर्डर कई  बार तथा टिकरी बॉर्डर एक बार जाने का मौका मिला। वहां अजब नजारा है। युवाओं की संख्या ज्यादा और वह भी पंजाब- हरियाणा के गांव से आए लोगों की थी । ये वही युवा थे जिनके बारे में अनेक प्रकार के दुष्प्रचार एवं भ्रांतियां ,'उड़ता पंजाब- नशेड़ी हरियाणा' की तोहमत लगाकर की जाती रही हैं। पर इस पूरे आंदोलन में कहीं भी युवाओं में ऐसे भाव प्रकट नहीं हुए। युवाओं से बातचीत भी हुई। उनके सामने यह बात भी रखी तो उनका जवाब था कि उड़ता- नशेड़ी था , पर अब नहीं रहा।

    आंदोलन स्थल पर हमें जगह-जगह भगत सिंह लाइब्रेरियां देखने को मिलीं। आंदोलन कोई नुमाइश तो है नहीं कि वहां पर प्रदर्शनियां लगी है और लोग उन्हें देख-देख कर खरीदारी कर रहे हैं। परंतु इन लाइब्रेरीयों के सामने युवाओं की भीड़ जरूर प्रभावित करती है। लाइब्रेरी संचालकों से भी मेरी बात हुई। उनका भी यह कहना था कि युवाओं में प्रगतिशील साहित्य के प्रति लगातार आकर्षण बढ़ रहा है।      

           विद्यार्थी आंदोलन में मैं भी सक्रिय रहा। हम भी समूह में युवा विद्यार्थियों से जागतिक मुद्दों पर बातचीत करते थे। पर उनके लामबंद न होने पर हमें अक्सर हताशा व निराशा मिलती थी। विद्यार्थी काल से अब तक लगभग 50 वर्षों की इस यात्रा में मेरे जैसे लोगों का यही कार्य रहा कि हम विद्यार्थी एवं युवाओं से बातचीत करें और  उनमें वैचारिक शक्ति का संचार करें। पर बहुत बड़ी सफलता हासिल नहीं हुई। परंतु इस किसान आंदोलन को देखकर अब ऐसा आभास होने लगा है कि जो काम हम 50 वर्षों में लगातार परिश्रम करने के बाद भी नहीं कर पाए, उसे आंदोलन के 70 दिनों ने कर दिया। इस आंदोलन ने युवाओं में वैचारिक परंपरा की तरफ रुझान पैदा करने का अद्भुत कार्य किया है। आंदोलन की हार- जीत के बारे में मै न तो समीक्षा करना चाहता हूं न ही कोई भविष्यवाणी, परंतु इतना जरूर कहना चाहूंगा कि इस आंदोलन के जरिए एक नई  वैचारिक युवा शक्ति का उदय होगा।

राम मोहन राय

(एडवोकेट ,सुप्रीम कोर्ट)

13.02.2021


Comments

Popular posts from this blog

Report of ‘Aaghaz-e-Dosti Aman Yatra 2026’ Begins from Rajghat with a Message of Peace, Unity and Friendship (English-Hindi)

बाबू मूल चंद जैन की विरासत का पुनर्पाठ

निरंकारी विवाह पद्धति- हमारा प्रत्यक्ष अनुभव