निंदनीय ट्रेंड और सामाजिक नैतिकता का पतन

निंदनीय ट्रेंड और सामाजिक नैतिकता का पतन

आज के दौर में, जहाँ तकनीक और संचार के साधनों ने हमें एक-दूसरे से जोड़ा है, वहीं कुछ निंदनीय प्रवृत्तियाँ भी समाज में अपनी जड़ें जमा रही हैं। देशभर में एक नया ट्रेंड उभर रहा है, जो अश्लीलता, गालियों और असभ्य व्यवहार से भरा हुआ है। यह प्रवृत्ति न केवल हमारी सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती दे रही है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और नैतिक नींव को भी हिलाने का काम कर रही है। सबसे दुखद बात यह है कि इस ट्रेंड में न केवल आम लोग, बल्कि समाज के कुछ प्रभावशाली लोग, जैसे राजनेता, भी शामिल हो रहे हैं। यह देखकर मन में निराशा और चिंता दोनों ही उभरती हैं।

सबसे अधिक चिंता का विषय है कि इस अश्लीलता और असभ्यता की लहर में माँ, बहन, बेटी जैसे पवित्र रिश्तों को भी नहीं बख्शा जा रहा। यह समाज का वह पतन है, जहाँ हम अपने ही मूल्यों को भूलकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। इससे भी अधिक शर्मनाक है कि कुछ लोग राजनेताओं की पत्नियों या परिवार की महिलाओं के पहनावे को निशाना बनाकर उसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताने लगते हैं। क्या भारतीय संस्कृति केवल कपड़ों तक सीमित है? क्या हमारी संस्कृति का आधार सम्मान, सहानुभूति और एकता नहीं है? यह हमारी नजरों का दोष है कि हम दूसरों की कमियों को तलाशते हैं और उसी को मुद्दा बनाकर अपनी कुंठा निकालते हैं। जैसा कि कहा जाता है, "नजर हमारी खराब है और कोसा जा रहा है आईना।"

सोशल मीडिया ने इस समस्या को और बढ़ावा दिया है। यह एक ऐसा मंच बन गया है, जहाँ अश्लीलता, गाली-गलौज और अनर्गल टिप्पणियों की बाढ़-सी आ गई है। लोग बिना सोचे-समझे अपनी भड़ास निकालते हैं, बिना यह विचार किए कि उनके शब्द किसी के सम्मान को ठेस पहुँचा सकते हैं। यह एक ऐसी आग है, जो अगर समय रहते न बुझाई गई, तो हमारे सामाजिक ताने-बाने को और कमजोर कर देगी।

यह समय है कि हम संभल जाएँ। हमें अपने व्यवहार, अपनी भाषा और अपनी सोच को सुधारने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि असली संस्कृति कपड़ों या बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता में निहित है। सोशल मीडिया पर हमें ऐसी सामग्री को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, जो नफरत और अश्लीलता को जन्म दे। इसके बजाय, हमें सकारात्मकता, प्रेरणा और एकता को प्रोत्साहित करना चाहिए।

आइए, हम सब मिलकर इस निंदनीय ट्रेंड को रोकने का संकल्प लें। अपनी भाषा को शुद्ध करें, अपने विचारों को सकारात्मक बनाएँ और समाज में सम्मान और मर्यादा को पुनर्जनन दें। क्योंकि अगर हम आज नहीं संभले, तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हमें इस पतन के लिए दोषी ठहराएँगी। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम एक ऐसा समाज बनाएँ, जहाँ हर व्यक्ति का सम्मान हो, चाहे वह किसी भी लिंग, वर्ग या पृष्ठभूमि से हो। संभल जाओ, समय अभी भी हमारे हाथ में है।
Ram Mohan Rai .
13.09.2025

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