हमारे पिता-भाई जी !



 

हमारे पिता -भाई जी !

        भाई जी के नाम से विख्यात डॉ एस . एन.   सुब्बाराव जी मेरे प्रति सदा अनुरागी एवं स्नेही रहे हैं। पिता की तरह उनका प्यार  हमेशा बना रहा। हफ्ते में एक दो बार तो फोन पर बात होती ही थी और यदि मुझसे कोताही होती तो वे मेरी कुशलता का समाचार पूछते। ऐसा व्यवहार उनका अपने सभी साथियों, अनुयायियों एवं कृपा पात्र लोगों पर था। 

    मेरे  पुत्र उत्कर्ष के विवाह के बाद मेरा 23 अक्टूबर को अपनी ससुराल उदयपुर जाने का कार्यक्रम बना। इसी बीच मुझे पता चला कि भाई जी जयपुर आ गए हैं। मैंने उनके सहयोगी श्री देसाई एवं श्री धर्मेंद्र कुमार के माध्यम से उनसे बातचीत की तथा कहा कि उदयपुर जाता हुआ अथवा 27 अक्टूबर को वापस आता हुआ उनसे भेंट करना चाहूंगा ।इसलिए मैंने अपनी वापसी की टिकट 27 अक्टूबर की  जयपुर- उदयपुर इंटरसिटी ट्रेन से करवाई । इत्तेफाक से उस दिन राजस्थान में सिविल परीक्षा होने के कारण नेट बंद था। परंतु ट्रेन में ही मुझे मेरे मोबाइल पर सूचना दी गई कि आदरणीय भाई जी उस दिन प्रात: ही महानिर्वाण कर चुके हैं और दिन के 12 बजे ही उनके पार्थिव शरीर को जोरा 

(मध्यप्रदेश) ले जाया जाएगा। इस हालत में सभी उपलब्ध साधनों का उपयोग करते हुए भी मैं किसी भी तरह से भाई जी के पार्थिव शरीर के दर्शन करने नहीं पहुंच सकता था और न ही ऐसी स्थिति में रहा कि जोरा जा सकूं ,अतः ना जा सका। जिस बात का मुझे बहुत ही अफसोस रहा या यदि यूं कहूं कि आत्मग्लानि रही तो दो राय नहीं होगी ।

         7 नवंबर को भाई जी के अत्यंत समर्पित अनुयायी श्री सुरेश राठी का फोन आया कि वह भाई जी की अस्थि कलश यात्रा को लेकर पानीपत आ रहे हैं तथा उनका आग्रह था कि मैं उनके साथ चलूं एवं अपने हाथों से भाई जी की अस्थियों का विसर्जन कुरुक्षेत्र में उसी स्थान पर करूं, जहां 12 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी के अवशेषों को सरोवर में भेंट किया गया था। मेरे संतोष का कोई ठिकाना नहीं था कि अपनी मृत्यु के पश्चात भाई जी का मेरे प्रति स्नेह पूर्ववत है।

      कल 9 नवंबर को उनकी उनके अस्थि अवशेष  पानीपत में आए और निर्मला देशपांडे संस्थान में चल रहे हाली अपना स्कूल के प्रत्येक बच्चे ने भाई जी के प्रिय भजन जय जगत व सर्वधर्म प्रार्थना का गायन कर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए ।भाई जी को स्कूल के प्रत्येक बच्चे से बहुत स्नेह था। अपने जीवन काल में वे इन्हें मिलने तीन बार आए थे। भाई जी की इच्छानुसार ही इन बच्चों के लिए प्रीतिभोज का आयोजन किया गया तथा उन्हें भावपूर्ण विदाई दी गई।   

       पानीपत में ही स्व0 सोम भाई की पुण्यस्थली खादी आश्रम पर समाधि स्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर   कुरुक्षेत्र के रास्ते में स्थान -स्थान पर सैकड़ों स्त्री-पुरुष तथा विशेषकर किसानों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और अंततः कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर जिसके बारे में विख्यात है कि स्वयं भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पत्ति के समय यहां यज्ञ का आह्वान किया था के तट पर उसी जगह, जहां पूज्य बापू की अस्थियां विसर्जन की गई थी, भाई जी की अस्थियों का  विसर्जन किया गया।  

     यह बहुत ही आत्मिक  प्रसंग है। जिसे पाकर मैं  आत्मविभोर हूं तथा स्वयं को भाई जी के आशीर्वाद से परिपूर्ण मानता हूं।

राम मोहन राय

09.11.2021

【नित्यनूतन वार्ता】


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