Padma Kaushik

*यज्ञमय परिवार* 
पद्मा मेरे सुपुत्र उत्कर्ष की सहकर्मी है .  पर जब सुधा-मारुति की बेटी अंजना की शादी में आने का कार्यक्रम बना तो उनका भी आग्रह रहा कि हम उनके घर भी आये.  आज हमे उनके यहां जाने का सौभाग्य मिला था. 
   वहां जाने पर पता चला कि पूरा परिवार ही सुसंस्कृत एवं  धर्म-परायण है. यदि तमिल-भारतीय परिवार की मर्यादाओं तथा रहन सहन को देखना है तो इससे अच्छा कुछ नही है. 
     हमारे घर पहुंचने पर सभी लोग अत्यंत प्रसन्न व आनंदित हुए.  एसा लगा ही नहीं कि हम किन्हीं अपरिचित लोगों से मिल रहे हों. जयेश भाई कहते हैं कि पानी मे तेल मिलना मात्र सम्पर्क है जबकि इसका दूध में मिलना समबन्ध है. यहां हम आपसी प्रिय संबन्धों को बढ़ाने आए थे. 
  परिवार के मुखिया श्री सुन्दर जी तो एसे लगे मानो कोई सगा भाई अनेक वर्षो अथवा जन्मों के बाद मिला हो.  हँस मुख चेहरा और विनम्र भावात्मक रूप.बात -चीत में इतनी सरलता कि किसी को भी अपना बना ले. व्यवहार में इतना अपनत्व कि कोई भी बिछुड़ने का नाम ले. 
   वास्तव मे पुरुष सत्ता मानसिकता की वज़ह से मैने  सुन्दर जी को मुखिया कहा पर वास्तव मे उनकी भी प्रेरणा स्त्रोत तो उनकी पत्नि है. न केवल एक उत्तम गृहणी अपितु पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधने वाली डोर.  शास्त्र वचन है कि हमारी रसोई एक औषधालय है और गृह माता एक उत्तम वैद्य.  श्रीमती सुन्दर इन्हीं भावों से ओतप्रोत है.  एक धर्मनिष्ठ आध्यात्मिक विदुषी.  
   हम दैनिक अग्निहोत्री है परंतु यात्रा में होने की वज़ह से चाहते हुए भी अपनी इस संकल्पित यज्ञ क्रिया को कर नहीं पा रहे थे. पर इस घर के आलौकिक वातावरण मे हमने अपने इस संकल्प को भी पूरा किया.  पूरा घर ही रूहानी रोशनी से जगमगाता है.    जगतगुरु  आद्य शंकराचार्य महर्षि रमण तथा अन्य वैदिक ऋषिगण के चित्र घर की दीवारों पर आलोकित है.
सुन्दर दम्पत्ति का सुपुत्र एक सफल व्यवसायी है. रियल एस्टेट सहित अनेक काम से वह जुड़ा है परंतु इसके बावजूद भी घर के सभी कार्यो में उनका आत्मीय लगाव है विशेषकर घर मे आए अतिथियों के संदर्भ में. माता-पिता के विचारों की स्पष्ट छाप इस युवा पर है. 
    पद्मा चूंकि इंदौर कार्यरत रहीं है इसलिए हिन्दी भाषा खूब बोलती-समझती है, पर भाषा आपसी संबन्धों में कभी बाधा नहीं बन सकती. मुझे याद है कि जब मैं एक वर्ष रूस में रहा तो शुरुआती दिनों में सांकेतिक भाषा ही मुझे मदद करती थी और फिर जब बांग्लादेश से आकर फिरदौसी हमारे घर आयी ,वह तो हिन्दी-अंग्रेज़ी कुछ भी नहीं जानती थी और हम बंगाली नहीं समझते थे.  पद्मा का व्यवहार उनके पैतृक विरासत  का भी परिचय देता है.  एक समझदार और संजीदा लड़की. 
     घर मे परिवार की बेटी व दो बच्चों से भी मिलना हुआ.  छोटे बालक दैवी ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं. छोटे लड्डू गोपाल को जब मैंने गोद में लिया तो वह इतना घुल मिल और य़ह ही तो था टेस्ट कि इस परिवार का हमारा  अनेक जन्मों से रिश्ता है. 
   एसे सात्विक, धर्मनिष्ठ तथा अतिथि परायण परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कामना करते हैं;
  ॐसंगच्छध्वं संवदध्वं
सं वो मनांसि जानताम्
देवा भागं यथा पूर्वे
सञ्जानाना उपासते ||
अर्थ –  कदम से कदम मिलाकर चलो , स्वर में स्वर मिला कर बोलो , तुम्हारे मनों मे समाज बोध हो। पूर्व कालमें जैसे देबों ने अपना भाग प्राप्त किया , सम्मिलित बुद्धि से कार्य करने वाले उसी प्रकार अपना – अपना अभीष्ट प्राप्त करते हैं।
राम  मोहन  राय, 
चेन्नई/ 13.03.2022 
[नित्यनूतन वार्ता]

Comments