Suhana Safar-22 (Keti-Koti Festival)

 आज नीदरलैंड्स में केती- कोती दिवस मनाया जा रहा है । जिसका अर्थ है कि गुलामी से आजादी का दिन । न सिर्फ इस देश में बल्कि दुनियां के अनेक देशों में विशेषकर यूरोप, अमेरिका तथा अन्य अश्वेत देशों में रंगभेदवाद और नस्लभेद की लानत सदियों से रही है। कानूनी रूप से बेशक इसका खात्मा कर दिया है परंतु वास्तविक रूप से इसके अनेक रूप अभी भी दुनियां में विद्यमान है । यह एक ऐसी घृणास्पद, क्रूर और निंदनीय व्यवस्था थी जिसमें जाति और शरीर के रंग की वजह से व्यवहार किया जाता था ।  इसी क्रूरता से शिकार होकर अफ्रीका के अनेक देशों से लोगों को लाया गया और उन्हें पशुवत जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया । उनके खुद के देशों में भी उन्हें तमाम अमानवीय नृश्नशता का भुक्तभोगी होना पड़ा । त्वचा के रंग के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त किए गए और खुद को सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय कृति माना गया । आज भी अनेक देशों कानून बनने के बावजूद भी ऐसी ही स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है ।
      कृषि पर आधारित देशों की स्थिति और भी बदतर रही । किसानी सदा से प्रकृति पर ही आश्रित रही ,इसीलिए भुखमरी और गरीबी के शिकार यही लोग रहे । भूख से मुक्ति के लिए ये लोग भारत से भी बाली, मॉरीशस, सूरीनाम जैसे अनेक देशों में डांगरो की तरह लाद कर ले जाए गए और फिर सिर्फ रोटी की कीमत पर शासक वर्ग के जुल्मों के शिकार हुए ।
    हमारे खुद के देश भारत में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग इन्हीं भेदभाव के शिकार रहे और इनकी बदहाली का कारण वह धार्मिक व्यवस्था थी जिसकी सहिंताओ में कहा गया था कि ये ब्रह्मा जी के पैरों से उत्पन्न हुए है और इनका काम ही है मुख, हाथों और जांघों से पैदा हुए वर्णों की सेवा करना ।
     हमारे देश की तरह ही अफ्रीकी और अन्य देशों में उसी देश के मूल निवासियों को धार्मिक, सार्वजनिक और अन्य शिक्षण संस्थानों में घुसने की मनाही थी और यदि बाज़ार आदि में भी प्रवेश करना हो तो आवाज़ कर इसकी सूचना पहले देनी होती थी ताकि सभ्रांत वर्गों के लोग बच सके ।
      जोती बा फूले ने अपनी प्रसिद्ध कृति गुलाम गिरी में इसकी तफसील से चर्चा की है । उन्होंने अपने सत्य शोधक आंदोलन को अमेरिका में चल रहे रंगभेद के खिलाफ़ मुहिम का हिस्सा बताया और अपनी पत्नी सावित्रीफुले के साथ मिल कर काम किया । रामा स्वामी पेरियार ,नारायण गुरु और बाद में डाo भीम राव अम्बेडकर ने इसे पतनशील समाज का हिस्सा बताया । उन्होंने कहा कि उनके समाज को मानवीय अधिकार चाहिए ।
     पूरी दुनियां में चल रहे नस्ल और रंगभेद विरोधी आंदोलन कमोबेश एक दूसरे का हिस्से ही हैं । कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने बेशक वर्ग आधारित समाज का इसे हिस्सा बताया परंतु एफ्रो अमेरिकन स्कॉलर डाo डब्ल्यू डी बॉयस ने इसे रंग और नस्ल के रूप में भी परिभाषित किया ।
      नीदरलैंड्स में केती कोती को भी इन्हीं संदर्भों में समझना जरूरी है। डच उपनिवेशवाद इन्हीं रंग प्रभुत्व मान्यताओं पर विकसित हुआ । उन्होंने जहां जहां भी अपनी शासन व्यवस्था स्थापित की वहां वहां भी गुलामी प्रथा को अपने वित्तीय मुनाफे में सहायक पाया । इतिहास ने करवट बदली और फिर एक जुलाई, सन 1863 में अपने उपनिवेश सूरीनाम में इस गुलाम प्रथा से आज़ादी का ऐलान किया जिसे आज मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
     15 अगस्त,1947 में  भारत को  विदेशी अंग्रेजी शासन से आज़ादी अवश्य मिली परंतु अभी भी मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज बनाना बाकी था । भारतीय संविधान के प्रस्तावना में लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष, समाजवादी गणतंत्र समाज बनाने का संकल्प है जिस पर अनेक अवरोधों के बाद काम जारी रखना जरूरी है । सन 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बंधुवा मजदूर मुक्ति के लिए अनेक कदम उठाए । हमारे सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक निर्णयों में परिभाषित किया कि इस तरह की बंधुआ मजदूरी समाप्त होनी चाहिए । Bonded Labour Abolition Act , अस्पृश्यता निवारण एक्ट आदि अनेक कानून भी बने । स्वामी अग्निवेश ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा की भी स्थापना की और बाल मजदूरी को बंधुआ मजदूरी का ही एक रूप बताया ।
     भारत की 15 अगस्त की स्वतंत्रता एक पड़ाव है परंतु स्वराज अभी बाकी है । आज उसी बंधुआ मुक्ति पर्व को अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए आज मैं डैम के पास राजमहल के सामने एक कार्यक्रम में मैं भी शामिल हुआ जिसमे सैंकड़ो स्थानीय लोग शामिल थे । इस समारोह में शामिल लोगों में उत्साह था और इसी प्रसन्नता को व्यक्त करते हुए वे लोग गीत ,संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे । बस फर्क इतना ही था कि यह शासकीय स्तर पर न होकर साधारण जनता द्वारा संचालित था । अनेक लोग दुनियां भर के रंगभेदवाद विरोधी लोगों के वक्तव्यों को प्रसारित कर रहे थे और इसमें मेरे अपने भारत के सुधारक जोतिबा और अंबेडकर के नाम भी शामिल थे ।
  केती- कोती एक अवसर का नाम नहीं अपितु सतत प्रयास की प्रक्रिया है जो तब तक जारी रहेगा जब तक शोषण और असमानता पर आधारित समाज व्यवस्था है । यह साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद के हर कदम का विरोध है जो युद्ध ,घृणा और भेदभाव को पैदा करता है । केती -कोटि की मुबारक ।
राम मोहन राय,
एमस्टरडम, नीदरलैंड,
01.07.2023

*केती- कोती को समग्र रूप से समझने के लिए हिंदी की प्रख्यात साहित्यकार और लेखिका , नीदरलैंड निवासी डाo पुष्पिता अवस्थी की यह कहानी पढ़नी होगी जो उनकी पुस्तक से साभार li गई है- ।
 *केती-कोती*
दूसरे दिन शालिनी आजादी के मेले में थी। मेला उसकी आँखों में था। वह मेले की आँखों में थी क्योंकि वह भारतीय होकर भी अपने पति का हाथ पकड़े हुए घुम और झूम रही थी। उसे अपने बचपन के गाँव के मेले याद आ रहे थे ।

नीग्रो जीवन के स्वाद से जुड़ी खाने-पीने की दुकानें... तरह-तरह के शीशे में बंद जंगली फलों के रस और खिच्चे फल, कनीपा फल बिक रहे हैं।...कहीं कसावा की ताज़ी रोटी सिंक रही है... जैसे भारत में डोसा बनता है। घिसी हुई बर्फ़ पर रंगीन मीठा शीरा ...उसे बचपन की बर्फ़ बेचने वाले कल्लूनाज़ की याद दिलाती थी। तरह-तरह के नीग्रो परिधान... नीग्रो मोतियों और जंगली पत्तियों के पंखों के आभूषण ।
    पूरे दिन अधनंगे बदन घूमने वाले स्त्री-पुरुषों ने जींस पैंट पहन रखी थी और उस पर पारंपरिक लूँगी को समेटकर वक्ष पर गाँठ लगा रखी थी। जिस पर हार्ट और अन्य आकृतियों की कंट्रास्ट में पेचवर्क था। सिर पर औरतों के सिर पर स्कार्फ थे जिनके कपड़े के फूल की गाँठ आगे की ओर माथे पर नाक की सीध पर रहती है।

बालों की चोटियाँ... और चोटियों में लगे हुए रंगीन बीट्स पर मेंड़ीदार चोटियाँ... जो नीग्रो हेअर स्टाइल की अलग पहचान भी थी।
    जब से हिंदुस्तानी पुरखे इस देश में आए हैं तब से वह कफरी-जुका के साथ रह रहे हैं या यूँ कहा जाये कि इनकी आज़ादी के बाद से ही तो हिंदुस्तानियों और जवानीज़ लोगों को मज़दूर-माल के रूप में ढोया जाना शुरू कर दिया गया था। नीग्रो की आज़ादी पर ही हिंदुस्तानियों की गुलामी की इमारत खड़ी हुई थी।
    नीग्रो बच्चियों और स्त्रियों के सिर पर इतनी तरह के हेअर स्टाइल थी चेहरे को विशेष बनाते थे। हर स्त्री के पास कम-से-कम दो-तीन आरे बच्चे थे जो या तो गोद में थे या हाथ पकड़े हुए थे और जो नवयुवतियाँ और युवक 1 थे वे भी एक-दूसरे का हाथ पकड़े... कहीं अकेले-दुकेले, कहीं ग्रुप में झूमते-नाचते मटरगश्ती करते हुए घूम रहे थे।

वहीं पाँचों पुल नामक जगह पर जहाँ कभी नहर बहती थी और एक गुल था, यहाँ जरूरत पड़ने पर गुलामी के समय में जब गुलामों को नंगा करके उनका गुप्तांग देखा जाता था जिससे उनके मज़दूरी करने और युवा होने का अंदाजा लगा लिया जाता था और उनकी मज़दूरी तय होती थी— इसे नृशंस सूरीनामी दर्दनाक स्मृति के रूप में पुलपाँच्ये के नाम से पहचानते थे।

शालिनी की आँखें उनकी आज़ादी दिवस की मस्ती में खोई हुई थीं। क्योंकि ही जुलाई को टी.वी. पर गुलामी पर दिखाई फ़िल्म से वह सिहर ऊठी थी। गुलामों की पीठ पर लोहा गर्म करके वे उस पर अपने संगठन या कंपनी की मोहर लगाते थे। वह चिह्न उनकी पीठ पर उनकी मृत्यु के बाद तक बना रहता था। इसलिए वह सिर्फ़ नीचे की देह पर एक छोटा-सा कपड़ा भर लपेटे रहते थे। क्योंकि ऊपर के हिस्से पर कपड़ा रहेगा तो उनके संगठन का नाम नहीं दिखेगा। इधर से उधर ले जाने के लिए उन्हें भेड़-बकरियों से भी बदतर हालत में दूंस-ठाँस कर भरकर ले जाते थे, जिसमें कई लोगों के पेट दबने से उल्टी होने लगती थी जो किसी की देह पर गिरती थी। गर्भवती स्त्रियों की बुरी हालत हो जाती थी। यह सब देखते हुए शालिनी का दिल हिल गया था। वह मनुष्य के इतने निर्दयी होने की कल्पना तक नहीं कर सकती

शालिनी अब नीग्रो जाति की आज़ादी के जश्न का मतलब समझने लगी थी। जितना कि शायद ये आज़ादी जीने वाले लोग भी न समझते हों। आज के दिन की यह अपने लोगों की भाषा में केती-कोती कहते हैं, केती का अर्थ है जंजीर और कोती मतलब है-टूटना। यह जंजीर टूटने का जश्न होता है। वाटर मूलन वेख के एक ओर से बादलों का धुआं उठ रहा था । पश्चिम की ओर का डूबता हुआ सूर्य उन पर अपनी आभा फेंक रहा था । आकाश में दो इन्द्रधनुष दिखायी दे रहे थे। दोहरे इंद्र धनुष को देखकर शालिनी उनमे ज़्यादा ख़ुश थी। आज़ादी के मेले से अधिक बड़ा उत्सव उसे आकाश में दिख दे रहा था। पारामारिबो प्रेसीडेंट एच हाउस के पीछे के मॉरीशस पालम पे बड़े बगीचे में दुकानें लगी हुई थीं... उसके संगीत के शोर...इसी में बादल भी अपना शोर करते हुए पालम-ट्री के ऊपर छत्ते की तरह लगे हुए थे उ आनंद में शामिल होने के लिए। दुकानदार दुकान में रहते थे.. लेकिन के बीच में इधर-उधर दुकानों के लिए भागदौड़ करने लगते थे। बरसात शुरू होने पर शालिनी भी अपना बैग सिर पर रखकर अकरम का हाथ पकड़े कार पार्किंग की ओर बढ़ गई। थोड़ा तेज़ चलती हुई, "अरे, पानी भीगने में गल थोड़े जाओगी। शूगर थोड़े ही हो तुम," अकरम ने आनंद के लहजे में कहा, "हाँ-हाँ मैं शूगर हूँ... तुम्हीं तो कहते हो...जल्दी चलो, गल नहीं जाऊँगी...पर भीग तो जाऊँगी..." शालिनी ने मीठी चुटकी लेते हुए अपनी बात भी कही... और तेज़ क़दमों से चलते हुए कार तक हो ली।

ग़ज़ब देश है ! ऐसी चटख और तीखी धूप देखने में सुनहरी और उजली पर चमड़े तक का रंग बदल देती है और तीन-चार बजे के बीच में ऐसे काल बादल जैसे साक्षात् इंद्र देव ही पूरे आकाश में हो और ऐसी तेज बरसात होती कि घर, दुकानें तो किसी तरह बच भी जाते.... पर खेत.... खलिहान... जमीन... सड़क सब कई घंटों के लिए पानी में डूब जाते हैं।

एक बार शालिनी सारे दिन पारामारिबो के सिटी सेंटर की सबसे बड़ बुक शॉप 'फाको' में थी...नई किताबों को खोजने में उसका दिमाग़ और आंखे लगी हुई थीं कि उसे तेज़ बरसात की आवाज़ ही नहीं सुनायी दी। सूरीनाम के घर मकान... डबल सीलिंग में होते हैं... ऊपर टीन की मजबूत छत.. भीतर में लकड़ी की ख़ूबसूरत छत ऐसी कि ऊपर की टीन की छत का पता तक नहीं चलेगा। वहाँ बरसात होती है बाद्य की झंकार की तरह और बरसात के रुकते ही सब कुछ शांत। शुरू में शालिनी, इस ध्वनि का, बहुत विभोर होकर आनंद लेती थी...लेकिन धीरे-धीरे उसे इसकी आदत पड़ती गई थी। पिछले दिनों की बरसात की शालिनी अभी गूंज तक भूली नहीं थी । जब फाको दुकान से किताबें ख़रीद कर बाहर आई तो सड़क नदारत थी। वहाँ सिर्फ एक फुट ऊंची नदी थी । मटियाला पानी। प्लास्टिक... पेपर केस , सॉफ्टड्रिंक्स... पारबीयर के खाली डिब्बे और प्लासिक्स अलग से
  उपला आए थे। चप्पलें और जूतों को लोगों ने हाथों में पहन रखा था। औरतों की देह में चिपके हुए कम-से-कम कपड़े हवा चलने पर ठंडक दे रहे थे। उपला आए बरसात से भीगकर वे खुश थीं। सड़कों का गंदा पानी तिस पर कुछ कारों का चुकचुक करके बंद हो जाना उन सबको परेशान किए हुए था। इसके बावजूद मुँह के सारे दाँत बाहर चमक रहे थे। 

"अगर हॉलैंड में ऐसा होता तो अब तक फायर बिग्रेड की गाड़ियाँ तुरंत पम्प करके पानी बाहर कर देती" अकरम ने परेशान होते हुए कहा। "हॉलैंड या यूरोप में ऐसा होता ही क्यों ?..." शालिनी ने दो क़दम आगे

बढ़कर अपनी बात कही और आगे टोका, "यहाँ के लोगों को इस परेशानी में जीने की आदत है और यह इसको इन्जॉय करते हैं... इसलिए सरकार को भी कोई चिंता नहीं होती है। उनकी कुर्सी सही सलामत बनी रहे फिर चाहे देश का कुछ भी हो... थर्ड वर्ल्ड कंट्री के तक़रीबन सभी देशों का यही हाल है... टूरिस्ट को परेशानी ज़रूर होती है... देखो न हॉफ पैंट और स्लीपर पहनने के बावजूद वो डच नवदंपति कितने परेशान हैं—वे इस पानी में पैर रखने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं... देखो न... यह क्रिस्नोपोलस्की होटल के सामने का हाल है। इसका मैनेजर भी कैसे यह दुर्व्यवस्था बर्दाश्त कर रहा है ? उसके तो होटल की मार्किट वैल्यू गिर जाएगी।" शालिनी सड़क में आई इस आकस्मिक बरखा - बाढ़ से बुरी तरह परेशान थी ।

किसी तरह वे दोनों अपनी कार में बैठे। अकरम परेशान होकर भीड़ में कार ड्राइव कर रहे थे। रेंगती हुई ड्राइविंग के साथ ट्रैफिक के बीच ड्राइविंग करना अकरम को पनिस्मेंट से भी अधिक बुरा लगता है। पर भारत में कहावत है-मजबूरी का नाम महात्मा गांधी !

यह सब सोचते हुए शालिनी अपनी आँखें चार किए हुए आजादी के मेले का जश्न समेटने में लगी हुई थी- सूरीनाम में अब तो कफरियों की आज़ादी का दिन हर दिन होता है...उन्हें कोई -वह आयोजन का अंतिम दिन था... पर सामाजिक बंधन नहीं है। किसी भी स्त्री के साथ सो लिए। माँ बन गई तो पालने की जिम्मेदारी माँ को है, यदि वह भी नहीं हुआ तो अनाथालय की हैं.....

शालिनी की एक अध्यापक मित्र ने एक बार उससे बताया था कि यहाँ के बहुत से बच्चों के माँ-बाप दोनों नहीं हैं... किसी तरह वह रात का खाना जुटा पाते हैं... उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं है... से बच्चों के लिए ब्रेकफास्ट बना कर लाते हैं। सुनते ही शालिनी कॉप थी और उसने कहा कि यहाँ के रेस्टोरेंट और होटलों से बात करो और सं बनाकर ऐसे बच्चों के लिए भोजन की स्थायी व्यवस्था करो। वा मिलेगा। शालिनी को अपना कहा अचानक यहाँ भी याद आ गया। इसलिए, हम लोग

थोड़ा भीड़ से बाहर निकली और तोरारिका के दाएँ-बाएँ की संकरी मा से गुजरी...। जहाँ प्रायः ड्रग्स बेचने वाले घूमते रहते हैं. जब यह जा • आदमी तक जानता है... भला पुलिस वाले क्यों नहीं जानते होंगे...? इसी यहाँ की सड़कों के किनारे खड़ी सस्ती कॉल गर्ल्स मिल जाती हैं ... जरा-प होटलों में रहने वाले... थोड़ा लूस होकर बातें करें...तो उन्हें होटल के बाहर भी क़दम नहीं रखना पड़ता है। रात भर के लिए स्त्री-देह उन्हें कैम्पस में ही मिल जाएगी। खुली जाँघे और छाती उघारू पहनावे यहाँ की स्त्रियों के आम वस्त्र हैं...फिर वे कफरी हो या जावानीज़ या चायनीज़ और अब तो हिंदुस्तानी भी । वर्जिनलैंड के नाम से जानी जाने वाली इस दक्षिण अमेरिका और कैरीबियाई धरती की औरतों को वर्जिन पाना बहुत ही मुश्किल है। बारह- तेरह बरस की बच्चियाँ तक संभोग सुख जान चुकी होती हैं। युवा होने तक इतने लड़के- युवक और आदमियों के बीच से उनकी देह, देह-यात्रा कर चुकी होती है कि भारत देश में ऐसी स्त्री को वेश्या के खाते में आसानी से डाल दिया जाता है।

'आज़ादी का मेला देखने के बाद भी इतनी चुप हो। आख़िर क्यों?" अकरम ने शालिनी की चुप्पी तोड़ी। तब उसे अहसास हुआ कि वह किस सोच में डूबी हुई थी।

"नहीं तो।" डबडबायी आवाज़ में उसने सिर्फ़ इतना ही कहा । "किधर को चलें ?" भीड़ से पूरी तरह निकलने पर एक लंबी साँस लेते हुए अकरम ने पूछा।

"वहीं जहाँ पहली बार हम दोनों ने साथ एक बीयर पी थी, वहीं चलकर सूरीनामी नदी के तट पर बैठते हैं। अटलांटिक महासागर के तट क हुए और जहाँ पर ब्राजिलियन दो लम्बे बड़े पापाखाई तोतों की अलग से की टेर सुनायी देती है और जो तोते अपने पंजों पर नर्तकों की तरह झूमते हैं।" शालिनी ने बहुत रोमांटिक होकर याद दिलाया।
     "हाँ... उस समय जब तुम्हें लव-फीवर चढ़ा हुआ था और जब तुम्हें सिर्फ़ प्रेम के रंग ही दिखाई देते थे।" अकरम ने शालिनी की आँखों में उतरते हुए कहा। बादलों का प्रकोप कम हो गया था। बरसात झीनी हो गई थी। शालिनी को लगा पाँच मिनट में यह बरसात बंद हो जाएगी और वे भी पहुँच जाएँगे। सूरीनामी नदी के तट के सामने उजड़ा हुआ स्टारडस्ट होटल था... । पर अभी जीवित था। उस होटल के कमरे और कारीडोर की दीवारों पर अद्भुत ऑयल पेंटिंग लगी हुई है... एक छोटे से मीटिंग हॉल में तो प्रायः स्त्री की मान तस्वीरें ही हैं- विभिन्न मुद्राओं में और बाक़ी कमरों में भी इसी तरह की पेंटिंग हैं जिसमें नदी... नाव... जंगल... फूलों का सहारा लेकर स्त्री-पुरुषों के मिलन की भंगिमाओं को चित्रित किया गया है। ख़ैर... उस डच पेंटर का बहुत नाम नहीं है-शालिनी स्वयं कला विशेषज्ञ है इसलिए उसे भी उसकी पेंटिंग बिकने का कारण समझ में आ चुका था।

बहुत कारों के बीच में अकरम ने अपनी कार लगायी... उसने रेस्तराँ को उजड़ा हुआ देखा। पेंट... उड़ गया था... फिर भी दोनों ने दाएँ-बाएँ देखा.... शायद कहीं से भीतर जाने का कोई रास्ता हो, पर बुरी तरह से बंद था... वहाँ से न्यू एम्सटर्डम जाने के लिए चलताऊ बोट जाती थी... कुछ लोग जाने-आने में लगे हुए थे पर अधिकांश चायनीज़.... हिंदुस्तानी... सब वहीं तट पर खड़े सूरीनामी हवा का आनंद ले रहे थे।

शालिनी बहुत मायूस-सी अकरम के कंधे पर हाथ रखे हुए उदास थी। इतनी जल्दी दो वर्ष के भीतर उसके बीयर पीने की जगह उजड़ जाएगी और वह उसकी स्मृति का इतिहास भर बनकर बचेगी। अकरम भी ऐसा ही सोच रहा था... और ग़मगीन था। फिर उस ओर पीठ करके वे दोनों भी औरों की तरह सूरीनामी नदी से होकर आती हुई हवा का आनंद लेने लगे थे कि "वह देखो न्यू एम्सटर्डम" तट पर अकरम ने उँगली उठाकर इशारा किया।

बिना रुके ठहरे तुम्हें लेकर घूमने निकल पड़ा था और वहाँ से हम दोनों सीधे याद है आने के तुरंत बाद मैं सीधे तुम्हारे घर आया था और न्यू एम्सटर्डम पहुँचे थे। हॉलैंड के एम्सटर्डम से सूरीनाम न्यू एम्सटर्डम की यात्रा बहुत रोमांचक थी। क्योंकि उस यात्रा में हम दोनों के प्रेम की यात्रा भी समायी हुई थी। कहने भर को 'न्यू' है। लकड़ी के इतने पुराने घर हैकमोसारेस बिल्डिंग... पुलिस बिल्डिंग और लोगों के घर... जैसे कोलोनेयिल पीरियड के हों ... पुरानी मरी हुई... न बोलने और न काम करने वाली तोपें सिर्फ़ इतिहास की गवाह बनी पड़ी हुई हैं-समय के संग्रहालय में...।"

डच लोगों ने पूरे सूरीनाम में... हॉलैंड की जगहों के अनुसार ही नाम रख छोड़े हैं। आरनेम....लेडिंग... अलकमार और न जाने क्या-क्या...? अभी चार दिन पहले अलकमार गई थी तो पुरानी लकड़ी के बने हुए छोटे कमरे के आकार की खाट थी फिर वहाँ से स्टीमर वाली पुरानी नावें चलती थीं। दम बुख के उस पार के दो तटों पर फलों... और अन्य पर गायों का पालन होता था। जहाँ दस हजार गायों के पालन का व्यवसाय एक डच परिवार चला रहा था और दूसरे तट पर भी डच दंपति फलों की खेती करके फलों का प्लाटेंशन और जूस का धंधा चलाते थे... ।

सप्ताह के अंत में जाने वाले एक अधेड़ हिंदुस्तानी ने बताया था कि उसके माँ-पिता जो अस्सी के ऊपर के थे और भाई-बहिन वहीं रहते थे वह उनसे मिलने जा रहा था...उसकी इतनी हिम्मत देख शालिनी ने नाम पूछा था। उसने बताया, “दिलीप कुमार। "

"बॉलीबुड एक्टर दिलीप कुमार को ध्यान में रखकर नाम रखा था क्या ?"

अकरम ने अटकलें लगाते हुए पूछा ।

“हाँ... हाँ...भईया – ठीक....जानइयो... दिलीप कुमार जो फ़िल्म में खेल खेलता रहा... तो हमार नाना ओही के ऊपर ले कर बस नाम धर दीहे..." दिलीप ने ख़ुशी से जवाब दिया।

भारत के कुछ पुरखे खेती के साथ-साथ बढ़ई और दर्जी का भी कारोबार करते थे। और उसकी मित्र बता रही थी कि उसके हस्बैंड जो आज मंत्री है उनके पिता एक प्रसिद्ध दर्जी थे। मुहम्मद रफी और मुकेश अपने अमेरिका दौरे के दौरान सूरीनाम भी गए थे तो उनके बैग अटैची वगैरह हवाई यात्रा के दौरान कहीं इधर-उधर हो गए थे। उन्हें कार्यक्रम देना था। तब उन्हीं के पिता ने रात में शेरवानी और चूड़ीदार सिलकर तैयार किया था। रफी साहब को तो इतना भाया था कि उन्होंने पाँच जोडी शेरवानी और पजामा सिलवाए थे। शालिनी इससे इतनी प्रभावित हुई थी कि जब वह अस्सी वर्ष के टेलर साहब से मिलने गई तो उन्होंने उसे शेरवानी पहने हुए मुकेश और रफी साहब के साथ की अपनी खिंचवायी हुई फ़ोटो दिखायी थी, जिसमें वे भी युवा थे और वह टेलर भी ।
    सत्तर से पहले सूरीनाम में सिनेमा जिन्दा था। तीन थियेटर चलते थे...सावित्री, यशोदा, द पारल जिसमें ब्लैक एण्ड व्हाइट हिंदुस्तानी फ़िल्में आती थीं 'मदर इंडिया' अनारकली फ़िल्में अकरम ने वहीं देखी थी। हिंदुस्तानियों से हॉल भरा रहता था और वे सिनेमा देखते समय बहुत चिल्लाते और शोर मचाते थे। शालिनी को उसकी दोस्त ने बताया था कि यही कारण है कि उसके पिता और ससुर आदि राजकपूर की तरह की मूँछें रखवाते थे... और उनकी उम्र के संगी-साथी भी। क्लीन शेव रहने का चलन बहुत बाद में आया।
    अब तो बॉलीवुड का भी चाल-चलन बहुत बदल गया है। उसी के अनुसार लोगों के रंग-ढंग इतने बदल गए हैं कि बेढंगे और बुरे लगने लगे हैं। तीन-चार टी.वी. स्टेशन में रात-दिन आधुनिक फ़िल्में दिखायी जाती हैं। इसीलिए सिर्फ़ फ़िल्मों के थियेटर ही नहीं... नाटकों के थियेटर भी इस देश में मर गए हैं...हिंदुस्तानियों के लिए मिलन समारोह के स्थल मंदिर हैं या मस्जिद, तो ईसाईयों के लिए चर्च... । व्यक्तिगत मनोरंजन के लिए जंगल और नदी तट बचे हुए हैं, और उसी में आनंद का भोग-विलास होता है।
     नीग्रो की केती-कोती दिवस के समारोह से लौटते हुए शालिनी को लगा। आज़ादी का मतलब जीने के बाद ही समझ में आता है। कहीं दासता की देह से आज़ादी का जन्म तो नहीं होता है।

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