पानीपत की गलियां-24(पानीपत की पुरानी गलियों की सैर: अमर भवन चौक से लाल मस्जिद तक)

पानीपत की गलियां-24
(पानीपत की पुरानी गलियों की सैर: अमर भवन चौक से लाल मस्जिद तक)

आज शाम मैं और मेरा पुराना साथी पवन कुमार सैनी जी फिर एक बार पानीपत की उन तंग, जीवंत और इतिहास से भरी गलियों में निकल पड़े। हमारा इरादा था पुराने शहर के उस हिस्से को फिर से महसूस करना जो कभी “ रांघड़ों वाला मोहल्ला” कहलाता था, यानी आज का अमर भवन चौक।

अमर भवन चौक से जैसे ही हम सेठी चौक की तरफ मुड़े, संकरी सड़क पर ट्रैफिक का ऐसा मेला लगा था कि पैर रखने की भी जगह नहीं थी। रेहड़ियाँ, ठेले, ऑटो-रिक्शा, छोटे-बड़े टेंपो, स्कूटर और मोटरसाइकिलें – सब एक-दूसरे से सटे हुए। सीजन जो चल रहा है – कंबल, शॉल और गर्म कपड़ों का।   पानीपत की यह पुरानी हथकरघा मंडी देश-दुनिया में मशहूर है।अमर भवन चोंक से सेठी चोंक तक पर्दे, चादरें व काटन, सिल्क, गलैश काटन, पोलिस्टर, धागे और कंबल का बाजार है.   यहां का माल सस्ता भी, टिकाऊ भी और क्वालिटी में बेस्ट भी। बस ग्राहक को आने-जाने की थोड़ी तकलीफ उठानी पड़ती है। हम भी धीरे-धीरे “खिसक-खिसक” कर आगे बढ़ते रहे।

इसी सड़क पर बाईं तरफ विशाल लाल मस्जिद है, जिसकी लाल ईंटों की भव्य इमारत दूर से ही नजर आती है। ठीक उसके सामने, सटा हुआ है संत गुरुद्वारा हरि मंदिर। यानी एक ही सड़क पर मस्जिद भी और गुरुद्वारा भी – पानीपत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीता-जागता नमूना।

धीरे-धीरे हम सेठी चौक पहुँचे। सेठी चौक अपने आप में एक बड़ा चौराहा है। यहाँ से तीन मुख्य रास्ते निकलते हैं:
- एक रास्ता खैल बाज़ार की तरफ,
- सामने वाला लाल मस्जिद की तरफ,
- और दाहिनी तरफ वाला रास्ता पुरानी दरगाह को पार करता हुआ सनौली रोड पर जा मिलता है।

यह दरगाह बहुत प्राचीन है। कहा जाता है कि यह हजरत बाबा फरीद गंजशकर के पोते के नाम पर है। हर साल यहाँ भव्य उर्स लगता है और देश-विदेश से हज़ारों जायरीन आते हैं। उर्स के दिनों में यह पूरा इलाका रौनक से भर जाता है।

खैर, हम लाल मस्जिद की तरफ ही बढ़ चले। सेठी चौक के कोने पर एक सरदार जी गली के कोने पर घर का बना गरमागरम छोले और टमाटर का सूप बेच रहे थे। सुगंध इतनी लज़ीज़ थी कि रुकने का मन किया, लेकिन हमने सोचा पहले पूरा चक्कर लगाकर आते हैं, लौटते वक्त पीएँगे।

इसी सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ते ही एक गली दाहिनी तरफ श्री राम मंदिर की ओर जाती है। मंदिर में हर समय भजन-कीर्तन और पूजा-पाठ चलता रहता है। ठीक उसी सड़क पर संत द्वारा हरि मंदिर  जिसे   संत गुरमुख दास जी महाराज ने इसका निर्माण कराया। इससे पहले यह  नत्थू शाह का ठिकाना था। गुरुद्वारा हरि मंदिर भी है – यानी मंदिर और गुरुद्वारा दोनों एक ही सड़क पर। यह दृश्य देखकर मन में अपनेपन का एहसास और गहरा हो जाता है।

लाल मस्जिद के ठीक सामने से एक गली सनौली रोड पर निकलती है। आजादी के बाद इसी मस्जिद परिसर में कुछ साल एक प्राइमरी स्कूल भी चला करता था। उस स्कूल का मुख्य गेट इसी गली में खुलता था। आज वह सारा स्वरूप बदल चुका है। दुकानें, शोरूम, मकान – सब कुछ नया सा लगता है। मैंने पवन जी से कहा, “यार, आज से कोई 40 साल पहले मैं यहाँ आया था, तब और आज में तो दिन-रात का फर्क है।” 
इसी सड़क पर लांबा वूलेन मिल, सरदार हिम्मत सिंह की प्रेस, मेहरबान बठला की प्रेस और गुसाई जी की चक्की  अब इतिहास हो चुकी है  परंतु  वह आज भी लोगों के दिलों दिमाग में छाई है. 

इसी सड़क पर चलते-चलते बाईं तरफ एक गली चढ़ाव मोहल्ले की ओर जाती है। उसी मोहल्ले में हमारी बिरादरी के बहुत सम्मानित चौधरी जीवन दास सैनी जी का पुराना मकान था। उनके सुपुत्र श्री फतेह सिंह सैनी एडवोकेट साहब आज भी बड़े आदर से याद किए जाते हैं। उनके पुत्र रविंद्र और टाइगर  दोनों युवा समाजसेवी हैं, मेल-मिलाप और भाईचारे के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। उनकी वजह से आज भी हमारी बिरादरी में पुराना मान-सम्मान कायम है।
  इसी सड़क पर एक मोहल्ले में हमारे शहर के प्रसिद्ध पत्रकार श्री वीरेंद्र सोनी जी की लगातार 57 वर्षों तक रिहाइश रहीं जिनकी क़लम ने पंजाब केसरी जैसे  अखबार को तब रौशन किया जब यह सर्वाधिक पढ़े जाने वाला अखबार था. अंबरीश और सोनी इस तरह से एक थे जैसे मुन्शी प्रेम चंद और माणिक लाल पत्रकारिता के क्षेत्र में माणिक लाल कन्हैया लाल-मुन्शी हो गए थे. बेबाक समाचार और बेधड़क आवाज के धनी रहे हैं वीरेंद्र सोनी जी. 

यह सड़क आगे जाकर एक और चौक में मिलती है। उस चौक से:
- एक रास्ता कलंदर चौक की तरफ,
- दूसरा कमल फर्नीचर हाउस के शोरूम वाली सड़क पर,
- और सीधा रास्ता सनौली रोड पर निकल जाता है।

इन तंग गलियों में आज भी पुराना पानीपत ज़िंदा है – उसकी खुशबू, उसकी आवाज़ें, उसकी रौनक और सबसे ऊपर उसकी मिली-जुली संस्कृति। चाहे मस्जिद की अज़ान हो, गुरुद्वारे का शबद कीर्तन हो या मंदिर के घंटे-घड़ियाल – सब एक साथ गूँजते हैं और यही पानीपत की असली पहचान है।

शायद यही वजह है कि कितना भी बदल जाए शहर, ये गलियाँ हमें बार-बार अपनी ओर खींच लेती हैं।
Ram Mohan Rai. 
Advocate. 
Panipat/20.11.2025

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