सावित्रीबाई फुले जयंती पर “मैं औरत हूँ!” का मार्मिक मंचन /03.01.2026
महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन (3 जनवरी) हर साल एक लोकप्रिय जन उत्सव की तरह मनाया जाता है। यह दिन न केवल महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की पहली योद्धा को याद करने का अवसर है, बल्कि स्त्री की ताकत, संघर्ष और बलिदान को फिर से महसूस करने का भी मौका देता है। मेरा सौभाग्य रहा कि मुंबई में रहने के कारण इस बार मैं भी इस उत्सव का हिस्सा बन सका।
दादर में ऊर्जा संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मैं शामिल हुआ। कई प्रेरक सत्रों के अलावा, सबसे प्रभावशाली रहा थियेटर ऑफ रेलेवंस के युवा कलाकारों का मंचन। अश्विनी नांदेडकर, कोमल खामकर, सायली पावस्कर, प्रियंका कामले और तुषार म्हस्के ने प्रसिद्ध रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक “मैं औरत हूँ !” की प्रस्तुति दी।
यह नाटक बेहद हृदयस्पर्शी और मार्मिक था। एक महिला के एकालाप (monolog) के रूप में लिखा गया यह टुकड़ा औरत के बहुआयामी स्वरूप को उजागर करता है – वह त्याग है, बलिदान है, ममत्व है, संघर्ष है, और सबसे ऊपर, असीम ताकत है। नाटक में औरत खुद कहती है कि वह हर जगह मौजूद है – ताजमहल की यादगार में, रामायण-महाभारत के युद्ध के कारण में, सावित्रीबाई फुले की शिक्षा की लड़ाई में, इंदिरा गांधी की सियासी ताकत में, मदर टेरेसा की करुणा में, एवरेस्ट फतह करने वाली की हिम्मत में, और साथ ही दहेज के लिए जलायी जाने वाली, बेटी होने के बोझ तले दबी, बासी रोटी खाने वाली उस अनाम स्त्री में भी।
औरत होना ही उसकी ताकत है और यही उसकी कमजोरी भी। वह मिटती है, चूर-चूर होकर धरती में मिल जाती है, फिर उठती है और जुल्म के खिलाफ लड़ती है। वह कुर्बानी है, लेकिन स्वेच्छा से भी और जबरन भी। नाटक की पंक्तियाँ बार-बार गूंजती हैं – “क्योंकि मैं औरत हूँ... और यही मेरी ताकत है।”
दरअसल नाटक " मैं औरत हूं" हम सब के भीतर का आत्म संवाद है जो व्यवस्था के शोषणकारी , वीभत्स सत्य को बाहर नहीं हम सबके भीतर उजागर करता है।
यह नाटक सावित्रीबाई फुले को केवल प्रथम महिला शिक्षिका के सत्ता - व्यवस्था के अनुकूलन को तोड़ सावित्रीबाई फुले की समता दृष्टि को आलोकित करता है।
एक मर्दवादी,धर्मांध और पूंजीवादी - पितृसत्तात्मक समाज में जहां वंदे मातरम् का भूत सत्ता को चढ़ा हो, माता को पूजा जाता हो वहां की सच्चाई से जब नाटक रूबरू कराता है तब पूरा दर्शक करुणामय हो अपनी मां,बहन,बेटी,बीवी को देखता है तो खुद - ब - खुद उद्गारित करता है " मैं औरत हूं ! ".
प्रस्तुति के बाद दर्शकों से संवाद का सत्र भी हुआ। जब मुझे बोलने का मौका मिला, तो मैंने कहा – “बेशक जैविक रूप से मैं एक पुरुष हूँ, लेकिन इस नाटक को देखकर दिल से कहना चाहता हूँ कि मैं भी एक औरत हूँ।” क्योंकि औरत का दर्द, उसकी ताकत, उसका ममत्व – ये सब मानवता के साझे भाव हैं, जिन्हें हर इंसान महसूस कर सकता है।
इस पूरे आयोजन की संयोजक रेश्मा सचमुच प्रशंसा की पात्र हैं, जिन्होंने इतने संवेदनशील और सशक्त कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।
रेशमा ने थियेटर ऑफ़ रेलेवंस की नाट्य कार्यशाला में सहभागिता की है। थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन
रंगकर्म की जड़ों को
सींचता हैं! रंगकर्म को जनमानस से जोड़ता है। जीवन के हर पहलू को रंगकर्म बदलता है चैतन्य और सौंदर्य बोध से। जीवन को सत्य,समग्र और सुंदर बनाते हुए!
नाटक की कुछ चुनी हुई पंक्तियाँ, जो चित्रों में दिख रही हैं और जो दिल को छू गईं:
नमस्कार, आदाब, वणक्कम, हाँ, मैं ही हूँ वो कतरा जो गर्म धरती पर गिर कर भस्म हो जाती हूँ और आपको ठण्डक देती हूँ... औरत होना ही मेरी ताकत है और औरत होना ही मेरी कमजोरी...
मैं मिटती हूँ-चूर-चूर होकर मिल जाती हूँ। इस मिट्टी में, और यहीं से इकट्ठा होकर उठती हूँ...
सावित्री बाई फुले भी मैं... और यही मेरी ताकत है।
यह नाटक 1998 में लिखा था
11 अप्रैल, 1998 को मुंबई यूनिवर्सिटी के फोर्ट कैंपस के कॉन्वोकेशन हॉल में इसका प्रथम मंचन हुआ था और इसे अभिनीत किया था बबली रावत ने।
तब से इस नाटक के हिंदी, अंग्रेज़ी, पंजाबी ,मराठी और अन्य भाषाओं में हज़ारों प्रस्तुतियां हुई हैं।
भारतीय,अमेरिकन,जर्मन और स्विट्ज़रलैंड के कलाकारों ने इस नाटक को अभिनीत किया है।
यह नाटक न केवल स्त्री-विमर्श का दस्तावेज है, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला एक जीवंत काव्य भी। सावित्रीबाई फुले जयंती जैसे अवसरों पर ऐसे मंचन हमें याद दिलाते हैं कि स्त्री मुक्ति की लड़ाई अभी जारी है, और इसमें हर किसी की भागीदारी जरूरी है – चाहे वह पुरुष हो या महिला।
जय ज्योति- जय क्रांति.
Ram Mohan Rai,
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