गोवा की यात्रा: एक ऐतिहासिक और भावनात्मक अनुभव /08.01.2026
गोवा की यात्रा: एक ऐतिहासिक और भावनात्मक अनुभव
कल से हम गोवा की सुंदर धरती पर हैं। यह यात्रा हमारे लिए केवल एक पर्यटन स्थल की सैर नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक और ऐतिहासिक जुड़ाव की कहानी है। हमारी बेटी संघमित्रा ने हमें यहां लाया है, और साथ में उसका बेटा श्रेयम भी है। परिवार के साथ यह समय बिताना हमें नई ऊर्जा दे रहा है। पिछले साल मैंने जो संकल्प लिया था, उसमें गोवा की यात्रा भी शामिल थी। आखिरकार, वह संकल्प पूरा हो रहा है, और हम यहां पहली बार आए हैं। हालांकि, गोवा आने की इच्छा तो बहुत पहले से थी, जब हमारे मित्र—केंद्रीय राज्य मंत्री एस. वाई. नाइक और गांधीवादी कुमार कलानंद मणि—ने हमें निमंत्रण दिया था। उस समय से ही मन में यह जगह बस गई थी, लेकिन अब जाकर यह सपना साकार हुआ है।
गोवा को आमतौर पर पर्यटन के लिए जाना जाता है—इसकी सुनहरी रेत वाली समुद्र तट, हरी-भरी वादियां, जीवंत नाइटलाइफ और पुर्तगाली प्रभाव वाली वास्तुकला। यहां के बीच जैसे कैलंगुट, बागा और अनजुना दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन मेरे लिए गोवा इससे कहीं अधिक है। यह एक ऐतिहासिक भूमि है, जहां क्रांतिकारी वीरों और स्वतंत्रता सेनानियों ने पुर्तगाली गुलामी से मुक्ति के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। गोवा की मिट्टी में उन शहीदों की यादें बसी हैं, जिन्होंने सदियों की दासता को चुनौती दी। पुर्तगालियों ने 1510 में गोवा पर कब्जा किया था और लगभग 450 वर्षों तक इसे अपनी कॉलोनी बनाए रखा। भारत की आजादी के बाद भी गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन रहा, जो एक बड़ा अन्याय था।
इस यात्रा में हमारा पहला पड़ाव वह जेल था, जो अब एक हेरिटेज सेंटर और प्रदर्शनी में तब्दील हो चुकी है। यह जगह गोवा मुक्ति संग्राम के सेनानियों की पीड़ा और संघर्ष की गवाह है। यहां उन वीरों को कैद किया गया था, जिन्होंने पुर्तगाली साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाई। जेल की दीवारें आज भी उन यातनाओं की कहानियां सुना रही हैं—कठोर सजाएं, अत्याचार और अमानवीय व्यवहार। हमने यहां घूमते हुए उन स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों, दस्तावेजों और स्मृतियों को देखा। यह जगह एक तीर्थस्थल की तरह लगी, जहां इतिहास जीवंत हो उठता है। गोवा मुक्ति संग्राम की कहानी 1950 के दशक में जोर पकड़ी, जब डॉ. राम मनोहर लोहिया, डॉ. जूलियो मेनेजेस और अन्य नेताओं ने सत्याग्रह और आंदोलन चलाए। आखिरकार, 1961 में भारतीय सेना की 'ऑपरेशन विजय' के माध्यम से गोवा को पुर्तगाली चंगुल से मुक्त कराया गया। 19 दिसंबर 1961 को गोवा आजाद हुआ, और यह दिन गोवा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया।
इस हेरिटेज सेंटर में प्रदर्शित सामग्री ने हमें गहराई से प्रभावित किया। यहां पुराने हथियार, पत्र, फोटोग्राफ और वीडियो क्लिप्स हैं, जो उस दौर की क्रूरता और वीरता को दर्शाते हैं। एक प्रदर्शनी में गोवा के स्थानीय लोगों के योगदान को विशेष रूप से उजागर किया गया है—कैसे किसानों, मजदूरों और महिलाओं ने भी इस संघर्ष में भाग लिया। हमने वह सेल भी देखा जहां सेनानियों को यातनाएं दी जाती थीं। यह सब देखकर मन भावुक हो उठा। गोवा की आजादी भारत की आजादी की पूरी तस्वीर को पूर्ण करती है। पर्यटन की चमक के पीछे यह संघर्ष की कहानी अक्सर छिप जाती है, लेकिन इसे याद रखना जरूरी है। मैं इस तीर्थस्थल पर एक अलग लेख लिखूंगा, जहां इस जेल की विस्तृत कहानी और उसके ऐतिहासिक महत्व को वर्णित करूंगा।
गोवा की यह यात्रा हमें सिखाती है कि सौंदर्य और इतिहास का मेल कितना अनोखा हो सकता है। यहां की संस्कृति में पुर्तगाली और भारतीय तत्वों का संगम है—चर्च, मंदिर, फेस्टिवल और स्थानीय व्यंजन जैसे फेनी और सीफूड। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है वह भावना जो इस भूमि में बसी है—मुक्ति की भावना। हमारी बेटी संघमित्रा और दोहते श्रेयम के साथ यह समय हमें परिवार की एकता और इतिहास से जुड़ाव का एहसास करा रहा है। फिलहाल, गोवा की धरती को सलाम करता हूं—उन वीरों को सलाम जिन्होंने इसे आजाद कराया, और इस खूबसूरत जगह को सलाम जो हमें नई प्रेरणा दे रही है।
राम मोहन राय,
गोवा /07.01.2026
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