गोवा की कैथेड्रल बेसिलिका की यात्रा: एक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक अनुभव _09.01.2026
गोवा की यात्रा हमेशा से मेरे लिए एक सपना रही है – समुद्र तटों की चमक, पुर्तगाली विरासत की झलक और आध्यात्मिक स्थलों की शांति। लेकिन इस बार, मेरा मुख्य उद्देश्य था ओल्ड गोवा में स्थित कैथेड्रल बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस की यात्रा, जिसे स्थानीय रूप से बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस के नाम से जाना जाता है। यह स्थान न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, जहां सेंट फ्रांसिस जेवियर की अविनाशी देह रखी हुई है। जनवरी 2026 की एक धूप भरी सुबह, मैं पणजी से टैक्सी लेकर ओल्ड गोवा पहुंचा। हरे-भरे पेड़ों से घिरा यह इलाका पुर्तगाली काल की याद दिलाता है, जहां यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की एक श्रृंखला है। जैसे ही मैं बेसिलिका के करीब पहुंचा, हवा में एक पवित्र शांति महसूस हुई, मानो समय ठहर गया हो।
बाहरी दृश्य: मजबूत और सादगीपूर्ण भव्यता
बेसिलिका का बाहरी हिस्सा दूर से ही आकर्षित करता है। लेटराइट पत्थर से बनी इस इमारत की दीवारें लाल-भूरे रंग की हैं, जो गोवा की मिट्टी से मेल खाती हैं। यह 1594 से 1605 के बीच बनाई गई थी, और इसका आर्किटेक्चर बारोक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे जेसुइट सोसाइटी ने पेश किया। मुख्य द्वार काले ग्रेनाइट से बना है, जो सादा लेकिन मजबूत दिखता है – कोई ज्यादा अलंकरण नहीं, लेकिन तीन स्तरों में बंटा हुआ: नीचे बड़े दरवाजे, बीच में खिड़कियां और ऊपर घंटी टावर। दाहिने तरफ का घंटी टावर ऊंचा है, लेकिन बाएं वाला अधूरा सा लगता है, जो इतिहास की एक कहानी कहता है। चारों तरफ हरी घास और पेड़ हैं, जहां पर्यटक फोटो खिंचाते नजर आते हैं। सूरज की रोशनी में पत्थर चमकते हैं, और पास ही बहती मांडवी नदी की हवा एक ताजगी देती है। मैंने मुख्य द्वार के सामने खड़े होकर महसूस किया कि यह जगह न केवल धार्मिक है बल्कि औपनिवेशिक इतिहास की गवाह है – पुर्तगालियों ने इसे सेंट फ्रांसिस जेवियर के सम्मान में बनाया, जो एशिया में ईसाई धर्म फैलाने वाले मिशनरी थे।
प्रवेश और मुख्य हॉल: शांति का स्वागत:
मुख्य द्वार से अंदर कदम रखते ही, एक ठंडी हवा का झोंका आया, जो बाहर की गर्मी से राहत देता है। प्रवेश द्वार पर नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे हैं, जिन पर बाइबिल की कहानियां उकेरी गई हैं। अंदर का मुख्य हॉल, या नवे, विशाल है – लगभग 250 फीट लंबा और 180 फीट चौड़ा। फर्श मोज़ेक टाइल्स से बना है, जो सदियों पुराना लगता है, और छत ऊंची वॉल्टेड है, जो कॉरिंथियन शैली में सजी हुई है। चारों तरफ साइड आइल्स हैं, जहां मोमबत्तियां जल रही थीं, और हल्की धूप की किरणें खिड़कियों से छनकर आ रही थीं। हॉल के बीच में लकड़ी की बेंचें व्यवस्थित हैं, जहां श्रद्धालु बैठकर प्रार्थना करते हैं। हवा में अगरबत्ती की खुशबू और हल्की घंटियों की आवाज एक आध्यात्मिक माहौल बनाती है। मैंने यहां कुछ मिनट रुककर महसूस किया कि यह जगह कितनी शांतिपूर्ण है – पर्यटकों की भीड़ के बावजूद, एक गहन मौन है।
मुख्य वेदी और अलंकरण: कला का खजाना
हॉल के अंत में मुख्य वेदी है, जो सोने से मढ़ी हुई है और बारोक शैली की उत्कृष्टता दिखाती है। वेदी पर सेंट फ्रांसिस जेवियर की मूर्ति है, और उसके चारों तरफ जटिल नक्काशी – फूल, पत्तियां और स्वर्गदूत। दीवारों पर पेंटिंग्स हैं, जो जीसस के जीवन की घटनाओं को दर्शाती हैं, और रंग अभी भी जीवंत हैं। दाहिने तरफ साइड चैपल्स हैं, जहां विभिन्न संतों की मूर्तियां रखी हैं। सबसे महत्वपूर्ण है सेंट फ्रांसिस जेवियर का मौसोलियम – एक चांदी का ताबूत, जो संगमरमर के स्तंभों पर रखा है। यह इटालियन कलाकार जियोवान्नी बतिस्ता फोगिनी द्वारा बनाया गया था, और हर 10 साल में प्रदर्शित किया जाता है। मैंने ताबूत के पास खड़े होकर श्रद्धांजली अर्पित की, और एक अजीब सी ऊर्जा महसूस हुई – जैसे इतिहास जीवित हो। वेदी के पास लकड़ी की नक्काशीदार स्क्रीन है, जो इंडियन और पुर्तगाली कला का मिश्रण है। हर कोने में छोटी-छोटी मूर्तियां और कैंडल स्टैंड्स हैं, जो शाम को रोशनी से चमकते होंगे।
साइड चैपल्स और संग्रहालय: इतिहास की झलकियां:
बेसिलिका के दाहिने हिस्से में एक छोटा संग्रहालय है, जहां पुरानी पेंटिंग्स, मूर्तियां और धार्मिक वस्तुएं रखी हैं। यहां सेंट फ्रांसिस जेवियर के जीवन से जुड़ी वस्तुएं हैं, जैसे उनके पत्र और कपड़े। एक चैपल में क्रॉस ऑफ मिरेकल्स है, जो 1619 में बढ़ता हुआ देखा गया था। बाएं तरफ की गैलरी में सीढ़ियां हैं, जो ऊपरी स्तर पर ले जाती हैं, जहां से पूरे हॉल का विहंगम दृश्य दिखता है। हर चैपल में अलग-अलग थीम है – एक में मैरी की मूर्ति, दूसरे में जीसस की क्रूसीफिक्शन। दीवारों पर फ्रेस्को पेंटिंग्स हैं, जो फीकी पड़ चुकी हैं लेकिन अभी भी प्रभावशाली हैं। मैंने यहां घूमते हुए महसूस किया कि यह जगह न केवल पूजा का केंद्र है बल्कि कला और इतिहास का संग्रहालय भी। पुर्तगाली वास्तुकार जुलियाओ सिमाओ और डोमिंगोस फर्नांडेस ने इसे डिजाइन किया था, और यह जेसुइट आर्किटेक्चर का क्लासिक उदाहरण है।
आध्यात्मिक अनुभव: आत्मा की शांति
यह यात्रा सिर्फ दर्शनीय नहीं थी; यह आध्यात्मिक थी। सेंट फ्रांसिस जेवियर की अविनाशी देह (जो 1552 में उनकी मृत्यु के बाद से संरक्षित है) देखकर एक चमत्कार सा लगा। हर साल दिसंबर में यहां एक्सपोजिशन होता है, जब लाखों श्रद्धालु आते हैं। मैं जन्मना आर्य समाजी हिन्दू हूं परंतु माता- पिता के सर्वधर्म सद्भाव के संस्कारों की वज़ह से इश्वर को सर्वव्यापी और निराकार मानता हूं, इसलिए किसी भी धर्म स्थल पर जाने में कोई एतराज नहीं. मैंने भी प्रार्थना की, और लगा जैसे अनंत शांति मिली हो। आसपास के लोग – कुछ घुटनों पर बैठे, कुछ मोमबत्तियां जला रहे – एक सामूहिक आस्था का दृश्य बनाते हैं। बाहर निकलते समय, मैंने पास की से कैथेड्रल की झलक देखी, जो बेसिलिका से सटी हुई है, लेकिन बॉम जीसस का अनुभव अनोखा था।
ऐतिहासिक महत्व और सलाह:
यह बेसिलिका 1605 में कांसक्रेटेड हुई थी और 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर बनी। यह गोवा के पुर्तगाली इतिहास की याद दिलाती है, जब 1510 में अल्फोंसो डी अल्बुकर्क ने गोवा जीता था। यात्रा के लिए सुबह जल्दी जाएं, क्योंकि दोपहर में भीड़ बढ़ जाती है। प्रवेश निशुल्क है, लेकिन फोटोग्राफी प्रतिबंधित है। गोवा की इस यात्रा ने मुझे आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया – अगर आप गोवा जा रहे हैं, तो बॉम जीसस को जरूर शामिल करें। यह न केवल एक जगह है, बल्कि एक अनुभव है जो दिल और दिमाग दोनों को छूता है।
Ram Mohan Rai,
Cathedral Beselica of Bom Jesus,
कैथेड्रल बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस,
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