गोवा यात्रा: महालसा नारायणी मंदिर के सुखद दर्शन /09.01.2026

 गोवा यात्रा: महालसा नारायणी मंदिर की सुखद सैर

आज दिनांक 10 जनवरी 2026 को, मैं अपनी गोवा यात्रा के एक यादगार हिस्से को कलमबद्ध कर रहा हूं। कल, यानी 9 जनवरी को, हमने गोवा के प्रसिद्ध महालसा नारायणी मंदिर के दर्शन के लिए एक कैब बुक की और सुबह ही प्रस्थान कर दिया। रास्ता हरा-भरा और मनोरम था, गोवा की प्राकृतिक सुंदरता ने सफर को और भी आनंदमय बना दिया। दोपहर बाद लगभग 2:30 बजे हम मंदिर पहुंचे। जैसे ही हमने मंदिर के द्वार पर कदम रखा, एक शांत और दिव्य वातावरण ने हमें घेर लिया। मंदिर अत्यंत आकर्षक और सुंदर है – इसकी वास्तुकला और सजावट देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। यहां आकर मन लगता है, जैसे समय ठहर सा जाता हो।

बेशक, मैं बतौर आर्य समाज के पृष्ठभूमि से मूर्तिपूजक नहीं हूं, लेकिन मैं अपनी पत्नी, जो कि विशुद्ध आस्थावान पौराणिक है, की वजह से मंदिर में जाने में कोई परहेज नहीं करता। मैं यहां की कलात्मकता, ऐतिहासिक महत्व और पुरातात्विक स्वरूप का दर्शन करता हूं। मंदिर की दीवारें, नक्काशी और समग्र डिजाइन पुरानी भारतीय कला की मिसाल हैं, जो सदियों की कहानी बयां करती हैं। आइए, अब मैं इस मंदिर के बारे में विस्तार से बताता हूं, ताकि यह यात्रा विवरण पूर्ण हो।

मंदिर का स्थान और पहुंच
महालसा नारायणी मंदिर गोवा के पोंडा तालुका में मरदोल गांव में स्थित है। यह पणजी (पनाजी) शहर से मात्र 22 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि मडगांव (मार्गाओ) से करीब 10 किलोमीटर दूर। गोवा की दक्षिणी भाग में वर्ना से स्थानांतरित होकर यहां स्थापित हुआ यह मंदिर, घने जंगलों और नदियों से घिरा हुआ है, जो इसे और भी रहस्यमयी और आकर्षक बनाता है। हम कैब से पहुंचे, जो आसान और आरामदायक था – गोवा में लोकल ट्रांसपोर्ट सिस्टम अच्छा है, और मंदिर तक सड़कें अच्छी तरह से जुड़ी हुई हैं। मंदिर का क्षेत्र लगभग 5-6 एकड़ में फैला हुआ है, जिसमें मुख्य मंदिर के अलावा उद्यान, तालाब और विश्राम स्थल शामिल हैं। परिसर में प्रवेश करते ही एक बड़ा प्रांगण नजर आता है, जहां भक्त आराम से घूम सकते हैं।

 मंदिर का इतिहास
महालसा नारायणी मंदिर का इतिहास गोवा की सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह मंदिर लगभग 450 वर्ष पुराना है, लेकिन इसकी जड़ें और भी प्राचीन हैं। मूल रूप से यह देवी का मंदिर दक्षिण गोवा के वर्ना (ओल्ड मरदोल या वेल्हाम) में स्थित था, जहां सदियों से पूजा होती आ रही थी। 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली आक्रमण और धार्मिक उत्पीड़न के दौरान, मूल मंदिर को नष्ट कर दिया गया। गोवा के हिंदू समुदाय ने देवी की प्रतिमा को गुप्त रूप से बचाया और इसे मरदोल में स्थानांतरित कर दिया। यहां मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया, जो गोवा के हिंदू समुदाय की दृढ़ता और आस्था का प्रतीक है। मंदिर का निर्माण गोवा की पारंपरिक शैली में किया गया है, जिसमें पुर्तगाली प्रभाव भी थोड़ा-बहुत दिखाई देता है, लेकिन मुख्य रूप से यह भारतीय मंदिर वास्तुकला का उदाहरण है। पुरातात्विक दृष्टि से, मंदिर की नक्काशियां और संरचना मध्यकालीन काल की कला को दर्शाती हैं, जो इतिहास प्रेमियों के लिए एक खजाना है।

 मंदिर के क्षेत्र और वास्तुकला
मंदिर का मुख्य क्षेत्र एक बड़े प्रांगण से घिरा है, जहां प्रवेश द्वार पर सुंदर नक्काशीदार स्तंभ और मेहराब हैं। मुख्य मंदिर भवन लकड़ी और पत्थर से निर्मित है, जिसमें गोवा की स्थानीय शैली – जैसे कि छत पर टाइल्स और दीवारों पर जटिल चित्रकारी – प्रमुख है। गर्भगृह में देवी की प्रतिमा स्थापित है, जो चारों ओर से घंटियों और दीपकों से सजा हुआ है। मंदिर के आसपास एक छोटा तालाब है, जो पूजा-अर्चना के लिए उपयोग होता है। कलात्मक दृष्टि से, मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं की कहानियां उकेरी गई हैं, जो रामायण और महाभारत से प्रेरित लगती हैं। पुरातात्विक महत्व के कारण, यह जगह गोवा के धरोहर स्थलों में शुमार है। हमने यहां घूमते हुए इन नक्काशियों को करीब से देखा – हर कोना इतिहास की झलक देता है।

 देव प्रतिमाएं
मंदिर मुख्य रूप से देवी महालसा नारायणी को समर्पित है, जो भगवान विष्णु की मोहिनी अवतार का रूप मानी जाती हैं। मोहिनी वह अवतार है जिसमें विष्णु ने अमृत कलश को राक्षसों से बचाया था। देवी को यहां लक्ष्मी या दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है – उनकी प्रतिमा चार भुजाओं वाली है, जिसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं। प्रतिमा सोने और चांदी से सजी हुई है, जो बेहद आकर्षक लगती है। गर्भगृह में अन्य छोटी प्रतिमाएं भी हैं, जैसे कि गणेश और अन्य सहायक देवताओं की। मैंने इन प्रतिमाओं को कलात्मक नजरिए से देखा – उनकी बनावट और सजावट पुरानी कारीगरी की मिसाल है।

 उत्सव और पूजा
मंदिर में साल भर विभिन्न उत्सव मनाए जाते हैं, जो गोवा की सांस्कृतिक जीवंतता को दर्शाते हैं। मुख्य उत्सवों में नवरात्रि प्रमुख है, जब देवी की विशेष पूजा और आरती होती है। इसके अलावा, जatra (मेला) और zatra जैसे स्थानीय उत्सव यहां आयोजित होते हैं, जहां भक्त नृत्य, संगीत और प्रसाद के साथ जश्न मनाते हैं। फरवरी-मार्च में 'शिगमो' उत्सव के दौरान मंदिर विशेष रूप से सजाया जाता है। दैनिक पूजा में सुबह-शाम आरती होती है, और विशेष अवसरों पर पालकी यात्रा निकाली जाती है। हम जब पहुंचे, तो दोपहर की पूजा चल रही थी, जिसकी ध्वनि और सुगंध ने वातावरण को और पवित्र बना दिया।

 आस्था किन लोगों में है
महालसा नारायणी की आस्था मुख्य रूप से गोवा के सरस्वत ब्राह्मण और दैवज्ञ ब्राह्मण समुदाय में गहरी है, जो सदियों से इस देवी की उपासक रहे हैं। गोवा के हिंदू समुदाय में यह मंदिर एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहां लोग परिवार के साथ आते हैं। देश-विदेश से पर्यटक भी यहां आते हैं, लेकिन स्थानीय गोवा वासियों में इसकी आस्था विशेष है – वे इसे अपनी कुलदेवी मानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी सुख-समृद्धि और सुरक्षा की दाता हैं, इसलिए व्यापारी और किसान वर्ग में भी इसकी पूजा प्रचलित है। मेरी पत्नी जैसी आस्थावान भक्तों के लिए यह जगह दिव्य अनुभव प्रदान करती है, जबकि मेरे जैसे इतिहास प्रेमी के लिए यह सांस्कृतिक धरोहर है।

कुल मिलाकर, यह यात्रा हमारे लिए यादगार रही। मंदिर से लौटते हुए हमने स्थानीय भोजन का आनंद लिया और गोवा की अन्य जगहों की योजना बनाई। अगर आप गोवा जा रहे हैं, तो महालसा मंदिर जरूर जाएं – यह न सिर्फ आध्यात्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और कलात्मक रूप से समृद्ध है।
Ram Mohan Rai, 
Mahalasa Temple, Goa. 
09.01.2026

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