पानीपत के मोहल्ले-1 (Kayasthan street)

पानीपत के मोहल्ले-1.
( कुचा कायस्थान)
पानीपत का पुराना शहर अपने आप में एक जीवंत इतिहास है, जहाँ गलियाँ और मोहल्ले सदियों की कहानियाँ समेटे हुए हैं। पानीपत शहर चार राजस्व सर्कलों में विभाजित है—तरफ़ अंसार, तरफ़ राजपूतान, तरफ़ अफ़ग़ानान और तरफ़ मख़दूम जदगान। आज हम तरफ़ अंसार के कुचा कायस्थान में घूमने निकले हैं। यह कुचा मोहल्ले के मकान नंबर 37, वार्ड संख्या 2 में स्थित है, जहाँ मेरा जन्म हुआ था। यह छोटा-सा इलाका उत्तर में मोहल्ला घेर अराइयाँ से घिरा हुआ है, पूर्व में घाटी बार (परम हंस कुटिया के सामने), दक्षिण में बुलबुल बाज़ार और चारखी से सटा हुआ है, तथा पश्चिम में चरखी से देवी मन्दिर सलार गंज रोड पर हिंदू सत्संग मंदिर (इमामबाड़ा) के सामने वाली गली तक फैला हुआ है।

पुराने ज़माने से इस कुचे में मुख्य रूप से कायस्थों, ब्राह्मणों और बनियों के मकान रहे हैं, लेकिन अब यहाँ की आबादी मिश्रित हो गई है—विभिन्न समुदायों के लोग यहाँ रहते हैं। यह कुचा दो हिस्सों में बँटा हुआ है: निचला हिस्सा जिसे 'तलहाई' कहा जाता है और ऊपरी हिस्सा 'उपराही'। तलहाई में ही विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर का घर था। उनके अलावा, बिशन स्वरूप भटनागर, राम चंदर भटनागर, कृष्ण स्वरूप भटनागर, पंडित वैद्य सेवा राम, पंडित छज्जू राम, पंडित शुगन चंद वकील, मास्टर सीता राम सैनी, लाल चंद जैन, जुग लाल कश्यप, पंडित शुगन चंद (बंबई वाले), और लाला लक्ष्मण स्वरूप वकील जैसे प्रमुख व्यक्तियों के घर यहाँ थे। उपराही में लाला आत्मा राम, श्याम लाल भटनागर, डॉ. के.सी. सेन, मास्टर बिशम्बर दास गरमा, लाला पारस राम कबाड़ी, पंडित रति राम, लाला जिया लाल जैन, शांति स्वरूप जैन,लाला कबूल सिंह जैन, रंजीत सिंह जैन, बिजेंद्र स्वरूप कुर्ल, और लाला सुंदर लाल आदि के आवास थे। ये सभी बुजुर्ग अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अधिकांश बच्चे बाहर बस चुके हैं—कुछ शहरों में, कुछ विदेशों में, और कुछ अन्य स्थानों पर।

इस कुचे में चार प्रमुख मंदिर हैं: तलहाई में शिव मंदिर, उपराही में चित्रगुप्त जी का मंदिर, और उपराही में ही श्री   दूदी लाल पार्श्वनाथ जैन मंदिर। इन मंदिरों ने इस इलाके को धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व प्रदान किया है, जहाँ लोग पूजा-अर्चना के लिए इकट्ठा होते थे। कुचे की एक अनोखी विशेषता है 'छत्ता'—यानी मकानों से ढकी हुई गली का एक हिस्सा। इसकी चौड़ाई एक जगह पर तो मात्र डेढ़ फुट ही है, जहाँ से आदमी बड़ी मुश्किल से निकल पाता है। यह संकरी गली पुराने शहर की वास्तुकला की याद दिलाती है, जहाँ जगह की कमी के बावजूद लोग सौहार्दपूर्ण तरीके से रहते थे।

वैसे तो पूरा पुराना पानीपत ऊँची-नीची पहाड़ी नुमा मलबे पर बसा हुआ है, जो सदियों के युद्धों और निर्माणों का गवाह है, लेकिन इस कुचे में उसका पूरा आनंद महसूस होता है। यहाँ लगभग 200 घर होंगे, लेकिन पुराने समय में छतें एक-दूसरे से सटी हुई होने की वजह से पूरा कुचा एक बड़े घर जैसा लगता था। हर किसी को पता होता था कि आज किस घर में क्या पका है—खुशबू से ही अंदाज़ा लग जाता था। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देते थे; जन्म, विवाह, त्योहार या दुखद घटनाएँ—सब कुछ सामूहिक रूप से मनाया जाता था। पड़ोसी परिवार की तरह थे, जहाँ मदद हमेशा उपलब्ध रहती थी।

मैंने अपने जन्म के बाद यहाँ 25 साल बिताए, जबकि मेरा परिवार इस मोहल्ले में लगभग 100 साल रहा। इसे छोड़े हुए 40 साल हो गए हैं, लेकिन अभी भी सपनों में यही गलियाँ, यही मकान और यही लोग नज़र आते हैं। यह जगह मेरे बचपन की यादों से भरी हुई है—खेलकूद, दोस्ती, त्योहारों की रौनक और उस पुराने पानीपत की सादगी। आज का पानीपत आधुनिक हो रहा है, लेकिन इस कुचे की आत्मा अभी भी वही पुरानी है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।
Ram Mohan Rai, 
Panipat/18.01.2026

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