पानीपत के गौरव: राजेंद्र गुप्ता - रंगमंच और सिनेमा के एक बहुमुखी कलाकार
राजेंद्र गुप्ता, हमारे शहर पानीपत के एक प्रतिष्ठित निवासी, आज मुंबई में रहते हुए हिंदी रंगमंच, टेलीविजन और फिल्म जगत के एक ख्यातिप्राप्त कलाकार हैं। उनकी हालिया प्रसिद्धि दूरदर्शन के धारावाहिक "भारत एक खोज" (जिसे अक्सर "हिंदुस्तान की खोज" कहा जाता है) और सब टीवी के लोकप्रिय शो "चिड़ियाघर" से और बढ़ी है, जहां उन्होंने केसरी नारायण (बाबूजी) की यादगार भूमिका निभाई।पानीपत जैसे छोटे शहर से निकलकर मुंबई के चकाचौंध भरे दुनिया में अपनी जगह बनाने वाले राजेंद्र गुप्ता की जीवन यात्रा प्रेरणादायक है, जो कला के प्रति समर्पण और मेहनत की मिसाल पेश करती है।
प्रारंभिक जीवन और परिवार पृष्ठभूमि
राजेंद्र गुप्ता का जन्म 17 अक्टूबर 1947 को हमारे शहर पानीपत, ( हरियाणा, ) में एक प्रतिष्ठित व्यवसायिक और समृद्ध परिवार में हुआ। उनके पिता, जिन्हें मास्टर जी (जय भगवान दास) कहा जाता था, ऊन के बड़े व्यापारी थे और साथ ही एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे कांग्रेस और आर्य समाज के प्रमुख नेता थे।राजेंद्र के चाचा लाला दिलीप सिंह आर्य समाज, बड़ा बाजार के प्रधान रहे और संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे। मेरा सौभाग्य रहा कि इन दोनों भाइयों के अलग-अलग कार्यकाल में प्रधान रहते हुए वे मंत्री के रूप में सेवा कर सके। परिवार की यह सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि ने राजेंद्र को शुरुआती जीवन में ही समाज सेवा और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी, हालांकि वे व्यवसाय में रुचि नहीं रखते थे और नाटक तथा रंगमंच की ओर आकर्षित हुए।
स्कूल और कॉलेज के दिनों में राजेंद्र सक्रिय रूप से नाटकों में भाग लेते थे। उन्होंने आर्य कॉलेज, पानीपत से स्नातक पूरा किया और 1972 में दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में दाखिला लिया, जहां उन्होंने निर्देशन में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की एनएसडी में उनकी मुलाकात कई प्रतिभाशाली कलाकारों से हुई, जिसने उनके करियर की नींव रखी।
व्यक्तिगत जीवन:
राजेंद्र गुप्ता का विवाह उनके साथ कार्यरत अभिनेत्री वीना गुप्ता से हुआ, जिनसे उनकी मुलाकात इंदौर में एक कॉलेज नाटक के दौरान हुई थी। उनकी एक बेटी रवी गुप्ता है, जो खुद एक टेलीविजन अभिनेत्री हैं और अभिनेता मनोज बिदवाई से विवाहित हैं। राजेंद्र का परिवार हमेशा उनके करियर में सहायक रहा है।
करियर की यात्रा: रंगमंच से सिनेमा तक-
1985 में राजेंद्र गुप्ता अपने परिवार के साथ मुंबई चले गए और टेलीविजन धारावाहिकों में काम शुरू किया उनका टेलीविजन डेब्यू "कहां गए वो लोग" (1985) से हुआ, और तीन साल बाद वे हिंदी फिल्म उद्योग में शामिल हुए। 1990 तक उन्होंने लगभग 40 धारावाहिकों में काम किया, जिसके लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ - पांच वर्षों में सबसे अधिक टीवी सीरियल करने का रिकॉर्ड।
रंगमंच राजेंद्र का पहला प्रेम है। उन्होंने दर्जनों नाटकों में अभिनय किया और कम से कम 20 का निर्देशन किया, जिनमें "सरफिरे", "जहेज हत्यारे" (अल्बर्ट कामू के "द जस्ट असैसिन्स" पर आधारित), और "सूरज की अंतिम किरण से सूरज की पहली किरण तक" (सुरेंद्र वर्मा के नाटक पर आधारित) शामिल हैं। वे अभिनेत्री नीना गुप्ता के साथ सहज प्रोडक्शंस नामक थिएटर प्रोडक्शन कंपनी चलाते हैं।
टेलीविजन पर उनकी प्रमुख भूमिकाएं "चंद्रकांता" (1990s) में पंडित जगन्नाथ, "साया" (1998-2001) में जगत नारायण, "महाराजा रणजीत सिंह" (2010) में अदीना बेग खान, "समविधान" (2014) में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, औरहाल ही में वे सोनी टीवी के "जगन्नाथ और पूर्वी की दोस्ती अनोखी" में पंडित जगन्नाथ मिश्रा की भूमिका निभा रहे हैं। फिल्मों में उन्होंने "लगान" (2001) में चंपानेर के मुखिया, "सलीम लंगड़े पे मत रो" (1989), "सेहर" (2005), "गुरु" (2007), "उलझ" (2024), और "मालिक" (2025) जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं।
पानीपत से अन्य प्रसिद्ध हस्तियां जैसे ख्वाजा अहमद अब्बास (जिन्होंने "सात हिंदुस्तानी" में अमिताभ बच्चन को लॉन्च किया और राज कपूर की कई फिल्मों का लेखन-निर्देशन किया) और सत्येंद्र कप्पू' (जो हमारे ही मोहल्ले के थे और मेरे पिता के विद्यार्थी रहे) ने भी फिल्म जगत में शहर का नाम रोशन किया। 'सत्येंद्र कप्पू' के परिवार को "बंबई वाले" कहा जाता था। लेकिन आज राजेंद्र गुप्ता ने अपनी कला और ईमानदारी से जो शोहरत कमाई है, वह अनुकरणीय है।
एक यादगार मुलाकात:
आजकल लेखक मुंबई में है और अपनी कोशिश रहती है कि उन तमाम लोगों से मिले जिनका उनके शहर, कार्यों और विचारधारा से ताल्लुक रहा। राजेंद्र गुप्ता से मिलना बहुत सहज रहा और ऐसा लगा जैसे बरसों से जान-पहचान है। लगभग एक घण्टे की बातचीत में हमारा विषय 'पानीपत और उनकी उससे जुड़ी यादें' ही रहा. उन्हें यह जानकर बेहद प्रसन्नता हुई कि अब उनके शहर के लोगों का साहित्यिक और साँस्कृतिक मिजाज़ विकसित हो रहा है और उनके आर्य कॉलेज में अब एक विशाल आधुनिक ऑडिटोरियम है जहां अक्सर रंगमंच के कार्यक्रम होते रहते है. मैंने उन्हें उनके अपने शहर में आने पर कोई साँस्कृतिक सभा में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया जिस पर उन्होंने खुशी का इजहार किया. विदा लेते समय मैंने कहा, "आपसी गले मिलना तो बनता है," और वे खुशी से गले मिले। इस तरह दो पानीपतियों का मिलन हुआ, जो शहर की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करता है। वे अपने शहर को हमेशा अपने दिल में बसाए रखते हैं. यहां के मोहल्ले, गलियां, लोग और अपने दोस्त और बुजुर्ग सब कुछ उनकी यादों में है और हाली पानीपती का यह शेर उनकी प्रेरणा है-"हरगिज़ न लूं बहिश्त, तेरी एक मुश्त ए खाक के बदले"
राजेंद्र गुप्ता की कहानी बताती है कि छोटे शहर से निकलकर भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं, अगर जुनून और मेहनत हो। वे आज भी सक्रिय हैं और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।
Ram Mohan Rai,
Mumbai/05.01.2026
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