पानीपत का प्राचीन मोहल्ला: घेर अराइयाँ की ऐतिहासिक यात्रा
पानीपत, हरियाणा का एक ऐतिहासिक शहर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विविध समुदायों के लिए जाना जाता है। यहां के मोहल्लों में से एक प्रमुख और प्राचीन मोहल्ला है 'घेर अराइयाँ', जो अराइ समुदाय की गौरवपूर्ण कहानी को समेटे हुए है। यह मोहल्ला न केवल स्थानीय इतिहास का हिस्सा है, बल्कि भारत-पाकिस्तान विभाजन की दर्दनाक स्मृतियों और सामाजिक परिवर्तनों का जीवंत गवाह भी है। इस लेख में हम घेर आरियन की उत्पत्ति, समुदाय की विशेषताओं, विभाजन के प्रभाव और वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
अराइ समुदाय की उत्पत्ति और विशेषताएं: अराइ समुदाय मुख्य रूप से पंजाब क्षेत्र के मूल निवासी हैं, जो कृषि और मेहनती जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐतिहासिक रूप से, इस समुदाय की जड़ें स्थानीय कृषक वर्ग में हैं, हालांकि कुछ कथाएं इनकी उत्पत्ति अरब मूल से जोड़ती हैं। लेकिन ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार, यह दावा अधिकतर सांस्कृतिक गौरव से जुड़ा हुआ है, जबकि वास्तविकता स्थानीय पंजाबी जड़ों की ओर इशारा करती है। अराइ लोग मुख्य रूप से इस्लाम धर्म को अपनाने वाले कृषक थे, जो छोटी-मोटी खेती और व्यापार से जुड़े हुए थे। पानीपत में अराइ समुदाय हिंदू और मुस्लिम दोनों रूपों में मौजूद था, जो शहर की सांप्रदायिक सद्भावना का प्रतीक था।
पानीपत के घेर अराइयाँ मोहल्ले में विभाजन से पहले लगभग 250 घर थे, जहां अराइ लोग निवास करते थे। ये लोग व्यवसायिक रूप से छोटी खेती पर निर्भर थे और अपने मेहनती स्वभाव से समृद्धि प्राप्त करते थे। मोहल्ला सैनी मोहल्लों के साथ-साथ स्थित था और कायस्थान मोहल्ले से लगा हुआ था। इसकी गलियां संकरी और सुरक्षित थीं, जहां गली के दोनों ओर गेट लगे हुए थे। आर्य प्राइमरी स्कूल के पास वाले घेर के शुरू में एक छोटी मस्जिद थी, जो बाद में मंदिर में परिवर्तित हो गई। गली की दूसरी तरफ कबीर चौरा के सामने एक दरवाजा लगा था, जिससे पूरी गली दोनों दरवाजों से बंद हो जाती थी। यह व्यवस्था सुरक्षा और समुदाय की एकजुटता को दर्शाती थी।
अराइ समुदाय की एक खासियत उनकी संगठन क्षमता और कड़ी मेहनत है। वे न केवल कृषि में कुशल थे, बल्कि शिक्षा और व्यापार में भी आगे बढ़े। पानीपत में अराइ लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, और उनके मोहल्ले शहर की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देते थे।
विभाजन का प्रभाव: प्रवासन और परिवर्तन
1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन आरिया समुदाय के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। पानीपत के घेर अराइयाँ में रहने वाले अधिकांश मुस्लिम अराइ पाकिस्तान चले गए। वेअराइयाँ मुख्य रूप से लाहौर, फैसलाबाद और आसपास के क्षेत्रों में बस गए, जहां उन्हें कैनाल कॉलोनियों में जमीन आवंटित की गई। भारतीय पंजाब के क्षेत्रों जैसे जालंधर, अमृतसर, पानीपत और अंबाला से बड़ी संख्या में मुस्लिम अराइयाँ पाकिस्तान की ओर पलायन कर गए। इस दौरान हिंसा और अशांति की वजह से कई परिवारों को अपार कष्ट सहना पड़ा।
विभाजन के बाद, घेर अराइयाँ में पाकिस्तान से आए पुरुषार्थी हिंदू परिवार बस गए। इनमें चौधरी केवल राम नंबरदार और कृष्ण लाल मोंगा का परिवार प्रमुख था। मोहल्ले की संरचना में बदलाव आया, और अब यहां कोई अराइ परिवार नहीं बस्ता। इमामबाड़े में अब आर्य प्राइमरी स्कूल संचालित होता है, जो शिक्षा का केंद्र बन चुका है। मुझे गर्व है कि मैंने यहां पढ़ाई की और बाद में मैनेजर के रूप में सेवा की। यह स्कूल मोहल्ले की नई पहचान बन गया है, जो पुरानी स्मृतियों को जीवित रखते हुए नई पीढ़ी को शिक्षित कर रहा है।
विभाजन ने Arai समुदाय को दो भागों में बांट दिया। भारत में कुछ हिंदू और सिख आरियन बचे, जो हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में छोटी संख्या में मौजूद हैं। ये लोग अब बागवानी और अन्य व्यवसायों में लगे हुए हैं।
वर्तमान स्थिति: पाकिस्तान और भारत में अराइ समुदाय:
आज पाकिस्तान में आरियन समुदाय सबसे बड़े मुस्लिम कृषक समुदायों में से एक है। लाहौर में इनकी आबादी लगभग 40% है, जो शहर की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि के अलावा, लोग राजनीति, व्यापार, शिक्षा और कानून के क्षेत्रों में प्रमुख हैं। उदाहरण के लिए, पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी मुहम्मद अली जैसे नेता इस समुदाय से आते हैं, जो इनकी राजनीतिक क्षमता को दर्शाते हैं। पाकिस्तान में अराइयाँ समुदाय ने अपनी मेहनत से समृद्धि हासिल की है और वे संगठित रूप से अपने हितों की रक्षा करते हैं।
भारत में अराइयाँ समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत कम है। यहां वे मुख्य रूप से हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बसे हुए हैं, जहां कुछ हिंदू और सिख आरियन भी शामिल हैं। ये लोग बागवानी, छोटे व्यापार और अन्य पेशों में लगे हुए हैं। पानीपत के घेर आरियन अब एक मिश्रित मोहल्ला बन चुका है, जहां विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। हालांकि, पुरानी मस्जिद का मंदिर में परिवर्तन और इमामबाड़े का स्कूल में बदलाव सामाजिक परिवर्तनों का प्रतीक है।
अराइ समुदाय की वर्तमान सफलता उनकी कड़ी मेहनत और अनुकूलन क्षमता पर आधारित है। पाकिस्तान में वे कृषि क्रांति का हिस्सा बने, जबकि भारत में बचे हुए सदस्य स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं।
घेर अराइयाँ मोहल्ला पानीपत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अराइयाँ समुदाय की कहानी मेहनत, संगठन और सांस्कृतिक गौरव से भरी हुई है। विभाजन ने इस समुदाय को बांटा, लेकिन इसने उनकी पहचान को मजबूत भी किया। आज अराइयाँ लोग दोनों देशों में अपनी जगह बना चुके हैं, और उनकी सफलता हमें सिखाती है कि मेहनत से कोई भी समुदाय आगे बढ़ सकता है। पानीपत जैसे शहरों में ऐसे मोहल्लों की स्मृतियां हमें अतीत से सीखने और भविष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। यह समुदाय कड़ी मेहनत और एकजुटता के लिए जाना जाता है, और इसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
Ram Mohan Rai,
Panipat/19.01.2026
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