थियेटर ऑफ़ रेलेवंस: एक नई दुनिया की सृजनशील यात्रा
जब मैंने पहली बार थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के कलाकारों के बारे में सोचा, तो मेरी समझ सीमित थी। मुझे लगा कि वे मात्र 6-7 होंगे। फिर धीरे-धीरे खोजने पर पता चला कि 8-10 हैं। लेकिन जैसे-जैसे मैं गहराई में उतरा, तो देखा कि वे अनेक हैं, और अंततः समझ आया कि ये अगणित हैं। ये आंकड़े नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा के प्रतिनिधि हैं। थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के कलाकार अपनी समझ, प्रदर्शन और भावों से न केवल दर्शकों को, बल्कि हर किसी को अपने साथ बांध लेते हैं। उनके नाटकों में ऐसी जान है कि अभिनय जैसा कुछ लगता ही नहीं; बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि हम खुद उस कहानी को जी रहे हैं। यह थियेटर महज मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन की गहराइयों को छूने वाला एक दर्शन है। इस लेख में मैं अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों के माध्यम से इस थियेटर की विशेषताओं, उसके कलाकारों की समर्पण भावना और उसके सामाजिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करूंगा।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस की खोज: एक व्यक्तिगत अनुभव
मेरा इस थियेटर से परिचय अप्रत्याशित था। बदलापुर में एक वर्कशॉप के दौरान मैंने एक दुबली-पतली लड़की पुष्पा को सुना। वह ऐसी बोल रही थीं मानो साक्षात मुक्ता बाई अवतरित हो गई हों। उनकी भाषा मराठी थी, लेकिन इतनी सरल और काव्यात्मक कि हर शब्द स्पष्ट रूप से समझ आ रहा था। उस पल मुझे लगा कि यह कोई साधारण प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है। इससे पहले, मैं थियेटर को अन्य सामान्य थियेटरों की तरह ही मानता था – एक ऐसा स्थान जहां मनोरंजन और आकर्षण के लिए नाच-गान होता है, जैसा कि समाज में आम लोगों को परोसा जाता है। लेकिन थियेटर ऑफ़ रेलेवंस ने मेरी इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया।
इस थियेटर के युवा कलाकार – अश्विनी, सायली और कोमल – ने प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता इरफान अली इंजीनियर को उनके प्रश्नों के उत्तर देते हुए ऐसा प्रभावित किया कि मैं अवाक रह गया। इसी तरह, तुषार म्हस्के ने प्रसिद्ध रंगमंच कलाकार राजेंद्र गुप्ता को समझाते हुए एक नई दृष्टि प्रदान की। ये युवा न तो साधारण हैं और न ही उनकी विचारधारा आम है। उनकी व्याख्या सुनकर ऐसा लगता है मानो कोई वेद का ऋषि मंत्रों की रचना कर रहा हो। इन लड़कियों में मुझे लोपामुद्रा और सुलभा जैसी प्राचीन विदुषियां नजर आईं, कभी-कभी तो वे विज्ञान के सूत्रों को समझाती हुई प्रोफेसरों जैसी लगतीं।
थियेटर की चार श्रेणियां: एक गहन विश्लेषण
इन कलाकारों की व्याख्या से मुझे दुनिया में थियेटर की चार प्रमुख श्रेणियां समझ आईं। यह वर्गीकरण न केवल थियेटर की विविधता को दर्शाता है, बल्कि उसके सामाजिक और दार्शनिक महत्व को भी उजागर करता है:
1. सत्ता पोषित थिएटर: यह वह थियेटर है जो दृष्टिहीन नाचने-गाने वाले जिस्मों की नुमाइश मात्र होता है। यहां कला का कोई गहरा उद्देश्य नहीं होता; यह केवल सत्ता के इशारों पर चलता है और मनोरंजन की आड़ में सतही प्रदर्शन करता है।
2. प्रोपेगंडा थियेटर: इसमें दृष्टिहीन नाचने-गाने वाले जिस्मों का उपयोग वामपंथी या दक्षिणपंथी प्रोपेगंडा के लिए किया जाता है। यह थियेटर विचारधारा को फैलाने का माध्यम बन जाता है, लेकिन सच्ची मानवता से दूर रहता है।
3. बुद्धिजीवी वर्ग का 'माध्यम' थियेटर: यह वह श्रेणी है जहां रंगकर्म को केवल मनोरंजन का माध्यम समझा जाता है। बुद्धिजीवी इसे एक शगूफा की तरह देखते हैं, जहां गहराई की बजाय सतही आनंद पर जोर होता है।
4. थियेटर ऑफ़ रेलेवंस **: यह चौथा और सबसे महत्वपूर्ण रूप है, जो नाट्य शास्त्र पर आधारित है। यह थियेटर को उन्मुक्त मानव दर्शन मानता है। थिएटर यहां मानवता के कल्याण का दर्शन बन जाता है, जो किसी सत्ता के अधीन नहीं होता। यह हर प्रकार की सत्ता – राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक – को आईना दिखाता है। यह थियेटर जीवन की सच्चाइयों को उजागर करता है और समाज को बदलने की प्रेरणा देता है।
यह वर्गीकरण सुनकर मैंने महसूस किया कि थियेटर ऑफ़ रेलेवंस एक कला रूप नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारधारा है जो मानव मुक्ति की दिशा में कार्य करती है।
आजीविका और समर्पण: योग दर्शन की झलक
जब मैंने इन कलाकारों से पूछा कि उनकी आजीविका कैसे चलती है, तो उनके जवाब ने मुझे पूरा भारतीय योग दर्शन समझा दिया। वे अपने काम के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। उनकी साधना एक नए मनुष्य और नए समाज के निर्माण के लिए है। यह समर्पण इतना गहरा है कि आर्थिक चिंताएं उनके लिए गौण हो जाती हैं। वे मानते हैं कि सच्ची कला स्वयं अपनी राह बना लेती है, और उनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि परिवर्तन लाना है।
यात्रा के दौरान सायली ने मुझसे वाम आंदोलन के भविष्य के बारे में पूछा। मैंने एक dogmatic (सिद्धांतवादी) जवाब दिया, लेकिन उसके पास पहले से ही एक ठोस जवाब था, जिस पर उसे पूर्ण भरोसा था – शायद उन कथित जीवन दानी कार्यकर्ताओं से भी अधिक। उसकी दृष्टि में थियेटर ऑफ़ रेलेवंस एक नई दुनिया और नए समाज बनाने का पूर्ण विचार है। इसमें गांधी की अहिंसा है, फुले की समता दृष्टि और सामाजिक न्याय की लड़ाई है, मार्क्स की वर्ग संघर्ष की समझ है, और दुनिया को बदलने वाली हर सोच शामिल है। यह एक वैज्ञानिक अनुसंधान की तरह है, जिसे मंजुल भारद्वाज ने बड़ी मेहनत से बुना है। हो सकता है कि आज यह कुछ लोगों को अनसुना लगे, लेकिन यह होने वाला सत्य है।
हाली पानीपती ने फरमाया है
– "माल है नायाब पर गाहक है अक्सर बेखबर – शहर में खोली है दुकां सबसे अलग।
" थियेटर ऑफ़ रेलेवंस ठीक ऐसा ही एक अनोखा कला संवाद मंच है, जहां नायाब माल (विचार और कला) उपलब्ध है, लेकिन गाहक अभी बेखबर हैं। यह थियेटर हमें सिखाता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का एक सम्पूर्ण मानवीय दर्शन और माध्यम है।
मंजुल भारद्वाज जैसे सृजनकर्ताओं की मेहनत से यह विचारधारा मजबूत हो रही है। यदि हम इसे समझें और अपनाएं, तो एक बेहतर दुनिया का निर्माण संभव है। थियेटर ऑफ़ रेलेवंस न केवल कलाकारों का मंच है, बल्कि हर उस व्यक्ति का आह्वान है जो मानवता के कल्याण में विश्वास रखता है।
Ram Mohan Rai,
Mumbai/06.01.2026
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