●क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले: एक क्रांतिकारी जीवन और माता सीता रानी सैनी पर उनका प्रभाव
आज 3 जनवरी 2026 है, क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले की जयंती का दिन। दुनिया भर में इसे हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। सावित्रीबाई फुले न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, बल्कि एक समाज सुधारक, कवयित्री और महिलाओं के अधिकारों की प्रबल पैरोकार भी थीं। उनके जीवन, विचारों और संदेशों ने हजारों लोगों के जीवन में परिवर्तन लाया। कई लोगों ने उन्हें अपना आदर्श माना और उनके दिखाए रास्ते पर चले। ऐसा ही एक नाम है पानीपत की माता सीता रानी सैनी का, जिन्होंने सावित्रीबाई के आदर्शों को अपनाकर समाज सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। यह लेख सावित्रीबाई फुले के जीवन इतिहास का वर्णन करता है और साथ ही बताता है कि कैसे उनके विचारों ने माता सीता रानी के जीवन को प्रभावित किया।
●सावित्रीबाई फुले का जीवन परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ था।उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। उस समय की प्रथा के अनुसार, मात्र 9 वर्ष की आयु में 1840 में उनका विवाह 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हो गया। ज्योतिराव फुले स्वयं एक समाज सुधारक, विचारक और लेखक थे, जिनका जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा में हुआ था। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को घर पर ही शिक्षा दी, क्योंकि उस युग में महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध था।
सावित्रीबाई ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत की पहली बालिका विद्यालय की स्थापना की। यह स्कूल न केवल लड़कियों के लिए था, बल्कि दलित और पिछड़े वर्गों की बच्चियों को भी शिक्षा प्रदान करता था। इस कदम से उन्हें समाज के रूढ़िवादी तत्वों से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें अपमानित करते, पत्थर मारते, लेकिन सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने हार नहीं मानी। उन्होंने कुल 18 स्कूल खोले, जिनमें से कई दलितों और महिलाओं के लिए थे।
●सावित्रीबाई के विचार और योगदान
सावित्रीबाई फुले के विचार मुख्य रूप से जाति व्यवस्था, महिलाओं की दासता और अशिक्षा के खिलाफ थे। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया। 1873 में ज्योतिराव के साथ मिलकर उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जो जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ था और सभी को समान अधिकार देने की वकालत करता था। सावित्रीबाई एक कवयित्री भी थीं; उनकी कविताएं जैसे 'काव्य फुले' और 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर' महिलाओं की पीड़ा और संघर्ष को व्यक्त करती हैं।
उन्होंने प्लेग महामारी के दौरान पुणे में बीमारों की सेवा की और 10 मार्च 1897 को प्लेग से संक्रमित होकर उनका निधन हो गया.
ज्योतिराव का निधन 28 नवंबर 1890 को हुआ था। फुले दंपति ने समाज को शिक्षा और समानता का संदेश दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।
●माता सीता रानी सैनी: सावित्रीबाई की प्रेरणा का जीवंत उदाहरण
सावित्रीबाई फुले के जन्म के लगभग 100 वर्ष बाद, 5 जनवरी, 1921 को हिसार में सैनी-माली समाज में जन्मीं सीता रानी सैनी ने उनके आदर्शों को अपनाया। सीता रानी अपने मायके से अशिक्षित निकलीं, लेकिन उनके पति, जो पानीपत में एक अध्यापक और सामाजिक कार्यकर्ता थे, ने उन्हें शिक्षित किया। यह ठीक वैसा ही था जैसे ज्योतिराव ने सावित्रीबाई को पढ़ाया था। इस दंपति ने फुले दंपति की राह पर चलते हुए समाज सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
अपमान सहते हुए भी उन्होंने रास्ता नहीं छोड़ा। वे हरिजन और पिछड़ी बस्तियों में जाकर स्कूल चलाते, बीमारों की सहायता करते। दिन-रात, गर्मी-सर्दी की परवाह किए बिना, किसी पीड़िता की एक पुकार पर वे थैला उठाकर पहुंच जाते। पुलिस स्टेशन हो या अस्पताल, माता सीता रानी हमेशा लोगों के बीच मौजूद रहतीं।
वे शराब, अश्लील फिल्मों और दहेज उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठातीं। पानीपत में 'माता सीता रानी सेवा संस्था' नामक संगठन उनके नाम पर चल रहा है, जो परिवार परामर्श केंद्र संचालित करता है और महिलाओं व बच्चों की सहायता करता है। यह संस्था महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से कार्य करती .
●एक दिलचस्प संयोग है कि सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी को हुआ था और सीता रानी का 5 जनवरी को। बेशक कोई मुकाबला नहीं, लेकिन रास्ते के पथिक को ऐसे आदर्शों को याद करना चाहिए।
सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले का जीवन हमें सिखाता है कि शिक्षा और समानता से ही समाज का उत्थान संभव है। उनके संदेशों ने न केवल अपने समय में क्रांति लाई, बल्कि बाद की पीढ़ियों को भी प्रेरित किया, जैसे माता सीता रानी सैनी को। आज उनकी जयंती पर हमें उनके योगदान को याद कर, समाज सेवा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। ऐसे क्रांतिकारियों की विरासत हमें आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
Ram Mohan Rai,
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