●बांग्लादेश चुनाव: साम्प्रदायिक तत्वों की हार, भारत-विरोधी शक्तियों का पतन और नई सरकार की चुनौतियां - राम मोहन राय (नित्यनूतन - 14.02.2026)
बांग्लादेश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों ने न केवल देश की राजनीतिक दिशा को एक नया मोड़ दिया है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव डाला है। इन चुनावों को अप्रत्यक्ष रूप से अति साम्प्रदायिक तत्वों और भारत-विरोधी पार्टियों की हार के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह जीत पूर्ण रूप से लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विजय नहीं है। बांग्लादेश की जनता के सामने जब दो प्रमुख राजनीतिक ताकतों में से एक को चुनने की मजबूरी थी, तो उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को अपना समर्थन दिया। इस लेख में हम इन चुनावों के ऐतिहासिक संदर्भ, प्रमुख खिलाड़ियों की भूमिका, हार-जीत के कारणों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
●ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बीएनपी का उदय और शेख मुजीब का युग
बीएनपी की स्थापना को समझने के लिए हमें बांग्लादेश के इतिहास में झांकना होगा। यह पार्टी जनरल जिया उर रहमान द्वारा 1978 में स्थापित की गई थी, जो शेख मुजीबुर रहमान की नृशंस हत्या के बाद राजनीतिक शून्यता में उभरी। शेख मुजीब, जिन्हें बांग्लादेश के राष्ट्रपिता के रूप में जाना जाता है, 1971 के मुक्ति संग्राम के नायक थे। लेकिन जनरल जिया और शेख मुजीब के बीच गहरे मतभेद थे। जिया पूर्व में पाकिस्तान समर्थक माने जाते थे, जबकि मुजीब भारत के सहयोग से बांग्लादेश की आजादी के प्रतीक थे। दिलचस्प बात यह है कि मुक्ति संग्राम में दोनों ही समान रूप से शामिल थे—जिया ने सेना की कमान संभाली थी, जबकि मुजीब राजनीतिक नेतृत्व प्रदान कर रहे थे।
1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेश में अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। जनरल जिया ने सत्ता संभाली और बीएनपी की नींव रखी, जो राष्ट्रवाद और आर्थिक सुधारों पर केंद्रित थी। लेकिन इस पार्टी की जड़ें विवादास्पद हैं, क्योंकि इसे मुजीब-विरोधी ताकतों का प्रतिनिधि माना जाता है। फिर भी, बीएनपी ने समय-समय पर लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की कोशिश की है, हालांकि इसका इतिहास सैन्य हस्तक्षेप से जुड़ा रहा है।
●शेख हसीना और श्रीमती जिया: सहयोग से शत्रुता तक का सफर
बांग्लादेश की राजनीति में दो प्रमुख महिला नेताओं—शेख हसीना (अवामी लीग की नेता) और खालिदा जिया (बीएनपी की नेता)—की भूमिका अहम रही है। एक समय था जब दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। 1990 के दशक की शुरुआत में, वे तत्कालीन सैन्य शासक के खिलाफ एकजुट हुईं और लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया। लेकिन जल्द ही यह गठबंधन टूट गया, और दोनों घोर राजनीतिक विरोधी बन गईं। शेख हसीना की सरकारों में बीएनपी पर दमन के आरोप लगे, जबकि बीएनपी की सरकारों में अवामी लीग को निशाना बनाया गया।
इस चुनाव में संभावित प्रधानमंत्री मुहम्मद यूनुस या अन्य बीएनपी नेता की भूमिका पर ध्यान दें—कई नेता, जैसे रहमान, हसीना के शासनकाल में देश छोड़ने को मजबूर हुए। वहीं, खालिदा जिया ने भ्रष्टाचार के आरोपों में कई वर्ष जेल में बिताए। यह राजनीतिक प्रतिशोध का चक्र बांग्लादेश की राजनीति को कमजोर करता रहा है, और चुनावों में जनता ने इसी से तंग आकर बदलाव चुना।
●वर्तमान संदर्भ: अवामी लीग का प्रतिबंध और जनता की मजबूरी
इस चुनाव से पहले अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया था, जो शेख हसीना की 15 वर्षों की सत्ता के बाद एक बड़ा परिवर्तन था। हसीना की सरकार पर भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और आर्थिक असमानता के आरोप थे। जनता के पास बीएनपी के अलावा कोई मजबूत विकल्प नहीं बचा था। चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि लोगों ने स्थिरता और बदलाव की उम्मीद में बीएनपी को चुना, लेकिन यह मजबूरी का चुनाव था।
चुनावों में जमात-ए-इस्लामी और उसकी सहयोगी लुम्पेन जिहादी ताकतों (Zen j) की करारी हार ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। इन तत्वों ने साम्प्रदायिकता और चरमपंथ को बढ़ावा देने की कोशिश की, लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया। यह साबित करता है कि बांग्लादेश की जनता को आसानी से बरगलाया नहीं जा सकता। इन ताकतों के पीछे सीआईए और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की मिलीभगत वाली साजिशों के आरोप लगे हैं, जो हसीना की नाकामियों—जैसे बेरोजगारी, मुद्रास्फीति और दमनकारी नीतियों—से उपजीं। हसीना की सरकार ने आर्थिक विकास तो किया, लेकिन असमानता बढ़ी, जिसने चरमपंथियों को अवसर दिया।
●सीमावर्ती क्षेत्रों में जमात का प्रभाव: भारत की भूमिका और चुनौतियां
एक चिंताजनक पहलू यह है कि भारत की सीमा से लगे बांग्लादेश के क्षेत्रों में जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवारों ने कुछ सीटें जीती हैं। यह न केवल बांग्लादेश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि भारत के लिए भी। इसका एक कारण भारत में बांग्लादेश-विरोधी तत्वों की सक्रियता भी है, जो घुसपैठ, अवैध व्यापार और साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ावा देते हैं। जैसा कि कहा जाता है, "कीचड़ से कीचड़ कभी नहीं धुल सकता"—दोनों देशों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा। भारत को बांग्लादेश के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए, न कि विरोधी रुख अपनाना।
●सबसे बड़ी शाबाशी बांग्लादेश की कम्युनिस्ट पार्टी, अवामी लीग और अल्पसंख्यक समुदायों (जैसे हिंदू, बौद्ध और ईसाई) के लिए है। इन समूहों ने अपने कार्यों—जैसे विरोध प्रदर्शनों की कमी या आंतरिक कलह—से बीएनपी की जीत का रास्ता प्रशस्त किया।
●भविष्य की उम्मीदें: मजबूत दक्षिण एशिया की ओर
हम उम्मीद कर सकते हैं कि बांग्लादेश की नई सरकार अपने दायित्वों को समझेगी। सबसे पहले, पड़ोसी देशों—खासकर भारत—से बेहतर संबंध स्थापित करने चाहिए। सीमा विवाद, जल बंटवारे और व्यापार जैसे मुद्दों पर सकारात्मक वार्ता जरूरी है। साथ ही, सभी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए, ताकि साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहे। बीएनपी को अपनी राष्ट्रवादी छवि को समावेशी बनाना होगा, और चरमपंथी तत्वों पर कड़ाई से नियंत्रण रखना होगा।
●अंत में, एक मजबूत दक्षिण एशिया ही विश्व शांति की गारंटी है। बांग्लादेश के चुनाव हमें सिखाते हैं कि राजनीतिक मजबूरियां बदलाव लाती हैं, लेकिन सच्ची प्रगति सहयोग और समावेश से ही संभव है। यदि नई सरकार इन सबकों को अपनाती है, तो बांग्लादेश न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का आधार भी बनेगा।
Ram Mohan Rai .
Nityanootan.blogspot.com/ 14.02.2026
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