"महात्मा गांधी: एक निडर सत्य का संदेश"

"महात्मा गांधी: एक निडर सत्य का संदेश"
●आज सुबह की बातचीत में हमने महात्मा गांधी के विचारों को फिर से जीवित किया। गांधीजी कोई मजबूरी नहीं थे—वे एक धांत मजबूती थे। अहिंसा उनके लिए कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा हथियार थी। हमने देखा कि कैसे सत्याग्रह, धैर्य और सामूहिक दबाव से क्रूर से क्रूर ताकत भी झुक सकती है। किसान आंदोलन इसका जीता-जागता प्रमाण है—बिना हिंसा के सरकार को झुकना पड़ा, क्योंकि जनता एकजुट थी।
लेकिन सवाल उठता है: क्या अहिंसा हर जगह काम करती है? अगर सामने वाला बिना शर्म का तानाशाह हो, तो क्या सिर्फ सत्य बोलने से जीत मिलेगी? जवाब है—नहीं। अहिंसा तभी विजयी होती है, जब उसके साथ समय, धैर्य और वैश्विक दबाव जुड़े हों। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग—सबने यही किया। उन्होंने अहिंसा को नैतिक ताकत दी, लेकिन असल दबाव था—आर्थिक प्रतिबंध, जनचेतना और अंतरराष्ट्रीय निंदा।
●भारत में आज भी ये रास्ता प्रासंगिक है। कश्मीर हो या नॉर्थ-ईस्ट, अहिंसात्मक प्रतिकार ने बहुत कुछ बदला, लेकिन सशस्त्र ताकत के सामने अकेला व्यक्ति नहीं टिकता। इसलिए जरूरत है—सामूहिक शक्ति की। देश में पहले से ही कई ग्रुप हैं—किसान, मजदूर, छात्र, महिला संगठन। अगर इन्हें एक सिद्धांत पर जोड़ा जाए—अहिंसा, सत्य और सेवा—तो कोई भी क्रूरता टूट सकती है।
●और सबसे महत्वपूर्ण—परिवर्तन घर से शुरू होता है। गांधीजी ने कहा था, "स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक वो गरीब की झोपड़ी तक न पहुँचे।" आज हमें वो फल पहुँचाना है। इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को जागृत करना होगा—न कि फोटो खिंचवाने के लिए, बल्कि घर-घर जाकर लोगों को संगठित करने के लिए।
        ●आज मैंने एक शीर्ष पद वाले व्यक्ति से बात की। उन्होंने कहा कि गांधीजी की लोकप्रियता अहिंसा और फिल्म की वजह से हुई। मैंने टोका—रामायण-महाभारत तो सदियों से हमारे मन में हैं, टीवी ने तो बस उन्हें पैकेज किया। गांधीजी भी पहले से लोकप्रिय थे—फिल्म ने बस उन्हें दुनिया तक पहुँचाया। वो चुप हो गए। उस चुप्पी में मैंने गांधीजी की मजबूती देखी। सत्य निडर होकर बोला जाए, तो सबसे ऊँचा कुर्सी वाला भी सोच में पड़ जाता है।
●गांधीजी का मंत्र आज भी जिंदा है: "सत्य बोलो, बिना डर के, बिना नफरत के।" अगर हम ये मंत्र अपनाएँ—घर से, गाँव से, शहर से—तो कोई भी क्रूरता अपना बन सकती है। क्योंकि असली ताकत हथियार में नहीं, दिल में है।
—आज की बातचीत से प्रेरित.
Ram Mohan Rai. 
Nityanootan.blogspot.com. 18.02.2026"महात्मा गांधी: एक निडर सत्य का संदेश"
●आज सुबह की बातचीत में हमने महात्मा गांधी के विचारों को फिर से जीवित किया। गांधीजी कोई मजबूरी नहीं थे—वे एक धांत मजबूती थे। अहिंसा उनके लिए कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा हथियार थी। हमने देखा कि कैसे सत्याग्रह, धैर्य और सामूहिक दबाव से क्रूर से क्रूर ताकत भी झुक सकती है। किसान आंदोलन इसका जीता-जागता प्रमाण है—बिना हिंसा के सरकार को झुकना पड़ा, क्योंकि जनता एकजुट थी।
लेकिन सवाल उठता है: क्या अहिंसा हर जगह काम करती है? अगर सामने वाला बिना शर्म का तानाशाह हो, तो क्या सिर्फ सत्य बोलने से जीत मिलेगी? जवाब है—नहीं। अहिंसा तभी विजयी होती है, जब उसके साथ समय, धैर्य और वैश्विक दबाव जुड़े हों। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग—सबने यही किया। उन्होंने अहिंसा को नैतिक ताकत दी, लेकिन असल दबाव था—आर्थिक प्रतिबंध, जनचेतना और अंतरराष्ट्रीय निंदा।
●भारत में आज भी ये रास्ता प्रासंगिक है। कश्मीर हो या नॉर्थ-ईस्ट, अहिंसात्मक प्रतिकार ने बहुत कुछ बदला, लेकिन सशस्त्र ताकत के सामने अकेला व्यक्ति नहीं टिकता। इसलिए जरूरत है—सामूहिक शक्ति की। देश में पहले से ही कई ग्रुप हैं—किसान, मजदूर, छात्र, महिला संगठन। अगर इन्हें एक सिद्धांत पर जोड़ा जाए—अहिंसा, सत्य और सेवा—तो कोई भी क्रूरता टूट सकती है।
●और सबसे महत्वपूर्ण—परिवर्तन घर से शुरू होता है। गांधीजी ने कहा था, "स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक वो गरीब की झोपड़ी तक न पहुँचे।" आज हमें वो फल पहुँचाना है। इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को जागृत करना होगा—न कि फोटो खिंचवाने के लिए, बल्कि घर-घर जाकर लोगों को संगठित करने के लिए।
        ●आज मैंने एक शीर्ष पद वाले व्यक्ति से बात की। उन्होंने कहा कि गांधीजी की लोकप्रियता अहिंसा और फिल्म की वजह से हुई। मैंने टोका—रामायण-महाभारत तो सदियों से हमारे मन में हैं, टीवी ने तो बस उन्हें पैकेज किया। गांधीजी भी पहले से लोकप्रिय थे—फिल्म ने बस उन्हें दुनिया तक पहुँचाया। वो चुप हो गए। उस चुप्पी में मैंने गांधीजी की मजबूती देखी। सत्य निडर होकर बोला जाए, तो सबसे ऊँचा कुर्सी वाला भी सोच में पड़ जाता है।
●गांधीजी का मंत्र आज भी जिंदा है: "सत्य बोलो, बिना डर के, बिना नफरत के।" अगर हम ये मंत्र अपनाएँ—घर से, गाँव से, शहर से—तो कोई भी क्रूरता अपना बन सकती है। क्योंकि असली ताकत हथियार में नहीं, दिल में है।
—आज की बातचीत से प्रेरित.
Ram Mohan Rai. 
Nityanootan.blogspot.com.   18.02.2026

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