राजनीतिक भाषा की गिरावट: सभ्यता से असभ्यता की ओर (Nityanootan.blogspot.com/13.02.2026

राजनीतिक भाषा की गिरावट: सभ्यता से असभ्यता की ओर

भारतीय लोकतंत्र की नींव में भाषा की मर्यादा और शिष्टाचार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। एक समय था जब किसी मामूली सभा या बैठक में भी यदि कोई व्यक्ति असभ्य या अपशब्दों का प्रयोग करता, तो उसे तुरंत सचेत किया जाता कि "असंसदीय भाषा का प्रयोग न करें"। लेकिन आज का परिदृश्य इससे बिलकुल उलट है। अब तो संसद जैसे सर्वोच्च मंच पर ही 'तू-तड़ाक' और असभ्य भाषा का बोलबाला है। क्या हम इसे लोकतंत्र की परिपक्वता कहें या सभ्यता की गिरावट? यह प्रश्न हर शिक्षित और जागरूक नागरिक के मन में उठ रहा है।

संसद, जो देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, वहां की बहसें राष्ट्र की दिशा तय करती हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यहां की भाषा इतनी गिर चुकी है कि इसे सुनकर शर्म आती है। उदाहरण के लिए, कुछ प्रमुख राजनेता जैसे निशिकांत दुबे और गिरिराज सिंह, जो कथित रूप से ऊपरी जाति से आते हैं और पढ़े-लिखे होने का दावा करते हैं, स्वयं को 'स्वामी' कहलवाते हैं। लेकिन संसदीय पटल पर उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा क्या कहलाएगी? वे भाषा के कथित अधिकृत ज्ञानी माने जाते हैं, फिर भी अपनी मर्यादा तोड़कर असभ्य शब्दों का सहारा लेते हैं। यह न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि को धूमिल करता है, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

दूसरी ओर, विपक्ष भी इस गिरावट में पीछे नहीं है। संसद में "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" जैसे नारे लगाना क्या सभ्य विपक्ष की भूमिका है? यह व्यवहार भी उतना ही निंदनीय है जितना सत्ता पक्ष का। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में व्यस्त हैं, जबकि राष्ट्रहित की चर्चा किनारे लग जाती है। यह स्थिति बताती है कि राजनीति में भाषा अब हथियार बन चुकी है, न कि संवाद का माध्यम।

यह गिरावट केवल संसद तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर भी यही हाल है। मेरे एक फेसबुक मित्र, जो व्यक्तिगत जीवन में बेहद सभ्य और सदाचारी हैं, अपनी पोस्टों में 10 जनपथ में रहने वाली एक सम्मानित संसद सदस्य (जिन्हें हम सभी जानते हैं) के लिए 'नचनिया' जैसे असंसदीय शब्दों का प्रयोग करते हैं। मूलतः उनके संस्कार अच्छे हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से वे कहीं से निर्देशित हैं। यह दर्शाता है कि राजनीति किस कदर व्यक्तियों के नैतिक मूल्यों को प्रभावित कर रही है। लोग व्यक्तिगत जीवन में सभ्य हैं, लेकिन राजनीतिक बहस में असभ्य हो जाते हैं।

इसके विपरीत, वामपंथी विचारधारा के लोग इन राजनेताओं से कहीं बेहतर सभ्य, सदाचारी और संस्कारवान दिखते हैं। वामपंथी बनने के लिए व्यक्ति को गहन अध्ययन करना पड़ता है। तभी वह भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को अपना आदर्श बना पाता है। ये लोग न केवल आध्यात्मिक होते हैं, बल्कि ईमानदार भी। वे विचारधारा के आधार पर बहस करते हैं, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। लेकिन देश में चल रहा यह माहौल—जहां भाषा की मर्यादा तार-तार हो रही है—किसी भी शिक्षित व्यक्ति को चिंतित करता है। क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां शब्दों की गरिमा खो चुकी हो?

अंत में, हमें याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र भाषा की सभ्यता पर टिका है। यदि हम इस गिरावट को नहीं रोकेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। रब ही राखा है, लेकिन हमें भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। राजनीतिक दलों से अपील है कि वे भाषा की मर्यादा बहाल करें, ताकि संसद फिर से विचारों का मंदिर बने, न कि गाली-गलौज का अखाड़ा।
Ram Mohan Rai. 
Nityanootan.blogspot.com. 
13.02.2026

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