विश्व में शांति की पुकार: युद्ध नहीं, राजा नहीं, बातचीत की मेज पर आएं

विश्व में शांति की पुकार: युद्ध नहीं, राजा नहीं, बातचीत की मेज पर आएं

आज विश्व के कई हिस्सों में "No Kings"जैसे बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। लाखों-करोड़ों लोग सड़कों पर उतरकर युद्ध की नीतियों, सत्ता के दुरुपयोग और हिंसा के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। अमेरिका से लेकर यूरोप तक लोग चिल्ला रहे हैं — युद्ध बंद हो, कोई एक व्यक्ति या ताकत पूरे विश्व पर राज न करे। यह प्रदर्शन शांति, लोकतंत्र और मानवता की रक्षा के लिए हैं। लेकिन क्या हम इन प्रदर्शनों को सिर्फ विरोध तक सीमित रखेंगे, या शांति की सच्ची राह अपनाएंगे?

महात्मा गांधी ने हमें सिखाया था कि सच्ची जीत हिंसा से नहीं, अहिंसा से होती है। उन्होंने कहा था — “अहिंसा ही सबसे बड़ी शक्ति है।” गांधीजी का मानना था कि “मार्ग हिंसा का पुराना और स्थापित है। अहिंसा का मार्ग नया है।” उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में पूरे विश्व को साबित कर दिखाया कि बिना गोली चलाए, बिना खून बहाए भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है। सत्याग्रह और अहिंसा उनके हथियार थे।

स्वतंत्रता के बाद भारत के लोगों ने गांधीजी की इसकी परंपरा को आगे बढ़ाया। जब पंजाब और कश्मीर में हिंसा चरम पर थी, तब निर्मला देशपांडे जैसी गाँधीवादी कार्यकर्ता शांति की मशाल लेकर आगे आईं। वे विनोबा भावे की शिष्या थीं और साम्प्रदायिक सद्भाव तथा शांति के लिए निरंतर प्रयासरत रहीं। उनकी प्रसिद्ध पुकार थी — “गोली नहीं, बोली चाहिए!”

निर्मला देशपांडे कश्मीर में शांति मार्च निकालतीं, भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत करवातीं और महिलाओं-युवतियों को शांति का संदेश देने के लिए प्रेरित करतीं। उन्होंने साबित किया कि शब्दों की ताकत गोलियों से ज्यादा मजबूत होती है। उनकी यह slogan आज भी प्रासंगिक है — गोली से समस्या हल नहीं होती, बातचीत से ही स्थायी समाधान निकलता है।

भारत की जनता ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक शांति की भूमिका निभाई है। गांधीजी के नेतृत्व में हमने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अहिंसक संघर्ष किया। आजादी के बाद भी भारत ने विश्व शांति के लिए अपनी आवाज बुलंद की — गुटनिरपेक्ष आंदोलन हो या संयुक्त राष्ट्र में शांति प्रस्ताव, भारत हमेशा युद्ध के बजाय संवाद का पक्षधर रहा। आम भारतीय, खासकर महिलाएं और युवा, जब भी हिंसा बढ़ी, तब शांति रैलियां, कैंडल मार्च और सद्भाव सभाएं आयोजित कीं।

आज जब विश्व में युद्ध की आग भड़क रही है — चाहे कोई भी क्षेत्र हो — तब भारत की जनता को फिर से अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। हमारी सभ्यता “वसुधैव कुटुम्बकम्” की रही है — पूरा विश्व एक परिवार है। हम युद्ध नहीं चाहते, हम राजा नहीं चाहते, हम सिर्फ शांति चाहते हैं।

आइए, हम सब मिलकर अपील करें:

- युद्ध बंद हो, गोली नहीं बोली चाहिए।
- सभी विवादों का समाधान बातचीत की मेज पर हो।
- कोई भी ताकत विश्व पर “राजा” बनकर शासन न करे।
- युवा, महिलाएं और आम नागरिक शांति के दूत बनें।

महात्मा गांधी ने कहा था — “एक आँख के बदले दोनों आँखें निकाल लेना अंधेरे को नहीं मिटाता।” हमें अंधेरे में नहीं, रोशनी की राह पर चलना है। निर्मला देशपांडे की तरह हमें बार-बार याद दिलाना है — “गोली नहीं, बोली चाहिए!”

भारत की जनता, आओ हम विश्व को संदेश दें कि शांति ही एकमात्र रास्ता है। आओ हम प्रदर्शनों को सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बनाएं। दुनिया के सभी नेताओं से अपील है — युद्ध की बजाय बातचीत की मेज पर बैठें। हिंसा से कोई जीतता नहीं, सिर्फ मानवता हारती है।

शांति हो, सद्भाव हो, विश्व एक परिवार बने।
जय अहिंसा! जय शांति!

यह लेख विश्व के वर्तमान प्रदर्शनों (“No Kings” आदि) को देखते हुए लिखा गया है, जिसमें भारत की गाँधीवादी परंपरा और आम जनता की भूमिका को उजागर किया गया है। शांति हर किसी की जिम्मेदारी है — आइए, हम सब मिलकर इसे साकार करें।
राम मोहन राय. 
Nityanootan.blogspot.com 
30.03.2026

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