श्रीमती मीरा कुमार के साथ विशेष साक्षात्कार


श्रीमती मीरा कुमार के साथ विशेष साक्षात्कार

स्थान: श्रीमती मीरा कुमार का निवास, दिल्ली  
दिनांक: 18.04.2026
 (श्री डी.पी. राय के सौजन्य से)  
साक्षात्कारकर्ता: एडवोकेट राम मोहन (सामाजिक कार्यकर्ता) एवं श्रीमती कृष्णा कांता



साक्षात्कारकर्ता: आदरणीया श्रीमती मीरा कुमार जी, सबसे पहले आपको और आपके परिवार को हमारा हार्दिक नमन। आज हम आपके पिता, स्वतंत्रता सेनानी, महान समाज सुधारक और पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम जी के जीवन और योगदान पर आपसे बात करना चाहते हैं। 

मीरा कुमार: स्वागत है आप दोनों का। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आप बाबूजी के जीवन से जुड़े स्मृतियों और उनके योगदान को जानने आए हैं।

साक्षात्कारकर्ता: आप अक्सर अपने पिता से स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के बारे में पूछा करती थीं। उन्होंने जातिगत उत्पीड़न का शिकार होते हुए भी राष्ट्र के लिए क्यों संघर्ष किया? क्या उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि पहले छुआछूत समाप्त हो, फिर आजादी?

मीरा कुमार:हाँ, मैं बचपन में अक्सर पिताजी से पूछती थी — “पिताजी, जब आपको खुद स्कूल में दृष्टि से अलग देखा जाता था, छुआछूत का इतना कष्ट सहना पड़ा, तो राष्ट्रिय आंदोलन में भाग लेने की क्या जरूरत थी? क्या आजादी इस छुआछूत को खत्म कर देती?” 

पिताजी बहुत गंभीर होकर जवाब देते थे —  
“बेटी, हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न देश का है। हम अपने उत्पीड़न के खिलाफ भी लड़ेंगे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ भी लड़ेंगे। देश की आजादी ही सभी समस्याओं के समाधान की दिशा में पहला और सबसे बड़ा कदम है।”

साक्षात्कारकर्ता: बाबूजी का जन्म कैसे हुआ? उनके परिवार की पृष्ठभूमि क्या थी?

मीरा कुमार: मेरे पिता का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो शिवनारायण सम्प्रदाय से ताल्लुक रखता था। उनके पिता महंत शोभीराम और माता वासंती देवी दोनों ही शिवनारायण सम्प्रदाय के अनुयायी थे। वे अपने तीन भाइयों और पाँच बहनों में सबसे छोटे थे। 

पिताजी के पिता प्रारंभिक जीवन में ब्रिटिश फौज में थे, लेकिन उनका स्वाभिमानी स्वभाव अंग्रेज अफसरों का अपमानजनक व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर पाया। उन्होंने इस्तीफा दे दिया और चंदवा में जमीन खरीदकर खेती करने लगे। साथ ही वे शिवनारायण पंथ के ग्रंथ खुद हाथ से लिखकर बाँटते थे। 

मेरी दादी वासंती देवी अत्यंत बुद्धिमती और दृढ़ निश्चयी महिला थीं। उन्होंने पिताजी के पिता के अंतिम समय में वचन दिया था कि वे उनके बेटे को उच्चतम शिक्षा दिलाएँगी। उन्होंने अपना वचन पूरी तरह निभाया।

साक्षात्कारकर्ता: उनकी शिक्षा की यात्रा कैसी रही? उन्होंने छुआछूत का सामना कैसे किया?

मीरा कुमार: 1914 में पिताजी ने गाँव की पाठशाला में प्रवेश लिया, लेकिन कुछ समय बाद ही उनके पिता का देहांत हो गया। परिस्थितियाँ बहुत कठिन थीं, फिर भी वे विलक्षण छात्र साबित हुए। 

1920 में आरा मिडिल स्कूल में प्रवेश किया, जो अंग्रेजी माध्यम का स्कूल था। अंग्रेजी सीखने के लिए वे रात-दिन मेहनत करते। लोगों ने सलाह दी कि अछूतों को मिलने वाली छात्रवृत्ति ले लें, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। अपनी प्रतिभा के बल पर हर कक्षा में छात्रवृत्ति प्राप्त की। 

वे प्रतिदिन पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ते और सुबह पैदल आरा रेलवे स्टेशन जाकर ‘स्टेट्समैन’ अखबार पढ़ते। 1922 में टाउन हॉल टाउन हाई स्कूल, आरा में प्रवेश किया, जहाँ उन्हें छुआछूत का बहुत कठोर अनुभव हुआ। उनके लिए अलग पानी का घड़ा रखा गया था। इसने उनके किशोर मन को गहरा आघात पहुँचाया। उन्होंने इसका विरोध किया और अंत में इस व्यवस्था को समाप्त करवाया, लेकिन पढ़ाई पर कभी असर नहीं पड़ने दिया। 

उन्होंने प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास किया और गणित तथा संस्कृत में 100% अंक प्राप्त किए। 

ईसाई मिशनरियों ने मेरी दादी के सामने प्रस्ताव रखा कि वे उनके पुत्र की उच्च शिक्षा लखनऊ और फिर अमेरिका में करवाएँगे, लेकिन माताजी ने धर्म परिवर्तन की मंशा समझ ली और प्रस्ताव ठुकरा दिया।

1925 में जब मदनमोहन मालवीय जी आरा आए तो पिताजी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ने का निमंत्रण दिया। 1926 में आई.एस.सी. करने गए, लेकिन वहाँ भी भयंकर छुआछूत का सामना करना पड़ा। छात्रावास छोड़कर उन्हें बाहर रहना पड़ा। इसी समय उन्होंने भेदभाव के विरुद्ध संकल्प लिया और वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति जानने के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन किया।

साक्षात्कारकर्ता: महात्मा गांधी का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?

मीरा कुमार:महात्मा गांधी का प्रभाव मेरे पिता के जीवन पर अत्यंत गहरा था। वे गांधीजी के अनन्य सहयोगी बने। 

गांधीजी मानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सेना से सीधा मुकाबला संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने जन आंदोलन खड़ा किया और अहिंसा को सबसे अचूक हथियार बनाया। हमारे देश में बुद्ध, महावीर और अन्य संतों ने अहिंसा की बात की थी, लेकिन पहली बार महात्मा गांधी ने अहिंसा को साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने का माध्यम बनाया।

गांधीजी गाँव-गाँव गए, लोगों को उनकी शक्ति का बोध कराया और आंदोलन के अग्रणी दस्तों में महिलाओं को शामिल किया। उनका मानना था कि यदि महिलाएँ आंदोलन में नहीं होंगी तो कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता।

साक्षात्कारकर्ता: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में आपके परिवार की भूमिका क्या थी?

मीरा कुमार: 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय सभी प्रमुख नेता जेल में थे। पिताजी भी जेल गए। आंदोलन शिथिल न हो, इसके लिए मेरी माता इंद्राणी देवी ने पटना में चरखा क्लास शुरू की और महिलाओं को प्रेरित किया। 

एक दिन मार्शल लॉ लगा हुआ था, गोली मारने का आदेश था, फिर भी मेरी माँ चरखा क्लास के लिए निकलीं और एक दिन अंग्रेजों की ट्रक के सामने दुर्गा की तरह निर्भीक खड़ी हो गईं।

गांधीजी ने चरखे को भी एक अचूक हथियार बनाया। अंबर चरखा घर-घर में चलाया गया, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक नीति को चुनौती दी और अंततः उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर किया।

साक्षात्कारकर्ता: स्वतंत्रता संग्राम में बाबूजी की क्या विशेष भूमिका थी?

मीरा कुमार: बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अनुसूचित जाति के एकमात्र राष्ट्रीय नेता थे। उस समय अनुसूचित जाति में उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति बहुत कम थे। जो थे, उन्हें अंग्रेज अपने पक्ष में करने की कोशिश करते थे। बाबूजी को भी बड़े-बड़े प्रलोभन दिए गए — वायसराय की कौंसिल में जगह आदि। लेकिन उन्होंने जेल की यातनाएँ सहना बेहतर समझा।

1940 के असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे जेल गए। 10 दिसंबर 1940 को उन्होंने शाहाबाद के कलेक्टर को विशाल सत्याग्रह का नोटिस दिया और गिरफ्तार हुए। 19 अगस्त 1942 को पटना से गिरफ्तार कर उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया।

महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था — “जगजीवन राम तपे हुए कंचन की भाँति खरे और सच्चे हैं। मेरा हृदय इनके प्रति आदरपूर्ण प्रशंसा से आपूरित है।”

साक्षात्कारकर्ता: 1937 के प्रांतीय चुनावों में उन्होंने किस प्रकार अंग्रेजों की साजिश को नाकाम किया?

मीरा कुमार: 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने कई प्रांतों में जीत हासिल की, लेकिन कांग्रेस ने अंग्रेज गवर्नरों को सारे अधिकार सौंपने से इनकार कर दिया। तब अंग्रेजों ने बिहार में यूनुस का कठपुतली मंत्रिमंडल बनाया। उन्होंने बाबूजी को और उनके 14 साथियों को शामिल होने के लिए बड़ी-बड़ी पेशकश कीं। 

बाबूजी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। यदि वे शामिल हो जाते तो कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन को भारी क्षति पहुँचती। गांधीजी की पत्रिका ‘हरिजन’ ने 17 अप्रैल 1931 को उनके इस साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

साक्षात्कारकर्ता: संविधान निर्माण में उनकी भूमिका क्या थी?

मीरा कुमार: संविधान सभा में बाबूजी सभी महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य थे। उन्होंने संविधान के प्रगतिशील और उदारवादी प्रावधानों को लिखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

वे 28 वर्ष की आयु में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए। बाद में दलित वर्ग संघ की टिकट पर निर्विरोध चुने गए और फिर कांग्रेस में शामिल हुए। अंतरिम सरकार में वे सबसे युवा मंत्री थे और श्रम मंत्री बने।

साक्षात्कारकर्ता: बाबूजी का व्यक्तित्व कैसा था?

मीरा कुमार:मेरे पिता अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे शुद्ध खादी पहनते थे, मद्यपान के सख्त विरोधी थे। उनकी दिनचर्या अनुशासित थी। वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। शिवनारायण सम्प्रदाय में दीक्षित होने के साथ-साथ गुरु रविदास के अनन्य भक्त थे। 12 अप्रैल 1979 को काशी के राजघाट पर उन्होंने गुरु रविदास स्मारक का शिलान्यास किया।

साक्षात्कारकर्ता: उन्होंने देश की सेवा में कौन-कौन से महत्वपूर्ण पद संभाले?

मीरा कुमार: उन्होंने श्रम मंत्री, संचार मंत्री, परिवहन एवं रेल मंत्री, खाद्य एवं कृषि मंत्री, सामुदायिक विकास एवं सहकारिता मंत्री तथा रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले। 

रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने सेवानिवृत्त सैनिकों को पुनर्वास दिया, रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया और अन्य विभागों में पूर्व सैनिकों को प्राथमिकता दी। 

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय वे और मेरी माता दोनों सीमा पर जाकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते थे। 

उन्होंने आरक्षण व्यवस्था को मजबूत किया, मंदिरों के द्वार खुलवाए, भूमिहीन किसानों को जमीन दिलाई, शिक्षा के अवसर बढ़ाए और अस्पृश्यता निवारण के लिए निरंतर प्रयास किए। वे हरित क्रांति के सूत्रधार भी थे।

साक्षात्कारकर्ता:अंत में, आज के संदर्भ में बाबूजी का जीवन क्या संदेश देता है?

मीरा कुमार: मेरे पिता महात्मा गांधी के उन उत्कट शिष्यों में से थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक मूल्यों, सिद्धांतों और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया। 

आज के समय में उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यह है कि वे दिखाते हैं — चाहे कितनी भी गरीबी और अपमान हो, उच्च आदर्शों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आत्मसम्मान बनाए रखते हुए राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए। 

मुझे विश्वास है कि उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।



समापन: 
साक्षात्कारकर्ता: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीया मीरा कुमार जी। बाबू जगजीवन राम जी के इस अमूल्य स्मरण और उनके महान योगदान को जानकर हम गौरवान्वित हुए।

मीरा कुमार: आप दोनों का भी धन्यवाद। बाबूजी के आदर्शों को आगे बढ़ाने में आपका योगदान सराहनीय है।

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