माइंडसेट बदले-समाज बदले

आजकल विवाह योग्य लड़कियां शादी से कतरा रही हैं। परिवारों में हिंसा का माहौल उन्हें दाम्पत्य जीवन में कदम रखने से डरा रहा है। रोजाना समाचार पत्रों में नित्य प्रति किसी न किसी की हत्या, मारपीट और घरेलू हिंसा की घटनाएं छाई रहती हैं। विवाहोपरांत मुकदमेबाजी से अदालतें भरी पड़ी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे समाचारों से मन व्यथित होता है कि हमने किस प्रकार का समाज बना दिया है।

एक बार कोर्ट में एक महिला जज से बतौर वकील रूबरू होने का अवसर मिला। जज महोदया ने कहा कि पहले लड़कियों में सहने की ताकत होती थी, जो अब नहीं रही। मेरा उत्तर था कि उनमें जुल्म सहने की सहनशीलता होती थी, पर अब क्योंकि वे जुल्म सहना नहीं चाहतीं, इसलिए उन पर इल्जाम लगाया जाता है। इस जवाब से जज महोदया निरुत्तर रह गईं। असल सवाल माइंडसेट बदलने का है।

हिंसा और डर का माहौल:
भारतीय समाज में घरेलू हिंसा एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या 4,45,256 थी, जिसमें पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता (धारा 498A) के मामले सबसे ज्यादा थे—लगभग 1,36,879 से 1,40,000 के आसपास। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, लगभग 32% विवाहित महिलाओं ने जीवन में कभी न कभी शारीरिक, यौनिक या भावनात्मक हिंसा का सामना किया है। ये आंकड़े केवल रिपोर्टेड केस हैं; वास्तविक संख्या और भी ज्यादा हो सकती है, क्योंकि कई महिलाएं सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता या डर के कारण शिकायत नहीं करतीं।

रोज समाचारों में आने वाली घटनाएं—पत्नी की हत्या, मारपीट, दहेज उत्पीड़न—युवा लड़कियों के मन में शादी के प्रति भय पैदा कर रही हैं। वे देख रही हैं कि शादी के नाम पर अक्सर समर्पण, समायोजन और चुपचाप सहनशीलता की अपेक्षा की जाती है। जब वे इस अपेक्षा को चुनौती देती हैं, तो उन्हें “असहिष्णु” या “आधुनिकता की शिकार” कह दिया जाता है।

 अदालतों में बढ़ती मुकदमेबाजी:
विवाह के बाद की मुकदमेबाजी ने परिवार अदालतों को भारी बोझ बना दिया है। बड़े शहरों में तलाक के केस 30-40% तक बढ़ गए हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में हर साल हजारों पिटीशन दाखिल हो रही हैं। पूरे देश में रोजाना औसतन 100 के करीब तलाक के केस फाइल हो रहे हैं। धारा 498A, दहेज निषेध अधिनियम और अन्य वैवाहिक कानूनों के तहत मामले बढ़े हैं, लेकिन इनमें कन्विक्शन रेट कम होने के कारण “दुरुपयोग” की चर्चा भी आम है।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में माना है कि कुछ मामलों में ये कानून व्यक्तिगत vendetta के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं, जिससे निर्दोष परिवार प्रभावित होते हैं। वहीं, वास्तविक हिंसा के मामलों में भी न्याय मिलने में देरी होती है। परिणामस्वरूप, दोनों पक्षों में अविश्वास बढ़ता जा रहा है—महिलाएं सुरक्षा की तलाश में कानूनी रास्ता अपनाती हैं, जबकि पुरुष पक्ष “लीगल टेररिज्म” की शिकायत करता है। इस द्वंद्व ने शादी को एक जोखिम भरा सौदा बना दिया है।

पुरानी सहनशीलता बनाम नई जागरूकता:
महिला जज का वह कथन—“पहले सहने की ताकत थी”—सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। पीढ़ियों से महिलाओं को सिखाया गया कि शादी में “समायोजन” ही धर्म है। वे जुल्म, अपमान और हिंसा सहती रहीं, क्योंकि समाज में तलाक या अलगाव को कलंक माना जाता था। परिवार की “इज्जत” बनाए रखने के नाम पर उनकी आवाज दबा दी जाती थी।

आज की युवा पीढ़ी, खासकर शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़कियां, इस सहनशीलता को जुल्म सहने की मजबूरी मानती हैं। वे शिक्षा, करियर और आत्मसम्मान को प्राथमिकता दे रही हैं। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई युवा महिलाएं शादी को “लाइफ माइलस्टोन” नहीं, बल्कि “ऑप्शनल” मान रही हैं। करियर, वित्तीय स्वतंत्रता और सही साथी की तलाश उन्हें देरी करने या शादी से बचने पर मजबूर कर रही है। वे कहती हैं—“अगर जुल्म सहना पड़े, तो शादी क्यों?”

यह बदलाव सकारात्मक है, क्योंकि यह महिलाओं में जागरूकता और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। लेकिन साथ ही यह समाज के लिए चेतावनी भी है कि पुरानी संरचनाएं अब टिक नहीं रही हैं।

 माइंडसेट बदलने की जरूरत:
समस्या केवल कानून या हिंसा की नहीं है; जड़ में माइंडसेट है। समाज को समझना होगा कि:

1. शादी समानता पर आधारित होनी चाहिए, न कि एक पक्ष के समर्पण पर। पति-पत्नी दोनों को सम्मान, समझ और साझेदारी की जरूरत है।

2. पुरुषों को भी सिखाया जाए कि हिंसा, नियंत्रण या “घर का मालिक” वाला रवैया पुरुषत्व नहीं है। लड़कों को बचपन से भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समानता और जिम्मेदारी सिखानी चाहिए।

3. महिलाओं को भी समझना चाहिए कि हर विवाद को अदालत तक ले जाना अंतिम समाधान नहीं। जहां संभव हो, संवाद और काउंसलिंग से रिश्ते सुधारे जा सकते हैं। लेकिन जुल्म के मामलों में चुप रहना भी गलत है।

4. परिवारों की भूमिका बदलनी होगी। ससुराल को बहू को “घर की बहू” नहीं, बल्कि परिवार की बराबर सदस्य मानना चाहिए। दहेज, नियंत्रण और हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर सोच बदलनी होगी।

5. समाज और मीडिया को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। केवल महिलाओं की पीड़ा या केवल पुरुषों के “दुरुपयोग” पर फोकस करने से द्वंद्व बढ़ता है। दोनों पक्षों की वास्तविकताओं को स्वीकार करें।

एक स्वस्थ समाज की ओर
हमने जो समाज बनाया है, उसमें हिंसा, अविश्वास और कानूनी जटिलताएं बढ़ गई हैं। युवा लड़कियां शादी से कतराती हैं क्योंकि वे जुल्म सहने को तैयार नहीं। यह उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि जागरूकता है। लेकिन शादी संस्था को खत्म करने की जरूरत नहीं; इसे सुधारने की जरूरत है।

माइंडसेट बदलना होगा—सहनशीलता को जुल्म सहन नहीं, बल्कि आपसी समझ और सम्मान कहें। कानूनों को सुरक्षा का हथियार बनाएं, हथियार नहीं। परिवारों को प्रेम और समानता का केंद्र बनाएं, न कि संघर्ष का। शिक्षा, जागरूकता और संवाद से ही हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहां शादी डर नहीं, बल्कि खुशी और विकास का प्रतीक बने।

अगर हम आज माइंडसेट नहीं बदले, तो कल विवाह योग्य युवा पीढ़ी शादी से पूरी तरह मुंह मोड़ लेगी। समय है सोचने का—क्या हम जुल्म सहने वाली पीढ़ी बनाना चाहते हैं, या समानता और सम्मान वाली? बदलाव हमसे शुरू होना चाहिए।
Ram Mohan Rai 
nityanootan.blogspot.com

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