पानीपत का इतिहास

 


सन 2013 में मुझे लाहौर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ मेरी भेंट हमारे पानीपत के प्रतिष्ठित बुजुर्ग एवं तत्कालीन राजनेता डॉ. मुबशर हसन से हुई। इस आत्मीय मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझे “हयात-ए-नू” की एक फोटोस्टेट प्रति भेंट की, जो उर्दू भाषा में थी।

यह विशेष पत्रिका वर्ष 1938 में हाली मुस्लिम हाई स्कूल के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रकाशित की गई थी। इसका संपादन मलिक मोहम्मद द्वारा किया गया था। पत्रिका के संपादक मंडल में अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व सम्मिलित थे, जिनमें प्रसिद्ध फिल्म लेखक एवं निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इस पत्रिका-रूप पुस्तक में पानीपत के इतिहास को अत्यंत प्रमुखता एवं विस्तार के साथ प्रस्तुत किया गया है। मैंने इसके हिन्दी अनुवाद के उद्देश्य से यह प्रति प्रसिद्ध गांधीवादी साहित्यकार एवं पट्टी कल्याणा आश्रम से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “ग्राम भावना ” के संपादक श्री जौहर को सौंप दी। उन्होंने अत्यंत निष्ठा और परिश्रम के साथ इसका हिन्दी अनुवाद किया।

इसके पश्चात मैंने यह अनुवाद पानीपत के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लेखक श्री दीपचंद निर्मोही को दिया। बाद में यह अनुवाद पानीपत नागरिक मंच के तत्कालीन अध्यक्ष श्री महेश दत्त शर्मा तक पहुँचा। लगभग तेरह वर्षों तक यह अनुवाद विभिन्न हाथों से गुजरता रहा। अंततः एक दिन श्री दीपचंद निर्मोही ने यह अनुवाद पढ़कर अपने इस आशीर्वाद के साथ मुझे वापस लौटा दिया और कहा कि मैं इसे संपादित करूं. 

यद्यपि अनुवाद मूल पाठ के अनुरूप और अत्यंत उत्कृष्ट था, तथापि उसका संपादन आवश्यक प्रतीत हुआ। मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसका संपादन एवं परिमार्जन करने का प्रयास किया। आज उसी प्रयास का परिणाम यह है कि वह पत्रिका एक पुस्तक के रूप में पाठकों के समक्ष उपस्थित है।

इस पुस्तक में अनेक ऐसे ऐतिहासिक तथ्य समाहित हैं, जो विशेष रूप से विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं एवं इतिहास-प्रेमियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।

यह पुस्तक आदरणीय डॉ. मुबशर हसन तथा श्री जौहर को सादर समर्पित है।

राम मोहन राय
(संपादक)

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पानीपत, जो आज एक साधारण कस्बे के रूप में दिखाई देता है, भूतकाल में अपने राजनीतिक महत्व, विद्वत्ता और सांस्कृतिक वैभव के कारण उत्तरी हिन्दुस्तान का अत्यंत प्रसिद्ध नगर रहा है। इसके विशाल मैदानों में अनेक बार हिन्दुस्तान के भाग्य का निर्णय हुआ और जो शासक यहाँ विजयी हुआ, दिल्ली का तख्त उसी के अधिकार में आया।

यह नगर बड़े-बड़े सूफी संतों, शांत फकीरों और महात्माओं की तपोभूमि रहा है, जिनका त्याग, साधना और आध्यात्मिक प्रभाव आज भी पूरे हिन्दुस्तान में श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। यहाँ अनेक महान विद्वान उत्पन्न हुए, जिनकी विद्वत्ता का लोहा आज तक माना जाता है। कुरान शरीफ के हाफिज़ तथा मधुर स्वर में उसका उच्चारण करने वालों का यह नगर हिन्दुस्तान का एक प्रमुख केंद्र रहा है। आज भी इस कस्बे में जितने कुरान शरीफ कंठस्थ करने वाले लोग मिलते हैं, उतने संभवतः देश के किसी बड़े नगर में भी दुर्लभ होंगे।

पानीपत केवल आध्यात्मिक और विद्वतापूर्ण परंपरा का ही केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह धनी रईसों और सम्मानित परिवारों का भी नगर था। उनकी बनवाई हुई कुछ शेष इमारतें आज भी इस कस्बे के प्राचीन वैभव की गवाही देती हैं। इस धरती ने अनेक मधुरभाषी कवियों, शायरों, साहित्यकारों और लेखकों को जन्म दिया, जो इसी मिट्टी से उठे और इसी में विलीन हो गए। यदि उनके जीवन और कृतित्व का सम्यक वर्णन किया जाए, तो एक विशाल ग्रंथ तैयार हो सकता है; और यदि उनकी रचनाओं को एकत्र कर लिया जाए, तो एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना हो सकती है।

प्रकृति ने इस नगर के भाग्य में यह सम्मान भी लिखा था कि आलोचना-लेखन और प्राकृतिक काव्य की वाणी के महान साहित्यकार यहाँ जन्मे। उन्होंने अपने अद्भुत साहित्यिक योगदान से उस नगर को, जो समय की विस्मृति में खो चुका था, पुनः देश और विश्व में प्रसिद्ध कर दिया।

बहुत समय से यह विचार था कि मौलाना हाली के जन्म और निवास-स्थान पानीपत का इतिहास, जो अत्यंत रोचक घटनाओं और गौरवपूर्ण कारनामों से भरा पड़ा है, प्रारंभ से लेकर वर्तमान तक क्रमबद्ध रूप में एकत्र किया जाए। विभिन्न कालों में यहाँ होने वाले युद्धों, घरेलू कलहों और इस धरती पर घटित ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया जाए, तथा हिन्दुस्तान के इतिहास में इस नगर को जो उच्च राजनीतिक सम्मान प्राप्त था, उसके कारणों पर भी प्रकाश डाला जाए, जिससे इसकी वास्तविक महत्ता और गौरव का अनुमान हो सके।

इसी उद्देश्य से दीर्घकालीन घटनाओं, अनेक पुस्तकों, हस्तलिखित ग्रंथों तथा विभिन्न विवरणों के अध्ययन, चयन और अनुवाद के पश्चात जो कुछ प्राप्त हो सका, उसे अत्यंत संक्षिप्त रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। जहाँ तक ज्ञात है, अब तक उर्दू या हिन्दी में पानीपत का कोई संक्षिप्त अथवा विस्तृत प्रामाणिक इतिहास प्रकाशित नहीं हुआ था। यह उसी दिशा में किया गया प्रथम प्रयास है।

निस्संदेह, इस विषय में अभी और अधिक खोज तथा अध्ययन की आवश्यकता है, और हमें इसके महत्व को समझना चाहिए। आशा है कि पाठकगण इसे रुचि और गंभीरता के साथ पढ़ेंगे।

— निवेदक : मुहम्मद इस्माइल, पानीपत

इतिहास पानीपत के आरंभ का

पानीपत भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाता है। यह वर्णन किया जाता है कि यह नगर महाभारत काल से भी पूर्व बसा हुआ था। महाभारत का महान युद्ध इसी पानीपत के विस्तृत मैदान में लड़ा गया था। जब पांडवों और कौरवों की सेनाएँ आमने-सामने पंक्तिबद्ध हुईं, तब उन्होंने युद्ध के लिए जिस विशाल क्षेत्र का चयन किया, वह पानीपत से स्थानेश्वर तक फैला हुआ था। यह पानीपत के रणक्षेत्र का प्रथम और अत्यंत भयानक युद्ध माना जाता है।

कहा जाता है कि उस समय समस्त हिन्दुस्तान के राजा इस युद्ध में सम्मिलित हुए—कुछ पांडवों की ओर से और कुछ कौरवों की ओर से। हिन्दुस्तान की धरती के परम पूज्य भगवान श्रीकृष्ण महाराज ने भी धर्म और अधर्म के इस महासंग्राम में पीड़ित पक्ष पांडवों का साथ दिया। अठारह दिनों तक भीषण युद्ध चलता रहा और उस भयंकर नरसंहार का अनुमान लगाना भी कठिन है। अंततः पांडव विजयी हुए और धर्मराज युधिष्ठिर दिल्ली की राजगद्दी के स्वामी बने।

हिन्दू दृष्टिकोण से पानीपत को यह महान गौरव प्राप्त है कि इसी रणभूमि में युद्ध के मध्य भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह प्रभावशाली उपदेश दिया, जो “श्रीमद्भगवद्गीता” के नाम से अमर और विश्वविख्यात हुआ।

यह युद्ध कब हुआ, इस विषय में विभिन्न मत हैं। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार यह युद्ध ईसा मसीह से लगभग 1400 वर्ष पूर्व हुआ था। हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध बंगाली इतिहासकार श्री रमेशचन्द्र दत्त ने भी अपनी पुस्तक हिन्दुस्तान की प्राचीन संस्कृति में इसी काल का समर्थन किया है। परन्तु हिन्दू धर्मावलम्बियों का मत इससे भिन्न है। उनका कहना है कि महाभारत का युद्ध ईसा मसीह से 3101 वर्ष पूर्व हुआ था, जैसा कि राजा विक्रमादित्य की गणनाओं से सिद्ध होता है।

यदि प्रथम मत को सही माना जाए तो पानीपत को बसे हुए लगभग 3325 वर्ष होते हैं, और यदि दूसरा मत स्वीकार किया जाए तो इसकी प्राचीनता 5000 वर्षों से भी अधिक सिद्ध होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो बहुत कम नगर ऐसे हैं जो प्राचीनता में पानीपत की समता कर सकते हैं।

पानीपत के आरंभिक काल का दूसरा वर्णन

पानीपत की प्राचीनता के संबंध में दूसरा उल्लेख सर सैयद अहमद खाँ साहब ने अपनी शोधपरक पुस्तक आसार-उस-सनादीद में किया है। वे लिखते हैं कि दिल्ली के राजा दंडपाणि अथवा दष्टपाल, जो राजा ध्रुवल राय के पुत्र थे, उन्होंने पानीपत को बसाया था। इस राजा ने ईसा पूर्व 707 से 691 तक लगभग 16 वर्षों तक इन्द्रप्रस्थ पर शासन किया।

प्राचीन हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक पुस्तकों तथा इतिहासकार लाला लाजपत राय ने भी इसी प्रकार का उल्लेख किया है। आसार-उस-सनादीद के कानपुर संस्करण के पृष्ठ 10 पर भी यही वर्णन मिलता है।

इन दोनों कथनों में प्रत्यक्ष रूप से भिन्नता दिखाई देती है, परंतु संभव है कि अत्यंत प्राचीन काल में बसा पानीपत समय के साथ उजड़ गया हो, उसकी बस्तियाँ नष्ट हो गई हों और वह केवल एक छोटे से गाँव के रूप में रह गया हो। तत्पश्चात राजा दंडपाल ने उसे पुनः बसाया हो। भारत के अनेक नगरों का इतिहास इसी प्रकार पुनर्निर्माण और पुनर्जीवन का रहा है। स्वयं दिल्ली इसका एक जीवंत उदाहरण है।

यह भी संभव है कि इस नगर का प्राचीन नाम कुछ और रहा हो और राजा दंडपाल ने पुनः बसाने के पश्चात अपने नाम से मिलता-जुलता “पानीपत” नाम दिया हो, जो आगे चलकर इतना प्रसिद्ध हुआ कि पुराना नाम पूर्णतः लुप्त हो गया।

किला और नगर की सुरक्षा-दीवार

इसके पश्चात अर्जुन नामक एक राजा ने नगर के मध्य एक भव्य किले का निर्माण कराया तथा नगर के चारों ओर एक विशाल पक्की दीवार बनवाई, जिसमें पंद्रह विशाल द्वार थे। यद्यपि वह किला अब खंडहर में परिवर्तित हो चुका है, तथापि उसका टूटा-फूटा मलबा आज भी नगर के मध्य एक विशाल टीले के रूप में विद्यमान है।

यह टीला इतना विस्तृत है कि इस पर पूरा एक मोहल्ला बसा हुआ है। नगर का थाना, म्युनिसिपल बोर्ड का स्कूल भवन, बोर्डिंग हाउस, नगरपालिका भवन, बिजलीघर, विक्टोरिया मेमोरियल लाइब्रेरी, खेल का मैदान तथा दो मस्जिदें इसी पर निर्मित हैं।

यूनानियों और सथीनों के आक्रमण

पानीपत सदा से उन जातियों का प्रमुख मार्ग और केंद्र रहा है जिन्होंने उत्तर-पश्चिमी दर्रों से होकर हिन्दुस्तान पर आक्रमण किए। अनेक बार यूनानी आक्रमणकारी इन मैदानों में ठहरे और लूटमार करते हुए आगे बढ़ गए। उनके आक्रमण ईसा मसीह से लगभग 326 वर्ष पूर्व आरंभ हुए।

यूनानियों के पश्चात मध्य एशिया की “सथीन” नामक जातियाँ भी इस क्षेत्र से होकर गुज़रीं और उन्होंने मथुरा तक व्यापक लूटपाट और विनाश किया। इन जातियों के आक्रमण ईसा पूर्व 400 से 150 तक होते रहे। लगभग 550 वर्षों के इस लंबे काल में उन्होंने यहाँ अपनी बस्तियाँ बसाईं और कम से कम तीन वंशों ने शासन भी किया। कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि पंजाब के जाट इन्हीं सथीन जातियों की संतति हैं, जबकि कुछ इतिहासकार राजपूतों को भी उन्हीं से संबंधित मानते हैं।

यूनानियों और सथीनों के इस क्षेत्र में आने तथा सत्ता स्थापित करने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। उस काल के सिक्के और अन्य प्राचीन वस्तुएँ आज भी कभी-कभी भूमि के भीतर से प्राप्त होती रहती हैं।

पानीपत में मुसलमानों का प्रथम आगमन

इस काल के पश्चात सन् 711 ईस्वी में मुसलमानों का आगमन हुआ, जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और मुल्तान तक पहुँच गया। उसके साथ सादात का एक कुनबा भी हिन्दुस्तान आया, जिसका नेतृत्व हजरत इमाम अब्दुल कासिम इस्माइल और सैयद-उल-हक कर रहे थे।

उस समय पानीपत पर शासन करने वाले हिन्दू राजा ने सैयद इस्माइल नामक एक वृद्ध व्यक्ति की अकारण हत्या करवा दी थी। उनके रक्त का बदला लेने के लिए इन दोनों बुजुर्गों ने सेना सहित राजा पर आक्रमण किया। यद्यपि उन्होंने राजा को मार डाला, परंतु स्वयं भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।

जहाँ वे युद्ध करते हुए मारे गए, वहाँ बाद में धीरे-धीरे एक गाँव बस गया। हजरत इमाम जाफर सादिक की वंश परंपरा से संबंधित एक प्रतिष्ठित सैयद परिवार भी वहाँ आकर बस गया। यह गाँव आज भी पानीपत के पश्चिम में आसन कलां मार्ग पर स्थित है और “सौदापुर” के नाम से प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध साहित्यकार शम्स-उल-उलमा मौलाना हाली की माताश्री भी इसी खानदान से थीं।

सुल्तान महमूद गजनवी का आक्रमण

मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के पश्चात लंबे समय तक शांति रही। इसके बाद गजनवी वंश का उदय हुआ और महमूद गजनवी सत्ता पर आसीन हुआ। उसने सन् 1001 से 1024 तक लगभग 24 वर्षों में हिन्दुस्तान पर सत्रह आक्रमण किए।

इन्हीं आक्रमणों में सन् 1011 में उसने थानेसर और पानीपत पर भी आक्रमण किया। परंतु उसके लौट जाने के पश्चात हिन्दू शासकों ने पुनः इस क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया। पानीपत की जामा मस्जिद को महमूद गजनवी के इसी आक्रमण की स्मृति माना जाता है।
[5/11, 3:47 PM] Ram Mohan Rai: सुल्तान महमूद गजनवी के पश्चात का काल और पानीपत का धार्मिक एवं राजनीतिक महत्व

सन् 1030 ईस्वी में सुल्तान महमूद गजनवी की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र सुल्तान मसूद राजगद्दी पर बैठा। सन् 1039 ईस्वी में उसने पुनः हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया। हिन्दू राजा उसके इस8 आक्रमण का सामना न कर सके। सुल्तान मसूद ने इस क्षेत्र के शासन के लिए अपना एक गवर्नर नियुक्त किया, जो सोनीपत में निवास करता था। सोनीपत, जो पानीपत से लगभग 27 मील दूर दिल्ली मार्ग पर स्थित एक प्राचीन बस्ती है, उस समय इस क्षेत्र का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बन गया।

किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक स्थिर न रह सकी। सन् 1042 में हिन्दू शासकों ने पुनः इस क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया।

हिन्दुस्तान में मुस्लिम खानदानों का आगमन और पानीपत में बसावट

इस काल में शाम, इराक और ईरान से मुसलमानों के अनेक प्रतिष्ठित खानदान हिन्दुस्तान आने लगे और विभिन्न नगरों में बसते चले गए। पानीपत की जलवायु अत्यंत सुहावनी थी। नगर में पर्याप्त चहल-पहल, सुंदर उद्यान, शांत वातावरण तथा आरामदेह स्थानों की भरमार थी। यही कारण था कि मुसलमानों के अनेक प्रतिष्ठित वंश यहाँ आकर बस गए और पानीपत उत्तर भारत में सम्मानित मुसलमानों का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

पानीपत की एक विशेषता यह भी थी कि यहाँ अनेक शांत और एकांत स्थान उपलब्ध थे, जहाँ सूफी संत, फकीर और भक्तजन निश्चिंत होकर परमात्मा की उपासना, चिंतन और साधना में लीन रह सकते थे। इसी कारण अनेक एकांतप्रिय वृद्ध और सूफी संत यहाँ आकर बस गए और धीरे-धीरे पानीपत सूफी संतों, वलियों और धार्मिक साधकों का पवित्र केंद्र बन गया।

धार्मिक दृष्टि से पानीपत का उत्कर्ष

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से पानीपत की प्रतिष्ठा का स्वर्णकाल वह था, जब हजरत शाह शर्फुद्दीन यहाँ अध्यात्म और वेदांत का पाठ पढ़ा रहे थे। देश के कोने-कोने से सैकड़ों जिज्ञासु और सत्य के साधक उनके पास ज्ञान प्राप्त करने आते थे और फिर अपने-अपने प्रदेशों में जाकर उस ज्ञान का प्रचार करते थे।

हजरत कलंदर साहब की ख्याति सुनकर बड़े-बड़े सूफी, संत और विद्वान यहाँ आए और उनमें से अनेक यहीं बस गए। उस समय पानीपत हिन्दुस्तान के प्रतिष्ठित धार्मिक विद्वानों का केंद्र बन चुका था। यहाँ विद्या की नदियाँ और आत्मिक ज्ञान के सागर उमड़ते थे।

दिल्ली के बादशाह भी अत्यंत विनम्रता के साथ हजरत कलंदर साहब की सेवा में उपस्थित होते और श्रद्धा के साथ उनके उपदेशों का रसपान कर लौटते थे।

उस समय के प्रमुख विद्वान

उस काल में पानीपत में अनेक महान विद्वान निवास करते थे। उनमें प्रमुख नाम इस प्रकार बताए जाते हैं—
मखदूम दौलत आज़ादी, मौलाना नजीबुद्दीन समरकंदी, मौलाना मलिक अली अंसारी, काज़ी जियाउद्दीन सुनामी, हजरत मौलाना सिराजुद्दीन मक्की, मौलाना जहरुद्दीन बुखारी, मौलाना सदरुद्दीन, शेख अब्दुल सनी दानिशमंद तथा मौलाना निजाम आदि।

ये सभी विद्वान पानीपत के इतिहास के उज्ज्वल नक्षत्र थे।

हजरत मखदूम जलालुद्दीन और ख्वाजा मलिक अंसारी

इन महान विभूतियों में दो ऐसे महापुरुष हुए जिनका पानीपत के इतिहास से अत्यंत गहरा और दीर्घ संबंध रहा—
पहले, हजरत मखदूम जलालुद्दीन कबीर-उल-औलिया, और दूसरे, ख्वाजा मलिक अंसारी।

हजरत मखदूम जलालुद्दीन अत्यंत उच्च कोटि के सूफी संत और आध्यात्मिक पुरुष थे। आपकी आयु लगभग 170 वर्ष बताई जाती है और सन् 1360 ईस्वी में आपका देहावसान हुआ। आपके पाँच पुत्र हुए और आपकी वंश परंपरा अत्यंत विस्तृत हुई। आपकी संतानों में अनेक बड़े सूफी, विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्ति उत्पन्न हुए। आज भी आपकी संतति पानीपत, सहारनपुर, कैराना और आजमगढ़ आदि नगरों में फैली हुई है।

पानीपत का एक पूरा मोहल्ला आपकी संतानों से आबाद है, जिसे “मखदूम जातगान” कहा जाता है।

दूसरे महापुरुष ख्वाजा मलिक अंसारी थे, जो हरात से हिन्दुस्तान आए और पानीपत में बस गए। आप शेखुल इस्लाम अब्दुल्ला अंसारी तथा प्रसिद्ध सूफी संतों की वंश परंपरा से संबंधित थे। स्वयं भी आप अत्यंत विद्वान, धार्मिक और चमत्कारी वृद्ध माने जाते थे।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने सम्मानस्वरूप तहसील पानीपत के अनेक उपजाऊ गाँव, भूमि तथा नगर में निवास और आजीविका के लिए पर्याप्त संपत्ति उन्हें प्रदान की। साथ ही पानीपत के बाजारों की देखरेख, मजारों के प्रबंधन तथा अन्य प्रशासनिक अधिकार भी सौंपे गए। संक्षेप में कहा जाए तो मानो पूरी पानीपत की जागीर ही उन्हें प्रदान कर दी गई थी।

ख्वाजा मलिक अंसारी की संतति

ख्वाजा मलिक अंसारी के दो पुत्र थे—
पहले ख्वाजा मसूद, जो पानीपत से पायल रियासत, पटियाला चले गए और वहीं बस गए।
दूसरे पुत्र ख्वाजा नसीर की शादी हजरत जलालुद्दीन कबीर की सुपुत्री से हुई। उनकी संतति अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध हुई।

उनकी वंश परंपरा में अनेक धनवान, रईस, कवि, साहित्यकार, विद्वान और लेखक उत्पन्न हुए। उनमें से कई हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रांतों के गवर्नर, बादशाहों के सलाहकार तथा अंग्रेजी शासनकाल में उच्च पदों पर आसीन रहे। कुछ व्यक्तियों ने अपनी साधना, तपस्या और विद्वत्ता के कारण अत्यधिक ख्याति प्राप्त की।

प्रत्येक वर्ग में विद्वानों की पर्याप्त संख्या मलिक अली अंसारी की संतानों में पाई जाती है।

इसी वंश में आगे चलकर हिन्दुस्तान के गौरव, “शम्स-उल-उलमा” अर्थात शिक्षा-सूर्य, मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली का जन्म हुआ। अपनी साहित्यिक प्रतिभा और काव्य रचनाओं से उन्होंने अपने पूर्वजों के नाम को चार चाँद लगा दिए।

आज भी पानीपत का विशाल “मोहल्ला अंसारियान” उनकी संतानों से आबाद है और अनेक भव्य भवनों से सुशोभित है। इसके अतिरिक्त उनकी संतति पटना, अज़ीमाबाद, औरंगाबाद, दक्षिण भारत तथा फरीदाबाद आदि स्थानों में भी पाई जाती है।

पानीपत का राजनीतिक महत्व

प्राचीन राजाओं तथा बाद के मुस्लिम बादशाहों के समय में पानीपत को सम्पूर्ण उत्तरी हिन्दुस्तान में अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थान प्राप्त था। इसका मुख्य कारण यह था कि उत्तर-पश्चिमी दर्रों से आने वाला प्रत्येक आक्रमणकारी, जो दिल्ली पर अधिकार करना चाहता था, पानीपत के मार्ग से होकर ही आता था।

वास्तव में पानीपत को हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली का मुख्य द्वार कहा जा सकता है।

यद्यपि अन्य मार्ग भी उपलब्ध थे, किन्तु वे अत्यंत कठिन और अनुपयुक्त थे। एक मार्ग रेतीले और सूखे क्षेत्रों से होकर गुजरता था, जहाँ पानी और भोजन का अभाव था। दूसरा मार्ग सहारनपुर की ओर पहाड़ी और नदी-नालों से भरा हुआ था, जो विशाल सेनाओं के लिए सुविधाजनक नहीं था।

इसके विपरीत पानीपत का मार्ग समतल, उपजाऊ, हरे-भरे खेतों और पर्याप्त जलस्रोतों से युक्त था। यहाँ सेना को पानी, चारा और भोजन सहज उपलब्ध हो जाता था। इसलिए अधिकांश आक्रमणकारियों ने इसी मार्ग को चुना।

युद्धभूमि के रूप में पानीपत

पानीपत के राजनीतिक महत्व का एक बड़ा कारण उसका विशाल किला और मजबूत नगर-दीवारें भी थीं। नगर की पक्की और ऊँची दीवारें तथा विशाल किला किसी भी सेना को सुरक्षित आश्रय प्रदान कर सकते थे। यदि किले की घेराबंदी भी हो जाए, तब भी सेना लंबे समय तक भीतर रहकर युद्ध कर सकती थी।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि किले में विशाल मात्रा में गेहूँ और अन्य रसद का भंडार सुरक्षित रखा जाता था।

इसके अतिरिक्त पानीपत के विस्तृत मैदान इतने विशाल थे कि उनमें किसी भी बड़ी सेना का पड़ाव डाला जा सकता था। खाइयाँ खोदकर युद्ध की तैयारी करना और मोर्चाबंदी करना यहाँ अत्यंत सुविधाजनक था।

इन्हीं कारणों से पानीपत विश्व इतिहास में एक महान राजनीतिक और युद्धभूमि के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

मुसलमानों के काल की प्रारंभिक लड़ाइयाँ

मुस्लिम शासनकाल में पानीपत के मैदान में प्रारंभिक लड़ाइयों का उल्लेख सन् 1390 ईस्वी के आसपास मिलता है। उस समय तुगलक वंश का एक नवयुवक अबू बकर दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया था। उसके विरुद्ध सुल्तान नसीरुद्दीन मोहम्मद तुगलक ने अपने पुत्र शहजादा हुमायूँ खाँ को भेजा, जो आगे चलकर सुल्तान अलाउद्दीन तुगलक कहलाया।

शहजादा हुमायूँ बड़ी सेना लेकर पानीपत पहुँचा और आसपास के क्षेत्रों में सैन्य अभियान आरंभ किया। इसके उत्तर में अबू बकर ने मलिक शाहीन इमादुद्दीन को चार हजार घुड़सवारों तथा पैदल सैनिकों के साथ भेजा। दोनों सेनाओं की भिड़ंत गाँव पसीना के निकट हुई, जिसमें शहजादा हुमायूँ पराजित हुआ और अपना समस्त सामान छोड़कर समाना की ओर भाग गया।

संभवतः मुसलमानों के शासनकाल में यह पानीपत की प्रथम बड़ी लड़ाई थी।

इसके पाँच वर्ष पश्चात, सन् 1395 ईस्वी में, शहजादा नुसरत खाँ ने विद्रोह कर पानीपत पर अधिकार कर लिया। उसने नगर को अपना मुख्यालय बनाया और उसे सैन्य दृष्टि से सुदृढ़ किया। इसके बाद उसने दिल्ली के निकट फ़िरोज़ाबाद पर भी कब्ज़ा कर लिया और स्वयं को “नुसरत शाह” घोषित कर दिया।

कहा जाता है कि उसने वर्तमान नगर से कुछ दूरी पर एक नया नगर बसाया, जिसमें भव्य भवनों और विशाल मस्जिदों का निर्माण कराया गया। मौलाना लखौल्लाह ने अपनी पुस्तक बुजुर्गोंन-ए-पानीपत में इसका विस्तृत वर्णन किया है।
सन् 1397 ईस्वी में समाना क्षेत्र के शासक ग़ालिब ख़ाँ पर लाहौर के स्वामी सारंग ख़ाँ ने आक्रमण किया। सारंग ख़ाँ ने जब अपनी शक्ति के समक्ष विरोधी पक्ष की सामर्थ्य को देखा, तो वह युद्धभूमि छोड़कर भाग निकला। उस समय पानीपत में नुसरत शाह का वज़ीर तातार ख़ाँ उपस्थित था, क्योंकि नुसरत शाह ने पानीपत को अपना मुख्यालय बना रखा था। ग़ालिब ख़ाँ अपने कुछ उच्च पदस्थ प्यादों और सवारों के साथ भागकर पानीपत पहुँचा और वहाँ शरण ली।

जब नुसरत शाह को इस घटना का समाचार मिला, तब उसने गुलामों के सरदार मालिक-उल-मुल्क को दस हाथियों तथा विशाल सेना के साथ पानीपत भेजा। साथ ही अपने वज़ीर तातार ख़ाँ को आदेश दिया कि वह ग़ालिब ख़ाँ को साथ लेकर सारंग ख़ाँ पर आक्रमण करे और पुनः समाना पर ग़ालिब ख़ाँ का अधिकार स्थापित कराए। तातार ख़ाँ ने आदेशानुसार ग़ालिब ख़ाँ को साथ लिया और समाना की ओर प्रस्थान किया।
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सन् 1398 ईस्वी में ग्राम कोटला के निकट सारंग ख़ाँ पर आक्रमण किया गया। इस युद्ध में सारंग ख़ाँ पराजित हुआ और वह भागकर मुल्तान की ओर चला गया। विजय प्राप्त करने के उपरांत तातार ख़ाँ पुनः पानीपत लौट आया।

तातार ख़ाँ को पानीपत आए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि फिरोज़ाबाद में नुसरत शाह पर सुल्तान महमूद तुगलक के सेनापति इनोखा उर्फ़ इक़बाल ख़ाँ ने बड़े तामझाम और विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में नुसरत शाह पराजित हुआ और उसके बहुत से हाथी तथा सैन्य सामग्री इक़बाल ख़ाँ के हाथ लग गई। पराजित होकर नुसरत शाह भागता हुआ पानीपत पहुँचा और अपने वज़ीर तातार ख़ाँ के पास शरण ली।

तातार ख़ाँ ने बादशाह की सुरक्षा के लिए कुछ सेना पानीपत में छोड़ दी तथा शेष सेना और हाथियों को लेकर इक़बाल ख़ाँ पर आक्रमण करने हेतु तत्काल दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। उधर इक़बाल ख़ाँ ने यह विचार किया कि इस समय पानीपत पर आक्रमण करना उचित रहेगा, क्योंकि नुसरत शाह और तातार ख़ाँ की सेना हाल ही के युद्ध से थकी और कमजोर हो चुकी थी। इसी उद्देश्य से वह अपनी सेना लेकर पानीपत की ओर बढ़ चला।

पानीपत पहुँचकर इक़बाल ख़ाँ ने नगर का घेराव कर लिया। उस समय वहाँ नुसरत शाह अकेला था और उसके पास इतनी सेना भी नहीं थी कि वह इक़बाल ख़ाँ की विशाल शक्ति का सामना कर सके। फिर भी उसने अत्यंत वीरता और साहस के साथ शत्रु का मुकाबला किया। दोनों पक्षों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ और लगातार तीन दिनों तक युद्धभूमि रणगर्जना से गूँजती रही।

अंततः नुसरत शाह पराजित हुआ। इक़बाल ख़ाँ ने पानीपत पर अधिकार कर लिया तथा बड़ी मात्रा में सैन्य सामग्री और हाथी उसके हाथ लगे। इधर तातार ख़ाँ ने दिल्ली पर विजय प्राप्त करने का भरसक प्रयास किया, परंतु वह सफल न हो सका। उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं थी कि वह पुनः पानीपत पर आक्रमण कर सके। परिणामस्वरूप, निराश और टूटे मन से वह गुजरात की ओर चला गया।
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पानीपत में अमीर तैमूर ख़ाँ का आगमन

सन् 1398 ईस्वी में, उपर्युक्त घटनाओं के दूसरे ही वर्ष, तैमूर लंग ने हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया। उस समय दिल्ली में सुल्तान नासिरुद्दीन शासन कर रहा था। तैमूर लूटपाट, नरसंहार और विनाश करता हुआ आँधी और तूफ़ान की भाँति पंजाब से होता हुआ आगे बढ़ा तथा 14 रबी-अल-अव्वल, हिजरी 801 अर्थात् 3 दिसंबर 1398 ईस्वी को पानीपत पहुँचकर उसने अपना डेरा डाला।

पानीपत के निवासियों को पहले ही नगर खाली करने का आदेश प्राप्त हो चुका था। इस घटना का उल्लेख तारीख-ए-हिन्दुस्तान के लेखक मौलाना ज़काउल्ला ने भाग-2 के पृष्ठ 244, 245 तथा पृष्ठ 288 पर किया है। आदेश मिलते ही अधिकांश लोग नगर छोड़कर चले गए। परिणामस्वरूप जब तैमूर ने नगर में प्रवेश किया, तब पूरा पानीपत वीरान और सुनसान पड़ा था।

तैमूर स्वयं पानीपत के किले में ठहरा, जबकि उसकी सेना नगर के बाहर मैदानों में डेरा डाले रही। चूँकि पानीपत एक अत्यंत महत्वपूर्ण सैनिक नगर था, इसलिए यहाँ सेना के लिए विशाल अन्न भंडार सुरक्षित रखा जाता था। तैमूर को किले में लगभग 1,60,000 मन गेहूँ संग्रहित मिला, जिसे उसने उदारतापूर्वक अपनी सेना में बँटवा दिया।

तैमूर पानीपत के किले में दो दिन तक ठहरा। यहाँ से प्रस्थान करने के सात दिन पश्चात वह दिल्ली पहुँचा, जहाँ उसने सुल्तान महमूद तुगलक को पराजित किया और लगभग पंद्रह दिनों तक दिल्ली में भयंकर लूटपाट और विनाश करता रहा।

मुबारक शाह की सैनिक गतिविधियों का केंद्र — पानीपत

सन् 1430 से 1433 ईस्वी के मध्य सैय्यद वंश के दूसरे शासक मक़सूद्दीन अबू-अल-फ़तह मुबारक शाह ने अपने शासनकाल में दो बार पानीपत को अपनी सैनिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। वह कई-कई महीनों तक यहाँ ठहरकर राज्य व्यवस्था का संचालन करता रहा। पहली बार वह सन् 1430 में तथा दूसरी बार सन् 1433 में पानीपत में निवासरत रहा।

बादशाह के पानीपत में ठहरने का मुख्य उद्देश्य यह था कि वह यहाँ से आसपास के उन विद्रोही क्षेत्रों पर नियंत्रण रख सके, जहाँ दंगे, उपद्रव और अशांति फैली हुई थी। इस संबंध में तारीख-ए-हिन्दुस्तान के लेखक मौलाना ज़काउल्ला ने भाग-2 के पृष्ठ 260 तथा 318 पर उल्लेख किया है कि समस्त पानीपत क्षेत्र में विद्रोह और दंगा-फसाद की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

बहलोल ख़ाँ और पानीपत पर अधिकार

मुबारक शाह के पश्चात सन् 1444 ईस्वी में मुहम्मद शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह अत्यंत दुर्बल स्वभाव का शासक था। उसकी निर्बलता को देखकर अनेक राज्यपाल और अधिकारी अपने-अपने प्रांतों में स्वतंत्र शासक बनने लगे। सरहिंद का गवर्नर बहलोल ख़ाँ भी अपने सीमित अधिकार से संतुष्ट न रहकर आगे बढ़ा और उसने पानीपत क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया।

मौलाना ज़काउल्ला के अनुसार, पानीपत पर विजय प्राप्त कर मलिक बहलोल ख़ाँ ने दिल्ली के द्वार तक अपने पाँव जमा लिए थे।

सुल्तान मुहम्मद शाह और बहलोल ख़ाँ का युद्ध

पानीपत जैसा महत्वपूर्ण सैनिक नगर शत्रु के अधिकार में रहना दिल्ली के बादशाह के लिए अत्यंत गंभीर संकट का कारण था। अतः सुल्तान मुहम्मद शाह ने तुरंत एक विशाल सेना बहलोल ख़ाँ का सामना करने के लिए भेजी। पानीपत के मैदान में दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ और मारकाट का भयानक दृश्य उपस्थित हो गया।

इस युद्ध में मलिक बहलोल पराजित हुआ तथा पानीपत नगर पुनः मुहम्मद शाह के अधिकार में आ गया।

पुनः पानीपत पर मलिक बहलोल का अधिकार

इस पराजय के बाद भी मलिक बहलोल ने साहस नहीं छोड़ा। वह गुप्त रूप से अपनी सेना संगठित करता रहा। जब उसके पास पर्याप्त सैनिक शक्ति एकत्र हो गई, तब उसने पुनः पानीपत पर आक्रमण किया और शीघ्र ही नगर पर अधिकार कर लिया।

इस बार बादशाह ने अपने राजमंत्री हस्साम ख़ाँ को उसके विरुद्ध युद्ध के लिए भेजा, परंतु मलिक बहलोल ख़ाँ ने हस्साम ख़ाँ को बुरी तरह पराजित कर दिया। इस घटना का उल्लेख भी मौलाना ज़काउल्ला ने तारीख-ए-हिन्दुस्तान भाग-2 के पृष्ठ 326 और 327 पर किया है।

हस्साम ख़ाँ अपने घायल और रक्तरंजित सैनिकों को युद्धभूमि में तड़पता छोड़कर दिल्ली भाग आया। अब मलिक बहलोल ख़ाँ निर्भय होकर पानीपत पर शासन करने लगा। इस विजय के परिणामस्वरूप वह पानीपत से लेकर मुल्तान तक के विशाल क्षेत्र का एकमात्र स्वामी बन गया।

उधर, जब पराजित हस्साम ख़ाँ दिल्ली पहुँचा, उसी समय मलिक बहलोल का एक पत्र भी बादशाह के पास पहुँचा, जिसमें लिखा था कि यदि हस्साम ख़ाँ को मृत्युदंड दे दिया जाए तो वह बादशाह की अधीनता स्वीकार कर लेगा। दुर्भाग्यवश, बादशाह उसकी चाल में फँस गया और उसने अपने ही वज़ीर हस्साम ख़ाँ का सिर धड़ से अलग करवा दिया।
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सन् 1452 में पानीपत में एक भीषण युद्ध होते-होते रह गया। भाग्य के विचित्र चक्र ने मलिक बहलोल को दिल्ली के विशाल राज्य का स्वामी बना दिया और वह सन् 1452 में बहलोल लोदी के नाम से बादशाह के सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने अपने पुत्र वाजिद निज़ाम खाँ को दिल्ली की व्यवस्था का दायित्व सौंपकर अपने अधिकार-प्राप्त प्रदेशों की स्थिति सुदृढ़ करने हेतु पंजाब की ओर प्रस्थान किया।

बहलोल के पंजाब पहुँचते ही जौनपुर के बादशाह महमूद खाँ शर्की ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उस समय वाजिद के पास इतनी विशाल सेना नहीं थी कि वह किले से बाहर निकलकर युद्ध कर सके, अतः वह किले में ही बंद होकर बैठ गया। विवश होकर उसने पालपुर में स्थित अपने पिता के पास संदेश भेजा कि यदि शीघ्र सहायता न पहुँची तो दिल्ली हाथ से निकल जाएगी।

उधर महमूद शर्की को उसके शाही सलाहकारों ने परामर्श दिया कि यदि बहलोल दिल्ली पहुँच गया तो उससे सामना करना अत्यंत कठिन होगा। अतः उचित यही होगा कि उसे पानीपत के समीप ही रोक लिया जाए और वहीं समाप्त कर दिया जाए, जिससे दिल्ली पर अधिकार सहज हो सके। इस योजना के अनुसार महमूद शर्की ने दरिया खाँ और फतेह खाँ हर्बी को 30,000 सैनिकों तथा 40 युद्धक हाथियों के साथ बहलोल खाँ पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

किन्तु इसी बीच सुल्तान बहलोल पानीपत से दिल्ली की ओर बढ़ चुका था। ग्राम नरेला के निकट दोनों सेनाओं का सामना हुआ। अंततः पानीपत एक महान संकट से बाल-बाल बच गया, अन्यथा विजयी पक्ष इस निर्धन नगर की क्या दुर्दशा करता, इसका अनुमान कठिन नहीं। इस घटना का उल्लेख “तारीख-ए-हिन्दुस्तान” में जकाउल्ला ने, भाग-दो, पृष्ठ 337 पर तथा करनाल के सरकारी गजट, सन् 1452, पृष्ठ 883-884 में किया है।

शाहजादे वाजिद निज़ाम खाँ का पानीपत पर आक्रमण

इस घटना के कुछ समय पश्चात वाजिद निज़ाम खाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज उठा लिया। वह 15,000 घुड़सवारों के साथ सबसे पहले पानीपत पर चढ़ आया और विजय प्राप्त कर नगर में प्रवेश कर गया। इसके बाद लंबे समय तक पानीपत ही उसका केंद्रीय ठिकाना बना रहा।

सुल्तान इब्राहिम लोदी के विरुद्ध हिन्दुस्तानी धनाढ्यों द्वारा बाबर को आमंत्रण

अब वह समय आया जब हिन्दुस्तान का शासन लोदी वंश के हाथों से निकलकर मुगलों के अधीन जाने वाला था। इन दोनों शासनों के भाग्य का निर्णय प्रायः पानीपत के मैदान में ही हुआ। लोदी वंश का अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी अत्यंत कठोर, अत्याचारी और अव्यवस्थित शासक माना जाता था। वह न प्रजा की भलाई की चिंता करता था और न ही राज्य-व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान देता था।

प्रांतों के सूबेदार और क्षेत्रीय अधिकारी इस अवसर का लाभ उठाकर स्वतंत्र होना चाहते थे, किन्तु उनमें सुल्तान से प्रत्यक्ष युद्ध करने का न साहस था और न सामर्थ्य। अनेक विचार-विमर्शों के पश्चात अंततः यह निर्णय लिया गया कि अफ़ग़ानिस्तान के शासक ज़हीरुद्दीन बाबर को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया जाए।

इन भारतीय धनाढ्यों और सामंतों का विचार था कि बाबर भी तैमूर लंग की भाँति लूटमार करके वापस लौट जाएगा और उसके पश्चात वे निर्भय होकर अपने-अपने क्षेत्रों के स्वतंत्र स्वामी बन बैठेंगे। किन्तु कौन जानता था कि प्रकृति एक नए युग की भूमिका रच रही है और बाबर यहाँ ऐसा स्थायी शासन स्थापित करेगा कि आने वाले लंबे काल तक हिन्दुस्तान के शासकों और प्रांताधिपतियों को उसकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ेगी।

अतः यह निश्चय किया गया कि दिलावर खाँ नामक व्यक्ति को काबुल भेजा जाए। वह बाबर के दरबार में उपस्थित हुआ और हिन्दुस्तान के क्षेत्रीय शासकों तथा अधिकारियों का संदेश उसे सुनाया। संदेश में कहा गया कि हिन्दुस्तान का बादशाह इब्राहिम लोदी अत्यंत अत्याचारी और निर्दयी हो चुका है। उसने अपने पिता के शासनकाल के अनेक अधिकारियों और धनाढ्यों को भी नहीं छोड़ा। अब तक वह 23 पदाधिकारियों को बिना किसी दोष के मरवा चुका है और न जाने आगे किसकी बारी हो।

कई अधिकारियों को जीवित दीवारों में चुनवा दिया गया, जहाँ वे तड़प-तड़प कर मर गए। अनेक धनाढ्यों को जलाकर मृत्यु के घाट उतार दिया गया। उसके अत्याचार इतने बढ़ चुके थे कि प्रजा पूर्णतः भयभीत और असहाय हो गई थी। संदेश में प्रार्थना की गई कि बाबर इस अत्याचारी शासक से उन्हें मुक्ति दिलाए। साथ ही यह आश्वासन भी दिया गया कि बाबर के हिन्दुस्तान की ओर बढ़ते ही वे सब उसके सेवक और आज्ञाकारी सहयोगी बनकर उसका साथ देंगे।

हिन्दुस्तान विजय के लिए बाबर की तैयारियाँ

यह संदेश सुनकर बाबर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने संदेशवाहक का आदर-सत्कार किया, उसे उच्च सम्मान प्रदान किया तथा अनेक घोड़े पुरस्कारस्वरूप दिए। उसी समय से बाबर ने हिन्दुस्तान विजय की तैयारियाँ आरंभ कर दीं।

उसने जहाँगीर कुली खाँ के एक सरदार को 2,000 मुगल सैनिकों के साथ अग्रिम रूप से रवाना किया, ताकि बाबर की सेना के मार्ग में आने वाले रास्तों और पुलों की मरम्मत कर उन्हें सुगम बनाया जा सके।

उधर अलाउद्दीन आलम खाँ, जिसे उसका चचेरा भाई सुल्तान इब्राहिम लोदी कैद में रखे हुए था, किसी प्रकार वहाँ से निकलकर काबुल पहुँच गया। बाबर ने उसका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और अपने पास आश्रय दिया। बाद में बाबर ने उसे मुगलों की एक अग्रिम टुकड़ी देकर आगे रवाना किया और कहा कि वह मार्ग में पड़ने वाले क्षेत्रों पर अधिकार करना आरंभ करे, जबकि वह स्वयं शीघ्र ही पीछे-पीछे पहुँच जाएगा।
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अलाउद्दीन का पानीपत में आगमन

उस समय भारी गर्मी पड़ रही थी। दिन में ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश से आग बरस रही हो, परन्तु आलम अत्यन्त सावधानी के साथ अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ता गया। वह दो विश्राम स्थलों के बीच एक पड़ाव बनाकर बोधशिख और लाहौर पहुँचा। वहाँ से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया। जब वह करनाल क्षेत्र के ग्राम इंद्री पहुँचा, तब पानीपत का बड़ा हमीर शेख सुलेमान अपनी सेना सहित उससे आ मिला। अब अलाउद्दीन खाँ की सेना की संख्या लगभग 40,000 हो गई।

इस विशाल सैन्य दल के साथ अलाउद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर उसका घेराव कर लिया। एक छापामार आक्रमण में उसे बड़ी सफलता प्राप्त हुई, परन्तु जब उसकी सेना निश्चिंत होकर गहरी निद्रा में सो रही थी, तभी सुल्तान इब्राहिम ने अवसर देखकर पीछे से आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन की सेना तितर-बितर हो गई। अलाउद्दीन तथा शेख सुलेमान किसी प्रकार प्राण बचाकर भागे और पानीपत में आकर शरण ली। उनकी कुछ बिखरी हुई सेना भी यहाँ आकर उनसे मिल गई।

मौलाना जकाउल्ला लिखते हैं कि पानीपत पहुँचकर न जाने अलाउद्दीन ने शेख सुलेमान के साथ ऐसा कौन-सा दाँव खेला कि शेख साहब ने तत्काल तीन-चार लाख रुपये जैसी भारी धनराशि निकालकर उसे भेंट कर दी। उस कोष को लेकर अलाउद्दीन तुरंत पानीपत से रवाना हो गया। यह उल्लेख8 तारीख-ए-हिन्दुस्तान में मौलाना जकाउल्ला द्वारा लिखित भाग-3 के पृष्ठों पर मिलता है।

बाबर और इब्राहिम लोदी का घमासान युद्ध : पानीपत का मैदान, सन् 1526

अब बाबर की कथा सुनिए। जहाँगीर कुली खाँ और अलाउद्दीन आलम खाँ को रवाना करने के बाद बाबर बड़ी तीव्रता से सेना के संगठन और तैयारी में लग गया। उसने शीघ्र ही अफगानिस्तान की समस्याओं का समाधान किया और 12,000 सैनिकों तथा अनेक तोपों को एकत्रित कर लिया। तत्पश्चात् सफर माह, सन् 1525 में वह काबुल से हिन्दुस्तान विजय के उद्देश्य से प्रस्थान कर गया।

24 रबीउल अव्वल, 932 हिजरी को जब वह स्यालकोट पहुँचा, तब उसे आलम खाँ की पराजय का समाचार एक व्यापारी के माध्यम से प्राप्त हुआ। किन्तु बाबर ने इसकी तनिक भी परवाह न की और निरन्तर आगे बढ़ता गया।

उस समय सुल्तान इब्राहिम लोदी आगरा में था। समाचार मिलते ही वह एक लाख सैनिकों की विशाल सेना लेकर बाबर के मुकाबले के लिए चल पड़ा। उसने राज्य का समस्त कोष भी अपने साथ ले लिया, ताकि आवश्यकता पड़ने पर युद्धभूमि में और अधिक सैनिक भर्ती किए जा सकें। इस बात का उल्लेख तारीख-ए-हिन्दुस्तान में मौलाना जकाउल्ला द्वारा लिखित भाग-3 के पृष्ठों पर मिलता है।

जब बाबर अपनी सेना सहित आगे बढ़ता हुआ 12 अप्रैल, 1526 को पानीपत पहुँचा, तब उसने देखा कि वहाँ का विशाल मैदान युद्ध के लिए अत्यन्त उपयुक्त है। उसने नगर की पूर्वी दीवार के नीचे अपनी सेना का पड़ाव डाला। बाबर अपनी तुझुक में लिखता है कि पानीपत इतना विशाल नगर था कि यदि वह अपनी 12,000 सैनिकों की सेना को नगर में ठहराता, तब भी सेना नगर के एक कोने में ही समा जाती।

उधर इब्राहिम लोदी भी बड़े ठाट-बाट के साथ बढ़ता चला आ रहा था। जब वह पानीपत पहुँचा, तब उसने बाबर की सेना को पहले से वहाँ उपस्थित पाया। इब्राहिम लोदी के लाव-लश्कर की शोभा देखने योग्य थी। प्रत्येक सैनिक के पास अत्यन्त चमकदार और दृढ़ शस्त्र-अस्त्र थे। प्रत्येक छोलदारी पर सुनहरे कलश सुशोभित थे। सभी तंबू और छोलदारियाँ अत्यन्त सुसज्जित थीं।

इतिहासकार लिखता है कि ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी खेत में मलमल के थान बिछाकर स्वर्ण के वृक्ष लगा दिए गए हों। सेना में दो हजार अधिकारी थे और प्रत्येक अधिकारी सजे-धजे हाथियों पर आरूढ़ था। सेना के मध्य भाग में सुल्तान इब्राहिम लोदी का हाथी था, जिसे सजाने-सँवारने में कला की समस्त सीमाएँ मानो समाप्त कर दी गई थीं।

संक्षेप में कहा जाए तो वह सेना हिन्दुस्तानी ऐश्वर्य और वैभव का अनुपम उदाहरण थी। बिना अतिशयोक्ति के कहा जा सकता है कि वह कोई सेना नहीं, बल्कि एक भव्य और शानदार बारात प्रतीत होती थी, जिसकी सजावट में धन पानी की तरह बहाया गया था।
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पानीपत का प्रथम युद्ध और इब्राहीम लोदी का अंत

30 अप्रैल 1526 को प्रातः साढ़े चार बजे से युद्ध आरम्भ हुआ। इस जोर का घमासान पड़ा कि पानीपत के मैदान में इस संघर्ष ने आज और कल की ऐसी गाथा रच दी, जिसकी दूसरी मिसाल दुर्लभ है। इब्राहीम के लिये योग्य, वीर और अनुभवी सेना-अधिकारी उपलब्ध थे, परन्तु वह अपनी सेना का सफल संचालन न कर सका। आग की वर्षा उगलने वाले बाबर के तोपखाने के सामने कुछ ही समय में लोदी सेना में भय और आतंक के लक्षण दिखाई देने लगे।

युद्ध अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर चुका था। सेनानायक महमूद खाँ ने इब्राहीम लोदी को सलाह दी कि वे जान बचाकर घोड़े पर बैठकर मैदान छोड़ दें, क्योंकि स्थिति अब नियंत्रण से बाहर हो रही थी। किन्तु इब्राहीम लोदी ने इसे स्वीकार नहीं किया। उसके लिये यह अत्यन्त गौरव और सम्मान का विषय था कि वह अंतिम क्षण तक रणभूमि में डटा रहे।

उसने कहा —
“पतिष्ठा की मृत्यु अपमानजनक जीवन से उत्तम है। सेना के उत्साह को बनाये रखने के लिये मैदान में बने रहना आवश्यक है। क्या यह उचित होगा कि मेरे सैनिक अपने प्राणों की बाज़ी लगाते रहें और मैं अपनी जान बचाकर रणक्षेत्र से भाग जाऊँ? मैं अफगानों के माथे पर कलंक का टीका नहीं लगाऊँगा।”

यह कहकर वह पुनः युद्ध में कूद पड़ा। उसके चारों ओर उसके विश्वस्त सैनिक उसकी रक्षा में डटे रहे। उसने अन्तिम समय तक वीरतापूर्वक बाबर की सेना का सामना किया, किन्तु भाग्य उसका साथ छोड़ चुका था। उसके शरीर पर तलवारों के गहरे घाव और तीरों की चोटें लगीं, और कुछ ही देर बाद वह रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ।

उसकी सेना तितर-बितर हो गई। महमूद खाँ घायल अवस्था में पकड़ा गया। उसका समस्त कोष, हाथी और शाही सामग्री बाबर के अधिकार में आ गई। यह युद्ध दोपहर बारह बजे से पहले ही समाप्त हो गया।

लगभग पाँच घंटे चले इस भयंकर युद्ध में बाबर के कथनानुसार चालीस हजार सैनिक मारे गये। समूचा मैदान लाशों से पट गया था। विजयी बाबर की स्मृति में काबुल बाग आज भी विजय-प्रतीक के रूप में विद्यमान है, जबकि पराजित इब्राहीम लोदी की कब्र आज भी इतिहास-प्रेमियों के लिये पीड़ा और शिक्षा का स्रोत बनी हुई है।

विजय के उपरान्त बाबर लगभग एक सप्ताह तक पानीपत में ठहरा रहा। यहाँ के निवासियों ने उसे श्रद्धाभाव एवं सम्मान के साथ भेंट अर्पित की। इसके बाद जब उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया, तो पानीपत में अपनी ओर से मुहम्मद अली जंगली नामक एक अधिकारी को नियुक्त कर गया।

क्योंकि बाबर को हिन्दुस्तान की कुंजी पानीपत के मैदान में ही प्राप्त हुई थी, इसलिये उसके पश्चात आने वाले लगभग सभी तुर्क और मुगल शासकों ने इस स्थान को शुभ और सौभाग्यशाली माना। यहाँ के नागरिक सदैव विनम्रता और राजभक्ति का व्यवहार करते रहे। जहाँगीर ने भी इस बात का उल्लेख अपनी आत्मकथा “तुजुके-जहाँगीरी” में किया है।
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पानीपत पर बाबर, शेरशाह और मुगल शासन का प्रभाव

पंजाब के राज्यपाल दौलत खाँ लोदी के हाथों पानीपत की तबाही के पश्चात हुमायूँ दिल्ली की राजगद्दी का स्वामी बना। उसी समय बिहार के शासक शेरखाँ ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि वह एक कुशल प्रशासक था, तथापि हुमायूँ के विरुद्ध प्रत्येक मोर्चे पर उसे विजय प्राप्त होती गई। इस उठा-पटक और भाग-दौड़ में हुमायूँ देश की शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं कर सका। वह अपनी जान बचाने के लिये देश की व्यवस्था को छोड़कर इधर-उधर भटकता रहा।

बाबर की मृत्यु के बाद पंजाब का शासक दौलत खाँ लोदी भी विद्रोही हो गया। उसने अवसर पाकर धन-संपत्ति लूटने का प्रयास किया और इसी उद्देश्य से पानीपत पर आक्रमण कर दिया। उस समय नगर के किलों में इतनी संख्या में सैनिक नहीं थे कि वे उसका मुकाबला कर सकते। फलतः नगर को खुला छोड़ दिया गया। यहाँ के अधिकांश नगरवासी अपने घर-बार छोड़कर भाग गये। नगर उजाड़ हो गया और उसमें उल्लुओं के बोलने जैसी वीरानी छा गई।

शेरशाह के शासनकाल में पानीपत की दशा

हुमायूँ शेरशाह के मुकाबले में साहस न दिखा सका और अनेक परेशानियों तथा दुर्दशाओं में अपना सब कुछ छोड़कर इधर-उधर भटकता रहा। अंततः 17 मई 1540 ईस्वी को कन्नौज के युद्ध में शेरशाह ने उसे पराजित कर हिन्दुस्तान की सत्ता अपने हाथों में संभाल ली। इसके पश्चात उसने जिस-जिस नगर की प्रजा भय के कारण अपने घर छोड़कर चली गई थी, उन्हें पुनः अपने नगरों में लौट आने का आश्वासन दिया कि किसी भी व्यक्ति को कोई आपत्ति नहीं होने दी जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा तथा सुख-शांति प्रदान की जाएगी।

उसके इन आश्वासनों को सुनकर पानीपत से भागे हुए नागरिक भी लौटकर आने लगे और कुछ समय पश्चात पहले जैसी चहल-पहल पुनः दिखाई देने लगी।

शेरशाह का शासनकाल देश की उन्नति, व्यापार-वृद्धि, सुख-शांति और न्याय-नीति के लिये प्रसिद्ध माना जाता है। प्रजा को सुख-सुविधाएँ पहुँचाने तथा न्यायपूर्ण शासन देने के लिये उसने विशेष प्रयास किये। इसके अतिरिक्त जनकल्याण के अनेक कार्य भी उसके शासनकाल में सम्पन्न हुए। उसने लंबी-लंबी सड़कों का निर्माण कराया तथा यात्रियों की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर सरायें बनवाईं।

उसने रोहतासगढ़ से लेकर बंगाल तक लगभग दो हजार मील लंबी सड़क का निर्माण कराया। इस सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये गये तथा मार्ग में पड़ने वाले महत्वपूर्ण नगरों को इससे जोड़ा गया। पानीपत राजधानी दिल्ली का द्वार होने के साथ-साथ उत्तर भारत का प्रमुख युद्ध-स्थल भी था। इसी कारण शेरशाह ने विशेष ध्यान देकर इस सड़क को पानीपत से निकाला। वर्तमान समय में भी यह पुरानी सड़क अनेक स्थानों पर दिखाई देती है।

इस स्थान पर सड़क बनवाने का एक कारण यह भी था कि यहाँ विदेशी आक्रमणकारियों के लिये प्रवेश का मार्ग खुला रहता था। इस कारण शेरशाह ने यहाँ एक अत्यंत मजबूत किला बनवाया और उसे इस प्रकार सुरक्षित किया कि पंजाब की ओर से होने वाले आक्रमणों को रोका जा सके। यह किला मुख्य सड़क के समीप स्थित था और सेना की आवाजाही के लिये भी उपयोगी माना जाता था।

इसी प्रकार शेरशाह के शासनकाल में पानीपत ने पुनः अपने महत्व और जीवन्तता को प्राप्त किया तथा नगर में व्यापार, आवागमन और जनजीवन फिर से व्यवस्थित होने लगा।

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शेरशाह सूरी के शासनकाल में सड़क व्यवस्था


Sher Shah Suri ने अपने शासनकाल में यात्रियों की सुविधा के लिए देश भर में लंबी-लंबी सड़कों का निर्माण कराया। उन्होंने एक विशाल सड़क Rohtasgarh Fort से Sonargaon तक लगभग 2000 मील लंबी बनवाई। सोनारगाँव ढाका, बंगाल से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित एक महत्वपूर्ण नगर था। यह परमपुत्र नदी और सेगना नदी के मध्य स्थित था तथा हिंदू राजाओं के शासनकाल में पूर्वी बंगाल के क्षेत्र में आता था। वर्तमान में वहाँ केवल एक साधारण ग्राम अपने पुराने प्रसिद्ध नाम से आबाद है। यह स्थान च्वामो और पानों के लिए प्रसिद्ध था।


इन सड़कों का निर्माण अत्यंत योग्यता और दूरदर्शिता के साथ किया गया था। इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि सड़कें मार्ग में पड़ने वाले सभी महत्वपूर्ण और बड़े नगरों से होकर गुजरें। Panipat दिल्ली का द्वार तथा उत्तरी भारत का प्रमुख युद्धस्थल था, इसलिए शेरशाह सूरी ने आदेश दिया कि यह सड़क पानीपत से होकर निकाली जाए। परिणामस्वरूप यह पुरातन सड़क आज भी पानीपत में दो भागों में दिखाई देती है।


एक मार्ग राव वाला दरवाज़ा, मोहल्ला राजपूतान के पिछवाड़े से होकर Imambara Kalan के सामने से गुजरते हुए लाहौरी दरवाज़े अर्थात बाव फ़ैज़ नवाब सादिक़ मस्जिद तक जाता है। दूसरा मार्ग Shah Vilayat Mazaar के सामने से होकर Dargah Hazrat Bu Ali Shah Qalandar के पश्चिम से गुजरता हुआ किले के नीचे से निकलता है।


इस सड़क के दोनों ओर शेरशाह सूरी ने छायादार वृक्ष लगवाए तथा प्रत्येक दो कोस पर यात्रियों के विश्राम हेतु सराय बनवाईं। प्रत्येक सराय में एक कुआँ और एक मस्जिद होती थी, जहाँ यात्रियों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता था। शेरशाह के विशाल शासनकाल, जो लगभग 1,13,000 परगनों, मंडलों और ग्रामों में फैला हुआ था, में पथिकों और निर्धनों के भोजन पर प्रतिदिन लगभग 500 अशर्फियाँ व्यय की जाती थीं।


शेरशाह सूरी ने सड़क पर प्रत्येक एक कोस की दूरी पर लगभग 24 फ़ीट ऊँची सैकड़ों मीनारें बनवाई थीं। इन मीनारों के माध्यम से डाक व्यवस्था संचालित होती थी और उनकी डाक व्यवस्था अत्यंत उत्कृष्ट मानी जाती थी। प्रत्येक सराय में दो घोड़े नियुक्त रहते थे। इन मीनारों में से दो आज भी पानीपत में विद्यमान हैं—एक नगर से बाहर निकलते ही Ibrahim Lodi Tomb के पास तथा दूसरी तहसील भवन से आगे स्थित है।


इन विशाल सड़कों के निर्माण का एक कारण यह भी था कि विशेषकर पानीपत जैसे क्षेत्रों में कश्मीर और सीमांत प्रांतों के विद्रोहियों को नियंत्रित किया जा सके। इसी उद्देश्य से शेरशाह सूरी ने एक अत्यंत सुदृढ़ किले का निर्माण कराया था, जो पंजाब के अन्य किलों की अपेक्षा अधिक मजबूत माना जाता था। यह किला काबुल जाने वाली सड़क पर स्थित था और यहाँ शेरशाह की भारी सेना तैनात रहती थी। भौगोलिक दृष्टि से वह क्षेत्र, जिसे उस समय पानीपत कहा गया, वर्तमान में पंजाब प्रांत के झेलम क्षेत्र में माना जाता है, जबकि आज का Panipat हरियाणा राज्य में स्थित है।


शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित इन सड़कों पर यात्रियों की सुख-सुविधा और सुरक्षा के लिए अत्यंत उत्तम व्यवस्थाएँ थीं। किसी में इतना साहस नहीं था कि कोई पथिक मार्ग में लुट जाए अथवा किसी निर्धन और निर्दोष व्यक्ति की हत्या हो जाए। बादशाही सेना को भी कठोर आदेश थे कि यात्रा के समय किसी खेत को हानि न पहुँचाई जाए और न ही किसी पौधे की पत्ती तक तोड़ी जाए। स्वयं शेरशाह सूरी यात्रा करते समय सड़क के दोनों ओर दृष्टि रखते थे कि कहीं कोई नुकसान न हो। परिणामस्वरूप सैनिकों द्वारा खेती को भी कोई क्षति नहीं पहुँचाई जाती थी।

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आज़म हुमायूं और सलीम शाह का युद्ध (सन् 1549)


Sher Shah Suri की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र Salim Shah Suri हिंदुस्तान की शासन-सत्ता का स्वामी बना। उसी समय पंजाब के गवर्नर आज़म हुमायूं ने विद्रोह कर नगरों को लूटना आरम्भ कर दिया। उसकी रोकथाम के लिए सलीम शाह ने दिल्ली से एक सेना भेजी।


आज़म हुमायूं भी 20,000 सवारों के साथ मुकाबले के लिए आ पहुँचा। दोनों पक्षों की शक्ति-परीक्षा के लिए पुनः Panipat का रणक्षेत्र निश्चित हुआ। परंतु आज़म हुमायूं के लुटेरे सैनिक शाही सेना के सुशिक्षित और संगठित सैनिकों के सामने अधिक देर तक न टिक सके। वे पूरी तरह पराजित होकर युद्धक्षेत्र में हजारों लाशें छोड़कर भाग गए।


सलीम शाह के सेनापति ने इस विजय की स्मृति में एक चबूतरे का निर्माण कराया, जिसका नाम “विजय मैदान” रखा गया। इसके पश्चात वह राजधानी दिल्ली लौट आया और सलीम शाह को विजय का शुभ समाचार सुनाया।


इस भीषण पराजय से आज़म हुमायूं सर्वथा टूट गया। Panipat रजिस्टर के वर्णनानुसार यह युद्ध नगर पानीपत से लगभग चार मील उत्तर दिशा में स्थित गाँव शिमला में हुआ था। पराजय के बाद आज़म हुमायूं पानीपत छोड़कर कश्मीर भाग गया, जहाँ बाद में एक अन्य युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई।


पानीपत की यह निर्णायक लड़ाई, जिसने पंजाब के गरीब नागरिकों को आज़म हुमायूं के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई 1549 में लड़ी गई थी.

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पानीपत की महान लड़ाई : हेमू और अकबर का निर्णायक संघर्ष (1556 ई.)


सन् 1555 ई. में ईरान के बादशाह की सहायता प्राप्त कर हुमायूं ने पुनः हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया और शेरशाह सूरी के दुर्बल उत्तराधिकारियों से शीघ्र ही सत्ता छीन ली। परन्तु भाग्य को कुछ और ही स्वीकार था। हुमायूं इस विजय के केवल छह मास पश्चात ही मृत्यु के मुख में समा गया। उस समय उसका पुत्र जलालुद्दीन अकबर, जिसकी आयु मात्र चौदह वर्ष थी, कलानौर में ठहरा हुआ था। पिता की मृत्यु के उपरान्त वह राजगद्दी पर बैठा, किन्तु वह अनुभवहीन बालक था और सम्पूर्ण देश विरोधियों से भरा पड़ा था।


उधर हेमचन्द्र नामक एक बनिया, जो जाति से ढोंसर था और सामान्य व्यक्ति दिखाई देने वाला छोटे कद का युवक था, कभी रेवाड़ी की गलियों में सिर पर टोकरी रखकर नमक बेचा करता था। किन्तु वह अत्यन्त दृढ़ निश्चयी, परिश्रमी और पुरुषार्थी व्यक्ति था। धीरे-धीरे उन्नति करते हुए वह सुल्तान मुहम्मद शाह आदिल का मंत्री तथा सेनापति बन गया। अब उसके गुण प्रकट हुए। वह वीरता और प्रबंध-व्यवस्था में अत्यन्त निपुण सिद्ध हुआ। जिधर भी सेना लेकर जाता, विजय प्राप्त करता।


उधर बादशाह आदिलशाह स्वभाव से अत्यन्त दुर्बल, विलासी, अत्याचारी और भोग-विलास में डूबा रहने वाला व्यक्ति था। शासन-प्रबन्ध का सम्पूर्ण भार उसने हेमचन्द्र पर छोड़ दिया और स्वयं रंगरलियों में निमग्न रहने लगा। इतिहासकारों ने उसके दुर्गुणों का विस्तृत उल्लेख किया है। चतुर और दूरदर्शी हेमू ने जब देखा कि हुमायूं का चौदह वर्षीय बालक उत्तराधिकारी बना है, तब उसने निश्चय किया कि उससे हिन्दुस्तान की सत्ता छीन लेना कोई कठिन कार्य नहीं।


उस समय हेमू बंगाल में था। वहाँ से वह पचास हजार अनुभवी घुड़सवार, एक हजार हाथी तथा पाँच सौ तोपें लेकर अकबर से युद्ध करने चला। उसने बिना किसी विशेष संघर्ष के आगरा पर अधिकार कर लिया और फिर युद्ध करते हुए दिल्ली को भी जीत लिया।


उस समय अकबर जालंधर में था। इन घटनाओं का समाचार सुनकर वह अत्यन्त चिंतित हुआ। जब सेना की गणना की गई तो उसकी संख्या केवल बीस हजार निकली। यह देखकर सेना-नायकों ने परामर्श दिया कि हेमू जैसा प्रबल शत्रु शीघ्र ही यहाँ पहुँचने वाला है। उससे युद्ध करना जान-बूझकर मृत्यु को बुलाना है। अतः शीघ्रता से काबुल लौट चलना चाहिए और अधिक सेना संगठित कर अगले वर्ष युद्ध करना चाहिए।


किन्तु अकबर के संरक्षक और गुरु बैरम खान ने कहा—

“जिस देश को हमने दो बार कठिनाइयों के बाद प्राप्त किया है, उसे भयवश छोड़ देना कायरता होगी। या तो हम मर जाएँगे अथवा दिल्ली पर पुनः विजय प्राप्त करेंगे। यदि हम हेमू से भयभीत होकर भाग गए तो संसार में अपमान होगा; और यदि युद्ध में मारे गए तो वीर कहलाएँगे।”


अकबर यद्यपि बालक था, किन्तु साहसी और दृढ़ निश्चयी था। उसने कहा—

“हाँ खान बाबा, आपने सत्य कहा। मैं आपके साथ हूँ और युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राण दे दूँगा।”


इन शब्दों ने सेना में भी नया उत्साह भर दिया और मुगल सेना दिल्ली की ओर बढ़ चली।


उधर हेमू पहले से ही युद्ध की तैयारी कर चुका था। उसने निश्चय किया कि पानीपत का विशाल मैदान अकबर को पराजित करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रहेगा। उसने अपना भारी तोपखाना पहले ही पानीपत भेज दिया और विचार किया कि जब तक तोपें व्यवस्थित होंगी, तब तक वह मुख्य सेना सहित पहुँच जाएगा। किन्तु उससे एक भारी भूल हो गई। उसने तोपखाने की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सेना साथ नहीं भेजी।


इधर अकबर ने अली कुली खाँ शैबानी को अग्रिम सेना देकर आगे रवाना किया। जब अली कुली खाँ पानीपत पहुँचा तो उसने देखा कि मैदान में तोपें तो बड़ी व्यवस्थित ढंग से लगी हुई हैं, परन्तु उनकी रक्षा के लिए सेना का नामोनिशान नहीं है। उसने तुरंत आक्रमण कर सम्पूर्ण तोपखाने पर अधिकार कर लिया। तोपों के साथ आए सैनिक भाग खड़े हुए। यह समाचार सुनते ही हेमू को गहरा आघात पहुँचा, किन्तु उसने साहस नहीं छोड़ा और तत्काल सेना लेकर पानीपत की ओर प्रस्थान किया।


अकबर 5 नवम्बर 1556 को पानीपत पहुँचा। वहाँ आठ दिनों तक युद्ध की तैयारियाँ होती रहीं। अन्ततः 13 नवम्बर 1556 का वह ऐतिहासिक दिन आया, जब दोनों महान शक्तियों का भाग्य निर्णीत होना था।


प्रातःकाल से युद्ध आरम्भ हो गया। हेमू ने अपनी सेना का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया था। वह इससे पूर्व बाईस युद्धों में विजयी हो चुका था। सबसे आगे उसने अपने विशाल और प्रशिक्षित जंगी हाथियों को रखा। इतिहासकारों ने इन हाथियों की अद्भुत शक्ति का वर्णन किया है। कहा जाता है कि वे भवनों को धक्का देकर गिरा देते थे और विशाल वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकते थे। युद्धभूमि में वे सैनिकों और घोड़ों को सूँड में पकड़कर पटक देते थे। प्रत्येक हाथी पर धनुर्धर बैठे थे, जो निरन्तर तीर-वर्षा कर रहे थे।


इन पाँच सौ हाथियों के पीछे समस्त सेना को तीन भागों में विभाजित किया गया था और प्रत्येक भाग अनुभवी सेनानायकों को सौंपा गया था। सेना के प्रमुख अधिकारी विशाल हाथियों पर आरूढ़ थे और सैनिक युद्ध-कला में दक्ष थे।


जब इन हाथियों ने प्रचण्ड वेग से मुगल सेना पर आक्रमण किया तो अकबर की सेना के अनेक वीर सैनिक मारे गए। घोड़े हाथियों के सामने टिक नहीं पा रहे थे और पीछे हटने लगे। किन्तु मुगल सैनिकों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। वे घोड़ों से उतर पड़े और पैदल ही तलवारें लेकर हेमू की सेना पर टूट पड़े।


युद्ध अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर चुका था। चारों ओर रक्तपात, चीख-पुकार और मृत्यु का ताण्डव था। हजारों सैनिकों की लाशें धरती पर बिखरी पड़ी थीं। उसी समय हेमू अपने विशाल हाथी पर सवार होकर बैरम खान की ओर बढ़ा, जो सेना के मध्य भाग में खड़ा सैनिकों का संचालन कर रहा था। तभी अचानक एक तीर आकर हेमू की आँख में लगा और मस्तिष्क को चीरता हुआ निकल गया। हेमू मूर्छित होकर हाथी पर ही गिर पड़ा।


जब उसकी सेना ने अपने सेनानायक को इस अवस्था में देखा तो उसका साहस टूट गया और वह भागने लगी। यह देखकर मुगल सैनिकों ने भागती हुई सेना पर भयंकर प्रहार किया। असंख्य सैनिक मारे गए और अनेक बंदी बना लिए गए। लगभग पन्द्रह सौ हाथी, अपार धन-सम्पत्ति तथा हीरे-जवाहरात अकबर के हाथ लगे।


यह विजय अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। इसी के परिणामस्वरूप तैमूर वंश की जड़ें हिन्दुस्तान में स्थायी रूप से जम गईं।


युद्ध समाप्त होने के पश्चात शाह कुली खाँ हेमू को बंदी बनाकर अकबर के समक्ष लाया। अकबर ने उससे अनेक बातें करनी चाहीं, किन्तु वह मौन रहा। तब बैरम खान ने अकबर से कहा—

“हुजूर, इस शत्रु का सिर अपने हाथों से काट दीजिए।”


अकबर ने उत्तर दिया—

“बंधे हुए शत्रु पर तलवार चलाना वीरता नहीं है। यह कार्य मैं नहीं कर सकता।”


तब बैरम खान ने स्वयं तलवार का एक प्रहार कर हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया और इस प्रकार इस भीषण युद्ध का अन्त हुआ। कहा जाता है कि हेमू का सिर काबुल भेजा गया और धड़ दिल्ली के द्वार पर लटकाया गया, जिससे लोग उसे देखकर भयभीत हों।


युद्धभूमि में जिस स्थान पर अकबर ने अपना तम्बू लगाया था, वह सड़क के किनारे स्थित था। विजय की स्मृति में अकबर ने वहाँ यात्रियों के विश्राम हेतु एक भव्य सराय बनवाने की आज्ञा दी। यद्यपि वह सराय अब विद्यमान नहीं है, किन्तु उसके टूटे हुए विशाल द्वार आज भी घरौंडा के निकट उत्तर दिशा में स्थित हैं और उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति को जीवित किए हुए हैं।


पानीपत और उसके आसपास की भूमि मानव-रक्त से रंजित हो उठी थी। मीलों तक फैली धरती वीर सैनिकों की कब्रगाह बन गई थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो उस भूमि का प्रत्येक कण किसी न किसी योद्धा की अस्थियों को अपने भीतर समेटे हुए है।


यह विवरण “पानीपत की दूसरी लड़ाई” शीर्षक से अंग्रेज़ी लेखक शेख रहीमुद्दीन साहिब द्वारा लिखित तथा मासिक पत्र रहनुमाए तालीम, लाहौर में भी प्रकाशित हो चुका है।

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इब्राहिम मिर्ज़ा द्वारा पानीपत की लूट


सन् 1573–74 ईस्वी में इब्राहिम मिर्ज़ा नामक एक सरदार ने बादशाह अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और बड़ौदा पर अधिकार कर लिया। यह व्यक्ति मुहम्मद सुल्तान मिर्ज़ा, हवाई ख़ुरासान की संतानों में से था और ख़ुरासान से भागकर हिन्दुस्तान में आकर रहने लगा था। जब अकबर ने सेना लेकर उस पर चढ़ाई की, तो वह वहाँ से भाग निकला। इसके बाद वह हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रदेशों में भटकता फिरा। जहाँ भी गया, वहाँ लूटमार, कत्लेआम और अत्याचार का बाज़ार गर्म कर दिया तथा नगरों को उजाड़ता हुआ आगे बढ़ता रहा।


इसी प्रकार भटकते-भटकते वह पानीपत आ पहुँचा। सन् 1574 में इब्राहिम मिर्ज़ा ने पानीपत में प्रवेश किया। उस समय नगर अत्यन्त समृद्ध, खुशहाल और भव्य था। इस अत्याचारी ने जहाँ तक उसका बस चला, नगर को खूब लूटा और दो-तीन दिनों में भारी विनाश कर डाला। शाही सेना निरन्तर उसका पीछा कर रही थी। जब मिर्ज़ा को सेना के निकट पहुँचने का समाचार मिला, तो वह पंजाब की ओर भाग गया, परन्तु वहाँ मानो मृत्यु उसका इंतजार कर रही थी। सतलुज नदी तक पहुँचते-पहुँचते युद्ध के दौरान एक तीर उसकी आँख में आ लगा और उसी आघात के कारण कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई।



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मुगल बादशाहों का पानीपत आगमन


अकबर के काल के बाद जितने भी मुगल बादशाह युद्ध अथवा सैर-सपाटे के लिए पंजाब, कश्मीर अथवा उत्तर-पश्चिम की ओर जाते रहे, वे प्रायः पानीपत के मार्ग से ही होकर गुजरे और यहाँ ठहरते भी रहे। इस तथ्य का उल्लेख इतिहासकारों ने अनेक स्थानों पर किया है। इससे स्पष्ट होता है कि पानीपत केवल युद्धभूमि ही नहीं, बल्कि साम्राज्य के आवागमन का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी था।



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सड़क-ए-आज़म की मरम्मत और देखरेख


शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित विशाल सड़क, जो पानीपत से होकर गुजरती थी, जहांगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में निरन्तर मरम्मत, संशोधन और देखरेख के अधीन रही। इस मार्ग पर प्रत्येक एक कोस की दूरी पर मीनारें स्थापित थीं, जिनका निर्माण शेरशाह सूरी ने करवाया था। साथ ही यात्रियों के विश्राम हेतु अनेक सरायें भी बनवाई गई थीं।


समय के साथ इनमें कुछ टूट-फूट हो गई थी। सन् 1619 में जहांगीर ने आदेश दिया कि इस सड़क पर और अधिक छायादार वृक्ष लगाए जाएँ, टूटी हुई मीनारों की मरम्मत कराई जाए तथा जर्जर सरायों को पुनः ठीक कराया जाए। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तीन कोस पर एक कुआँ बनवाने की भी आज्ञा दी गई। इस आदेश का पालन किया गया।


जो सराय अकबर ने अपने पड़ाव-स्थल पर बनवाई थी, वह अब अस्तित्व में नहीं रही। बाद में शाहजहाँ के समय सन् 1634 में खान फ़िरोज़ की देखरेख में सड़क तथा उससे सम्बद्ध निर्माणों की पुनः मरम्मत कराई गई। इन कार्यों का उल्लेख तत्कालीन इतिहास ग्रंथों तथा करनाल गज़ेटियर आदि में भी मिलता है।



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शहज़ादा ख़ुसरू द्वारा पानीपत की लूट तथा जहांगीर का आगमन


सन् 1606 में शहज़ादा ख़ुसरू मिर्ज़ा ने अपने पिता सम्राट जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और पंजाब क्षेत्र में लूटपाट तथा मारकाट मचा दी। उसने ग्राम नरेला को जलाया और पानीपत पहुँचकर नगर को भी खूब लूटा।


जब सम्राट जहांगीर विद्रोही पुत्र का पीछा करते हुए पानीपत पहुँचा, तब नगरवासी अपनी फरियाद लेकर उसके सामने उपस्थित हुए। इस पर जहांगीर ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि भाग्य ने उस नगर को भी लूट से नहीं बचाया, जो उसके पूर्वजों के लिए अत्यन्त शुभ सिद्ध हुआ था और जहाँ उसके पिता तथा दादा ने महान विजयों को प्राप्त किया था।


जहांगीर ने नगरवासियों को आश्वस्त किया कि उनका जो भी नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई राजकोष से कराई जाएगी। साथ ही उसने आदेश दिया कि काबुली बाग मस्जिद में नियमित रूप से जुमे की नमाज़ अदा की जाए। यह परम्परा लंबे समय तक चलती रही। बाद में मराठों के अधिकारकाल में कुछ समय के लिए इसमें बाधा आई, किन्तु शांति स्थापित होने पर पुनः जुमे की नमाज़ आरम्भ हो गई।



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नवाब मुकर्रब ख़ाँ — पानीपत के रईस-ए-आज़म


उमराए-जहांगीरी में नवाब मुकर्रब ख़ाँ अत्यन्त योग्य, प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध व्यक्ति माने जाते थे। वे मखदूम जलालुद्दीन कबीर-उल-औलिया की संतानों में से थे। उन्होंने अपने निवास हेतु कैराना में भव्य भवन बनवाए थे। सम्राट जहांगीर के दरबार में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी।


एक बार उन्होंने सम्राट जहांगीर को अपने निवास पर भोजन हेतु आमंत्रित किया। जहांगीर उनकी मेहमाननवाज़ी से अत्यन्त प्रसन्न हुआ और स्वयं आगरा से कैराना पहुँचकर उनका आतिथ्य स्वीकार किया। अपनी आत्मकथा में जहांगीर ने उल्लेख किया है कि उसने हिन्दुस्तान में पिस्ते का वृक्ष केवल मुकर्रब ख़ाँ के बाग में देखा, जबकि यह वृक्ष सामान्यतः हिन्दुस्तान में नहीं पाया जाता। इसके अतिरिक्त वहाँ तीन सौ सरू (सरो) के वृक्ष भी थे, जिससे उस बाग की विशालता और भव्यता का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।


जब नवाब मुकर्रब ख़ाँ के पिता हकीम शेख बीना का देहांत हुआ, तब उन्होंने पानीपत में हजरत बू अली शाह कलंदर की दरगाह के समीप उनका मकबरा बनवाया। इस मकबरे में संगमरमर तथा अनेक मूल्यवान पत्थरों का उपयोग किया गया। बाद में स्वयं नवाब मुकर्रब ख़ाँ भी इसी मकबरे में दफन किए गए। उनकी कब्र संग-ए-जहरमोहरा नामक दुर्लभ पत्थर से निर्मित बताई जाती है, जिसे अत्यन्त अनोखा और मूल्यवान माना जाता है।



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दरगाह हजरत बू अली शाह कलंदर का निर्माण


नवाब मुकर्रब ख़ाँ के पुत्र नवाब रिज़क़ अल्लाह ख़ाँ ने सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर के शासनकाल में पानीपत में वह भव्य भवन बनवाया, जो आज भी हजरत बू अली शाह कलंदर की दरगाह के नाम से नगर के मध्य स्थित है और जहाँ विशेष तथा सामान्य सभी वर्गों के लोग जियारत के लिए आते हैं।


नवाब रिज़क़ अल्लाह ख़ाँ ने दरगाह के निर्माण में कसौटी के दो अद्वितीय स्तंभ लगवाए, जिनके समान स्तंभ संसार में अन्यत्र दुर्लभ माने जाते हैं। कहा जाता है कि ये स्तंभ नवाब मुकर्रब ख़ाँ को दक्षिण भारत के किसी द्वीप में प्राप्त हुए थे।


दरगाह का विशाल आन्तरिक प्रांगण, चारों ओर बने हुए अनेक कक्ष, लाल पत्थर की खूबसूरत मस्जिद, हौज़ और कुआँ — यह सब नवाब रिज़क़ अल्लाह ख़ाँ द्वारा सन् 1661 में निर्मित कराया गया। पानीपत में होने वाले अनेक बड़े इस्लामी जलसे प्रायः इसी दरगाह के आन्तरिक सहन में आयोजित होते रहे हैं। दरगाह का शेष भवन भी उन्हीं के द्वारा बनवाया गया था।

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पानीपत में बंदा सिंह बहादुर बैरागी का आगमन


लगभग दो सौ वर्षों तक अत्यन्त वैभव और प्रभुत्व के साथ हिन्दुस्तान पर शासन करने के पश्चात मुगल साम्राज्य अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक आते-आते दुर्बल और जर्जर होने लगा था। शासन की कमजोरी अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी और पंजाब क्षेत्र में सिख पंथ तीव्र गति से उभर रहा था। गुरु गोबिंद सिंह के शिष्य बंदा सिंह बहादुर ने सन् 1709 में पानीपत से सरहिंद तक तथा सहारनपुर और मुज़फ्फरनगर से लगे क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया और इस सम्पूर्ण भूभाग में अपना शासन कायम कर दिया।


इसी काल में पानीपत की धरती पर बंदा सिंह बहादुर बैरागी और मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम के मध्य संघर्ष हुआ। परिस्थिति उस समय अत्यन्त गंभीर हो गई थी, क्योंकि पानीपत से सरहिंद तक का अधिकांश क्षेत्र बंदा सिंह बहादुर के अधिकार में आ चुका था। उस समय बादशाह बहादुर शाह प्रथम नौरोज़ के उत्सव से निवृत्त हुआ ही था कि उसने मुहम्मद मुनव्वर ख़ाँ, रुस्तम दिल ख़ाँ और चूरामन जाट के नेतृत्व में एक विशाल सेना संगठित कर बंदा बहादुर के विरुद्ध प्रस्थान किया।


उधर सिखों की ओर से भी लगभग तीस हज़ार घुड़सवार और बड़ी संख्या में सैनिक युद्धभूमि में उतरे। पानीपत की धरती एक बार फिर रक्तरंजित हो उठी। आग और रक्त की धाराएँ पुनः बहने लगीं। अत्यन्त भीषण संघर्ष के पश्चात अंततः बंदा बैरागी को पराजय का सामना करना पड़ा और सन् 1710 में वे इस क्षेत्र को छोड़कर चले गए।



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नवाब ख़ाँ सादिक़ का पानीपत आगमन


इस युद्ध के कुछ समय पश्चात पानीपत ने पुनः उन्नति, समृद्धि और चहल-पहल का युग देखा। ख्वाजा मलिक अंसारी की चौदहवीं पीढ़ी में नवाब शम्सुद्दौला ख़ाँ सादिक़ अत्यन्त प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध अमीर हुए। वे अंतिम दौर के मुगल सम्राटों — बहादुर शाह प्रथम, जहाँदार शाह, फ़र्रुख़सियर, मुहम्मद शाह तथा अहमद शाह बहादुर के शासनकाल में विभिन्न उच्च पदों पर नियुक्त रहे।


उन्होंने अपने पूर्वजों की जन्मभूमि पानीपत की शोभा, आबादी और वैभव को बढ़ाने में अत्यन्त उदारतापूर्वक धन व्यय किया। नगर में अनेक विशाल, पक्के और भव्य भवनों तथा मस्जिदों का निर्माण कराया, जो आज भी उनकी निर्माण-कला और दृढ़ संकल्प की स्मृति को जीवित रखते हैं। यद्यपि इनमें से अनेक भवन काल के प्रभाव से ध्वस्त हो चुके हैं, कुछ खंडहर अवस्था में विद्यमान हैं और कुछ धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।


नवाब ख़ाँ सादिक़ ने एक सुंदर नगर की आधारशिला रखी, जिसका नाम “शहर सादिक़” रखा गया। इसमें अपने भाइयों, वंशजों और परिवार के निवास हेतु शानदार महल, विशाल भवन, मनोहर बाग-बगीचे, कुएँ तथा फव्वारों का निर्माण कराया गया। सम्पूर्ण नगर के चारों ओर एक मजबूत चारदीवारी भी बनवाई गई।


आज उस नगर के अवशेष केवल इक्कीस मस्जिदों, कुछ टूटे-फूटे भवनों, जर्जर द्वारों और ऊँचे टीलों के रूप में दिखाई देते हैं। यह क्षेत्र जैन हाई स्कूल के पीछे से लेकर इब्राहिम लोदी का मकबरा तक विस्तृत माना जाता है। वर्तमान का मोहल्ला बगीचा भी उसी नगर की भूमि पर बसा हुआ है।


समय के साथ “शहर सादिक़” इतिहास का विषय बन गया, परन्तु नवाब सादिक़ द्वारा निर्मित कुछ भवन आज भी पानीपत नगर के भीतर विद्यमान हैं। निरन्तर मरम्मत और देखरेख के कारण वे अभी तक अच्छी अवस्था में हैं।


इन भवनों में एक प्रमुख भवन वह मदरसा है, जो हजरत बू अली शाह कलंदर की दरगाह से सटा हुआ पश्चिम दिशा में स्थित है। इसी भवन के प्रांगण में ख़ाँ सादिक़ और उनके संबंधियों की कब्रें बनी हुई हैं। इस भवन का निर्माण नवाब शाह ने सन् 1136 हिजरी में करवाया था। इसके निर्माण से सम्बद्ध शिलालेख में नवाब शम्सुद्दीन शाह बहादुर का नाम भी अंकित बताया जाता है।


वर्तमान समय में इस भवन में मुस्लिम हाई स्कूल की एक शाखा संचालित है। इसकी मरम्मत, सफाई और संरक्षण का कार्य नवाब नासिर अहमद ख़ाँ साहब, हजरत कलंदर साहब की दरगाह की मुआफ़ी से प्राप्त आय द्वारा करवाते रहे हैं। उनके प्रयासों से भवन में एक बड़े कक्ष की वृद्धि भी की गई।


इसी भवन से सम्बद्ध हजरत कलंदर साहब की दरगाह का बाहरी चौक और नक्कारखाना भी उल्लेखनीय है। इसकी तिथि एक सार्थक वाक्य “दरजहाँ को सरफ़राज़ सादिक़” से निकलती है, जिसका भावार्थ यह है कि सादिक़ ने हजरत अली शाह कलंदर के नाम को संसार में प्रतिष्ठा प्रदान की।


नवाब साहब द्वारा निर्मित एक अन्य महत्वपूर्ण भवन मस्जिद है, जिसे उन्होंने अपने निजी निवास-भवनों के निकट, पानीपत नगर के भीतर, मुहल्ला अंसार की पुरानी सड़क — जी.टी. रोड — के किनारे बनवाया था। यह स्थान आज “महल सराय” के नाम से प्रसिद्ध है।

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पानीपत में नादिरशाह का आक्रमण, मुगल सत्ता का पतन और भीषण रक्तपात


18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य अपनी दुर्बलता की चरम अवस्था में पहुँच चुका था। इसी समय सन् 1739 में फारस का शासक नादिरशाह ईश्वरीय प्रकोप के समान हिन्दुस्तान पर टूट पड़ा। हिन्दुस्तान उस समय “सोने की चिड़िया” के नाम से प्रसिद्ध था। नादिरशाह ने विचार किया कि इस सोने की चिड़िया को पकड़कर इसके मुख से हीरे-जवाहरात निकलवाए जाएँ। वह बिजली और आँधी की गति से हिन्दुस्तान की ओर बढ़ा, जबकि मुगल बादशाह मुहम्मद शाह अत्यन्त शिथिलता और अव्यवस्था की दशा में दिल्ली से चला। उसकी गति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि दो महीनों में वह केवल चार-चार मंजिलें ही तय कर पाया।


जब मुहम्मद शाह पानीपत से गुजरकर करनाल पहुँचा, उसी समय नादिरशाह भी वहाँ आ पहुँचा। मुगल सेना का समस्त तोपखाना तथा रसद अवध के सूबेदार बरहान-उल-मुल्क सआदत खाँ के पास था, जो पानीपत में सेना की तैयारी और व्यवस्था में लगा हुआ था। जैसे ही उसे समाचार मिला कि नादिरशाह करनाल तक पहुँच चुका है, वह तुरंत सेना सहित मुहम्मद शाह की सहायता के लिए रवाना हुआ।


बरहान-उल-मुल्क अभी पानीपत से कुछ ही दूर निकला था कि उसकी मुठभेड़ नादिरशाह की सेना के एक दस्ते से हो गई। उसने बिना विलम्ब किए तत्काल आक्रमण कर दिया। युद्ध दो घंटे तक बड़े जोर-शोर से चलता रहा, परन्तु अंततः बरहान-उल-मुल्क पराजित होकर बंदी बना लिया गया और नादिरशाह के सामने प्रस्तुत किया गया। सौभाग्य से उसका सिर तत्काल नहीं काटा गया।


बरहान-उल-मुल्क के साथ भारी मात्रा में अनाज तथा पूरा तोपखाना भी था, जिसे उसने पानीपत में बादशाही सेना के लिए एकत्र किया था। यह समस्त रसद और तोपखाना नादिरशाह के हाथ लग गया। उधर मुहम्मद शाह की सेना इसी रसद की आशा में बैठी थी। परिणामस्वरूप सेना में भयंकर अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। खाने-पीने की वस्तुएँ इतनी दुर्लभ हो गईं कि एक रुपये में केवल पाव भर आटा मिलता था। भूख से त्रस्त सेना अधिक समय तक टिक न सकी और अंततः हथियार डाल दिए गए। 15 फ़रवरी 1739 को मुहम्मद शाह ने नादिरशाह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।


इसके पश्चात नादिरशाह और मुहम्मद शाह की संयुक्त सेनाएँ पानीपत के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ीं। दिल्ली पहुँचकर नादिरशाह ने जिस प्रकार का भयंकर नरसंहार और लूटपाट करवाई, वह भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिनी जाती है।



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पानीपत में मुगल बादशाह का राज्याभिषेक


पानीपत की एक विशेषता यह भी रही कि तैमूरिया वंश के एक बादशाह का राज्याभिषेक यहीं सम्पन्न हुआ। सन् 1748 में लगभग तीस वर्षों तक शासन करने के बाद मुगल सम्राट मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई। उस समय उसका पुत्र मिर्जा अहमद पंजाब में सेना सहित गया हुआ था। जब वह वापस लौटते हुए पानीपत पहुँचा, तभी उसे अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला।


इसके बाद 15 अप्रैल 1748 को पानीपत में ही मिर्जा अहमद ने “अबुल नसर मुजाहिदुद्दीन अहमद शाह” की उपाधि धारण कर राजगद्दी संभाली। यहीं पर वे सभी शाही रस्में सम्पन्न की गईं जो किसी नए मुगल बादशाह के राज्यारोहण के समय की जाती थीं।



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सन् 1756 : पानीपत पर अचानक संकट


सन् 1756 में पानीपत पर एक विचित्र और भयावह संकट टूट पड़ा। उस समय दिल्ली दरबार की एक सेना, जिसे “सीन-दाग रिशाला” कहा जाता था, कई महीनों से वेतन न मिलने के कारण विद्रोह पर उतारू थी। सैनिकों ने दिल्ली के प्रधानमंत्री गाज़ीउद्दीन खाँ से वेतन की माँग की, परन्तु उसने धनाभाव का बहाना बनाकर कहा कि “परगना पानीपत तुम्हें वेतन के बदले दिया जाता है, वहाँ जाकर जैसे भी हो, अपना वेतन वसूल कर लो।”


इतना आदेश मिलते ही वह सेना पानीपत आ पहुँची और नगर में डेरा डाल दिया। इसके बाद लूटपाट, अत्याचार और उत्पीड़न का ऐसा दौर शुरू हुआ कि चार महीनों तक पानीपत के नागरिक असहनीय कष्ट झेलते रहे। लोगों ने अपना धन-संपत्ति तक सौंप दी, परन्तु फिर भी उन्हें शांति नहीं मिली।


जब पीड़ित नागरिक दिल्ली पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई, तब वज़ीर ने कुतुब शाह रोहेला को सैनिकों सहित पानीपत भेजा और आदेश दिया कि सीन-दाग रिशाले को नगर से बाहर निकाल दिया जाए। कुतुब शाह के पहुँचते ही दोनों पक्षों में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया।



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आलमगीर सानी के वज़ीर का पानीपत में अपमान


इसी अशांति के बीच आलमगीर द्वितीय को साथ लेकर वज़ीर गाज़ीउद्दीन खाँ पानीपत पहुँचा। उसका उद्देश्य पंजाब की ओर बढ़कर लाहौर पर अधिकार करना था, जहाँ उस समय अहमद शाह अब्दाली के प्रतिनिधि का शासन था।


जब बादशाह और वज़ीर पानीपत पहुँचे, तब सीन-दाग रिशाले के सैनिकों ने अवसर देखकर वज़ीर को बंदी बना लिया। सैनिकों ने क्रोधित होकर कहा— “हमसे तो कहा गया था कि पानीपत से अपना वेतन वसूल करो, और अब हमारे ऊपर सेना भेज दी गई।”


इसके बाद सैनिकों ने वज़ीर की टाँगें पकड़कर उसे पानीपत की गलियों और बाजारों में घसीटा। उसका शरीर लहूलुहान हो गया, कपड़े फट गए और पगड़ी तक उतर गई। हाथों की कोहनियाँ छिल गईं, किन्तु वह लगातार सैनिकों को गालियाँ देता रहा। जनता वज़ीर के अत्याचारों से इतनी तंग आ चुकी थी कि किसी ने भी उसे बचाने का प्रयास नहीं किया।


जब उसकी मृत्यु निकट प्रतीत होने लगी, तब किसी ने बादशाह को यह समाचार दिया। बादशाह ने तत्काल आदेश भिजवाया कि वज़ीर को छोड़ दिया जाए और सैनिकों का बकाया वेतन दरबार से दिया जाएगा। तब जाकर उसकी जान बच सकी।


परन्तु अपनी सेना में लौटते ही अपमान से क्रोधित वज़ीर ने आदेश दिया कि सीन-दाग रिशाले का कोई भी सैनिक जीवित न छोड़ा जाए। इसके बाद सैनिकों का निर्मम संहार आरम्भ हुआ। पानीपत की गलियाँ, मोहल्ले और बाजार लाशों से भर गए तथा रक्त पानी की तरह बहने लगा। यह नरसंहार तब तक चलता रहा जब तक सीन-दाग रिशाला लगभग पूर्णतः समाप्त नहीं हो गया।



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पानीपत का सबसे अधिक रक्तपात वाला युद्ध


पानीपत का इतिहास अनेक युद्धों और रक्तपात से भरा हुआ है, किन्तु यहाँ जो महायुद्ध लड़ा गया, उसे हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे भयंकर और रक्तरंजित युद्ध माना जाता है। इतनी विशाल सेनाओं का आमने-सामने आना, इतनी व्यापक मारकाट, और एक ही मैदान में इतनी अधिक लाशों का ढेर इससे पूर्व शायद ही कभी देखा गया था।


दोनों सेनाओं ने अद्भुत साहस, वीरता और प्राणपण से युद्ध किया। विशाल सैन्य बल, असंख्य हथियार, भव्य युद्ध-सज्जा और विनाशकारी परिणाम— इन सभी ने इस युद्ध को भारतीय इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में स्थान दिया। हारने वाले पक्ष की जो दुर्दशा हुई, उसका उदाहरण इतिहास में विरल है। पानीपत की धरती इस महाविनाश की साक्षी बनी, जिसने उत्तर भारत की राजनीतिक दिशा ही बदल दी।

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पानीपत की तीसरी लड़ाई


जब तीसरी पानीपत की लड़ाई का समय आया, तब भारत में मुगल शासन अत्यन्त दुर्बल हो चुका था। दिल्ली के बादशाह केवल नाममात्र के शासक रह गए थे और विभिन्न प्रान्तों में शक्तिशाली सरदार अपने-अपने अधिकार स्थापित करने लगे थे। दक्षिण भारत में मराठा शक्ति तीव्र गति से उभर रही थी। धीरे-धीरे मराठों ने उत्तर में अटक से लेकर दक्षिण में सागर तक अपने प्रभाव का विस्तार कर लिया और अनेक राज्यों से कर वसूल करना आरम्भ कर दिया।


सन् 1758 में मराठों ने पानीपत पर आक्रमण कर उस पर अधिकार प्राप्त कर लिया। इस आक्रमण के दौरान नगर और उसके आसपास के क्षेत्र में भारी लूटमार तथा विनाश हुआ। इसके बाद मराठा सेना आगे बढ़ी और पंजाब के अनेक भागों में भी व्यापक तबाही मचाई।


उधर, अहमद शाह अब्दाली, जो नादिरशाह की मृत्यु के बाद अफगानिस्तान और ईरान का शक्तिशाली शासक बन चुका था, उसने पंजाब की ओर प्रस्थान किया। लाहौर पर अधिकार करने के पश्चात वह दिल्ली की ओर बढ़ा। उस समय दिल्ली में तैमूर वंश के दुर्बल शासक शासन कर रहे थे, जो उसका सामना करने में असमर्थ थे। परिणामस्वरूप अब्दाली ने दिल्ली पर अपना प्रभाव स्थापित किया और नजीबुद्दौला रुहेला को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर वापस अफगानिस्तान लौट गया।



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मराठों की सैनिक तैयारियाँ


अहमद शाह अब्दाली के प्रवेश से मराठा नेतृत्व अत्यन्त चिंतित हुआ। उस समय मराठों के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव पूना में अत्यन्त वैभव और शक्ति के साथ शासन कर रहे थे। उन्होंने निश्चय किया कि अफगानों को परास्त कर उन्हें अटक पार खदेड़ दिया जाए।


इस उद्देश्य से एक विशाल सेना तैयार की गई। मराठा सरदारों और वीर योद्धाओं को तत्काल सेना में सम्मिलित होने का आदेश भेजा गया। युद्ध का नेतृत्व पेशवा के संबंधी सदाशिवराव भाऊ को सौंपा गया। पेशवा ने अपने सत्रह वर्षीय पुत्र विश्वासराव को भी साथ भेजा ताकि विजय प्राप्त होने पर उसे हिन्दुस्तान के शासन का उत्तराधिकारी घोषित किया जा सके।


मराठा सेना अत्यन्त विशाल थी। उसके साथ भारी तोपखाना था, जिसमें लगभग पंद्रह सौ बड़ी तोपें बताई जाती हैं। इस तोपखाने का संचालन इब्राहिम गार्डी नामक अनुभवी सेनानायक के हाथ में था, जिसने फ्रांसीसी सेनापति बुस्सी से युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उसके अधीन लगभग बारह हजार बंदूकची थे।


इसके अतिरिक्त बीस हजार घुड़सवार मराठा सरदार युद्ध में प्राण न्योछावर करने को तैयार थे। गुजरात से गायकवाड़ अपनी सेना सहित पहुँचे। मालवा से मल्हारराव होलकर ने सहायता दी। चंबल के तट पर सिंधिया अपनी सेना लेकर आ पहुँचे। बुन्देलखण्ड से गोविन्द पंत बुंदेला उपस्थित हुए।


भरतपुर के जाट राजा राजा सूरजमल ने लगभग तीस हजार सैनिकों की सहायता दी। अनेक राजपूत सरदार भी अपनी सेनाओं सहित आए। सेना के साथ पिंडारी, रावत तथा अनेक युद्ध विशेषज्ञ भी सम्मिलित थे। समस्त सेना का अनुमान लगभग पाँच लाख व्यक्तियों तक लगाया जाता है।



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मराठों का पुराना युद्ध ढंग


मराठों की युद्ध नीति अत्यन्त विशिष्ट थी। वे सामान्यतः भारी साजो-सामान साथ लेकर नहीं चलते थे। प्रत्येक सैनिक के पास केवल शस्त्र, घोड़ा और भोजन के लिए चावलों का थैला होता था। वे खुले मैदान में सीधी भिड़न्त के बजाय पहाड़ों, झाड़ियों और सुरक्षित स्थानों से अचानक आक्रमण करते थे।


मराठा सैनिक रात में छापामार शैली से शत्रु पर धावा बोलते, उसकी रसद काट देते और खेतों तथा वृक्षों को नष्ट कर देते थे ताकि विरोधी सेना को भोजन और चारा न मिल सके। कुओं और जलस्रोतों को भी अनुपयोगी बना दिया जाता था। इस प्रकार वे शत्रु को धीरे-धीरे थका देते थे और अवसर मिलने पर पीछे हटती सेना पर प्रहार करते थे।



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खुले मैदान में युद्ध करने का निर्णय


किन्तु इस बार सेनापति सदाशिवराव भाऊ ने पुरानी छापामार नीति छोड़कर खुले मैदान में युद्ध करने का निश्चय किया। उन्हें अपनी विशाल सेना और तोपखाने पर अत्यधिक गर्व था।


मराठा सेना अत्यन्त शाही ठाठ-बाट के साथ आगे बढ़ी। विशाल और सुंदर तंबू, रेशमी पर्दे, सोने-चाँदी से सुसज्जित ध्वजाएँ और भोजन सामग्री से भरी हजारों गाड़ियाँ सेना के साथ थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई शाही दरबार युद्ध के लिए निकल पड़ा हो।


इसी समय मल्हारराव होलकर और राजा सूरजमल ने सलाह दी कि भारी सामान को किसी सुरक्षित दुर्ग में रख दिया जाए और मराठों की पुरानी युद्ध पद्धति अपनाई जाए। किन्तु सदाशिवराव भाऊ ने इस सलाह को अस्वीकार कर दिया। उन्हें अपनी शक्ति और सेना पर अत्यधिक अभिमान था।


कहा जाता है कि उन्होंने राजा सूरजमल और मल्हारराव होलकर के साथ अत्यन्त कठोर व्यवहार किया।राजा सूरजमल और मल्हारराव होलकर ने जब सदाशिवराव भाऊ को यह सलाह दी कि भारी सामान और स्त्रियों-बच्चों को किसी सुरक्षित दुर्ग में छोड़ दिया जाए तथा मराठों की पुरानी छापामार युद्ध नीति अपनाई जाए, तब भाऊ अपने विशाल सैन्य बल, तोपखाने और शाही वैभव के घमंड में चूर था। उसने दोनों अनुभवी सरदारों की सलाह को अत्यन्त अपमानजनक ढंग से ठुकरा दिया।


भाऊ ने मल्हारराव होलकर से कहा —


> “तू एक निर्लज्ज बकरियाँ चलाने वाला है, लड़ना क्या जाने? मुझे ऐसे व्यक्ति की सलाह की आवश्यकता नहीं है।”




इसके बाद उसने राजा सूरजमल से कहा —


> “तू एक छोटा सा साधारण जमींदार है। इतनी विशाल सेना तूने स्वप्न में भी नहीं देखी होगी। तू क्या जाने इस शानदार युद्ध में किस प्रकार विजय प्राप्त करनी चाहिए? तुम दोनों बूढ़े हो और अफगानों से लड़ते हुए डरते हो। कोई देव-दानव तो नहीं जो तुम्हें खा जाएंगे।”




इन कटु और अपमानजनक शब्दों से राजा सूरजमल अत्यन्त आहत हुए। उन्होंने परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कोई उत्तर तो नहीं दिया, किन्तु मन ही मन वे मराठा नेतृत्व से विमुख हो गए। बाद में दिल्ली की लूटमार देखकर वे अपनी सेना सहित मराठों का साथ छोड़कर अलग हो गए, जो मराठों के लिए एक बड़ी क्षति सिद्ध हुई। इस अपमान से दुखी होकर राजा सूरजमल अपनी सेना सहित अलग हो गए। यह मराठों के लिए अत्यन्त बड़ी क्षति सिद्ध हुई।



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दिल्ली पर अधिकार और लूट


मराठा सेना दिल्ली पहुँची। उस समय मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय का प्रभाव समाप्तप्राय था। मराठों ने आसानी से दिल्ली पर अधिकार कर लिया।


दिल्ली में प्रवेश के बाद व्यापक लूटमार हुई। दीवान-ए-आम की चाँदी जड़ी छत तक को तोड़कर बेच दिया गया। इस घटना ने अनेक सहयोगी राजाओं और सरदारों को मराठों से विमुख कर दिया। राजा सूरजमल पहले ही असंतुष्ट थे, अब वे पूर्णतः अलग हो गए।



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पानीपत की ओर प्रस्थान और कुंजपुरा की तबाही


दशहरे के समय मराठा सेना ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया। पहले से यह निर्णय किया गया था कि पानीपत के मैदान में अहमद शाह अब्दाली का सामना किया जाएगा।


मराठों ने पहले पानीपत पर अधिकार किया और फिर आगे बढ़कर कुंजपुरा के किले पर आक्रमण किया। वहाँ अब्दाली की ओर से अब्दुल समद खान रक्षा कर रहा था। मराठों ने किले पर अधिकार कर भारी कत्लेआम और लूटमार की।


इसी बीच सूचना मिली कि अहमद शाह अब्दाली तेजी से आगे बढ़ रहा है। तब मराठा सेना शीघ्रता से वापस पानीपत लौट आई और 25 अक्टूबर 1760 को वहाँ डेरा डाल दिया। उन्होंने अपने शिविर के सामने लगभग साठ फुट चौड़ी खाई खुदवाई और उसके पीछे तोपें स्थापित कर दीं।



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अहमद शाह अब्दाली का पानीपत पहुँचना


अहमद शाह अब्दाली ने भी अत्यन्त सावधानी से अपनी सेना का प्रबंध किया। उसने अपने शिविर के चारों ओर सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की और रात-दिन सेना की गतिविधियों पर दृष्टि रखी।


दोनों सेनाएँ कई महीनों तक आमने-सामने डटी रहीं। इस दौरान केवल छोटी-मोटी झड़पें हुईं, किन्तु कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ। अब्दाली ने मराठों की रसद काटने की नीति अपनाई और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें बाहर से भोजन या सहायता न मिल सके।



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मराठों की रसद संकट में


अब्दाली ने मराठों को सहायता पहुँचाने वाले मार्गों पर भी आक्रमण किया।


आला जाट, जो मराठों को भोजन सामग्री पहुँचा रहा था, पर अफगानों ने धावा बोल दिया और उसे बुरी तरह परास्त किया।


इसके बाद सूचना मिली कि गोविन्द पंत बुंदेला दस हजार सैनिकों और पर्याप्त रसद के साथ सहायता के लिए आ रहे हैं। अब्दाली ने अताई खान दुर्रानी को उन्हें रोकने भेजा। जलालाबाद के समीप दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, जिसमें गोविन्द पंत मारे गए और उनकी सेना तितर-बितर हो गई। सारी रसद और धन अफगानों के हाथ लग गया।



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चालीस लाख रुपये अफगानों के हाथ लगना


इसी बीच पाराजी नामक एक मराठा सरदार दिल्ली से पंद्रह सौ सैनिकों की सुरक्षा में चालीस लाख रुपये लेकर मराठा शिविर की ओर चला। दुर्भाग्यवश सेना मार्ग भूल गई और सीधे अफगान शिविर के समीप पहुँच गई।


अफगानों ने तत्काल आक्रमण कर दिया। मराठों के लगभग सभी सैनिक मारे गए और चालीस लाख रुपये की विशाल धनराशि भी अफगानों के हाथ लग गई।


इस प्रकार युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही मराठा सेना रसद, सहयोग और मनोबल—तीनों दृष्टियों से अत्यन्त कठिन परिस्थिति में पहुँच चुकी थी।

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मराठा सेनापति की सेना को ठहराने के संबंध में भूल और उसका दुष्परिणाम


जिस स्थान को भाऊ ने अपनी सेना के ठहरने के लिए चुना, वह मराठा सेना के लिए अत्यन्त हानिकारक सिद्ध हुआ। मराठों की सेना चारों ओर से घिर गई थी। मराठा सैनिकों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी शीघ्र गति, फुर्ती, चालाकी तथा स्वतंत्र रूप से घूमकर युद्ध करने की क्षमता थी। इसी गुण ने उन्हें अब तक विभिन्न युद्धों में विजय दिलाई थी, परन्तु पानीपत के सीमित क्षेत्र में आकर वे इन सब गुणों से सर्वथा वंचित हो गए।


थोड़ी-सी भूमि में लाखों सवार, हजारों सैनिक, घोड़े, हाथी और बैल एकत्र हो गए थे। ऐसी स्थिति में यदि भोजन और चारे की आपूर्ति बंद हो जाए, तो सेना का धीरे-धीरे विनाश निश्चित था। अहमद शाह अब्दाली ने मराठा सेना तक पहुँचने वाले सभी मार्ग बंद कर दिए थे। अब मराठों के सामने केवल दो ही मार्ग थे—या तो धीरे-धीरे भूख से मर जाएँ अथवा अपमानपूर्वक अहमद शाह अब्दाली की अधीनता स्वीकार कर लें।


जब तक सैनिकों के लिए भोजन सामग्री और पशुओं के लिए चारा उपलब्ध रहा, तब तक किसी प्रकार की विशेष कठिनाई अनुभव नहीं हुई। परन्तु शीघ्र ही समस्त अनाज समाप्त हो गया। बाहर से सहायता मिलने की कोई आशा न थी, क्योंकि अहमद शाह अब्दाली के सैनिक अत्यन्त तेज गति वाले घोड़ों पर प्रतिदिन पचास-पचास और साठ-साठ मील तक गश्त लगाते रहते थे। किसी में इतना साहस न था कि उनकी दृष्टि से बचकर मराठा शिविर तक पहुँच सके।


जब मराठा सैनिक भूख से व्याकुल हो उठे, तब पानीपत नगर के निवासियों पर विपत्ति आ पड़ी। नगर में जितना भी अनाज उपलब्ध हो सका, उसे एकत्र कर सेना में बाँट दिया गया, किन्तु वह भी एक-दो दिन में समाप्त हो गया। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि सैनिक गधों और कुत्तों को मारकर खाने लगे। जब वे भी समाप्त हो गए, तो मृत पशुओं की खालें तथा हड्डियाँ पीस-पीसकर खाई जाने लगीं। अंततः जब यह भी उपलब्ध न रहा, तब सैनिक भूख से मरने लगे और समस्त सेना में अत्यन्त बेचैनी फैल गई।


पशुओं के लिए चारे का भी पूर्ण अभाव हो गया। एक रात लगभग बीस हजार साइस और खसियारे चारे की खोज में गुप्त रूप से मराठा शिविर से बाहर निकले, किन्तु वे अफगानों की दृष्टि से कैसे बच सकते थे, जो मराठा सेना की प्रत्येक गतिविधि पर निगाह रखे हुए थे। परिणाम यह हुआ कि उन बीस हजार व्यक्तियों में से एक भी वापस न लौट सका। इस भयावह घटना से मराठा सेना में भारी खलबली मच गई।


यदि साइसों की सुरक्षा के लिए सेना का कोई सशक्त दस्ता साथ भेजा गया होता, तो संभवतः यह दुर्दिन देखने को न मिलता। वास्तव में यह मराठा सेना पर आई एक भयंकर आपत्ति थी। चारे के अभाव में घोड़े भूख से मरने लगे। उनकी लाशों से ऐसी दुर्गंध फैल गई कि सैनिकों का शिविर में रहना कठिन हो गया। दुर्गंध से मानो मस्तिष्क फटा जाता था।


अत्यन्त विवश होकर भाऊ ने संधि की प्रार्थना की, परन्तु उधर से कोई सकारात्मक उत्तर न मिला। भाऊ ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को अपनी ओर मिलाने का भी प्रयास किया, किन्तु उसमें भी सफलता प्राप्त न हुई।



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निर्णायक महायुद्ध


स्थिति अब अत्यन्त असहनीय हो चुकी थी। एक रात सभी मराठा सरदार भाऊ के तंबू में एकत्र हुए और उन्होंने कहा—“अब विचार और असमंजस का समय समाप्त हो चुका है। आज्ञा दीजिए कि हम घेरे से निकलकर जी-जान से आक्रमण करें। या तो विजय प्राप्त करें अथवा रणभूमि में कटकर मर जाएँ। भूख और दुर्गंध से मरने की अपेक्षा शत्रु की तलवार से मरना हजार गुना श्रेष्ठ है।”


भाऊ ने उत्तर दिया—“यदि यही तुम सबकी इच्छा है, तो युद्ध की तैयारी करो। प्रातःकाल आक्रमण किया जाएगा।”


इस प्रकार निर्णायक युद्ध का निश्चय हो गया।


अफगानों को भी इस तैयारी का समाचार मिल गया। रात्रि लगभग तीन बजे शुजाउद्दौला घबराया हुआ अहमद शाह अब्दाली के पास पहुँचा और पहरेदार से बोला—“शीघ्र बादशाह को जगाओ।” आवाज सुनते ही अहमद शाह अब्दाली बाहर आ गया। वह पूर्णतः युद्ध के शस्त्रों से सुसज्जित था। तत्क्षण आदेश दे दिए गए और शेष रात्रि अफगानों ने भी युद्ध की तैयारी में व्यतीत की।


प्रातःकाल सूर्य उदय से पूर्व ही मराठा सेना अपने घेरे से निकलकर अफगान सेना के सामने आ डटी। बड़े-बड़े सरदार हाथियों पर सवार थे। सेना का नेतृत्व भाऊ कर रहा था और उसके पीछे मराठों के चुने हुए तथा अनुभवी वीर घुड़सवार थे। यह समस्त सेना प्राणों को हथेली पर रखकर युद्धभूमि में उतरी थी।


उधर अफगान भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उपस्थित थे। अहमद शाह अब्दाली अपने प्रमुख सरदारों सहित सबसे पीछे खड़ा था।


युद्ध का आरम्भ मराठों ने किया। एक साथ लगभग पन्द्रह सौ तोपों से अग्निवर्षा आरम्भ हुई। मराठों को अपनी भारी तोपों पर अत्यधिक विश्वास था। उनका विचार था कि इन तोपों की मार से थोड़ी ही देर में अफगान सेना नष्ट हो जाएगी। परन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। मराठा तोपचियों ने अपने तोपों के निशाने ठीक प्रकार से निर्धारित नहीं किए और घबराहट में अंधाधुंध गोलाबारी आरम्भ कर दी। परिणामस्वरूप एक भी गोला अफगानों को विशेष हानि न पहुँचा सका। अधिकांश गोले अफगान सैनिकों के सिरों के ऊपर से निकलकर दूर जा गिरे।


इसके पश्चात इब्राहिम गार्दी अपनी प्रशिक्षित सेना को लेकर अत्यन्त सूझबूझ और वीरता के साथ आगे बढ़ा। उसने अफगानों पर भीषण आक्रमण किया और थोड़े ही समय में लगभग आठ हजार अफगान सैनिकों को मार गिराया। दमाजी गायकवाड़, महादजी सिंधिया तथा मल्हारराव होल्कर ने भी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया।


मराठों के प्रचण्ड आक्रमण का सामना अफगान सैनिक अधिक देर तक न कर सके और उनमें निराशा तथा भगदड़ के लक्षण दिखाई देने लगे। उसी समय भाऊ ने अपने वीर नवयुवकों को लेकर अफगान सेना के मध्य भाग पर तीव्र आक्रमण कर दिया। तीन घंटे तक दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ। भाऊ के इस प्रबल आक्रमण से हजारों अफगान सैनिक मारे गए।


दोपहर तक ऐसा प्रतीत होने लगा कि मराठे युद्ध जीत रहे हैं। किन्तु अफगानों के लिए भी यह जीवन-मरण का प्रश्न था। वे भी अत्यन्त साहस और दृढ़ता से लड़े। “अल्लाह-हू-अकबर” और “हर-हर महादेव” के घोष से सम्पूर्ण रणभूमि गूँज उठी। दोनों सेनाएँ इतनी निकट आ गई थीं कि तलवार चलाने तक का स्थान नहीं बचा था। सैनिकों ने खंजर निकाल लिए और निकट युद्ध प्रारम्भ हो गया।


मराठों से एक और भारी भूल यह हुई कि उन्होंने अपनी संपूर्ण सेना युद्धभूमि में उतार दी और कोई भी रिजर्व सेना सुरक्षित नहीं रखी। इसके विपरीत अहमद शाह अब्दाली ने लगभग बीस हजार ताज़ादम सैनिक अपने पास सुरक्षित रखे थे। वह ऊँचे मंच पर खड़ा युद्ध की स्थिति पर दृष्टि रखे हुए था, ताकि आवश्यकता पड़ने पर इन सैनिकों को सहायता के लिए भेज सके।


दोपहर लगभग एक बजे अब्दाली ने देखा कि नजीबुद्दौला और शुजाउद्दौला के सैनिक मराठों के तीव्र आक्रमण को सहन न कर पाने के कारण भागने लगे हैं। तब उसने तुरंत अपनी रिजर्व सेना के दो भाग किए। एक भाग को भगोड़े सैनिकों को रोकने के लिए भेजा गया तथा दूसरे भाग को लेकर वह स्वयं युद्धभूमि की ओर बढ़ा।


अफगान और रोहेला सरदारों की सहायता मिलने से अफगान सेना में पुनः उत्साह भर गया। दूसरी ओर मराठा सैनिक प्रातःकाल से निरंतर युद्ध करते-करते थक चुके थे। फिर भी उन्होंने सच्चे वीरों की भाँति ताज़ादम सेना का अत्यन्त साहसपूर्वक सामना किया।


युद्ध कुछ समय के लिए मंद पड़ा, किन्तु शीघ्र ही पहले से भी अधिक भयंकर रूप धारण कर गया। ऐसा घमासान युद्ध हुआ कि वृद्ध से वृद्ध सैनिक ने भी वैसा भीषण युद्ध कभी न देखा था।


इब्राहिम गार्दी यद्यपि घावों से चूर हो चुका था, फिर भी अद्भुत वीरता से युद्ध करता रहा। अंततः अत्यधिक घायल होकर वह मूर्छित हो गया और बंदी बना लिया गया।


विश्वासराव युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। भाऊ ने भी असाधारण साहस और वीरता का परिचय दिया, किन्तु अब भाग्य पलट चुका था। मराठा सेना में पराजय के लक्षण दिखाई देने लगे।


भाऊ चाहता तो संभवतः युद्धभूमि से निकलकर अपने प्राण बचा सकता था, किन्तु उसकी मान-मर्यादा ने उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दी। उसने अंत तक वीरतापूर्वक युद्ध किया और रणभूमि में मारा गया।


कुछ इतिहासकारों के अनुसार, भाऊ ने अपने अंतिम क्षणों तक अद्भुत वीरता और धैर्य का परिचय दिया। एक विवरण में कहा गया है कि उसने पीछे हटने से स्पष्ट इनकार कर दिया था और अंतिम समय तक युद्ध करता रहा। वहीं कुछ अन्य इतिहासकारों का मत है कि जब स्थिति पूर्णतः निराशाजनक हो गई, तब वह हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ और युद्ध के सबसे भीषण भाग में प्रवेश कर गया, जिसके बाद उसका कोई निश्चित समाचार नहीं मिला।


युद्ध समाप्त होने के बाद रणभूमि से कुछ दूरी पर एक शव मिला, जिसके विषय में यह विश्वास किया गया कि वह भाऊ का था। इस प्रकार पानीपत का यह भीषण युद्ध समाप्त हुआ, जिसने मराठा शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया और भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।

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माधवजी सिंधिया, नाना फडणवीस तथा मल्हारराव होल्कर किसी प्रकार प्राण बचाकर युद्धभूमि से निकल गए। जनकोजी सिंधिया जीवित बंदी बना लिए गए। अब मराठा सेना में ऐसा कोई प्रमुख सेनानायक शेष न रहा था, जो सैनिकों को संगठित रखता अथवा युद्धरत सैनिकों की सहायता करता। परिणामस्वरूप मराठा सेना में भगदड़ मच गई।


मराठों के पांव उखड़ते ही पूरा मैदान उनकी लाशों से पट गया। अफगानों ने भागती हुई मराठा सेना का दूर-दूर तक पीछा किया और मीलों तक उनका संहार करते चले गए। युद्ध समाप्त होने पर लगभग बीस मील का विशाल क्षेत्र मराठा सैनिकों के शवों से भरा पड़ा था। हजारों मराठा सैनिक अफगानों द्वारा बंदी बना लिए गए, जिन्हें बाद में तलवार के घाट उतार दिया गया। अनुमान लगाया गया कि लगभग दो लाख मराठा इस युद्ध में मारे गए। पानीपत से लेकर पूना तक मराठा परिवारों में शोक और मातम छा गया।


मराठों ने इस युद्ध में जिस वीरता, साहस और प्राणपण से युद्ध किया, उसकी ऐसी मिसाल पहले कभी देखने को नहीं मिली थी। परंतु मराठा सेना को जितनी भयानक और निराशाजनक पराजय इस युद्ध में सहन करनी पड़ी, वैसी विपत्ति उन पर पहले कभी नहीं आई थी। इस हार ने मराठों के हृदय को गहरे शोक और संताप से भर दिया।


बालाजी बाजीराव पूना से सेना लेकर भाऊ की सहायता के लिए चला था, किंतु जब वह नर्मदा नदी तक पहुंचा तो उसे एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें लिखा था— “दो मोती गल गए, सत्ताईस अशर्फियां नष्ट हो गईं और चांदी-तांबे के सिक्कों की तो कोई गणना ही नहीं रही।” यह समाचार पढ़कर वह स्तब्ध रह गया। यह आघात उसके लिए असहनीय सिद्ध हुआ। कहा जाता है कि उसने राजपाट से विरक्ति ग्रहण कर ली और एक पाठशाला में बच्चों को संस्कृत पढ़ाने लगा। वह हर समय अत्यंत उदास और चिंतित रहने लगा तथा इसी मानसिक अवस्था में लगभग छह महीने बाद उसकी मृत्यु हो गई।


पानीपत के मैदान में यह अत्यंत भयानक युद्ध जमादुल आखिर के महीने में, तदनुसार 7 जनवरी 1761 ईस्वी को लड़ा गया। पानीपत के इस भीषण युद्ध का विवरण विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों और स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, जिनमें तारीख हिन्दुस्तान, तारीख हिन्द, तारीख इंदौर, वाकया दुर्रानी तथा Easy Stories From Indian History प्रमुख हैं।

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अहमद शाह अब्दाली के भीषण आक्रमण और पानीपत के विनाशकारी युद्ध के पश्चात जब वह वापस लौटने लगा, तो उसने चीन खाँ दुर्रानी नामक व्यक्ति को इस समस्त क्षेत्र का नाज़िम नियुक्त कर दिया। उस समय सिख शक्ति पंजाब में निरंतर सुदृढ़ हो रही थी। सिखों ने अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए सन् 1763 में चीन खाँ को पराजित कर सरहिंद से लेकर पानीपत तक का विस्तृत क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिया।


इसी समय राजा गोपाल सिंह नामक एक सरदार ने जींद, सफीदों, करनाल और पानीपत पर अधिकार स्थापित कर लिया और निश्चिंत होकर इस क्षेत्र का शासन करने लगा।


उधर अहमद शाह अब्दाली पुनः बड़ी सेना लेकर अपने देश से चला और अप्रैल 1767 में लाहौर पहुंचा। सिखों ने परिस्थिति का आकलन करते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर अपनी शक्ति को सुरक्षित रखा। किंतु सरहिंद में आला जाट ने लगभग दो लाख सिख सैनिकों के साथ अब्दाली का सामना करने का निश्चय किया। अब्दाली ने अत्यंत तीव्र गति से बढ़ते हुए लगभग नब्बे कोस की दूरी दो दिनों में पूरी की और अचानक आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में अनेक सिख वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद अब्दाली आगे बढ़ता हुआ पानीपत तक आया। जब वह पानीपत पहुंचा, तब उसके साथ लगभग पचास हजार सैनिक थे। कुछ दिन पानीपत में ठहरने के पश्चात वह दिल्ली की ओर बढ़ने का विचार करता रहा, किंतु अंततः वापस अपने देश लौट गया। यह अहमद शाह अब्दाली का हिन्दुस्तान पर अंतिम आक्रमण सिद्ध हुआ। इसके बाद वह फिर कभी भारत नहीं आया।


जैसे ही अब्दाली वापस लौटा, राजा गोपाल सिंह ने अवसर का लाभ उठाकर तुरंत पानीपत पर पुनः आक्रमण कर दिया।


इसके कुछ समय बाद पानीपत और उसके आसपास का क्षेत्र पुनः संघर्षों का केंद्र बन गया। सन् 1770 में सिखों ने सनौद के फौजदार रहीम दाद खाँ पर भारी सेना के साथ आक्रमण किया। इस पर शाह आलम द्वितीय ने अपने प्रमुख अमीर मिर्ज़ा नजफ खाँ को सिखों के मुकाबले के लिए भेजा। दूसरी ओर सिखों ने जाब्ता खाँ रोहेला से सहायता मांगी, जो उस समय शाह आलम से असंतुष्ट था। जाब्ता खाँ तुरंत सिखों की सहायता के लिए आ पहुंचा।


शाही सेना जब पानीपत पहुंची, उसी समय जाब्ता खाँ और सिखों की संयुक्त सेना भी वहां पहुंच गई। दोनों पक्षों के बीच अत्यंत भीषण युद्ध हुआ। इतिहासकारों ने इस युद्ध की तुलना 1761 के पानीपत युद्ध से करते हुए लिखा है कि उसकी भयानकता उससे कुछ ही कम थी। यद्यपि इस युद्ध का कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला, तथापि शाही सेना के लौटते ही सिखों ने पुनः इस क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।


सन् 1779 में शाह आलम द्वितीय ने इस क्षेत्र से सिखों को हटाने का प्रयास किया। इसके लिए शहजादा फरवंदा बख्श तथा दरबार के सरदार अब्दुल अहद को पानीपत भेजा गया। उन्हें आदेश दिया गया कि पानीपत को स्थायी निवास और सैनिक छावनी बनाकर आसपास के क्षेत्रों को नियंत्रित किया जाए तथा जनता को निरंतर संघर्षों से राहत दिलाई जाए।


शहजादा कई महीनों तक पानीपत में रहा और इधर-उधर से लगभग बीस हजार सैनिक एकत्रित कर लिए। वह अपने साथ तोपखाना भी लाया था, किंतु अधिकारियों के आपसी मतभेद और विद्रोह के कारण सेना को कोई विशेष सफलता प्राप्त न हो सकी। अंततः कोई परिणाम न निकलने पर शहजादा वापस दिल्ली लौट गया।


इसी काल में राजा गजपत सिंह की इच्छा भी पानीपत पर अधिकार स्थापित करने की थी। उसने कई बार पानीपत पर आक्रमण किया, किंतु प्रत्येक बार पानीपत के नागरिकों ने शाही सेना के साथ मिलकर उसका प्रतिरोध किया और उसे पराजित कर दिया। सन् 1796 में राजा गजपत सिंह की मृत्यु के बाद पानीपत को उसके निरंतर आक्रमणों से मुक्ति मिली।


इसके पश्चात सन् 1797 में बेगम समरू ने इस क्षेत्र में फैले उपद्रवों को शांत करने का निश्चय किया। वह अत्यंत वीर, कुशल और अनुभवी महिला थीं। उन्होंने बड़ी सेना एकत्रित कर पानीपत को युद्ध के निर्णय का केंद्र बनाया। बेगम यहां पहुंचीं और उन्होंने अपने डेरे डाले। दूसरी ओर सिख सेना भी वहां आ पहुंची और युद्ध आरंभ हो गया।


युद्ध चल ही रहा था कि यह समाचार मिला कि गुलाम कादिर रोहिल्ला ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया है। बेगम समरू, शाह आलम द्वितीय की समर्थक थीं। यह समाचार सुनते ही वे युद्ध अधूरा छोड़कर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गईं।


इसके लगभग ग्यारह वर्ष बाद पुनः बेगम समरू अपनी सेना सहित इस क्षेत्र में आईं और लगभग एक वर्ष तक पानीपत में डेरा डाले रहीं। उस समय उनकी रियासत जयपुर से संघर्ष चल रहा था और अपनी पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के उद्देश्य से उन्होंने कुछ समय यहां निवास किया।


सन् 1799 में जनरल बैरन को दौलतराव सिंधिया ने सिखों को हटाने के लिए पानीपत भेजा, किंतु दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाने के कारण युद्ध की आवश्यकता नहीं पड़ी।


इसके बाद सन् 1801 में टॉमस नामक एक अंग्रेज अधिकारी, जिसे अंग्रेजों द्वारा हिसार क्षेत्र का कुछ भाग प्रदान किया गया था, सेना लेकर पानीपत पर चढ़ आया। उस समय पानीपत सिखों के अधिकार में था। टॉमस ने पानीपत में व्यापक लूटपाट की और जो कुछ प्राप्त हुआ उसे लेकर वापस हिसार लौट गया।


यह काल अत्यंत असुरक्षा और अराजकता का था। पानीपत की जनता का जीवन और संपत्ति किसी प्रकार सुरक्षित नहीं थी। जिस किसी सरदार अथवा शक्ति के पास थोड़ी भी सैन्य सामर्थ्य होती, वह इस क्षेत्र में लूटमार और आक्रमण आरंभ कर देता। निरंतर युद्धों और संघर्षों के कारण पानीपत और उसके आसपास का समस्त क्षेत्र अत्यंत उजड़ गया। कहा जाता है कि जिले के लगभग 178 गांव पूर्णतः वीरान हो चुके थे। जो गांव शेष बचे थे, उनकी स्थिति भी अत्यंत दयनीय थी। लोग अपने गांवों के चारों ओर खाइयाँ खोदकर भय और असुरक्षा के वातावरण में जीवन व्यतीत करते थे।


उस समय के एक यात्री श्री आर्चन ने इस क्षेत्र की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस भूभाग में केवल जंगली पशु ही दिखाई देते थे। खेती-बाड़ी लगभग समाप्त हो चुकी थी, नागरिक अपने घर छोड़कर जा चुके थे, पुराने मकबरे और दरगाहें वीरान पड़ी थीं तथा चारों ओर लूटमार और भय का वातावरण व्याप्त था। यात्रियों के लिए इस क्षेत्र से गुजरना भी अत्यंत जोखिमपूर्ण माना जाता था।

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पानीपत पर अंग्रेजों का अधिकार और उसके बाद का इतिहास


अंग्रेजों का अधिकार और पानीपत को मिली शांति


वस्तुतः पानीपत और उससे लगते क्षेत्रों की दशा अत्यन्त दयनीय हो चुकी थी। निरन्तर युद्धों, लूटमार और अस्थिरता ने इस भूभाग को उजाड़ कर रख दिया था। तभी मानो ईश्वर को इस प्रदेश पर दया आई। 11 सितम्बर 1803 को Lord Lake ने दिल्ली के निकट हुए युद्ध में मराठों को पराजित किया। इसके पश्चात 30 दिसम्बर को Daulat Rao Scindia ने सुरजी-अंजनगाँव की संधि के अनुसार हिन्दुस्तान का उत्तरी भाग अंग्रेजों को सौंप दिया। बाद में पूना की संधि के अनुसार, जो इस समझौते के लगभग पाँच मास बाद हुई, दिल्ली के निकट का समस्त क्षेत्र — जिसमें पानीपत भी सम्मिलित था — East India Company के अधिकार में आ गया।


अंग्रेजों के अधिकार में आने के बाद पानीपत को प्रतिदिन होने वाले युद्धों और लूटपाट से मुक्ति मिली। नगरवासियों को पहली बार शांति और स्थिरता का अनुभव हुआ।


पानीपत में अंग्रेजी छावनी की स्थापना


जब अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हुआ तो उन्होंने पानीपत की केंद्रीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए यहाँ एक छावनी स्थापित की। सेना के रहने की व्यवस्था उस स्थान पर की गई जहाँ आज थाना सदर और हाली मुस्लिम हाई स्कूल, जिसे अब आर.ए. सीनियर सेकेंडरी स्कूल कहा जाता है, स्थित हैं।


किन्तु नगर के सज्जनों और प्रतिष्ठित नागरिकों को यह छावनी पसंद नहीं आई। जब Lord Lake अपनी सेना सहित यहाँ से गुज़रे, तब मोहल्ला अंसार के प्रतिष्ठित धनाढ्य व्यक्ति Khwaja Sadiq Ali ने उनसे भेंट कर छावनी को पानीपत से हटाने का अनुरोध किया। उन्होंने विस्तारपूर्वक इसके कारण भी प्रस्तुत किए। कहा जाता है कि वे प्रसिद्ध विद्वान Maulana Altaf Hussain Hali के गुरु मौलवी हाजी इब्राहीम हुसैन अंसारी के दादा थे।


लॉर्ड लेक ने उनसे कहा, “तुम हमारे साथ चलो, मार्ग में इस विषय पर विचार करेंगे।” इस प्रकार ख्वाजा सादिक अली सेना के साथ चल पड़े। जब वे कानपुर के समीप पहुँचे तो लॉर्ड लेक ने आश्चर्य से पूछा कि इतनी दूर तक साथ आने पर भी उन्होंने इस विषय में पुनः कुछ क्यों नहीं कहा। इस पर ख्वाजा सादिक अली ने उत्तर दिया कि उन्हें विश्वास था कि लॉर्ड लेक स्वयं विचार कर उन्हें बुलाएँगे।


उनकी धैर्यशीलता और विनम्रता से प्रभावित होकर लॉर्ड लेक ने उसी समय छावनी हटाने की आज्ञा लिखने का निश्चय किया। संयोग से वहाँ दवात, कलम और कागज उपलब्ध नहीं था। तब ख्वाजा सादिक अली ने अपनी जेब से ये तीनों वस्तुएँ निकालकर प्रस्तुत कर दीं। जब लिखने के लिए कोई आधार नहीं मिला तो वे स्वयं झुक गए और बोले — “हुज़ूर, मेरी पीठ पर कागज़ रखकर आदेश लिख दीजिए।”


इस प्रकार आदेश लिखा गया और पानीपत की छावनी हटाकर करनाल स्थानांतरित कर दी गई। यह घटना स्वर्गीय ख्वाजा सादिक अली साहब के पड़पोते मखदूमी जनाब मौलवी मोहम्मद अली हैदर अंसारी ने स्वयं वर्णित की थी। छावनी हटाने से सम्बन्धित दस्तावेज भी उनके पास सुरक्षित बताए जाते हैं।



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पानीपत जिला बना


अंग्रेजी शासन स्थापित होने के कुछ समय बाद, सन् 1824 में पानीपत को जिला बनाया गया तथा करनाल और सोनीपत उसकी तहसीलें निश्चित की गईं। बाद में सन् 1841 में गोहाना को रोहतक से अलग कर जिला पानीपत में सम्मिलित कर दिया गया।


उस समय जिला पानीपत, दिल्ली कमिश्नरी के अधीन था। इस कमिश्नरी में पानीपत, दिल्ली, रोहतक और गुड़गांव के जिले सम्मिलित थे, जो उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के अंतर्गत आगरा के लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन आते थे।


उस काल के न्यायालय भवनों में से केवल एक भवन आज भी शेष है, जो “काबड़ी कोठी” के नाम से प्रसिद्ध है और पानीपत नगर से लगभग एक मील पश्चिम दिशा में स्थित है। उस समय पंजाब और करनाल के बड़े-बड़े अधिकारी यहाँ आकर ठहरते थे। प्रसिद्ध उर्दू साहित्यकार Maulana Altaf Hussain Hali के जन्म-शताब्दी समारोह के अवसर पर Nawab of Bhopal भी 26 अक्टूबर 1935 को पानीपत पधारे और इसी कोठी में ठहरे थे।


शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति


सन् 1816 में पूरे जिला पानीपत में केवल 12 मदरसे और स्कूल थे। सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या अत्यन्त कम थी तथा अनेक विद्यालय लगभग खाली पड़े रहते थे।


उस समय पानीपत की जलवायु अपेक्षाकृत अच्छी मानी जाती थी, इसी कारण इसे जिला मुख्यालय बनाया गया था। परन्तु 1852 में ग्रांड ट्रंक रोड में सुधार और फेरबदल के कारण बाढ़ का जल खादर क्षेत्रों में जाने से रुक गया और नगर के चारों ओर पानी भरने लगा। परिणामस्वरूप सड़ांध फैल गई और अनेक बीमारियाँ उत्पन्न हो गईं।


स्थिति इतनी खराब हो गई कि 1854 में अधिकारियों को जिला मुख्यालय पानीपत से हटाकर करनाल ले जाना पड़ा। साथ ही नगर के आसपास धान की खेती पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक पानीपत केवल तहसील के रूप में रहा। अंततः सन् 1991 में नागरिकों और वकीलों के संघर्ष के परिणामस्वरूप इसे पुनः जिला घोषित किया गया।


इसके बावजूद पानीपत सदैव व्यापार, आवागमन और चहल-पहल का प्रमुख केंद्र बना रहा।



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सन् 1857 की क्रांति और पानीपत


सन् 1857 की क्रांति का प्रभाव पानीपत पर भी अत्यन्त तीव्रता से पड़ा। जब दिल्ली में विद्रोह की ज्वाला भड़की तो पानीपत के लोगों ने भी चोक कलंदर साहब में एकत्र होकर अंग्रेजों के विरुद्ध जोशीले भाषण दिए। लोगों से कहा गया कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह दिल्ली जाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करे। जो इस युद्ध में मारा जाएगा वह शहीद कहलाएगा और जो विजयी होगा वह गाज़ी कहलाएगा।


जब अंग्रेजों को इन भाषणों का समाचार मिला तो उन्होंने रियासत झिंड से तोपखाना मंगवाकर नगर के बाहर कब्रिस्तान कंवर अली के टीले पर तैनात कर दिया। संयोगवश वह ईद का दिन था। नगर में भय और हलचल फैल गई, परन्तु पानीपत के लोगों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि चाहे उन्हें तोपों से उड़ा दिया जाए, वे अपने विचारों से पीछे नहीं हटेंगे।


जनता के इस दृढ़ संकल्प से अंग्रेज अधिकारी भी विचलित हो उठे और अंततः उन्होंने अपना तोपखाना वहाँ से हटा लिया। फिर भी दंडस्वरूप दरगाह कलंदर साहब के लिए मुगल बादशाहों द्वारा दिए गए दो गाँव सरकार ने जब्त कर लिए।


उस समय पानीपत का मजिस्ट्रेट मिस्टर डेनबरा दिल्ली गया हुआ था और वहीं मारा गया। तत्पश्चात मिस्टर रिचर्ड डिक्शन ने डिप्टी कलेक्टर के रूप में कार्यभार संभाला। वह अत्यन्त सतर्क और साहसी अधिकारी था, परन्तु पानीपत के लोगों ने उसे भी अपने अधिकारों का हनन करने का अवसर नहीं दिया।



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रेलमार्ग और व्यापारिक उन्नति


1 मार्च 1891 से दिल्ली की ओर रेल सेवा पुनः प्रारम्भ हुई। इससे पानीपत का सीधा संपर्क एक ओर दिल्ली और दूसरी ओर अंबाला तथा लाहौर से स्थापित हो गया। आवागमन में अत्यन्त सुविधा हुई और व्यापार में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।


14 मई 1928 को पानीपत को रेलवे जंक्शन घोषित किया गया तथा यहाँ से जींद और रोहतक के लिए नई रेल लाइनें प्रारम्भ की गईं। इससे पानीपत का महत्व और अधिक बढ़ गया।

पानीपत का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि संघर्ष, पुनर्निर्माण, साहस और सामाजिक जागरण की कहानी भी है। मराठों, मुगलों और अंग्रेजों के संघर्षों से लेकर 1857 की क्रांति और आधुनिक प्रशासनिक पुनर्गठन तक, पानीपत ने अनेक ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव देखे हैं।


यह वही भूमि है जिसने बार-बार विनाश झेला, किन्तु हर बार नए उत्साह के साथ स्वयं को पुनः स्थापित किया। पानीपत के लोगों ने अपने इतिहास और विरासत को सुरक्षित रखने का जो प्रयास किया, वही आज इस ऐतिहासिक धरोहर को जीवित रखे हुए है।



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