कुरैशियान मोहल्ला (पानीपत के मोहल्ले-3)

कुरैशियान मोहल्ला (पानीपत के मोहल्ले-3)

पानीपत शहर की ऐतिहासिक गलियों में कुरैशियान मोहल्ला एक ऐसा इलाका है जो सदियों से हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का प्रतीक रहा है। यह मोहल्ला कायस्थान मोहल्ले से जुड़ा हुआ है और सुभाष बाजार, बड़ा बाजार तथा सराफा बाजार से होकर गुजरता है। यहां लगभग 200-250 मकान हैं, और शहर की खासियत यह रही कि हिंदू और मुस्लिम मोहल्ले साथ-साथ रहे, बिना किसी झगड़े या विवाद के। हालांकि, 1857 की क्रांति और 1947 के भारत विभाजन के दौरान कुछ उथल-पुथल हुई, जब पानीपत के मुसलमान पाकिस्तान जाना नहीं चाहते थे, क्योंकि वे इसे अपनी मातृभूमि मानते थे। 1934 में प्रकाशित पुस्तक 'दास्तान-ए-नौ' में इसका जिक्र है, लेकिन महात्मा गांधी की हत्या के बाद अधिकांश मुसलमान पानीपत छोड़ गए। अब इस मोहल्ले में कोई मुसलमान नहीं बचा है, और ज्यादातर पंजाबी तथा कुछ सुनार बसे हुए हैं। आपका इस मोहल्ले से गहरा जुड़ाव रहा है, जहां मेरे दोस्त शम्मी, पंकज और रजनीश रहते थे, और आर्य प्राइमरी स्कूल में साथ पढ़ाई की यादें हैं। गली के अंत में अब एक मंदिर है, और यह पापड़-बड़ियों या चूड़ियों वाली दुकान (जो अब नहीं है, लेकिन प्रचलित है) पर समाप्त होती है।

इस संदर्भ में, मोहल्ले का नाम 'कुरैशियान' मुस्लिम कुरैशी समुदाय से जुड़ा हुआ है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि मुस्लिम कुरैशी कौन होते हैं, वे क्या करते हैं, और पैगंबर मुहम्मद का उनसे क्या संबंध है।

 मुस्लिम कुरैशी कौन होते हैं?
मुस्लिम कुरैशी (Qureshi या Quraishi) एक प्रमुख मुस्लिम समुदाय है, जो मुख्य रूप से अरब की प्राचीन कुरैश (Quraysh) जनजाति से अपना वंशज मानते हैं।कुरैश जनजाति प्राचीन मक्का (सऊदी अरब) की एक व्यापारिक और प्रभावशाली जनजाति थी, जो काबा (इस्लाम का पवित्र स्थल) की देखभाल और नियंत्रण करती थी। इस जनजाति के सदस्यों को कुरैशी कहा जाता है, और वे दस मुख्य कबीलों में बंटे हुए थे, जिनमें बनू हाशिम सबसे प्रमुख था।

भारत में, कुरैशी समुदाय मुख्य रूप से उत्तर भारत (जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा) में पाया जाता है। वे खुद को कुरैश जनजाति के वंशज बताते हैं, जो इस्लाम के प्रारंभिक काल में अरब से भारत आए थे।भारत में आने वाले कुरैशी अरब, तुर्की, फारसी और अफगान आक्रमणकारियों के साथ आए और यहां बस गए। वे शेख कुरैशी या कसाब (Qassab) के नाम से भी जाने जाते हैं, और यह समुदाय इस्लाम की सुन्नी तथा शिया दोनों परंपराओं का पालन करता है।वे कुरान की शिक्षाओं का पालन करने का प्रयास करते हैं और धार्मिक विद्वान, प्रशासक तथा व्यापारी के रूप में जाने जाते हैं।

 मुस्लिम कुरैशी क्या करते हैं?
परंपरागत रूप से, कुरैशी समुदाय कसाई (butcher) का पेशा अपनाता है। वे जानवरों की हलाल तरीके से जिबह (slaughter) करते हैं और मांस का व्यापार करते हैं।भारत में, विशेष रूप से दिल्ली और उत्तर भारत में, कुरैशी कसाई समुदाय के रूप में प्रसिद्ध हैं, और वे मांस के व्यापार में लगे रहते हैं।यह पेशा उनकी पहचान का हिस्सा है, क्योंकि 'कुरैशी' शब्द का संबंध कुरैश जनजाति से है, जो व्यापारिक थी, लेकिन भारत में यह कसाई कार्य से जुड़ गया। कई कुरैशी अब दैनिक मजदूरी या छोटे व्यवसाय में भी लगे हैं।

हालांकि, आधुनिक समय में कुरैशी समुदाय विविध क्षेत्रों में फैल गया है। वे फल व्यापार, निर्माण कार्य, बैंकिंग, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में सक्रिय हैं। उदाहरण के लिए, कुछ कुरैशी अब डॉक्टर, इंजीनियर या व्यवसायी बन रहे हैं, जो उनकी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़ने का संकेत है। वे सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी भाग लेते हैं, जैसे मस्जिदों की देखभाल और इस्लामी शिक्षाओं का प्रसार।

 पैगंबर मुहम्मद भी कुरैशी ही थे
हां, पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कुरैश जनजाति से ही संबंध रखते थे।वे बनू हाशिम कबीले में जन्मे थे, जो कुरैश की एक शाखा थी। पैगंबर मुहम्मद का जन्म 570 ईस्वी में मक्का में हुआ था, और कुरैश जनजाति उस समय मक्का की सबसे शक्तिशाली और व्यापारिक जनजाति थी। उनके पूर्वज फिह्र इब्न मालिक से थे, जो कुरैश जनजाति के संस्थापक माने जाते हैं। पैगंबर मुहम्मद एक सफल व्यापारी थे और अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे।इस्लाम के उदय से पहले कुरैश जनजाति काबा की रक्षा करती थी, और पैगंबर के संदेश ने इस जनजाति को प्रभावित किया।
   पानीपत के कुरैशियान मोहल्ले के मुसलमान 1947 के भारत विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर पाकिस्तान चले गए। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, उत्तर भारत (जिसमें पानीपत शामिल था, जो तब पूर्वी पंजाब का हिस्सा था) से प्रवास करने वाले मुसलमानों की पहली लहर (1947-1948) में अधिकांश लोग पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बसे। इसमें लाहौर, फैसलाबाद (तब लायलपुर), मुल्तान, रावलपिंडी और अन्य शहर शामिल थे, जहां वे स्थानीय अर्थव्यवस्था और समाज में समाहित हो गए। यह प्रवास मुख्य रूप से पंजाबी मुसलमानों का था, और कुरैशी जैसे समुदाय, जो परंपरागत रूप से व्यापार और कसाई कार्य से जुड़े थे, भी इसी पैटर्न का हिस्सा थे। हालांकि, विशिष्ट रूप से पानीपत के कुरैशियों के लिए कोई एकल शहर का सटीक रिकॉर्ड नहीं मिलता, लेकिन सामान्य प्रवृत्ति यही दर्शाती है कि वे पाकिस्तानी पंजाब में फैल गए, जहां आज भी कुरैशी समुदाय की बड़ी आबादी है। कुछ परिवारों ने सिंध प्रांत (जैसे कराची) में भी बसना चुना, लेकिन पानीपत जैसे क्षेत्रों से मुख्य प्रवास पंजाब की ओर था।
कुरैशी समुदाय पैगंबर मुहम्मद से अपने वंशीय संबंध को गर्व से याद करता है, और यह उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।पानीपत के कुरैशियान मोहल्ले जैसे इलाके इस ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाते हैं, जहां मुस्लिम कुरैशी सदियों तक बसे रहे और सामाजिक सद्भाव बनाए रखा।

(यह जानकारी ऐतिहासिक स्रोतों,मेरे पिताजी मास्टर सीता राम सैनी द्वारा बताई बातों और समुदाय के वर्णनों पर आधारित है।)
Ram Mohan Rai ,
Panipat/ 28.01.2026

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