"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" nityanootan.blogspot.com/25.02.2026

"धार्मिक संस्थानों में बच्चों और महिलाओं का यौन शोषण: एक गंभीर और व्यापक समस्या" – समय आ गया है बच्चों को इन आवासीय गुरुकुलों, मदरसों और ईसाई धार्मिक प्रशिक्षण स्कूलों  से मुक्त करने का

●भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के लिए होने लगे तो चुप रहना अपराध है। हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर प्रयागराज में POCSO एक्ट के तहत यौन शोषण के आरोप लगे हैं, लेकिन सवाल किसी एक व्यक्ति या एक आश्रम का नहीं है। सवाल उन हजारों आवासीय धार्मिक संस्थानों का है – हिंदू गुरुकुलों, मुस्लिम मदरसो, ईसाई चर्च स्कूलों और मठ-आश्रमों का – जहां लंबे समय से बच्चों (खासकर नाबालिग लड़कों और लड़कियों) तथा महिलाओं (ननों, शिष्याओं, देवदासियों) के खिलाफ यौन शोषण की शिकायतें बार-बार आ रही हैं। कई मामलों में कोर्ट में केस दर्ज हुए, दोषियों को सजा भी मिली, लेकिन समस्या जड़ से नहीं उखड़ी। यह कोई प्राचीन या मिथकीय बात नहीं है – यह आज की वास्तविकता है।

 ●गुरुकुल और हिंदू आश्रमों में शोषण की कहानियां:
आवासीय गुरुकुलों में बच्चे गुरु-शिष्य परंपरा के नाम पर रहते हैं। लेकिन कई जगहों पर यह परंपरा शोषण का साधन बन गई है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में वारकरी गुरुकुल के प्रमुख भगवान कोकरे महाराज पर नाबालिग लड़की का यौन शोषण करने का आरोप लगा और उन्हें गिरफ्तार किया गया। पुराने मामलों में दिल्ली के एक गुरुकुल में पांच छात्रों पर अन्य छात्रों के साथ यौन शोषण का केस दर्ज हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हरे कृष्ण मूवमेंट (ISKCON) के पुराने गुरुकुलों में 1970-80 के दशक में बच्चों पर शारीरिक, मानसिक और यौन शोषण की पुष्टि हुई थी। हालिया अविमुक्तेश्वरानंद मामले में भी आरोप है कि आश्रम में नाबालिगों का शोषण ‘गुरु सेवा’ के नाम पर हुआ। ये मामले बताते हैं कि बंद दरवाजों के पीछे, बिना नियमित निगरानी के, शक्ति का दुरुपयोग आसान हो जाता है।

● मदरसों में लगातार आ रही शिकायतें:
मदरसों में भी यौन शोषण की घटनाएं कम नहीं। केरल के विभिन्न मदरसों में शिक्षकों पर नाबालिग लड़कों का बार-बार शोषण करने के मामले सामने आए। एक मामले में मदरसा शिक्षक मुहम्मद रफी को 18 साल की सजा सुनाई गई। ओडिशा में एक 12 वर्षीय मदरसा छात्र का शोषण करने के बाद हत्या कर दी गई, क्योंकि वह सीनियर छात्रों के शोषण को उजागर करने की धमकी दे रहा था। पाकिस्तान में तो मदरसों में यौन हिंसा का पैटर्न इतना आम है कि अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में हजारों मामले दर्ज हैं। भारत में भी एनसीपीसीआर और मीडिया रिपोर्ट्स बार-बार मदरसों में निगरानी की कमी और कवर-अप की बात उठाती रही हैं। यहां भी बच्चे मुफ्त शिक्षा और रहने के नाम पर फंस जाते हैं, लेकिन सुरक्षा शून्य।

 ●चर्च स्कूलों, कॉन्वेंट्स और ईसाई संस्थानों की स्थिति:
ईसाई संस्थानों में नन और नाबालिग छात्राओं पर शोषण की लंबी फेहरिस्त है। केरल में बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर एक नन का 13 बार बलात्कार करने का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना। एसोसिएटेड प्रेस की जांच में पता चला कि दशकों से भारत के कई कॉन्वेंट्स में पुजारियों द्वारा ननों का यौन शोषण चलता रहा। केरल में ही एक पुजारी को नाबालिग लड़की का शोषण करने पर दोहरी उम्रकैद की सजा हुई। रानाघाट (पश्चिम बंगाल) में एक बुजुर्ग नन का गैंगरेप हुआ। कई मामलों में चर्च प्रबंधन ने शिकायतों को दबाने की कोशिश की। ये संस्थान शिक्षा के नाम पर चलते हैं, लेकिन अंदरूनी माहौल अक्सर शोषणकारी साबित होता है।

 ●देवदासी प्रथा: बचपन में ही मंदिरों में समर्पण और फिर शोषण
यह प्रथा सबसे पुरानी और सबसे क्रूर है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में आज भी सैकड़ों लड़कियों को बचपन में ही देवी के नाम पर ‘समर्पित’ कर दिया जाता है। देवदासी बनने के बाद वे मंदिर की ‘दासी’ कहलाती हैं, लेकिन वास्तव में यौन शोषण और वेश्यावृत्ति में धकेल दी जाती हैं। कानून (1988 का राष्ट्रीय प्रतिबंध) के बावजूद यह प्रथा चल रही है। नेशनल कमीशन फॉर वीमेन और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार हजारों देवदासियां आज भी इस चक्रव्यूह में फंसी हैं। यह कोई ‘पुरानी बात’ नहीं – 2020-25 की रिपोर्ट्स में भी नई समर्पण की घटनाएं दर्ज हैं।

 ●सब नंगे हैं – कोई एक धर्म नहीं
कोई भी धर्म या संप्रदाय खुद को इससे मुक्त नहीं बता सकता। हिंदू गुरुकुल हों, मुस्लिम मदरसे हों, ईसाई कॉन्वेंट-स्कूल हों या मंदिर-आश्रम – हर जगह बंद कमरों, गुरु-शिष्य/पुजारी-भक्त संबंध और बिना बाहरी निगरानी के माहौल ने शोषण को बढ़ावा दिया। कई मामलों में संस्थान प्रबंधन ने शिकायत दबाई, पीड़ितों को धमकाया या चुप कराया। POCSO एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और महिला सुरक्षा कानूनों के बावजूद क्रियान्वयन कमजोर है। अहमदाबाद, सिरसा, मदुरै स्थित आश्रमों के अनेक धर्म गुरु जेलों में हैं. 

 ●समाधान: बच्चों को इन संस्थानों से मुक्त करना जरूरी
समय आ गया है कि हम सख्त कदम उठाएं:
- सभी आवासीय धार्मिक संस्थानों (गुरुकुल, मदरसा, कॉन्वेंट, आश्रम) में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का रहना पूरी तरह प्रतिबंधित या सख्त शर्तों के अधीन किया जाए।
- अनिवार्य रूप से CCTV, नियमित पुलिस/चाइल्ड राइट्स कमीशन निरीक्षण, और स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य।
- बच्चों को दिन के समय की शिक्षा दी जाए, लेकिन रात्रि आवास परिवार या सरकारी होस्टल में हो।
- देवदासी प्रथा पर सख्ती से अमल, दोषियों पर POCSO + ट्रैफिकिंग कानून लगे।
- सभी धार्मिक संस्थानों को बाल अधिकारों का पालन करने के लिए रजिस्ट्रेशन और ट्रेनिंग अनिवार्य।
- पीड़ितों के लिए त्वरित न्याय, मुआवजा और पुनर्वास।

●धार्मिक शिक्षा घर पर, सामुदायिक स्तर पर या डे-स्कूल में दी जा सकती है। बच्चों को मंदिर-मस्जिद-चर्च की दीवारों के अंदर कैद करने की जरूरत नहीं। उनका बचपन, सम्मान और सुरक्षा पहले है। जब तक हम इन संस्थानों को बिना सवाल पूछे ‘पवित्र’ मानते रहेंगे, शोषण जारी रहेगा। 

●सभी धर्मों के सच्चे अनुयायियों को खुद आगे आना चाहिए – क्योंकि सच्चा धर्म बच्चे की रक्षा करता है, शोषण नहीं। सरकार, समाज और मीडिया को मिलकर इन आवासीय धार्मिक संस्थानों से बच्चों को मुक्त कराना चाहिए। यह कोई धर्म-विरोधी कदम नहीं, बल्कि मानवता और बच्चों के अधिकारों का समर्थन है। अब चुप्पी तोड़ने का समय है।
Ram Mohan Rai, 
Nityanootan.blogspot.com. 
25.02.2026

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