शांति की आग: गोली नहीं, बोली चाहिए
बारिश के तूफान की तरह, दुनिया में चल रही जंगों का शोर भी लगातार सुनाई दे रहा है। और फिर भी, कुछ लोग—जिन्हें युद्ध सिर्फ़ एक "तमाशा" लगता है—खुशी से कहते हैं, "वाह, कितना रोमांचक!"। लेकिन मैंने देखा है वो दर्द। वो बच्चे जो भूख से तड़पते हैं, वो माँएँ जो बेघर होकर डर में जीती हैं, वो किसान जो फसल खराब होने से रातें काटते हैं।
हम सब—चाहे हम शहर में ऐश की जिंदगी जी रहे हों, या सिर्फ़ स्क्रॉल करते रहें—उस बेबसी से अलग नहीं हैं। परपीड़ा हमारी ही पीड़ा है। अगर हमने इस आग को नहीं बुझाया, तो ये हमारे घरों को भी जला देगी।
मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे 34 साल तक निर्मला देश पांडे दीदी के साथ काम करने का मौका मिला। वो संत विनोबा भावे की मानस पुत्री थीं—भूदान की पैदल यात्रा से शुरू करके दक्षिण एशिया तक, जम्मू-कश्मीर के आतंकपीड़ित इलाकों से लेकर बिहार के जहानाबाद और महाराष्ट्र के नक्सल क्षेत्रों तक। हम साथ गए, साथ चले, साथ सुने।
दीदी कहती थीं: "युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए। जंग नहीं, अमन चाहिए। गोली नहीं, बोली चाहिए।"
ये कोई नारा नहीं था—ये उनका जीवन था। वो महिलाओं को साथ लेकर पाकिस्तान-भारत के पुराने सैनिकों से मिलतीं, अमन की बात करतीं। वो कहतीं कि हिंसा का जवाब सिर्फ़ बातचीत है, दिल से दिल तक।
मैंने देखा—कश्मीर में शांति रैली में लोग कैसे जुड़ते थे। नक्सल इलाकों में कैसे डर के बीच उम्मीद जागती थी। दक्षिण एशिया में कैसे दो देशों के बीच की दीवारें पिघलती थीं।
आज दुनिया फिर उसी मोड़ पर है। युद्ध की खबरें ट्रेंड कर रही हैं, लेकिन शांति की आवाज़ दब गई है। युवा साथी, मेरे पुराने दोस्त, और दुनिया भर के शांतिकर्मी—सुनो।
गांधी जी ने कहा था: "दुनिया बदलनी है, तो खुद से शुरू करो।"
दीदी का काम रुकना नहीं चाहिए। हम सब संकल्प लें —आखिरी दम तक इसे आगे बढ़ाए। क्योंकि अमन की आग भी लगती है—बस वो जलाने वाली नहीं, बुझाने वाली होती है।
Ram Mohan Rai.
Nityanootan.blogspot.com
05.04.2026
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