हेमवती नंदन बहुगुणा: विचार, व्यक्तित्व और राजनीतिक द्वंद्व का एक अध्याय
भारतीय राजनीति के इतिहास में हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अपने समय में समाजवादी सोच, संगठन क्षमता और जनसंपर्क के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई। विद्यार्थी जीवन से ही मैं उनके व्यक्तित्व और विचारधारा से अत्यंत प्रभावित रहा। उनके भीतर समाजवाद के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और जनहित के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण दिखाई देता था।
यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी ने देश में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए— प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण जन और वितरण प्रणाली को मजबूत करने जैसे कदमों ने भारत की सामाजिक-आर्थिक दिशा को नई दिशा दी। 1971 के चुनाव में “गरीबी हटाओ” के नारे के साथ मिली उनकी ऐतिहासिक विजय ने देश में एक नई आशा का संचार किया। उस समय उनके साथ कई प्रखर समाजवादी विचारक और नेता जुड़े थे, जिनमें पी.एन. हक्सर, चंद्रजीत यादव, के.आर. गणेश, नंदिनी सत्पथी और स्वयं बहुगुणा जी प्रमुख थे।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में बहुगुणा जी का कार्यकाल एक नई ऊर्जा और परिवर्तन की लहर लेकर आया। उनके नेतृत्व में प्रशासनिक सक्रियता और राजनीतिक जागरूकता का विस्तार हुआ। परंतु राजनीति के जटिल समीकरणों के चलते उन्हें पद से हटाया गया। आपातकाल के तुरंत बाद उन्होंने बाबू जगजीवन राम और अन्य साथियों के साथ मिलकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी की स्थापना की, जो उस समय लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।
1980 में उन्होंने पुनः इंदिरा गांधी के साथ कांग्रेस में वापसी की, लेकिन जल्द ही उपेक्षा और आंतरिक मतभेदों के कारण उन्होंने अलग राह चुनी और समाजवादी कांग्रेस का गठन किया। यह उनके राजनीतिक जीवन का वह दौर था, जिसमें आदर्श और व्यावहारिक राजनीति के बीच संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
मुझे व्यक्तिगत रूप से उनके साथ जुड़ने और उनसे सीखने का अवसर मिला। पानीपत में उनके आगमन पर हमने अपने साथियों के साथ मिलकर उनका स्वागत किया, बुद्धिजीवियों की बैठक आयोजित की और एक जनसभा का भी आयोजन किया। वे इस आयोजन से अत्यंत प्रभावित हुए और मुझे अपनी पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण दिया। किंतु मैंने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते इसे स्वीकार नहीं किया।
हालांकि, एक घटना ने मुझे गहराई से विचलित किया। जब वे पानीपत में ही एक ब्राह्मण सम्मेलन में शामिल हुए और मंच पर प्रतीकात्मक रूप से अपना कुर्ता बदलकर यज्ञोपवीत दिखाने का प्रयास किया, तो यह उनके समाजवादी और जाति-विहीन विचारों के विपरीत लगा। एक ऐसा नेता, जो सिद्धांततः जाति और धर्म से ऊपर था, उसका इस प्रकार का आचरण निराशाजनक प्रतीत हुआ।
समय के साथ उनके परिवार की राजनीतिक दिशा भी बदली। उनके पुत्र विजय बहुगुणा और पुत्री रीता बहुगुणा जोशी दोनों ने राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, किंतु उनकी वर्तमान राजनीतिक स्थिति उनके पिता की मूल समाजवादी विचारधारा से भिन्न दिखाई देती है। यह राजनीति की उस वास्तविकता को दर्शाता है, जहां विचारधारा समय के साथ परिवर्तित होती रहती है।
आज बहुगुणा जी के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए मन में मिश्रित भावनाएं उत्पन्न होती हैं—एक ओर उनके आदर्शों और योगदान के प्रति सम्मान, तो दूसरी ओर उनके जीवन के अंतिम चरण में दिखाई दिए वैचारिक द्वंद्व के प्रति खेद। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और देश में ऐसे नेताओं का उदय हो, जो अपने सिद्धांतों के प्रति अंत तक अडिग रहें।
हेमवती नंदन बहुगुणा का जीवन हमें यह सिखाता है कि राजनीति केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि विचार और मूल्यों की परीक्षा भी है—और इस परीक्षा में स्थिरता ही किसी नेता की वास्तविक पहचान बनाती है।
Ram Mohan Rai
nityanootan.blogspot.com
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