उजबेकिस्तान से दोस्ती के नाम-राम मोहन राय

 

समर्पण

      उन सभी उज़्बेक मित्रों, शिक्षकों और शुभचिंतकों को,

जिन्होंने सन् 1980-81 में अपने स्नेह, आत्मीयता और सहयोग से मुझे यह अनुभव कराया कि मित्रता की कोई सीमा नहीं होती, न भाषा की, न भूगोल की।

विशेष रूप से मेरी आदरणीय शिक्षिका

रईसा करिमोवना

को,

जिनके स्नेहिल मार्गदर्शन, प्रेरणा और अपनत्व ने मेरे उज़्बेकिस्तान प्रवास को जीवन की अविस्मरणीय धरोहर बना दिया।

उनकी स्मृति और सम्मान में यह पुस्तक

"उज़्बेकिस्तान से दोस्ती के नाम"

सादर समर्पित।




प्राक्कथन

समय का अपना एक अद्भुत स्वभाव होता है। वह बीत तो जाता है, परंतु अपने पीछे स्मृतियों के ऐसे पदचिह्न छोड़ जाता है जो वर्षों बाद भी मन की धरती पर वैसे ही ताज़ा बने रहते हैं। मेरे जीवन की ऐसी ही एक अमूल्य स्मृति है—सन् 1980-81 में सोवियत उज़्बेकिस्तान में बिताए गए वे आठ महीने, जिन्होंने मेरे दृष्टिकोण, अनुभवों और जीवन-बोध को नई दिशा दी।

आज उस यात्रा को लगभग छियालीस वर्ष बीत चुके हैं। जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। शिक्षा, व्यवसाय, परिवार और सामाजिक दायित्वों के बीच उज़्बेकिस्तान की स्मृतियाँ कहीं मन के एक शांत कोने में सुरक्षित पड़ी रहीं। कई बार मन में विचार आया कि उन अनुभवों को शब्दों में ढालूँ, उन्हें एक यात्रा-वृत्तांत का रूप दूँ, परंतु संकोच और आत्मविश्वास की कमी के कारण यह कार्य टलता रहा।

कुछ समय पूर्व संयोगवश मैं अपने पुराने चित्रों और दस्तावेज़ों को देख रहा था। उन्हीं में उज़्बेकिस्तान प्रवास की कुछ तस्वीरें भी थीं। जैसे ही मेरी दृष्टि अपनी प्रिय शिक्षिका रईसा करिमोवना के चित्र पर पड़ी, मानो स्मृतियों की एक बंद खिड़की अचानक खुल गई। ताश्कंद की सड़कें, चोरसू बाज़ार की चहल-पहल, कपास के खेत, बुखारा और समरकंद की ऐतिहासिक धरोहरें, फरगना की हरियाली, मित्रों की मुस्कान, शिक्षकों का स्नेह और उज़्बेक जनता का भारत के प्रति प्रेम—सब कुछ चलचित्र की भाँति आँखों के सामने उभर आया।

उस क्षण से स्मृतियों की यह यात्रा शब्दों की यात्रा बन गई। एक-एक कर घटनाएँ, अनुभव, संवाद और भावनाएँ कागज़ पर उतरने लगीं। देखते ही देखते ये संस्मरण 47 अध्यायों की एक शृंखला में परिवर्तित हो गए। यह पुस्तक केवल स्थानों और ऐतिहासिक इमारतों का वर्णन नहीं है, बल्कि उन लोगों, संबंधों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज़ है, जिन्होंने मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ी।

मैं स्वयं को लेखक नहीं मानता। साहित्य-सृजन का कोई दावा भी नहीं करता। मैं तो केवल स्वान्तः सुखाय लिखता हूँ। जो देखा, जो जिया, जो अनुभव किया और जो आज भी हृदय में स्पंदित है, उसी को सरल शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। यदि इन पृष्ठों में कहीं आत्मीयता, सच्चाई और मानवीय संवेदना का स्पर्श पाठकों को अनुभव हो, तो मैं अपने प्रयास को सफल समझूँगा।

यह पुस्तक मैं अपनी आदरणीय शिक्षिका रईसा करिमोवना को सादर समर्पित करता हूँ। यदि उनका स्नेह, मार्गदर्शन और प्रेरणा मुझे न मिली होती, तो संभवतः यह यात्रा भी इतनी अर्थपूर्ण न बन पाती और न ही यह पुस्तक अस्तित्व में आती। उनके एक चित्र ने ही स्मृतियों के उस विशाल संसार का द्वार खोल दिया, जो आज इस पुस्तक के रूप में आपके समक्ष है।

"उज़्बेकिस्तान से दोस्ती के नाम" केवल मेरी यात्रा की कहानी नहीं, बल्कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे सांस्कृतिक स्नेह, आत्मीयता और मानवीय संबंधों को समर्पित एक विनम्र श्रद्धांजलि है।

मैं आशा करता हूँ कि पाठक इन संस्मरणों के माध्यम से न केवल उस समय के उज़्बेकिस्तान को देख पाएँगे, बल्कि उन भावनाओं को भी महसूस करेंगे, जिन्हें मैंने वहाँ रहकर अनुभव किया था।

स्नेह और विनम्रता सहित,

— राम मोहन राय
(1980-81 के उज़्बेकिस्तान प्रवास की स्मृतियों के साथ)

लेखक की ओर से
यात्राएँ केवल स्थानों की नहीं होतीं, वे मनुष्य के भीतर भी घटित होती हैं। कुछ यात्राएँ हमें नए नगरों, नई सभ्यताओं और नए लोगों से परिचित कराती हैं, जबकि कुछ यात्राएँ हमारे भीतर स्थायी रूप से बस जाती हैं। उज़्बेकिस्तान की मेरी यात्रा ऐसी ही एक यात्रा थी।
सन् 1980-81 में अध्ययन के उद्देश्य से मुझे सोवियत उज़्बेकिस्तान में लगभग आठ महीने रहने का अवसर प्राप्त हुआ। उस समय मैं यह नहीं जानता था कि यह प्रवास मेरे जीवन की सबसे मूल्यवान स्मृतियों में परिवर्तित हो जाएगा। ताश्कंद, समरकंद, बुखारा और फरगना के ऐतिहासिक नगरों से लेकर वहाँ के गाँवों, खेतों, विद्यालयों, बाज़ारों और सांस्कृतिक आयोजनों तक, हर अनुभव मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ गया।
इन संस्मरणों में मैंने किसी इतिहासकार या शोधकर्ता की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक साधारण भारतीय विद्यार्थी की आँखों से देखे गए उज़्बेकिस्तान को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें कहीं आश्चर्य है, कहीं सीख है, कहीं संस्कृति का सौन्दर्य है और कहीं मनुष्यता की वह ऊष्मा है, जो देशों की सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ती है।
इन लेखों का उद्देश्य केवल अतीत का वर्णन करना नहीं है। मेरा प्रयास है कि नई पीढ़ी यह समझ सके कि भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंध केवल राजनयिक या आर्थिक नहीं हैं; वे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक स्तर पर भी अत्यंत गहरे हैं।
यदि इस पुस्तक को पढ़ते समय पाठक मेरे साथ उन गलियों में चल सकें, उन बाज़ारों की चहल-पहल सुन सकें, उन लोगों की आत्मीयता अनुभव कर सकें और उस युग के उज़्बेकिस्तान की झलक पा सकें, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगा।
यह पुस्तक स्मृतियों की उस यात्रा का परिणाम है, जो चार दशकों से अधिक समय तक मेरे मन में सुरक्षित रही और अंततः शब्दों का रूप लेकर आपके समक्ष प्रस्तुत हुई।
आप सभी पाठकों के स्नेह और शुभकामनाओं की अपेक्षा के साथ।
— राम मोहन राय


आभार
इस पुस्तक के लेखन और प्रकाशन की यात्रा में अनेक व्यक्तियों का प्रत्यक्ष और परोक्ष योगदान रहा है। मैं उन सभी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
सबसे पहले मैं उज़्बेकिस्तान की उस धरती को नमन करता हूँ, जिसने मुझे अपने बीच स्थान दिया और अपने इतिहास, संस्कृति तथा मानवीय मूल्यों से परिचित होने का अवसर प्रदान किया।
मैं अपनी आदरणीय शिक्षिका रईसा करिमोवना के प्रति विशेष आभार व्यक्त करता हूँ। उनका स्नेह, मार्गदर्शन और प्रेरणा मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेंगे। इस पुस्तक की प्रेरणा भी कहीं न कहीं उनकी स्मृतियों से ही प्राप्त हुई है।
मैं उन सभी उज़्बेक मित्रों, सहपाठियों, शिक्षकों और परिवारों का भी आभारी हूँ, जिनसे मुझे आत्मीयता, सहयोग और प्रेम मिला। भाषा भिन्न होने के बावजूद उन्होंने मुझे कभी पराया नहीं समझा।
अपने परिवार के सदस्यों का भी मैं हृदय से धन्यवाद करता हूँ, जिनके प्रोत्साहन और धैर्य ने मुझे इन संस्मरणों को पुस्तक का रूप देने के लिए प्रेरित किया।
अंत में मैं अपने पाठकों का आभारी हूँ, जो इस पुस्तक को पढ़कर मेरी स्मृतियों की यात्रा में सहभागी बनेंगे। यदि इन पृष्ठों के माध्यम से भारत और उज़्बेकिस्तान के मध्य मित्रता और सांस्कृतिक निकटता की भावना को थोड़ा भी बल मिले, तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।
सभी के प्रति कृतज्ञता सहित,
— राम मोहन राय




ताशकंद की ओर मेरी पहली उड़ान -1

रूस जाने की मेरी कहानी अपने आप में अत्यंत रोचक, रोमांचकारी और अविस्मरणीय है। आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ तो मन उत्साह और आनंद से भर उठता है।

एक दिन प्रातःकाल हमारे घर जिला पानीपत की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सचिव कॉमरेड रघबीर सिंह जी आए। वे मेरे पिता स्वर्गीय मास्टर सीताराम जी के छात्र रह चुके थे और परिवार से उनका आत्मीय संबंध था। आते ही उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राममोहन, कुछ ही दिनों बाद तुम्हें सोवियत संघ (रूस) जाना है।"

यह समाचार सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय मेरे लिए विदेश यात्रा किसी स्वप्न से कम नहीं थी। मैं भोलेपन में यह समझता था कि जैसे रेल का टिकट लेकर हम ट्रेन में बैठ जाते हैं, उसी प्रकार हवाई जहाज में भी बैठ जाया जाता होगा। तभी उन्होंने बताया कि विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट आवश्यक होता है। "पासपोर्ट" शब्द मेरे लिए बिल्कुल नया था। मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और यात्रा में केवल दस दिन शेष थे।

भागदौड़ शुरू हुई। चंडीगढ़ के एक मित्र की सहायता से मेरा पासपोर्ट आवेदन तो हो गया, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह इतने कम समय में कैसे प्राप्त होगा। उस समय हरियाणा के ऊर्जा मंत्री श्री शमशेर सिंह सुरजेवाला थे। उनके साथ मैं एंटी-फासिस्ट आन्दोलन तथा अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के कार्यों में जुड़ा हुआ था। मैंने उनसे संपर्क किया और अपनी समस्या बताई। उन्होंने अगले दिन अपने कार्यालय में बुलाया।

मैं उनके कार्यालय पहुँचा और पूरी स्थिति बताई। उन्होंने तत्काल क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (आर.पी.ओ.) को फोन किया और कहा, "ये हमारे अच्छे साथी हैं, इनका पासपोर्ट शीघ्र बनवाइए।" मुस्कुराते हुए उन्होंने अधिकारी से कहा, "सुरजेवाला किसी का एहसान नहीं रखता, कभी मेरी सेवा की आवश्यकता हो तो अवश्य याद करना।"

उनकी कृपा से मैं उसी दिन पासपोर्ट कार्यालय, चंडीगढ़ पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि आर.पी.ओ. कार्यालय के बाहर मेरे नाम की घोषणा की जा रही थी। मैं भीतर गया, आवश्यक दस्तावेज जमा किए। अधिकारी ने कहा कि सामान्यतः इसमें पुलिस सत्यापन सहित लंबी प्रक्रिया होती है, परन्तु सुरजेवाला साहब के विशेष अनुरोध के कारण आप प्रतीक्षा कीजिए। मैं बाहर बैठ गया। लगभग शाम चार बजे मुझे मेरा पासपोर्ट मिल गया। वह क्षण मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था।

अब सारी तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी थीं। बचपन से ही हवाई जहाज के प्रति मेरे मन में विशेष आकर्षण था। जब भी आकाश में कोई विमान उड़ता दिखाई देता, उसकी आवाज सुनकर मैं और मोहल्ले के अन्य बच्चे उसकी दिशा में दौड़ पड़ते। जब तक वह हमारी आँखों से ओझल नहीं हो जाता, हम उसे निहारते रहते। आज वही सपना साकार होने जा रहा था—मैं स्वयं हवाई जहाज में बैठने वाला था।

मेरे साथ पानीपत से कॉमरेड जगदीश शर्मा जी मुझे विदा करने दिल्ली हवाई अड्डे तक आए। दिन में हमारी मुलाकात ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के अध्यक्ष तथा तत्कालीन राज्यसभा सदस्य कॉमरेड सी. के. चंद्रप्पन जी से हुई। उन्होंने हमें यात्रा से संबंधित अनेक आवश्यक निर्देश दिए।

हवाई अड्डे पर मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे साथ दो अन्य युवा साथी भी इस यात्रा पर जा रहे हैं—नवतेज सिंह, जो कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से थे और पूर्व परिचित भी थे, तथा इलाहाबाद (प्रयागराज) के सुरेश त्रिपाठी। इस प्रकार हम तीन भारतीय युवा सोवियत संघ की यात्रा के लिए तैयार थे।

उस समय डॉलर की कीमत लगभग बीस रुपये थी। यात्रा के लिए हमने चार सौ रुपये देकर बीस अमेरिकी डॉलर खरीदे, जिन्हें साथ रखना आवश्यक था। इसके अतिरिक्त सौ रुपये हवाई अड्डा कर (एयरपोर्ट टैक्स) के रूप में जमा कराए। सारी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद हम एअरोफ्लोट के विमान में सवार हुए।

रात्रि लगभग एक बजे विमान ने दिल्ली से उड़ान भरी। यह मेरे जीवन की पहली हवाई यात्रा थी। उत्साह, जिज्ञासा और रोमांच से मन भरा हुआ था। रात के अँधेरे में बादलों के ऊपर उड़ते हुए मैं बार-बार खिड़की से बाहर झाँकता और सोचता कि मैं सचमुच अपने देश की सीमाओं से बाहर निकल रहा हूँ।

लगभग चार बजे प्रातः हमारा विमान ताशकंद के आकाश में पहुँच गया। उतरने से पहले विमान कुछ देर ताशकंद शहर के ऊपर चक्कर लगा रहा था। नीचे दूर-दूर तक फैली हुई जगमगाती रोशनियाँ मानो किसी स्वप्नलोक का दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। चौड़ी सड़कों पर चलती रोशनी की कतारें, सुसज्जित नगर और अनुशासित प्रकाश व्यवस्था देखकर मन अभिभूत हो उठा।

कुछ ही क्षण बाद विमान ताशकंद हवाई अड्डे पर उतर गया। जैसे ही मैंने उस धरती पर पहला कदम रखा, मन में एक अनोखा उल्लास और गर्व की अनुभूति हुई। यह केवल एक विदेशी यात्रा नहीं थी, बल्कि मेरे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। ताशकंद की वह पहली सुबह, हवाई अड्डे की वह पहली झलक और जीवन की वह पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान आज भी मेरी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ सुरक्षित है।
राम मोहन राय
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 ताशकंद में पहला दिन : अनिश्चितता, संघर्ष और नई शुरुआत

प्रातः लगभग चार बजे हमारा विमान ताशकंद हवाई अड्डे पर उतरा। उस समय ताशकंद तत्कालीन सोवियत संघ का एक प्रमुख नगर था और मध्य एशिया का महत्वपूर्ण केंद्र भी। हवाई अड्डा आधुनिक सुविधाओं तथा आकर्षक साज-सज्जा से युक्त था। हम अपना सामान प्राप्त करके उस स्थान पर जाकर बैठ गए जहाँ हमें विश्वास था कि कोई न कोई अधिकारी अथवा प्रतिनिधि हमें लेने अवश्य आएगा।

किन्तु समय बीतता गया। एक घंटा, दो घंटे, तीन घंटे और देखते-देखते पूरे छह घंटे गुजर गए। सुबह के दस बज चुके थे, परन्तु हमें लेने कोई नहीं आया। बाद में अनुमान हुआ कि संभवतः संबंधित कार्यालय सुबह दस बजे खुला होगा और तभी किसी अधिकारी को हमारी जानकारी मिली होगी।

अंततः एक युवा महिला वहाँ पहुँचीं। उनका नाम स्वेतलाना था। वह लगभग छह फुट लंबी, आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी तथा अत्यंत आत्मविश्वासी थीं। सौभाग्य से उन्हें अंग्रेज़ी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने हमारा स्वागत किया और फिर हमें वाहन में बैठाकर कॉम्सोमोल विश्वविद्यालय ले गईं, जहाँ हमारे रहने और ठहरने की व्यवस्था की गई थी।

हवाई अड्डे पर बिताए वे छह घंटे आज भी स्मृति-पटल पर अंकित हैं। हमारे पास रूसी मुद्रा नहीं थी। यदि चाय अथवा कॉफी पीनी होती तो उसके लिए लगभग डेढ़ डॉलर खर्च करने पड़ते। उस समय सोवियत रूबल का मूल्य अमेरिकी डॉलर से भी कुछ अधिक था। हमारे पास कुल बीस डॉलर ही थे, जिन्हें हमें पूरे आठ महीने के प्रवास के दौरान किसी आपातकालीन आवश्यकता के लिए सँभालकर रखना था। इसलिए हम चाहकर भी कोई अनावश्यक खर्च नहीं कर सकते थे।

समस्या केवल धन की ही नहीं थी। हमें समय का भी सही अनुमान नहीं था। भारतीय समय और ताशकंद के समय में लगभग तीन से चार घंटे का अंतर था। सोवियत संघ इतना विशाल देश था कि उसके विभिन्न क्षेत्रों में समय भी अलग-अलग था। ताशकंद मध्य एशिया में स्थित होने के कारण भारत की अपेक्षा भिन्न समय क्षेत्र में था।

सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की थी। हमें रूसी भाषा का एक शब्द भी नहीं आता था और अधिकांश लोग अंग्रेज़ी नहीं समझते थे। हम जानना चाहते थे कि सूर्योदय कब होगा, परन्तु किसी से पूछ नहीं पा रहे थे। अंततः हमें एक कागज़ और कलम मिली। हमने कागज़ पर एक गोल घेरा बनाया और उसके चारों ओर किरणें खींच दीं, ताकि वह सूर्य जैसा दिखाई दे। फिर हम लोगों को वह चित्र दिखाकर इशारों से पूछने लगे कि सूर्य कब निकलेगा। लोग हमारी बात समझ नहीं पाते और हम उनकी बात नहीं समझ पाते। इस प्रकार संकेतों और मुस्कानों के सहारे संवाद का प्रयास चलता रहा, किन्तु कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाया।

वे छह घंटे हमें बहुत भारी लग रहे थे। मन में बार-बार यही विचार आता था कि यदि पहले ही दिन इतनी कठिनाइयाँ हैं, तो आने वाले आठ महीने कैसे बीतेंगे? क्या हम इस अनजान देश में अपने आप को ढाल पाएँगे? क्या यहाँ मन लग सकेगा? ऐसे अनेक प्रश्न मन को उद्वेलित कर रहे थे।

किन्तु हॉस्टल पहुँचते ही परिस्थितियाँ बदलने लगीं। हमें अपना कमरा आवंटित कर दिया गया। सामान सुरक्षित रख दिया गया और थोड़ी राहत का अनुभव हुआ। तभी सूचना मिली कि नाश्ता करने के बाद हमें मेडिकल जाँच के लिए जाना है।

एक सरल और सौम्य स्वभाव के उज़्बेक युवक को हमारी सहायता की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे हमें मेडिकल परीक्षण केंद्र लेकर गए। वहाँ हमारा विस्तृत स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। सौभाग्य से सभी रिपोर्ट सामान्य पाई गईं। इसके बाद हमें आधिकारिक रूप से हॉस्टल में रहने की अनुमति प्रदान कर दी गई।

इस प्रकार ताशकंद में हमारा पहला दिन अनिश्चितता, प्रतीक्षा, भाषा की कठिनाइयों और मानसिक संघर्ष से आरम्भ हुआ, किन्तु धीरे-धीरे वही दिन एक नए जीवन, नई संस्कृति और नए अनुभवों की सुखद शुरुआत का आधार बन गया।
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ताशकंद : इतिहास, संस्कृति और आत्मीयता का अनुपम नगर-3

ताशकंद केवल उज़्बेकिस्तान की राजधानी ही नहीं, बल्कि मध्य एशिया के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र भी है। प्राचीन काल से ही भारत और ताशकंद के बीच घनिष्ठ संबंध रहे हैं। व्यापार, संस्कृति, शिक्षा और राजनयिक संपर्कों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के लोग सदियों से एक-दूसरे के निकट रहे हैं। इतिहास के अनेक अध्याय इस बात के साक्षी हैं कि भारत और मध्य एशिया का संबंध केवल भौगोलिक निकटता का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मीयता का भी रहा है।

"ताशकंद" शब्द का अर्थ ही एक सुंदर और आकर्षक नगर माना जाता है, और वास्तव में इसकी सुंदरता देखने योग्य है। चौड़ी सड़कों, हरियाली से भरपूर उद्यानों, सुव्यवस्थित भवनों और स्वच्छ वातावरण से सुसज्जित यह नगर आगंतुकों के मन पर गहरी छाप छोड़ता है। अक्टूबर क्रांति के बाद जब उज़्बेकिस्तान सोवियत संघ का एक गणराज्य बना, तब ताशकंद के विकास को नई गति मिली। शिक्षा, विज्ञान, उद्योग और संस्कृति के क्षेत्रों में यहाँ उल्लेखनीय प्रगति हुई और यह नगर पूरे सोवियत संघ के प्रमुख शहरों में गिना जाने लगा।

उज़्बेक भाषा यहाँ की प्रमुख भाषा है, किंतु रूसी भाषा का प्रभाव भी व्यापक रूप से दिखाई देता है। सोवियत काल में अनेक लोगों के नामों के रूसीकरण की प्रक्रिया भी देखने को मिली। उदाहरण के लिए, पारंपरिक उज़्बेक अथवा इस्लामी नामों को रूसी शैली में ढालकर बोला जाने लगा। फिर भी, इस परिवर्तन के बावजूद उज़्बेक समाज ने अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखा। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी उन्होंने अपनी जड़ों से नाता नहीं तोड़ा।

ताशकंद के बाज़ारों में घूमना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है। सोवियत काल में दुकानों को रूसी शब्द "मगाज़िन" कहा जाता था, किंतु स्थानीय लोग आज भी "बाज़ार" शब्द को आत्मीयता से प्रयोग करते हैं। इन बाज़ारों में स्थानीय जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। नगर की गलियों, चौकों और मोहल्लों के नाम स्थानीय नायकों, कवियों, कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों के नाम पर रखे गए हैं। कहीं उज़्बेक इतिहास के महान व्यक्तित्वों की स्मृतियाँ जीवित हैं तो कहीं रूस और अन्य देशों के प्रसिद्ध लोगों का सम्मान किया गया है।

उज़्बेक लोगों की वेशभूषा भी उनकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुरुष प्रायः चुस्त पायजामा, लंबा कोट या अचकन और सिर पर पारंपरिक उज़्बेक टोपी पहनते हैं। महिलाएँ भी शालीन और पूर्ण परिधान धारण करती हैं, जिनमें सलवार, लंबा कुर्ता, जैकेट और सिर पर टोपी या स्कार्फ शामिल होते हैं। आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पोशाक के प्रति उनका सम्मान आज भी बना हुआ है।

यहाँ के लोगों में सोने के प्रति विशेष आकर्षण देखने को मिलता है। अनेक लोग अपने दाँतों पर सोने की परत चढ़वाते हैं, जिससे मुस्कान में एक विशिष्ट सुनहरी चमक दिखाई देती है। यह स्थानीय संस्कृति की एक रोचक विशेषता है।

मेरे लिए ताशकंद की सबसे बड़ी विशेषता वहाँ के लोगों का प्रेम और अपनापन रहा। मेरा चेहरा कुछ गोल-मटोल होने के कारण जब मैं उज़्बेक टोपी पहनकर बाहर निकलता था, तो कई लोग मुस्कुराते हुए पूछ बैठते—"क्या आप उज़्बेक हैं?" जब मैं उन्हें बताता कि मैं हिंदुस्तान से हूँ, तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता की एक अलग ही चमक आ जाती। "हिंदुस्तानी" शब्द वे बड़े स्नेह और सम्मान के साथ उच्चारित करते थे। ऐसा लगता था मानो भारत का नाम सुनते ही उनके हृदय में कोई पुरानी आत्मीय स्मृति जाग उठती हो।

भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों की चर्चा बाबर के बिना अधूरी है। फ़रगना की धरती से निकला वह युवा शासक भारत आया और 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित कर मुगल साम्राज्य की स्थापना की। यद्यपि इतिहास की इन घटनाओं को आज के संबंधों का आधार नहीं माना जा सकता, फिर भी वे दोनों क्षेत्रों के साझा अतीत की एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य हैं।

मेरे अनुभव में ताशकंद की सबसे बड़ी पहचान उसकी इमारतें, सड़कें या बाज़ार नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों का स्नेह है। उन्होंने हर अवसर पर भारतीयों के प्रति सम्मान, प्रेम और आत्मीयता का परिचय दिया। यही कारण है कि ताशकंद मेरे लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि यादों, मित्रताओं और सांस्कृतिक निकटता का जीवंत प्रतीक बन गया है। अपनी इस यात्रा के आगामी संस्मरणों में मैं ऐसे अनेक प्रसंग साझा करूँगा, जो भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सदियों से चले आ रहे इस मानवीय संबंध की सुंदर कहानी को और अधिक उजागर करेंगे।
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ताशकंद के बाज़ार, भारतीयों के प्रति प्रेम और अविस्मरणीय आत्मीयता -4

ताशकंद में बिताए गए दिनों की अनेक स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में उसी ताजगी के साथ जीवित हैं, जैसे वे कल की ही बातें हों। उन स्मृतियों में सबसे आकर्षक स्थान ताशकंद के बाज़ारों का है। वहाँ के बाज़ार केवल खरीद-बिक्री के केंद्र नहीं थे, बल्कि स्थानीय संस्कृति, मानवीय संबंधों और आत्मीयता के जीवंत प्रतीक थे।

ताशकंद के आधुनिक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अपनी जगह थे, किंतु मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती थीं वे पारंपरिक मंडियाँ, जहाँ ताज़े फल, सब्जियाँ, दूध, मेवे, रंग-बिरंगे वस्त्र और दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुएँ सहजता से उपलब्ध हो जाती थीं। हम प्रायः सप्ताह भर की सब्जियाँ और फल एक साथ खरीद लाते और फिर निश्चिंत हो जाते कि अब कई दिनों तक बाज़ार जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

मेरे साथ अक्सर मेरे प्रिय मित्र नवतेज सिंह भी होते थे। उनकी सिख पगड़ी और विशिष्ट वेशभूषा लोगों का ध्यान तुरंत आकर्षित कर लेती थी। उस क्षेत्र में सिख समुदाय के लोग बहुत कम दिखाई देते थे, इसलिए अनेक उज़्बेक उन्हें किसी बड़े धार्मिक विद्वान या उलेमा के रूप में देखते थे। जब वे बाज़ार से गुजरते, तो कई बुज़ुर्ग सम्मानपूर्वक उन्हें सलाम करते। यह दृश्य हमारे लिए जितना आश्चर्यजनक था, उतना ही सुखद भी।

एक दिन बाज़ार में एक अत्यंत रोचक घटना घटी। हम एक उज़्बेक दुकानदार से तरबूज खरीदने पहुँचे। हमने उसका मूल्य पूछा और तरबूज चुन लिया। जब हमने पैसे देने के लिए हाथ बढ़ाया, तो दुकानदार ने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए और बड़े सम्मान के साथ बोला—

"हिन्दुस्तानी और उज़्बेकिस्तानी दोस्त... भाई-भाई!"

फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा—

"तोहफ़ा!"

यह सुनकर हम असमंजस में पड़ गए। भारत की तरह उज़्बेक भाषा में भी "तोहफ़ा" शब्द उपहार के लिए प्रयुक्त होता है। हम बार-बार पैसे देने का प्रयास करते रहे, लेकिन वह प्रेमपूर्वक मना करता रहा। अंततः उसके स्नेह के आगे हमें झुकना पड़ा। हमने उज़्बेक भाषा में "तशक्कुर" अर्थात धन्यवाद कहा और भावुक मन से वहाँ से विदा ली।

ऐसे अनुभव ताशकंद में अक्सर होते थे। जब लोग पहचान जाते कि हम भारत से हैं, तो वे बड़े उत्साह से बातचीत शुरू कर देते। रूसी भाषा में पूछते—

"काक द्येला?" (कैसे हो?)

और हम मुस्कुराकर उत्तर देते—

"खराशो!" (अच्छे हैं।)

इसके बाद लगभग हर बार दो नाम अवश्य आते—

"इंदिरा गांधी कैसी हैं?"

"राज कपूर कैसे हैं?"

उनकी जिज्ञासा और अपनापन देखकर हम मुस्कुरा देते। उन्हें लगता था कि हर भारतीय का सीधा संबंध इंदिरा गांधी और राज कपूर से होगा। हम उन्हें क्या बताते कि हमने भी इंदिरा गांधी को अधिकांशतः समाचारों और दूरदर्शन पर ही देखा है और राज कपूर को उनकी फिल्मों के माध्यम से जाना है। किंतु यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण था कि भारत उनके हृदय में बसता था, और भारत का प्रतिनिधित्व उनके लिए इंदिरा गांधी और राज कपूर करते थे।

उस समय सोवियत संघ में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता चरम पर थी। राज कपूर, अमिताभ बच्चन और भारतीय सिनेमा के अनेक कलाकार वहाँ के लोगों के दिलों पर राज करते थे। एक दिन हमें पता चला कि स्थानीय सिनेमाघर में हिन्दी फिल्म "त्रिशूल" का रूसी भाषा में डब किया हुआ संस्करण प्रदर्शित हो रहा है। हम फिल्म देखने पहुँचे।

हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब देखा कि पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था। जैसे ही दर्शकों को पता चला कि कुछ भारतीय युवक फिल्म देखने आए हैं, पूरे सभागार में तालियाँ गूँज उठीं। लोगों ने खड़े होकर हमारा स्वागत किया। उन्हें शायद लगा कि हम भारत के किसी सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं। उस क्षण हमें ऐसा लगा जैसे हम साधारण विद्यार्थी नहीं, बल्कि अपने देश के सांस्कृतिक दूत हों। उस आत्मीय स्वागत ने हमारे मन को गहराई से छू लिया।

एक और घटना आज भी याद आते ही रोमांचित कर देती है।

एक शाम भोजन के बाद मैं और नवतेज सिंह टहलने निकले थे। रास्ते में दो उज़्बेक युवक मिले। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा—

"हिन्दुस्तानी?"

हमने "हाँ" कहा तो वे बड़े उत्साह से हमें गले लगाकर बोले—

"दोस्त! दोस्त!"

फिर उन्होंने आग्रह किया कि हम उनके साथ चलें। हम उनके पीछे-पीछे चल पड़े, किंतु मन में हल्का भय भी था। वे हमें शहर से कुछ दूर उस स्थान पर ले गए जहाँ नई इमारतों का निर्माण हो रहा था। चारों ओर सन्नाटा था। रास्ते भर हमारे मन में तरह-तरह के विचार आते रहे। हम सोच रहे थे कि यदि कोई अनहोनी हो गई तो किसी को यह भी पता नहीं चलेगा कि हम कहाँ गए थे।

लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे, तो देखा कि उनके कुछ और मित्र भी मौजूद थे। वे खुले वातावरण में भोजन बना रहे थे। उन्होंने अत्यंत आग्रहपूर्वक हमें अपने साथ बैठाया और भोजन कराया। उनके व्यवहार में इतना अपनापन था कि थोड़ी ही देर में हमारा सारा भय दूर हो गया।

भोजन के बाद उन्होंने हमें उज़्बेक कला की सुंदर स्मृति-चिह्न भेंट किए—छोटी-छोटी आकर्षक मूर्तियाँ, जो संभवतः चीनी मिट्टी से बनी थीं। विदा लेते समय वे हमें मुख्य सड़क तक छोड़ने आए और उनमें से एक युवक तो हमारे छात्रावास तक हमारे साथ आया, ताकि हमें कोई असुविधा न हो।

जब हम सुरक्षित हॉस्टल पहुँचे, तब जाकर हमारी साँस में साँस आई। हम दोनों हँसते हुए एक-दूसरे से बोले—"आज तो हम व्यर्थ ही डरते रहे!"

उस दिन हमने एक महत्वपूर्ण बात सीखी—दुनिया में हर जगह इंसानियत की भाषा सबसे बड़ी होती है। उन उज़्बेक युवकों ने हमें यह अनुभव कराया कि देशों की सीमाएँ भले अलग हों, लेकिन दिलों की दूरी प्रेम और मित्रता से मिट जाती है।

ताशकंद की ये स्मृतियाँ केवल यात्रा के प्रसंग नहीं हैं, बल्कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच उस गहरे मानवीय संबंध की जीवंत मिसाल हैं, जिसमें औपचारिक कूटनीति से अधिक महत्व दिलों की निकटता का है। वहाँ के लोगों ने बार-बार यह अनुभव कराया कि उनके लिए "हिन्दुस्तानी" केवल किसी दूसरे देश का नागरिक नहीं, बल्कि एक मित्र, एक भाई और एक सम्मानित अतिथि है। यही प्रेम, यही अपनापन और यही मानवीय गर्माहट ताशकंद की मेरी सबसे अनमोल स्मृति है।
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ताशकंद मेट्रो : केवल यात्रा नहीं, मित्रता और संस्कृति का जीवंत संसार -5

कॉम्सोमोल विश्वविद्यालय में हमारा अध्ययन प्रातः 10 बजे से लेकर सायं 3 बजे तक चलता था। कक्षाओं की समाप्ति के बाद हमारे सामने समय का एक विस्तृत संसार खुल जाता था, जिसे हम ताशकंद शहर की गलियों, उद्यानों और विशेष रूप से उसकी प्रसिद्ध मेट्रो के साथ बिताते थे। उस समय भारत में मेट्रो रेल की चर्चा अवश्य होने लगी थी और कुछ समय बाद कोलकाता में मेट्रो सेवा भी प्रारम्भ हो गई थी, किंतु मॉस्को और ताशकंद की मेट्रो का आकर्षण विश्वभर में प्रसिद्ध था। इसलिए हमारे लिए मेट्रो केवल एक यातायात का साधन नहीं, बल्कि रोमांच, ज्ञान, मित्रता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक अद्भुत माध्यम बन गई थी।

हमारा निवास गोर्कीगो शॉसे (Gorkiy Shosse) क्षेत्र में था। छुट्टी के दिनों में तो मेट्रो की सैर हमारे लिए किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। हम मेट्रो स्टेशन पहुँचते, ट्रेन में बैठते और एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन, फिर अंतिम स्टेशन तक पहुँचकर वापस लौट आते। यह पूरा क्रम किसी बालसुलभ कौतूहल और आनंद से भरा रहता था।

ताशकंद मेट्रो के स्टेशन अपने आप में कला के अद्भुत नमूने थे। प्रत्येक स्टेशन की वास्तुकला, भित्ति चित्र, झूमर और सजावट अलग-अलग विषयों पर आधारित होती थी। जिन प्रमुख स्टेशनों पर हम अक्सर जाते थे उनमें शामिल थे—

अमीर तैमूर चौक (Amir Temur Xiyoboni)

मुस्तकिलिक मैदानी / स्वतंत्रता चौक (Mustaqillik Maidoni)

पख्ताकोर (Paxtakor)

ख़ल्कलार दोस्तलिगी / जनमैत्री (Xalqlar Do‘stligi)

मिल्ली बोग / राष्ट्रीय उद्यान (Milliy Bog)

नोवज़ा (Novza)

मिर्ज़ो उलुगबेक (Mirzo Ulugbek)

चिलोंज़ोर (Chilonzor)

ओल्माज़ोर (Olmazor)

चोशतेपा (Choshtepa)

ओज़गारिश / परिवर्तन (O‘zgarish)

सिर्गाली (Sirg‘ali)

यांगीहायोत / नया जीवन (Yangihayot)


इन स्टेशनों के नाम ही उज्बेकिस्तान के इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का परिचय देते थे। जब हम इन स्टेशनों से गुजरते थे तो ऐसा लगता था जैसे हम किसी जीवित संग्रहालय में यात्रा कर रहे हों।

मेट्रो का किराया अत्यंत कम था, इसलिए विद्यार्थियों के लिए यह कोई बोझ नहीं था। परन्तु इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी—लोगों से मिलने और उन्हें समझने का अवसर। जैसे ही किसी भारतीय, रूसी या उज्बेक यात्री को पता चलता कि हम भारत से आए विद्यार्थी हैं, वे अत्यंत आत्मीयता से मिलते। अनेक बार लोग अपनी सीट छोड़कर हमें बैठने का आग्रह करते। हम विनम्रता से कहते—"पझालुस्ता (Pozhaluysta), आप बैठिए," परन्तु वे हमें बैठाकर विशेष प्रसन्नता का अनुभव करते थे। यह सम्मान वास्तव में भारत के प्रति उनके प्रेम और आदर का प्रतीक था।

मेट्रो के डिब्बों में कभी-कभी युवा कलाकार अपने पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर उज्बेक और रूसी लोकधुनें सुनाते थे। रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा में सजी युवतियाँ और युवक पूरे वातावरण को सांस्कृतिक उत्सव में बदल देते थे। ऐसा लगता था मानो पूरी मध्य एशिया की आत्मा हमारे सामने जीवंत हो उठी हो।

भाषा की कठिनाइयाँ भी हमारे उत्साह को कम नहीं कर पाती थीं। हमारी रूसी भाषा अभी सीखने की अवस्था में थी, परन्तु हमें आश्चर्य होता था कि अनेक उज्बेक शब्द भारतीय भाषाओं से बहुत निकट प्रतीत होते थे। "दोस्ती", "अमन", "जिंदाबाद", "तशक्कुर", "शुक्रिया", "मिज़ाज शरीफ" जैसे शब्द हमारे लिए परिचय और आत्मीयता के पुल बन जाते थे। केवल कुछ शब्दों के सहारे ही हम लोगों से मित्रता स्थापित कर लेते थे।

प्रत्येक स्टेशन पर नए यात्री चढ़ते, कुछ उतरते और हम उनसे बातचीत का अवसर खोज लेते। वे भारत के बारे में जानना चाहते थे और हम उनके देश और संस्कृति के बारे में। भारतीय फिल्मों, गीतों, नाटकों और साहित्य के प्रति उनका विशेष आकर्षण था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों का नाम सुनकर हमें आश्चर्य होता था कि वे उन्हें कितनी अच्छी तरह जानते हैं। बदले में जब हम अलेक्ज़ेंडर पुश्किन, माक्सिम गोर्की और अन्य रूसी साहित्यकारों का उल्लेख करते तो उनके चेहरे गर्व और प्रसन्नता से खिल उठते थे।उज्बेकिस्तान की जनता केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत पर ही गर्व नहीं करती थी, बल्कि अपने साहित्य, कला और संगीत के महान पुरोधाओं को भी अत्यंत सम्मान देती थी। मेट्रो के अनेक स्टेशन और सार्वजनिक स्थल इन्हीं विभूतियों के नाम पर बने हुए थे। बातचीत के दौरान हमें पता चला कि उज्बेक जनता अपने महान कवि अलीशेर नवोई (Alisher Navoiy) को उसी श्रद्धा से याद करती है, जैसे भारत में हम तुलसीदास, कबीर या रवीन्द्रनाथ ठाकुर को स्मरण करते हैं। नवोई की कविताएँ और रचनाएँ आज भी उज्बेक संस्कृति की आत्मा मानी जाती हैं। इसी प्रकार महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और शासक मिर्ज़ो उलुगबेक (Mirzo Ulugbek) ज्ञान और विज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।
संगीत और कला के क्षेत्र में यूनुस रजाबी (Yunus Rajabiy) का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता था। उन्होंने उज्बेक लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत को संरक्षित करने में अमूल्य योगदान दिया। साहित्य जगत में ग़फ़ूर ग़ुलाम (Gafur Ghulam), अब्दुल्ला कादिरी (Abdulla Qodiriy), हामिद आलिमजान (Hamid Olimjon), ज़ुल्फ़िया (Zulfiya) और अब्दुल्ला काहार (Abdulla Qahhor) जैसे साहित्यकारों की रचनाएँ जन-जन में लोकप्रिय थीं। विशेष रूप से कवयित्री ज़ुल्फ़िया को उज्बेक महिलाओं की प्रेरणा और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता था।
जब हम अपने रूसी और उज्बेक मित्रों से मिलते, तो साहित्य और कला पर चर्चा अवश्य होती। वे हमसे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा और हरिवंश राय बच्चन के बारे में पूछते, जबकि हम उनसे अलीशेर नवोई, ग़फ़ूर ग़ुलाम और ज़ुल्फ़िया की रचनाओं के विषय में जानने का प्रयास करते। इस प्रकार मेट्रो के डिब्बों में होने वाली साधारण-सी बातचीत भी एक सांस्कृतिक संगोष्ठी का रूप ले लेती थी, जहाँ भारत और उज्बेकिस्तान की साहित्यिक एवं कलात्मक परम्पराएँ एक-दूसरे से परिचित होती थीं।

मेट्रो यात्रा के दौरान ही हमारी मित्रता अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, तुर्कमेनिस्तान और सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्यों से आए विद्यार्थियों से हुई। कभी-कभी यह परिचय कुछ मिनटों का होता था, परन्तु वह मित्रता वर्षों तक बनी रहती थी। हम एक-दूसरे के देशों की संस्कृति, परम्पराओं और जीवनशैली के बारे में जानने का प्रयास करते। फिर सभी मित्र मिलकर किसी नए स्टेशन या पर्यटन स्थल की ओर निकल पड़ते और यात्रा का आनंद कई गुना बढ़ जाता।

शनिवार और रविवार के दिन तो पूरा ताशकंद मानो घूमने निकल पड़ता था। मेट्रो यात्रियों से खचाखच भरी होती, परन्तु उसी भीड़ में जीवन की धड़कन महसूस होती थी। हँसते-मुस्कुराते चेहरे, नए परिचय, नई बातें और नई सीख—सब कुछ उस यात्रा का हिस्सा बन जाता था।

आज जब उन दिनों को स्मरण करता हूँ, तो लगता है कि ताशकंद की मेट्रो केवल भूमिगत रेल नहीं थी। वह एक चलती-फिरती पाठशाला थी, जहाँ हमें भाषा, संस्कृति, इतिहास, मानवता और विश्व-मैत्री का पाठ पढ़ने को मिला। वह मित्रता का ऐसा सेतु थी जिसने देशों की सीमाओं को मिटाकर दिलों को जोड़ दिया। वास्तव में, ताशकंद की मेट्रो ने हमें यह सिखाया कि दुनिया को समझने का सबसे सुंदर मार्ग लोगों से मिलना, उन्हें सुनना और उनसे प्रेम करना है। यही कारण है कि आज भी ताशकंद की मेट्रो की स्मृतियाँ मेरे हृदय में एक मधुर संगीत की भाँति गूँजती रहती हैं।
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भाषा: दिलों को जोड़ने वाला सबसे सुंदर सेतु -6

किसी भी व्यक्ति से संवाद स्थापित करने का सबसे प्रभावी और आत्मीय माध्यम उसकी अपनी भाषा होती है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के हृदय तक पहुँचने का मार्ग है। भाषा के माध्यम से ही हम किसी समाज की संस्कृति, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझ पाते हैं। सामान्यतः भाषा तीन प्रकार से अभिव्यक्त होती है—बोलकर, लिखकर और संकेतों द्वारा। ताश्कंद में अपने प्रवास के दौरान मुझे इन तीनों प्रकारों का उपयोग करने का अवसर मिला, किंतु भाषा से जुड़ा एक अनुभव मेरे लिए अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय रहा।

जब मैंने उज़्बेक लोगों के बीच आना-जाना प्रारम्भ किया, तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनकी भाषा के अनेक शब्द हिन्दी-उर्दू से अत्यंत मिलते-जुलते हैं। एक दिन एक युवा उज़्बेक युवक ने मुझसे पूछा, “क्या आप हिन्दुस्तानी हैं?” मैंने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “हाँ।” वह तुरंत बोला, “आप कैसे हैं?” क्षणभर के लिए मुझे लगा कि वह हिन्दी जानता है। मैंने भी उत्तर दिया, “मैं ठीक हूँ, आप बताइए, आप कैसे हैं?” इसके बाद वह चुप हो गया। संभवतः उसे “आप कैसे हैं” के अतिरिक्त कोई और हिन्दी वाक्य नहीं आता था। परंतु उसके इन कुछ शब्दों ने ही मेरे मन में अपनत्व की ऐसी लहर जगा दी कि वह दृश्य आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।

यह अनुभव मुझे वर्षों पहले की एक घटना की याद दिलाता है। जब मैं पूज्य दीदी निर्मला देशपांडे जी के साथ तमिलनाडु गया था और चेन्नई से श्रीपेरंबदूर तक साइकिल यात्रा में सहभागी बना था, तब मैंने कुछ तमिल शब्द सीख लिए थे—“वणक्कम”, “नंदरी”, “अन्ना”, “अम्मा”, “तन्नीर”, “चाय कुडिंग” आदि। उन आठ-दस शब्दों ने पूरी यात्रा को सहज और आनंदमय बना दिया था। जब मुझे चाय चाहिए होती, तो मैं कहता—“चाय कुडिंग”; पानी के लिए “तन्नीर कुडिंग”। स्थानीय लोग मेरी टूटी-फूटी तमिल सुनकर प्रसन्न हो जाते और मुझे भी उनके बीच अपनापन महसूस होता।

किन्तु ताश्कंद में तो स्थिति और भी अद्भुत थी। वहाँ मुझे सैकड़ों ऐसे शब्द मिले जो हिन्दी-उर्दू और उज़्बेक भाषा में लगभग समान थे। “दोस्त”, “किताब”, “दुनिया”, “बाज़ार”, “सब्ज़ी”, “ख़बर”, “रंग”, “गुल”, “क़लम”, “दफ़्तर”, “हुनर”, “अदब”, “शहर”, “मेहमान”, “वतन”, “ज़मीन”, “मुहब्बत”—ये सभी शब्द मेरे लिए अपरिचित नहीं थे। ये तो मेरी मातृभाषा के वे शब्द थे जिनका मैं भारत में भी प्रतिदिन प्रयोग करता था।

धीरे-धीरे मैंने पाया कि फ़ारसी, अरबी और तुर्की प्रभाव के कारण उज़्बेक और हिन्दी-उर्दू भाषाओं में गहरा भाषायी संबंध है। जब भी मुझे यह विश्वास हो जाता कि सामने वाला व्यक्ति उज़्बेक है, तो मैं बातचीत में जानबूझकर ऐसे ही साझा शब्दों का प्रयोग करता। आश्चर्यजनक रूप से वे लोग बहुत प्रसन्न होते। उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती और बातचीत का वातावरण तुरंत आत्मीय बन जाता। भाषा का यह छोटा-सा पुल दो अनजान व्यक्तियों को मित्र बना देता था।"मुझे शीघ्र ही यह अनुभव होने लगा कि उज़्बेकिस्तान में मैं किसी बिल्कुल अपरिचित भाषा के बीच नहीं हूँ। जहाँ भी जाता, कानों में ऐसे शब्द पड़ते जो मेरे अपने 7लगते थे—दोस्त, किताब, ख़बर, बाज़ार, सब्ज़ी, मेहमान, वतन, मुहब्बत, अदब, क़लम, दफ़्तर, दरवाज़ा, बाग़, मंज़िल, सफ़र, मक़सद, फ़िक्र, सवाल और जवाब। ऐसा लगता था मानो सदियों पुराना कोई सांस्कृतिक कारवाँ भारत और मध्य एशिया के बीच आज भी चल रहा हो और उसके पदचिह्न इन शब्दों में सुरक्षित हों। जब मैं किसी उज़्बेक से 'रहमत', 'अदब', 'दोस्त' या 'मुहब्बत' जैसे शब्दों में बात करता, तो उसके चेहरे पर जो मुस्कान खिलती थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि भाषाएँ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं, वे दिलों को जोड़ने वाली जीवंत कड़ियाँ होती हैं।"
      रूसी भाषा सीखना मेरे लिए एक अलग अनुभव था। उसमें संस्कृत की तरह विभक्तियाँ, व्याकरणिक संरचनाएँ और अनेक जटिलताएँ थीं। उसे सीखने के लिए वैसी ही मेहनत करनी पड़ती थी जैसी हम संस्कृत सीखते समय करते हैं। लेकिन उज़्बेक भाषा से मेरा संबंध बिल्कुल अलग था। वह मुझे किसी विदेशी भाषा की अपेक्षा अपनी ही मिट्टी की सुगंध से भरी हुई प्रतीत होती थी। उसके अनेक शब्द मेरे लिए परिचित थे, उसकी ध्वनियाँ आत्मीय थीं और उसकी अभिव्यक्तियों में मुझे अपने घर-परिवार का सा अपनापन महसूस होता था।

ताश्कंद की गलियों, बाज़ारों और सार्वजनिक स्थलों पर घूमते हुए मैंने बार-बार अनुभव किया कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि वह हृदयों को जोड़ने वाला एक अदृश्य सेतु है। यदि हम किसी व्यक्ति की भाषा के कुछ आदरसूचक शब्द भी सीख लें और उनका प्रयोग करें, तो वह हमारे प्रति सहज ही स्नेह और सम्मान अनुभव करने लगता है। यही कारण है कि विदेश में रहते हुए भी मुझे कभी पूर्णतः पराया होने का अनुभव नहीं हुआ।

उज़्बेकिस्तान में बिताए गए वे दिन मुझे यह सीख देकर गए कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच केवल ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध ही नहीं हैं, बल्कि भाषायी आत्मीयता का भी एक मजबूत आधार है। यह समानता दोनों देशों के लोगों को और निकट लाने की क्षमता रखती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम इन साझा सांस्कृतिक और भाषायी धरोहरों को पहचानें, उन्हें सहेजें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।

ताश्कंद में रहते हुए मैंने महसूस किया कि भौगोलिक दूरियाँ चाहे कितनी भी हों, भाषा के कुछ आत्मीय शब्द उन्हें क्षणभर में मिटा सकते हैं। सचमुच, भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय का सबसे सुंदर द्वार है। और जब यह द्वार खुलता है, तो संसार का कोई भी देश, कोई भी समाज और कोई भी व्यक्ति पराया नहीं रह जाता।
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उज़्बेक और हिन्दी-उर्दू के समान या मिलते-जुलते शब्द -7

उज़्बेक हिन्दी-उर्दू अर्थ

Kitob किताब Book
Daftar दफ़्तर Office/Register
Qalam क़लम Pen
Xat ख़त Letter
Xabar ख़बर News
Rang रंग Colour
Gul गुल/फूल Flower
Bog‘ बाग़ Garden
Bahor बहार Spring
Meva मेवा Fruit/Dry fruit
Sabzi सब्ज़ी Vegetables
Bozor बाज़ार Market
Non नान Bread
Choy चाय Tea
Osh आश/पुलाव Rice dish
Do‘st दोस्त Friend
Muhabbat मुहब्बत Love
Adab अदब Respect/Literature
Hurmat हुरमत/इज़्ज़त Respect
Rahmat रहमत Mercy/Thanks
Marhamat मरहमत कृपा कीजिए
Vatan वतन Homeland
Dunya दुनिया World
Zamin ज़मीन Land
Shahar शहर City
Musiqa मूसीकी Music
San'at सनअत Art
Hunar हुनर Skill
Mehmon मेहमान Guest
Odam आदमी Human
Avlod औलाद Generation
Darvoza दरवाज़ा Gate
Maydon मैदान Ground
Havo हवा Air
Oftob आफ़ताब Sun
Yulduz यलदूज़/सितारा Star
Mahalla मोहल्ला Locality
Qissa क़िस्सा Story
Tarix तारीख़ History
Muallim मौलिम/मुअल्लिम Teacher
Talaba तलबा Student
Hukumat हुकूमत Government
Vazir वज़ीर Minister
Qahramon क़हरमान Hero
Sharq शर्क़ East
G‘arb ग़र्ब West
Shimol शुमाल North
Janub जुनूब South
Samar समर फल/परिणाम
Fikr फ़िक्र Thought
Savol सवाल Question
Javob जवाब Answer
Maqsad मक़सद Purpose
Safar सफ़र Journey
Manzil मंज़िल Destination
Dasturxon दस्तरख़्वान Dining spread
Bemor बीमार Sick
Dori दवा/दारू Medicine
Kasalxona अस्पताल (कसाल = बीमार) Hospital
Baraka बरकत Blessing
Haqiqat हक़ीक़त Reality
Tinchlik तसल्ली/शांति Peace


दैनिक अभिवादन के शब्द

उज़्बेक हिन्दी-उर्दू

Assalomu alaykum अस्सलामु अलैकुम
Va alaykum assalom वालेकुम अस्सलाम
Rahmat शुक्रिया / धन्यवाद
Marhamat आइए / कृपया
Xayr ख़ैर / अच्छा
Yaxshi अच्छा
Ha हाँ
Yo‘q नहीं
Aka बड़ा भाई
Opa बड़ी बहन
Ona माँ
Ota पिता
Bobo बाबा
Buvi दादी/नानी

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जब ताशकंद में मिलीं महान नृत्यांगना तमारा खानुम -8

कॉम्सोमोल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट, ताशकंद में उस दिन सुबह से ही एक विशेष प्रकार की हलचल दिखाई दे रही थी। यद्यपि प्रत्येक शनिवार की संध्या को वहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते थे, परन्तु उस दिन का वातावरण कुछ अलग ही था। विद्यार्थियों, अध्यापकों और कर्मचारियों के चेहरों पर एक विशेष उत्साह झलक रहा था। हर ओर तैयारियाँ चल रही थीं और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई असाधारण आयोजन होने वाला हो।

संध्या लगभग पाँच बजे जब हम संस्थान के विशाल सांस्कृतिक सभागार में पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य देखते ही बनता था। लगभग ढाई सौ दर्शकों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। केवल विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि संस्थान का समस्त स्टाफ, उनके परिवारजन तथा आसपास के अन्य शिक्षण संस्थानों के लोग भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। सभी रंग-बिरंगे परिधानों में सजे हुए थे और पूरे वातावरण में उत्सव का रंग घुला हुआ था।

हम तीन भारतीय विद्यार्थी भी उत्सुकतापूर्वक अपनी सीटों पर बैठे कार्यक्रम के आरम्भ की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ ही देर बाद मंच पर उस युग की महान उज़्बेक नृत्यांगना तमारा खानुम का प्रवेश हुआ। लगभग पचहत्तर वर्ष की आयु में भी उनके व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण और ऊर्जा थी। वे पारंपरिक उज़्बेक पोशाक में सुसज्जित थीं। सिर पर दो सुंदर चोटियाँ, उन पर जड़े आकर्षक आभूषण, विशेष उज़्बेक टोपी तथा रंगीन चुनरी उनके व्यक्तित्व को और भी गरिमामय बना रहे थे।

कार्यक्रम संचालक ने उनका परिचय देते हुए बताया कि उनका जन्म 1906 में फरगना में हुआ था और वे विश्व के अनेक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी थीं। उन्होंने लगभग अस्सी भाषाओं के गीतों पर नृत्य प्रस्तुत करके अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की थी। यह सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

कार्यक्रम का आरम्भ उज़्बेक लोकगीतों से हुआ। उनके नृत्य की लय, भाव-भंगिमाएँ और अदाएँ दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रही थीं। इसके बाद तुर्कमेनी, रूसी और अफगानी गीतों पर भी उन्होंने अपने नृत्य प्रस्तुत किए। सभागार में उपस्थित विभिन्न देशों के विद्यार्थी अपनी-अपनी पसंद के गीतों की फरमाइश कर रहे थे और तमारा खानुम उन्हें सहज प्रसन्नता के साथ पूरा कर रही थीं।

हम तीन भारतीय मन ही मन सोच रहे थे कि हमारी इच्छा कौन सुनेगा। तभी अचानक मंच से घोषणा हुई कि अब तमारा खानुम भारतीय फिल्मों के गीतों पर नृत्य प्रस्तुत करेंगी। यह सुनकर हमारी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। कुछ ही क्षणों बाद वे भारतीय नृत्यांगना की वेशभूषा में मंच पर लौटीं और फिर जो दृश्य उपस्थित हुआ, वह आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।

उस समय उज़्बेकिस्तान में भारतीय फिल्में—विशेषकर नागिन, आवारा और डिस्को डांसर—अत्यंत लोकप्रिय थीं। उन्होंने इन फिल्मों के कई गीतों पर नृत्य प्रस्तुत किया। मुझे आज भी वह गीत याद है—“तू नदिया की धार, मैं तेरा किनारा...”। गीत के प्रत्येक भाव को उन्होंने इतनी कुशलता और आत्मीयता से प्रस्तुत किया कि पूरा सभागार तालियों और उत्साह से गूँज उठा। गीत के शब्द शायद केवल हम तीन भारतीय ही पूरी तरह समझ पा रहे थे, किन्तु उनकी कला की भाषा सबके हृदय तक पहुँच रही थी।

उनके नृत्य ने ऐसा समाँ बाँधा कि समय का आभास ही नहीं रहा। अंततः हम तीनों स्वयं को रोक न सके और मंच पर पहुँचकर उनका अभिनंदन किया। हमारी ओर से मिले इस स्नेह और सम्मान से वे अत्यंत भाव-विभोर हो उठीं। उन्होंने हमें अपने बच्चों की भाँति गले लगाया और अपना स्नेह, आशीर्वाद तथा शुभकामनाएँ प्रदान कीं। इसके पश्चात हमने उनके साथ आए संगीतकारों और कलाकारों का भी हृदय से अभिनंदन किया।

देखते ही देखते चार घंटे कैसे बीत गए, इसका किसी को एहसास ही नहीं हुआ। वह दिन हमारे जीवन की अविस्मरणीय स्मृतियों में सदा के लिए अंकित हो गया। यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विश्वविख्यात कलाकार से साक्षात्कार का अनुपम अवसर था। हमने न केवल उनकी अद्भुत कला का दर्शन किया, बल्कि उनके स्नेह और आत्मीयता को भी निकट से अनुभव किया।

आज जब तमारा खानुम का नाम सुनता हूँ, तो मन श्रद्धा और रोमांच से भर उठता है। यह सोचकर गर्व होता है कि मुझे उस महान कलाकार के दर्शन करने, उनका नृत्य देखने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। वह संध्या ताशकंद की सांस्कृतिक स्मृतियों में ही नहीं, मेरे जीवन के स्वर्णिम पलों में भी सदैव अमर रहेगी।
आपके संस्मरण में भावनाओं की अत्यंत गहरी धारा प्रवाहित हो रही है। इसे साहित्यिक, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण हिन्दी में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

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ताश्कंद : मेरे महानायक लाल बहादुर शास्त्री की स्मृतियों की धरती- 9

ताश्कंद हम भारतीयों के लिए केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं है, बल्कि श्रद्धा, स्मृति और भावनाओं की एक पावन धरती है। यह वही भूमि है जहाँ भारत के महान सपूत, पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपनी अंतिम साँस ली थी। शास्त्री जी केवल एक कुशल राजनेता ही नहीं थे, बल्कि सादगी, त्याग, सत्यनिष्ठा और राष्ट्रसेवा की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व ने करोड़ों भारतीयों के हृदय को स्पर्श किया था।

जब वे भारत के प्रधानमंत्री बने, उस समय मेरी आयु लगभग आठ वर्ष थी। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का वातावरण बन रहा था। उन्हीं दिनों दीपावली के अवसर पर बाज़ार में एक छोटा-सा खिलौना टैंक बिकता था, जिसे ज़मीन पर रगड़ने से चिंगारियाँ निकलती थीं। वह टैंक मुझे बहुत आकर्षक लगा। तीन रुपये की कीमत उस समय मेरे लिए बहुत बड़ी थी, फिर भी मैंने उसे खरीद लिया।

बालमन में देशभक्ति का ऐसा ज्वार उमड़ा कि मैंने प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को एक पोस्टकार्ड लिख डाला। उसमें मैंने लिखा—“मेरे पास एक टैंक है। यदि भारतीय सेना को इसकी या मेरी आवश्यकता पड़े, तो मैं अपना टैंक देने और स्वयं देश के लिए शहीद होने को भी तैयार हूँ।”

कुछ दिनों बाद मुझे स्वयं शास्त्री जी के हस्ताक्षरयुक्त पत्र का उत्तर प्राप्त हुआ। उसके शब्द आज भी मुझे अक्षरशः स्मरण हैं—

"प्रिय राम मोहन,
आपका पत्र मिला। धन्यवाद। हमें अपनी भारतीय सेनाओं पर गर्व है। फिर भी यदि आपके टैंक और आपकी आवश्यकता हुई, तो आपको अवश्य अवसर देंगे।
आपका,
लाल बहादुर"

उस पत्र को पाकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैं उसे हाथ में लेकर पूरे मोहल्ले में घूमता रहा। मेरे लिए यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। उस दिन से मैं शास्त्री जी को अपना मित्र मानने लगा था।

मैंने उन्हें पुनः पत्र लिखा और उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। इस बार उत्तर उनके निजी सचिव श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव जी की ओर से आया। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री जी विदेश यात्रा पर ताश्कंद गए हुए हैं, उनके लौटने पर मुझे उनसे मिलने का समय दिया जाएगा।

वह समय शास्त्री जी की लोकप्रियता का स्वर्णकाल था। "जय जवान, जय किसान" का उनका उद्घोष देश के घर-घर में गूँज रहा था। बच्चे-बच्चे की ज़बान पर उनका नाम था। किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। शास्त्री जी ताश्कंद से लौट नहीं सके। वहीं हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया।

जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया, तब सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलेक्सी कोशिगिन और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ान ने स्वयं अपने कंधों पर उनकी अर्थी को उठाया। पूरा देश शोक में डूबा हुआ था। करोड़ों आँखें नम थीं। मैं तो एक बालक था, फिर भी मेरे हृदय में गहरा दुःख था। बार-बार यही विचार आता था कि मुझे अपने प्रिय प्रधानमंत्री से मिलना था, पर वह इच्छा अधूरी रह गई।

समय बीतता गया। लगभग पंद्रह वर्ष बाद भाग्य ने मुझे स्वयं ताश्कंद जाने का अवसर प्रदान किया। वहाँ जाने के अनेक आकर्षण थे—उसकी संस्कृति, इतिहास, कला और वहाँ के लोगों का आत्मीय व्यवहार; किन्तु मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण था उस स्थान को देखना जहाँ मेरे महानायक लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपने जीवन के अंतिम क्षण बिताए थे।

ताश्कंद में रहते हुए मैं प्रायः प्रत्येक रविवार अमीर तैमूर मेट्रो स्टेशन से वहाँ जाता। ताशकंद अंतरराष्ट्रीय होटल के पीछे स्थित शास्त्री स्ट्रीट में स्थित शास्त्री स्मारक मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं था। वहाँ पहुँचकर मैं घंटों बैठा रहता। यह कोई कल्पना-लोक नहीं था, न ही मैं किसी चमत्कार की अपेक्षा करता था। मैं केवल उनकी स्मृतियों के निकट बैठना चाहता था, उनके विचारों को महसूस करना चाहता था और मन ही मन उनसे संवाद करना चाहता था।

जिस भवन में शास्त्री जी ठहरे थे, वह कोई भव्य या विशाल परिसर नहीं था। वहाँ कुछ कमरे थे, जहाँ वे रहे, जहाँ भारत-पाकिस्तान वार्ताएँ हुईं और जहाँ भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने ऐतिहासिक चर्चा में भाग लिया। बाद में उस स्थान को स्मारक का स्वरूप दिया गया। यह ऐसा स्थल नहीं था जहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक आते हों, परन्तु जो लोग शास्त्री जी के जीवन, उनके आदर्शों और उनके योगदान को जानते हैं, वे वहाँ श्रद्धा से नतमस्तक होने अवश्य पहुँचते हैं।

शास्त्री जी मेरे जीवन के महानायक थे। इसलिए ताश्कंद में मेरा एक नियमित क्रम बन गया था—प्रत्येक रविवार वहाँ जाना, एक-दो घंटे मौन बैठना और उनके जीवन-संदेशों पर चिंतन करना। उन क्षणों में मुझे ऐसा अनुभव होता था मानो मैं अपने बचपन के उस अधूरे संवाद को पूरा कर रहा हूँ।

आज भी जब मैं उन दिनों को स्मरण करता हूँ, तो मन भावुक हो उठता है। ताश्कंद मेरे लिए केवल उसकी संस्कृति, सभ्यता, व्यापार, लोककला और ऐतिहासिक धरोहरों के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है; वह इसलिए भी विशेष है क्योंकि वहाँ मेरे प्रिय नेता, मेरे प्रेरणास्रोत और मेरे महानायक लाल बहादुर शास्त्री जी की अमर स्मृतियाँ बसती हैं।

भारतीय जनमानस में ताश्कंद का नाम सदैव आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाएगा, क्योंकि यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि उस महान आत्मा की स्मृति से जुड़ी हुई पवित्र भूमि है जिसने अपने जीवन को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
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सलाम प्रीपदावातेल(Преподаватель) रईसा करिमोवना -10

सन 1980-81 में मुझे तत्कालीन सोवियत संघ, आज के उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताश्कंद में लगभग आठ माह तक अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह समय मेरे जीवन के सबसे स्मरणीय और भावनात्मक अध्यायों में से एक है। विदेशी धरती पर शिक्षा, नए लोग, नई संस्कृति और नई भाषा—सब कुछ मेरे लिए बिल्कुल नया था। परंतु उन अनजाने दिनों में यदि किसी ने मातृत्व, स्नेह और आत्मीयता का स्पर्श दिया, तो वे थीं मेरी रूसी भाषा की शिक्षिका—रईसा करिमोवना।

वे अधेड़ आयु की, अत्यंत सरल, वात्सल्यपूर्ण और प्रसन्नचित्त महिला थीं। हमारी पहली ही कक्षा रूसी भाषा की लगी। उन्होंने बड़े स्नेह से हमें बताया कि रूसी में शिक्षिका को “प्रीपदावातेल” कहा जाता है और इसलिए हमें उन्हें “प्रीपदावातेल रईसा करिमोवना” कहकर संबोधित करना चाहिए। उसी दिन उन्होंने हमें रूसी वर्णमाला सिखानी आरम्भ की। आश्चर्य यह था कि वे अल्फाबेट्स हमें बहुत सहज और सरल लगे।

पहले ही दिन हम ताश्कंद के “मुख्य मार्केट” क्षेत्र में घूमने गए। वहाँ एक ऊँची इमारत पर रूसी भाषा में बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था। अर्थ तो मैं समझ नहीं पाया, पर अगले दिन उत्सुकतावश मैंने अपनी शिक्षिका से कहा—“ गोर्की शौसे में एक इमारत पर लिखा था—‘पार्तिया इ नारोद येदिनी।’” यह सुनते ही उनके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। उन्होंने प्रसन्न होकर समझाया—“इसका अर्थ है—‘पार्टी और जनता एक हैं।’”

यह बात आज भी मुझे विस्मित करती है कि वे केवल रूसी और उज़्बेक भाषा जानती थीं, अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं। उधर मैं रूसी सीख रहा था और मेरी अपनी भाषा हिंदी थी। परंतु आत्मीयता की भाषा किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती। टूटी-फूटी रूसी, हिंदी के शब्द, इशारे और मुस्कान—इन्हीं के माध्यम से हमारे बीच संवाद, शिक्षा और स्नेह का सुंदर संसार बनता चला गया।

17 अक्टूबर 1980—मेरा जन्मदिन था। विदेशी धरती पर अपना जन्मदिन मनाना एक अलग ही अनुभूति थी। मैं शाकाहारी था, इसलिए मैंने अपने छोटे-से छात्रावास कक्ष में ब्रेड रोल्स और शर्बत आदि की व्यवस्था की और अपनी शिक्षिका रईसा करिमोवना को भी आमंत्रित किया।

कुछ देर बाद उन्होंने मुस्कराकर पूछा—
“राममोहन, तवोया मामा फोतोग्राफिया येस्त?”
अर्थात—“राममोहन, क्या तुम्हारे पास अपनी माँ की तस्वीर है?”

मैंने तुरंत एक दर्पण लेकर उनके मुह की ओर करके कहा —
“आनी, मिया मामा… यह मेरी माँ हैं।”

इतना सुनते ही उनके चेहरे पर एक अद्भुत ममता छलक उठी। उन्होंने मुझे बड़े स्नेह से गले लगा लिया। उस क्षण मुझे लगा मानो विदेशी धरती पर मुझे अपनी माँ का ही स्नेह मिल गया हो।

अगले ही दिन उन्होंने मुझे और मेरे मित्रों—प्रिंस, शाहजहाँ, नवतेज सिंह और सुरेश त्रिपाठी—को अपने घर रात्रिभोज पर आमंत्रित किया। अब समस्या यह थी कि मैं पूर्णतः शाकाहारी था। उन्होंने बड़े प्रेम से सबसे पहले छोटी मछलियाँ परोसीं। मैंने संकोच से कहा—
“एता म्यासा… यानी यह मांस है, मैं नहीं खा सकता।”

फिर उन्होंने बतख के अंडे परोसे। मैंने विनम्रता से उन्हें भी अस्वीकार कर दिया। अंततः उन्होंने बड़े प्रेम से उबले हुए आड़ू सामने रख दिए। जीवन में पहली बार मैं उबला हुआ आड़ू देख रहा था। अब मैं उन्हें यह कैसे कहता कि यह भी मुझे पसंद नहीं! उनके स्नेह को ठेस न पहुँचे, इसलिए मैंने बड़ी कठिनाई से दो-तीन टुकड़े खा लिए। उन्हें लगा कि मुझे यह बहुत पसंद आया है। बस फिर क्या था—उन्होंने प्रेमपूर्वक मुझे एक के बाद एक कई उबले हुए आड़ू परोस दिए। आज उस घटना को याद कर मन मुस्करा उठता है।

रईसा करिमोवना केवल भाषा नहीं पढ़ाती थीं, वे अपने विद्यार्थियों को रूस की संस्कृति, विचारधारा और मानवीय मूल्यों से भी परिचित कराती थीं। उन्होंने हमें एक रूसी पंक्ति सुनाई थी, जो आज भी स्मृति में अंकित है—

“रूस्की यज़िक — एता यज़िक वेलिकोवो लेनिना,
एता यज़िक मीरा इ द्रुज़्बी।”

अर्थात—
“रूसी भाषा महान लेनिन की भाषा है,
यह शांति और मैत्री की भाषा है।”

उन्होंने हमें एक अत्यंत सुंदर रूसी बाल कविता भी याद करवाई थी। उसके शब्द आज भी मेरी स्मृतियों में उसी मधुरता के साथ जीवित हैं—
“आज सूरज चमक रहा है,
नीला आकाश दमक रहा है।
एक बालक पतंग उड़ा रहा है
और मन ही मन प्रार्थना कर रहा है—

यह सूरज सदा चमकता रहे,
यह नीला आकाश सदा बना रहे,
मेरी माँ सदा जीवित रहे,
और मैं भी सदा बना रहूँ।”

आज अचानक अपने पुराने दुर्लभ चित्रों में मुझे रईसा करिमोवना का चित्र दिखाई दिया। समय बीत चुका है। शायद वे आज इस संसार में नहीं होंगी, परंतु मेरी स्मृतियों में वे आज भी उसी वात्सल्य भरी मुस्कान के साथ जीवित हैं।

उन्होंने मुझे केवल रूसी भाषा नहीं सिखाई, बल्कि यह भी सिखाया कि मातृत्व, प्रेम और आत्मीयता की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती।

विदेश की धरती पर वे मेरे लिए एक शिक्षिका से कहीं बढ़कर थीं—वे एक माँ थीं।

सलाम, प्रीपदावातेल रईसा करिमोवना!



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“परदेस में अपना घर” -11
ताश्कंद में भारतीयता की सुगंध : सुधीर माथुर और उनके परिवार की स्मृतियाँ

ताश्कंद के कॉम्सोमोल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट में हमारे लिए लगभग हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं। उत्कृष्ट शिक्षण व्यवस्था, आरामदायक छात्रावास, आधुनिक परिवहन और आत्मीय वातावरण—सब कुछ था। यदि कोई कमी थी, तो वह थी भारतीय भोजन की, विशेषकर शाकाहारी भारतीय भोजन की।

मैं जन्म से शाकाहारी रहा हूँ। इसलिए आरम्भिक दिनों में भोजन की समस्या कुछ अधिक ही महसूस होती थी। किंतु आवश्यकता मनुष्य को समाधान ढूँढ़ना सिखा देती है। एक दिन मैं बाज़ार गया और वहाँ से सब्ज़ी पकाने का एक बर्तन, कुछ रसोई का सामान तथा आवश्यक वस्तुएँ ले आया। छात्रावास के सामने एक साझा रसोईघर था। वहीं मैंने अपने लिए भोजन बनाना प्रारम्भ कर दिया।

मेरे एक उज़्बेक मित्र शाहजहाँ को जब यह पता चला कि मैं मांसाहार नहीं करता, तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “फिर आपको प्रोटीन कहाँ से मिलता है?” मैंने मुस्कराकर उत्तर दिया, “दालों से, सब्जियों से, दूध से। और देखिए, मैं भी आपकी ही तरह स्वस्थ हूँ।” वे मेरी बात सुनकर हँस पड़े।

यद्यपि भोजन की समस्या का कुछ समाधान हो गया था, फिर भी घर के स्वाद और भारतीय व्यंजनों की कमी अक्सर खलती थी। उस समय ताश्कंद में कोई भारतीय रेस्तराँ नहीं था। इसी बीच हमें पता चला कि आसपास के अपार्टमेंटों में कुछ भारतीय परिवार रहते हैं, जो वहाँ के विभिन्न संस्थानों में कार्यरत हैं।

एक दिन मैं अपने मित्रों नवतेज और सुरेश त्रिपाठी के साथ उन भारतीय परिवारों की खोज में निकल पड़ा। भाषा की कठिनाई थी। हम राह चलते लोगों से टूटी-फूटी रूसी और संकेतों में पूछते—“हिन्दुस्तानी? इंडिस्की नारोद? भारतीय?” बहुत खोजबीन के बाद किसी ने बताया कि एक अपार्टमेंट की चौथी मंज़िल पर एक भारतीय परिवार रहता है।

हम उत्साह से वहाँ पहुँचे। दरवाज़ा खुला तो सामने एक आत्मीय मुस्कान ने हमारा स्वागत किया। वे थे श्री सुधीर माथुर। बातचीत हुई, चाय मिली और फिर उन्होंने सहज भाव से पूछा, “भोजन करोगे?”

वास्तव में हम तो इसी आशा में वहाँ पहुँचे थे। कई महीनों बाद उस दिन हमें भारतीय भोजन का स्वाद मिला। वह केवल भोजन नहीं था, मानो घर की स्मृतियों से भरी एक थाली थी।

सुधीर जी ने बताया कि उन्हें भारतीय दूतावास के माध्यम से भारत से आने वाली दालें, आटा, मसाले और अन्य खाद्य सामग्री प्राप्त हो जाती हैं। धीरे-धीरे उनका घर हमारे लिए ताश्कंद में एक छोटे-से भारतीय आश्रय जैसा बन गया।

संयोगवश सुधीर माथुर जी राजस्थान के जयपुर से थे। मेरी भावी पत्नी कृष्णा कांता जी से भी मेरा संबंध जयपुर से ही जुड़ा हुआ था। इस कारण हमारे बीच शीघ्र ही आत्मीयता बढ़ गई। मैं उनके घर नियमित रूप से आने-जाने लगा।

उन दिनों उनकी पत्नी गर्भवती थीं। मेरी आयु तब केवल बाईस-तेईस वर्ष रही होगी। यद्यपि मुझे घरेलू अनुभव कम था, पर अध्ययन की रुचि के कारण मैंने महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा रचित "संस्कार विधि" का अध्ययन किया था। उसमें गर्भवती स्त्री की इच्छाओं और उनके महत्व का वर्णन पढ़ा था। मुझे स्मरण था कि गर्भवती महिला की उचित इच्छाओं की पूर्ति उसके मानसिक सुख और होने वाले शिशु के स्वस्थ विकास में सहायक मानी जाती है।

धीरे-धीरे उनकी पत्नी मुझे छोटे भाई की तरह स्नेह देने लगीं। अब वे मेरी बहन थीं और उनका परिवार मेरा अपना परिवार बन चुका था।

एक दिन उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “मेरा गोलगप्पे खाने का मन कर रहा है।”

ताश्कंद में गोलगप्पे! यह सुनकर मैं भी कुछ क्षण के लिए असमंजस में पड़ गया। पर इच्छा पूरी करनी थी। मैंने छोटे-छोटे आटे के पूरियों जैसे गोले बनाए। नींबू, मसालों और थोड़े से शहद से एक खट्टा-मीठा पानी तैयार किया। फिर उन छोटी पूरियों को उसी में डुबो-डुबोकर उन्हें खिलाया। वह बिल्कुल असली गोलगप्पा तो नहीं था, पर उनकी मुस्कान देखकर लगा कि प्रयास सफल हो गया।

कुछ दिनों बाद उनकी इच्छा हुई—“आज तो दही भल्ले खाने का मन है।”

अब नई चुनौती सामने थी। मैंने स्थानीय ब्रेड, जिसे वहाँ "क्लेब" कहा जाता था, पानी में भिगोकर उसके छोटे गोले बनाए। उन्हें दही में डालकर ऊपर से मसाले और थोड़ा शहद मिलाया। जब उन्हें परोसा गया तो वे खिल उठीं। उन्होंने हँसते हुए कहा—“स्वाद चाहे जैसा हो, दही भल्ले की याद तो आ ही गई।”

एक दिन उन्होंने गुलाब जामुन खाने की इच्छा व्यक्त कर दी। मैंने फिर वही ब्रेड ली, उसके छोटे-छोटे गोले बनाकर हल्के तेल में सुनहरा तला और फिर शहद में डुबो दिया। वह पारंपरिक गुलाब जामुन नहीं था, पर उसमें स्नेह और अपनापन भरपूर था।

आज सोचता हूँ तो लगता है कि मैं कोई कुशल रसोइया नहीं था, पर उन परिस्थितियों ने मुझे रचनात्मक होना सिखाया। आवश्यकता वास्तव में आविष्कार की जननी होती है।

सुधीर माथुर और उनके परिवार से मुझे केवल भोजन या घरेलू स्नेह ही नहीं मिला, बल्कि जीवन की अनेक महत्वपूर्ण सीखें भी मिलीं। उन्होंने मुझे उज़्बेकिस्तान के समाज, संस्कृति, इतिहास और वहाँ के लोगों की मानसिकता को समझने का अवसर दिया।

वे बताते थे कि उज़्बेकिस्तान के लोग भारत को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। भारतीय संस्कृति, लोकपरंपराएँ, शांति और मैत्री का संदेश उन्हें आकर्षित करता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी वहाँ विशेष रूप से लोकप्रिय भारतीय नेताओं में गिने जाते थे।

समय के साथ हमें पता चला कि उनके घर एक पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने "नताशा" रखा। बाद के वर्षों में जीवन की व्यस्तताओं और समय के प्रवाह में संपर्क धीरे-धीरे कम होता गया। फिर एक दिन यह दुखद समाचार मिला कि सुधीर माथुर जी इस संसार को छोड़कर चले गए। बाद में ज्ञात हुआ कि उनकी पुत्री नताशा मॉस्को में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान में कार्यरत हैं।

आज जब ताश्कंद की स्मृतियाँ मन में उभरती हैं, तो वहाँ के भव्य भवन, चौड़ी सड़कें और ऐतिहासिक स्थल तो याद आते ही हैं, पर उनसे कहीं अधिक स्मरण आते हैं सुधीर माथुर और उनका परिवार। उस परदेश में उन्होंने हमें केवल भोजन नहीं कराया, बल्कि अपनापन दिया, आत्मविश्वास दिया और ज्ञान दिया। उन्होंने हमें यह अनुभव कराया कि भारतीयता केवल भौगोलिक सीमाओं में नहीं बसती; वह जहाँ भी भारतीय हृदय धड़कता है, वहीं जीवित रहती है।

मेरे लिए सुधीर माथुर केवल एक परिचित या मित्र नहीं थे। वे मेरे मार्गदर्शक, मेरे बड़े भाई और ताश्कंद में भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रतिनिधि थे। उनकी स्मृतियाँ आज भी मेरे हृदय में उसी प्रकार सुरक्षित हैं, जैसे किसी दूर देश में अचानक मिल जाने वाला अपना घर।यह अध्याय आपकी पुस्तक में “ताश्कंद में भारतीयता की सुगंध” या “परदेस में अपना घर” शीर्षक से अत्यंत प्रभावशाली लगेगा, क्योंकि इसमें केवल यात्रा नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और भारतीय संस्कृति की जीवंतता भी झलकती है।
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खास्त इमाम परिसर : ताशकंद की आत्मा और पानीपत की स्मृतियाँ -12

ताशकंद में रहते हुए मैंने अनेक स्थानों का भ्रमण किया। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, भव्य मेट्रो स्टेशन, विशाल भवन और आधुनिक जीवनशैली सोवियत ताशकंद की पहचान थे। किंतु इन सबके बीच यदि कोई स्थान मेरे मन को सबसे अधिक स्पर्श कर गया, तो वह था खास्त इमाम परिसर।

एक रविवार को मैं अपने कुछ साथियों के साथ पुराने ताशकंद की ओर निकल पड़ा। जैसे-जैसे हम शहर के पुराने भाग में पहुँचे, आधुनिक ताशकंद पीछे छूटता गया और इतिहास की परतें खुलने लगीं। पुराने मकान, शांत गलियाँ और दूर से दिखाई देती नीली गुम्बदें मानो किसी बीते युग की कहानी सुना रही थीं।

जब मैंने पहली बार खास्त इमाम परिसर को देखा, तो मेरे कदम अनायास ही धीमे हो गए। वहाँ का वातावरण अत्यंत शांत, गंभीर और आध्यात्मिक था। परिसर में प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो समय की गति थम गई हो। विशाल मदरसे, पुरानी मस्जिदें और सदियों पुरानी स्थापत्य कला अपने भीतर इतिहास का एक विराट संसार समेटे हुए थीं।

मैं उन इमारतों को निहार ही रहा था कि अचानक मुझे अपने शहर पानीपत की याद आ गई। मेरे मन में तुरंत का चित्र उभर आया। पानीपत की वह पावन दरगाह, जहाँ बचपन से जाने का अवसर मिलता रहा था, और ताशकंद का यह खास्त इमाम परिसर—दोनों भौगोलिक रूप से हजारों किलोमीटर दूर थे, परंतु उनकी आत्मा में मुझे एक अद्भुत समानता दिखाई दी।

जिस प्रकार पानीपत में हजरत बू अली शाह कलंदर की दरगाह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे, मानवीय एकता और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है, उसी प्रकार खास्त इमाम परिसर भी ताशकंद के लोगों की आस्था, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक था। दोनों स्थानों पर पहुँचकर मन में एक प्रकार की शांति और विनम्रता का भाव स्वतः उत्पन्न होता है।

मैं परिसर के एक कोने में बैठ गया। वहाँ की निस्तब्धता में मुझे पानीपत की दरगाह का वही सुकून महसूस हुआ, जहाँ विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के श्रद्धा से आते हैं। मुझे लगा कि संतों, सूफियों और महापुरुषों की वाणी की कोई सीमाएँ नहीं होतीं। वे देशों, भाषाओं और राजनीतिक व्यवस्थाओं से ऊपर उठकर मानवता का संदेश देते हैं।

खास्त इमाम परिसर में घूमते हुए मैं सोच रहा था कि इतिहास ने पानीपत और ताशकंद को कितने अद्भुत सूत्रों से जोड़ा है। दोनों नगर प्राचीन व्यापारिक मार्गों से जुड़े रहे, दोनों ने अनेक सभ्यताओं का उत्थान और पतन देखा, दोनों ने संतों, विद्वानों और महापुरुषों को जन्म दिया, और दोनों आज भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को सँजोए हुए हैं।

मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो पानीपत के बू अली शाह कलंदर और ताशकंद के हजरत इमाम कफ़्फ़ाल शाशी मानवता के एक ही संदेश के दो स्वर हों। दोनों ही हमें यह सिखाते हैं कि ज्ञान, प्रेम, सहिष्णुता और मानवीय एकता ही किसी समाज की वास्तविक शक्ति होती है।

उस दिन खास्त इमाम परिसर मेरे लिए केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रहा। वह ताशकंद और पानीपत, मध्य एशिया और भारत, इतिहास और वर्तमान के बीच एक जीवंत सेतु बन गया। वहाँ बैठकर मुझे यह एहसास हुआ कि चाहे हम कितनी भी दूर क्यों न चले जाएँ, अपनी मिट्टी की स्मृतियाँ हमारे साथ चलती रहती हैं और संसार के किसी भी कोने में हमें अपनेपन के सूत्र खोज लेने की प्रेरणा देती हैं।

आज भी जब मैं ताशकंद के उन दिनों को याद करता हूँ, तो खास्त इमाम परिसर की नीली गुम्बदों के साथ-साथ पानीपत की हजरत बू अली शाह कलंदर की दरगाह भी मेरी स्मृतियों में एक साथ उभर आती है। तब लगता है कि दूरी केवल नक्शों में होती है; संस्कृति, अध्यात्म और मानवता के स्तर पर ताशकंद और पानीपत एक-दूसरे के बहुत निकट हैं।
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कुकेलदाश मदरसा : ताशकंद के इतिहास से मेरा साक्षात्कार -13

ताशकंद में मेरे प्रवास के दौरान जिन ऐतिहासिक स्थलों ने मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ी, उनमें कुकेलदाश मदरसा का नाम प्रमुख है। यह केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि मध्य एशिया के गौरवशाली इतिहास, शिक्षा परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।

एक अवकाश के दिन मैं ताशकंद के पुराने शहर की ओर निकल पड़ा। वहाँ का वातावरण आधुनिक ताशकंद से बिल्कुल भिन्न था। चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों की जगह पुराने मकान, संकरी गलियाँ और इतिहास की सुगंध बिखरी हुई थी। इसी क्षेत्र में स्थित था—कुकेलदाश मदरसा।

जैसे ही मैं उसके विशाल प्रवेश द्वार के सामने पहुँचा, मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया। ऊँची मेहराबें, नीली और फ़िरोज़ी टाइलों की सजावट तथा भव्य स्थापत्य कला देखकर मन अनायास ही कई शताब्दियाँ पीछे चला गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो यह इमारत आज भी अपने भीतर बीते युग के विद्यार्थियों, विद्वानों और शिक्षकों की स्मृतियाँ संजोए हुए है।

मुझे बताया गया कि कुकेलदाश मदरसा का निर्माण 16वीं शताब्दी में शैबानी शासकों के काल में किया गया था। इसका नाम तत्कालीन शासक के एक प्रभावशाली मंत्री और संरक्षक "कुकेलदाश" के नाम पर पड़ा। उस समय यह केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि मध्य एशिया के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक माना जाता था। दूर-दूर से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

जब मैं उसके विशाल आँगन में पहुँचा, तो वहाँ एक अद्भुत शांति थी। चारों ओर बने छोटे-छोटे कक्षों को देखकर मैं कल्पना करने लगा कि कभी इन्हीं कमरों में विद्यार्थी निवास करते होंगे, अध्ययन करते होंगे और अपने भविष्य के सपने संजोते होंगे। मुझे अपने छात्र जीवन की भी याद आने लगी। मैं सोचने लगा कि युग बदल जाते हैं, भाषाएँ बदल जाती हैं, परंतु ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा कभी नहीं बदलती।

मदरसे की दीवारों पर समय के अनेक निशान दिखाई देते थे। किसी ने बताया कि इस भवन ने युद्ध, भूकंप और राजनीतिक परिवर्तनों के अनेक दौर देखे हैं। कभी यह शिक्षा का केंद्र रहा, कभी गोदाम के रूप में प्रयुक्त हुआ और कभी उपेक्षा का शिकार भी बना। परंतु इसके बावजूद यह आज भी दृढ़ता से खड़ा है, मानो इतिहास का प्रहरी हो।

कुकेलदाश मदरसा को देखते हुए मुझे अपने शहर पानीपत की याद आ गई। पानीपत भी इतिहास की अनेक करवटों का साक्षी रहा है। जिस प्रकार पानीपत की धरती ने साम्राज्यों के उत्थान और पतन को देखा, उसी प्रकार ताशकंद की इन ऐतिहासिक इमारतों ने भी समय की अनगिनत यात्राएँ देखी हैं। मुझे लगा कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि ऐसी इमारतों की दीवारों में भी जीवित रहता है।

मदरसे के आसपास का क्षेत्र भी अत्यंत रोचक था। निकट ही प्रसिद्ध चोरसू बाज़ार था, जहाँ जीवन अपनी पूरी रंगीनियों के साथ धड़कता था। एक ओर सदियों पुराना मदरसा और दूसरी ओर जीवंत बाज़ार—यह दृश्य मुझे भारत के पुराने शहरों की याद दिला रहा था, जहाँ इतिहास और वर्तमान एक साथ चलते हैं।

मैं वहाँ काफी देर तक बैठा रहा। उस शांत वातावरण में मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो अतीत और वर्तमान के बीच कोई अदृश्य संवाद चल रहा हो। मैं सोच रहा था कि जिन लोगों ने इस मदरसे का निर्माण किया होगा, क्या उन्होंने कभी कल्पना की होगी कि सदियों बाद भारत का एक युवा विद्यार्थी यहाँ आएगा, इसकी दीवारों को देखेगा और इसकी स्मृतियों को अपने हृदय में लेकर जाएगा?

कुकेलदाश मदरसा मेरे लिए केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं था। वह शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक था। उसने मुझे यह एहसास कराया कि ज्ञान की परंपरा सीमाओं में बंधी नहीं होती। भारत हो या उज़्बेकिस्तान, मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका ज्ञान, उसकी संस्कृति और उसकी स्मृति होती है।

आज, दशकों बाद भी जब मैं ताशकंद के अपने प्रवास को याद करता हूँ, तो कुकेलदाश मदरसे की विशाल मेहराबें, उसका शांत आँगन और उसकी इतिहास से भरी दीवारें मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठती हैं। वह स्थान मुझे आज भी यह संदेश देता है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, ज्ञान और संस्कृति की ज्योति कभी बुझती नहीं; वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानवता का मार्ग आलोकित करती रहती है।
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चोरसू बाज़ार में एक दिन -14

ताशकंद में हमारे अध्ययन का समय प्रातः दस बजे से लेकर अपराह्न तीन बजे तक रहता था। उसके बाद का समय हमारे लिए ताशकंद को जानने और समझने का समय होता था। सप्ताह के अवकाश वाले दिन तो विशेष रूप से घूमने-फिरने के लिए सुरक्षित रहते थे। ऐसे ही एक रविवार को हमने निश्चय किया कि आज पूरा दिन ताशकंद के प्रसिद्ध चोरसू बाज़ार में बिताया जाए।

सुबह का समय था। हम छात्रावास से निकले और मेट्रो पकड़कर पुराने ताशकंद की ओर चल पड़े। ताशकंद की मेट्रो स्वयं एक कला दीर्घा जैसी लगती थी, पर उस दिन हमारा लक्ष्य कुछ और था। कुछ ही देर बाद हम चोरसू स्टेशन पर उतर गए। स्टेशन से बाहर निकलते ही दूर से नीले रंग का विशाल गुम्बद दिखाई देने लगा। वही था—चोरसू बाज़ार, ताशकंद के जनजीवन का धड़कता हुआ हृदय।

जैसे-जैसे हम उसके निकट पहुँचते गए, वातावरण में एक अलग ही प्रकार की चहल-पहल दिखाई देने लगी। लोगों की आवाजाही बढ़ती जा रही थी। कोई फल खरीद रहा था, कोई सब्जियाँ, कोई कपड़े और कोई घरेलू सामान। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा ताशकंद उस दिन वहीं उमड़ आया हो।

बाज़ार में प्रवेश करते ही सबसे पहले मेरी दृष्टि फलों की दुकानों पर पड़ी। मैंने जीवन में पहली बार इतने विशाल आकार के खरबूजे और तरबूज एक साथ देखे थे। अंगूरों के गुच्छे इतने बड़े और आकर्षक थे कि उन्हें देखकर मन ललचा जाए। लाल सेब, सुनहरी खुबानियाँ, आड़ू, नाशपाती और अनारों के ढेर ऐसे लगे हुए थे मानो किसी चित्रकार ने रंगों की प्रदर्शनी सजा दी हो।

मुझे अपने हरियाणा के खेतों और पानीपत की मंडियों की याद आ गई। अंतर केवल इतना था कि यहाँ फलों की विविधता कहीं अधिक थी। उज़्बेकिस्तान की धरती सचमुच फलों की धरती कही जा सकती है।

आगे बढ़ने पर सूखे मेवों की कतारें दिखाई दीं। बादाम, पिस्ता, अखरोट, किशमिश और सूखी खुबानियों के ढेर लगे हुए थे। दुकानदार बड़ी आत्मीयता से ग्राहकों को स्वाद चखाते थे। भाषा की कठिनाई अवश्य थी, पर मुस्कान की भाषा सब समझते थे। हम कभी रूसी के दो-चार शब्द बोलते, कभी संकेतों का सहारा लेते और कभी केवल मुस्कुराकर अपनी बात कह देते।

एक स्थान पर बड़ी-बड़ी गोल रोटियाँ सजी हुई थीं। इन्हें वहाँ "नॉन" कहा जाता था। उनकी सुगंध दूर तक फैल रही थी। मुझे भारतीय तंदूरी रोटी की याद आ गई। मैंने एक रोटी खरीदी और वहीं बैठकर उसका स्वाद लिया। सरल भोजन होने पर भी उसमें एक विशेष प्रकार का अपनापन था।

चोरसू बाज़ार केवल खरीद-बिक्री का केंद्र नहीं था, बल्कि लोगों के मिलने-जुलने का भी स्थान था। वृद्ध लोग एक ओर बैठकर बातचीत कर रहे थे। महिलाएँ परिवार के साथ खरीदारी कर रही थीं। बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे। हर चेहरे पर जीवन की सहजता दिखाई देती थी।

उन्हें देखकर मुझे अपने शहर पानीपत के बाज़ारों की याद आने लगी। इंसार बाज़ार, पुरानी सब्ज़ी मंडी और शहर की संकरी गलियों में भी यही दृश्य दिखाई देता है। दुकानदार ग्राहकों को नाम से पहचानते हैं, लोग खरीदारी से अधिक बातचीत करने आते हैं, और बाज़ार केवल व्यापार नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र बन जाता है।

कुछ देर बाद मुझे दिल्ली का चाँदनी चौक भी याद आने लगा। चाँदनी चौक की भीड़, उसकी पुरानी दुकानें, मसालों की खुशबू और लोगों का अथाह प्रवाह—सब कुछ किसी न किसी रूप में चोरसू बाज़ार से जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था। मुझे लगा कि चाहे ताशकंद हो, दिल्ली हो या पानीपत—बाज़ारों की आत्मा एक जैसी होती है।

दोपहर तक हम बाज़ार के लगभग हर हिस्से में घूम चुके थे। एक कोने में स्थानीय हस्तशिल्प बिक रहा था। कहीं रंग-बिरंगे कपड़े थे, कहीं मिट्टी के बर्तन और कहीं लकड़ी की नक्काशी की वस्तुएँ। इन वस्तुओं में उज़्बेक संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी।

मैंने वहाँ खड़े-खड़े सोचा कि सदियों पहले जब रेशम मार्ग से व्यापारी गुजरते होंगे, तब भी शायद इसी प्रकार के बाज़ारों में रुकते होंगे। वे केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि विचारों, संस्कृतियों और अनुभवों का भी आदान-प्रदान करते होंगे। शायद इसी कारण ताशकंद सदियों से सभ्यताओं के मिलन का केंद्र रहा है।

शाम होने लगी थी। बाज़ार की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। हम अपने छात्रावास लौटने के लिए निकल पड़े। पर लौटते समय मेरे मन में एक गहरी अनुभूति थी। उस दिन मैंने केवल एक बाज़ार नहीं देखा था, बल्कि उज़्बेकिस्तान के जनजीवन की धड़कन को महसूस किया था।

आज, लगभग आधी शताब्दी बाद भी जब मैं चोरसू बाज़ार को याद करता हूँ, तो वहाँ के फलों की सुगंध, लोगों की मुस्कान, नीले गुम्बद की छवि और बाज़ार की जीवंतता मेरी स्मृतियों में ताज़ा हो उठती है। मुझे लगता है कि यदि किसी यात्री को किसी देश की आत्मा को समझना हो, तो उसे उसके बाज़ारों में अवश्य जाना चाहिए। मैंने उज़्बेकिस्तान को उसके स्मारकों और संग्रहालयों से जितना जाना, उससे कहीं अधिक चोरसू बाज़ार की गलियों में घूमकर जाना।

मेरे लिए चोरसू बाज़ार आज भी केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि ताशकंद की जीवंत स्मृति, भारत और उज़्बेकिस्तान की सांस्कृतिक निकटता का प्रतीक और मेरे जीवन की उन अमूल्य यात्राओं में से एक है, जिन्हें समय कभी धूमिल नहीं कर सकता।
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अलीशेर नवोई ओपेरा एवं बैले थियेटर : ताशकंद की सांस्कृतिक आत्मा से मेरा परिचय-15

ताशकंद में बिताए गए मेरे आठ महीनों के प्रवास में अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थलों को देखने का अवसर मिला। इनमें से कुछ स्थान अपनी भव्यता के कारण स्मरणीय हैं, कुछ अपने इतिहास के कारण, और कुछ इसलिए कि उन्होंने मेरे मन पर गहरा सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ा। अलीशेर नवोई ओपेरा एवं बैले थियेटर ऐसा ही एक स्थल था।

भारत से जाने से पहले मैंने ओपेरा और बैले के बारे में केवल पढ़ा और सुना था। हमारे यहाँ संगीत, नृत्य और नाटक की समृद्ध परंपरा है, परंतु यूरोप और रूस की ओपेरा एवं बैले कला मेरे लिए एक नया अनुभव थी। इसलिए जब मुझे पता चला कि ताशकंद का अलीशेर नवोई ओपेरा एवं बैले थियेटर मध्य एशिया के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है, तो उसे देखने की उत्सुकता स्वाभाविक थी।

एक दिन हम कुछ भारतीय छात्र मेट्रो से वहाँ जाने के लिए निकले। जैसे ही हम थियेटर के निकट पहुँचे, उसकी भव्य इमारत दूर से ही दिखाई देने लगी। विशाल परिसर, सुंदर उद्यान, फव्वारे और सुव्यवस्थित वातावरण देखकर ऐसा लगा मानो हम किसी सांस्कृतिक तीर्थस्थल में प्रवेश कर रहे हों।

थियेटर की इमारत अत्यंत आकर्षक थी। उसकी वास्तुकला में पूर्व और पश्चिम का सुंदर संगम दिखाई देता था। एक ओर मध्य एशिया की पारंपरिक कला की झलक थी तो दूसरी ओर आधुनिक स्थापत्य का प्रभाव। बाद में ज्ञात हुआ कि इस भवन के निर्माण में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापानी युद्धबंदियों ने भी श्रम किया था। यह जानकारी मेरे लिए विशेष रुचिकर थी, क्योंकि उस भवन की प्रत्येक दीवार मानो इतिहास की एक अलग कहानी कह रही थी।

थियेटर के भीतर प्रवेश करते ही मैं उसकी भव्यता देखकर अभिभूत रह गया। विशाल झूमर, कलात्मक सजावट, भव्य सभागार और अनुशासित वातावरण—सब कुछ अत्यंत प्रभावशाली था। वहाँ उपस्थित दर्शकों के व्यवहार में भी कला के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता था।

उस दिन हमें एक बैले प्रस्तुति देखने का अवसर मिला। भाषा मेरी समझ से परे थी, परंतु कला की भाषा किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती। कलाकारों की भाव-भंगिमाएँ, संगीत की लय और मंच की प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि बिना शब्दों को समझे भी कथा का भाव हृदय तक पहुँच रहा था।

मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ के लोग कला और संस्कृति को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे, बल्कि उसे जीवन का आवश्यक हिस्सा समझते थे। परिवार, विद्यार्थी, बुज़ुर्ग—सभी बड़ी संख्या में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे। इससे मुझे उज़्बेक समाज की सांस्कृतिक चेतना का परिचय मिला।

थियेटर के बाहर बैठकर मैं देर तक लोगों को आते-जाते देखता रहा। उसी समय मेरे मन में दिल्ली की याद उभर आई। मुझे दिल्ली का और विशेष रूप से स्मरण हो आया, जहाँ भारत की नाट्य, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आयोजित होती हैं।

किन्तु यदि किसी एक स्थान से इसकी तुलना करनी हो, तो मुझे सबसे अधिक साम्यता से प्रतीत हुई। जिस प्रकार कमानी सभागार दिल्ली की सांस्कृतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र है, उसी प्रकार अलीशेर नवोई थियेटर ताशकंद की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र था। अंतर केवल इतना था कि कमानी सभागार में भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य और रंगमंच की परंपरा जीवित दिखाई देती है, जबकि ताशकंद में ओपेरा और बैले की यूरोपीय तथा रूसी परंपरा अपने उत्कृष्ट रूप में उपस्थित थी।

मुझे यह भी अनुभव हुआ कि भारत और उज़्बेकिस्तान दोनों देशों की सांस्कृतिक आत्मा में एक समान तत्व विद्यमान है—कला के प्रति सम्मान। माध्यम भिन्न हो सकते हैं, वाद्य यंत्र अलग हो सकते हैं, नृत्य शैलियाँ अलग हो सकती हैं, परंतु कला के प्रति प्रेम दोनों समाजों को एक सूत्र में बाँधता है।

उस दिन थियेटर से लौटते समय मेरे मन में अजीब-सी तृप्ति थी। मैंने केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं देखा था, बल्कि एक ऐसे समाज की झलक देखी थी जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को बड़े गर्व और सम्मान के साथ सँजोकर रखता है।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो अलीशेर नवोई ओपेरा एवं बैले थियेटर की भव्य इमारत, उसके चमकते झूमर, मंच पर नृत्य करते कलाकार और दर्शकों का अनुशासित उत्साह मेरी आँखों के सामने सजीव हो उठता है। ताशकंद की स्मृतियों में यह स्थल मेरे लिए केवल एक भवन नहीं, बल्कि संस्कृति, सौंदर्य और मानवीय सृजनशीलता का प्रतीक बन गया है।

यदि चोरसू बाज़ार ने मुझे उज़्बेकिस्तान के जनजीवन से परिचित कराया, खास्त इमाम परिसर ने उसकी आध्यात्मिक चेतना का परिचय दिया, तो अलीशेर नवोई ओपेरा एवं बैले थियेटर ने मुझे उसकी सांस्कृतिक आत्मा से परिचित कराया। यही कारण है कि ताशकंद की स्मृतियों में यह स्थान आज भी विशेष सम्मान और आत्मीयता के साथ सुरक्षित है।
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कपास के खेतों में श्रम, समाज और जीवन का पाठ-16

ताश्कंद में बिताए गए दिनों की अनेक स्मृतियाँ आज भी मन में ताज़ा हैं, परन्तु उनमें से सबसे अनूठा और प्रेरणादायक अनुभव था आसपास के गाँवों में जाकर कपास चुनना। उज़्बेकिस्तान सदियों से कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा है और संयोग से हमारे वहाँ रहने के दिनों में कपास चुगाई का मौसम था। इस कारण हमें उस व्यवस्था को निकट से देखने और समझने का अवसर मिला, जिसने मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ी।

हमारे देश में सामान्यतः जब फसल तैयार होती है तो उसके कटान, संग्रहण और विपणन का अधिकांश भार किसान और उसके परिवार पर ही रहता है। कभी-कभी उसे अतिरिक्त मजदूरों की सहायता भी लेनी पड़ती है। खेत में बीज डालने से लेकर फसल को मंडी तक पहुँचाने की पूरी यात्रा किसान के अथक परिश्रम, उसके पसीने और उसके संघर्ष की कहानी होती है। ऊपर से प्रकृति की मार—अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, सूखा या अग्निकांड—उसकी वर्षों की मेहनत को कुछ ही क्षणों में नष्ट कर सकती है। किन्तु शहरों में रहने वाले अधिकांश लोग केवल अंतिम परिणाम देखते हैं; उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि उनके भोजन की प्रत्येक थाली के पीछे कितनी मेहनत, चिंता और त्याग छिपा हुआ है।

सोवियत उज़्बेकिस्तान में मैंने एक भिन्न व्यवस्था देखी। वहाँ खेती केवल किसान का कार्य नहीं मानी जाती थी, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी समझी जाती थी। फसल की बुवाई, सिंचाई, देखभाल और कटाई—हर चरण में समाज के विभिन्न वर्ग किसी न किसी रूप में सहभागी बनते थे। यह दृश्य मुझे भारत के प्राचीन ग्राम-गणतंत्रों की याद दिलाता था, जहाँ पूरा गाँव एक परिवार की तरह कार्य करता था और प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था।

कपास चुगाई के मौसम में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और यहाँ तक कि वरिष्ठ कक्षाओं के विद्यालयों में भी अवकाश घोषित कर दिया जाता था। परन्तु ये छुट्टियाँ मनोरंजन या विश्राम के लिए नहीं होती थीं। विद्यार्थी गाँवों की ओर जाते, किसानों के साथ खेतों में उतरते और श्रम की उस प्रक्रिया का हिस्सा बनते जिसके बल पर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था खड़ी थी।

हमारे संस्थान की ओर से ऐसी कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं थी, फिर भी जब भी अवसर मिलता, हम मित्र आसपास के गाँवों में पहुँच जाते। हमारे कंधों पर कपड़े का बना एक थैला या झोला लटका रहता, जिसमें हम कपास चुन-चुनकर भरते जाते। खेत के एक कोने में किसान अपनी तराजू लेकर बैठा होता। दिन भर की चुनी हुई कपास को वह तौलता और उसके बदले हमें कुछ रूबल या कोपेक प्रदान करता।

आर्थिक दृष्टि से यह राशि हमारे लिए बहुत बड़ी नहीं थी, क्योंकि हम केवल कभी-कभार ही वहाँ जाते थे। परन्तु स्थानीय विद्यार्थियों के लिए यह कमाई अत्यंत महत्वपूर्ण होती थी। अनेक छात्र अपनी जेब-खर्च, पुस्तकों, शिक्षण सामग्री और वर्ष भर की छोटी-मोटी आवश्यकताओं का खर्च इसी श्रम से अर्जित करते थे। इस प्रकार श्रम केवल आय का साधन नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का भी आधार था।

मेरे लिए यह अनुभव किसी पाठ्यपुस्तक से कहीं अधिक शिक्षाप्रद था। पहली बार मैंने समझा कि श्रम केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी है। खेतों में काम करते हुए किसान, विद्यार्थी, शिक्षक और अधिकारी के बीच कोई ऊँच-नीच नहीं दिखाई देती थी। वहाँ सबके हाथ मिट्टी से सने होते थे और सबका उद्देश्य एक ही होता था—सामूहिक उत्पादन और सामूहिक समृद्धि।

दुर्भाग्य से हमारे समाज में शारीरिक श्रम को अक्सर कम सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। हम अनेक बार यह मान लेते हैं कि सफाई, खेती या अन्य श्रमसाध्य कार्य किसी विशेष वर्ग का दायित्व हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि समाज का कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। जो व्यक्ति खेत में अन्न उगाता है, जो सड़क बनाता है, जो सफाई करता है, वही सभ्यता की आधारशिला रखता है।

कपास के उन खेतों में काम करते हुए मुझे बार-बार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, डॉ॰ जाकिर हुसैन और आचार्य विनोबा भावे के विचार स्मरण आते थे। इन सभी महापुरुषों ने शिक्षा को श्रम और ग्राम जीवन से जोड़ने पर बल दिया था। गांधीजी की ‘नई तालीम’ और विनोबा जी के ‘ग्राम स्वराज’ का मूल भाव यही था कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन और श्रम से उसका जीवंत संबंध स्थापित हो।

सोवियत व्यवस्था के अनेक पक्षों पर मतभेद हो सकते हैं; उसकी सीमाएँ और कमियाँ भी रही होंगी। किन्तु मैंने वहाँ जो देखा, उसमें श्रम के प्रति सम्मान, सामूहिक उत्तरदायित्व और आत्मनिर्भरता की भावना अत्यंत प्रभावशाली थी। कपास के उन खेतों में बिताए गए कुछ घंटे केवल श्रम के घंटे नहीं थे; वे जीवन, समाज और मानव समानता का पाठ पढ़ाने वाले अमूल्य क्षण थे।

आज भी जब उन दिनों को स्मरण करता हूँ तो लगता है कि मैंने वहाँ केवल कपास नहीं चुनी थी, बल्कि श्रम की गरिमा, सामूहिकता की शक्ति और मनुष्य की वास्तविक महानता के कुछ अनमोल सूत्र भी चुनकर अपने साथ ले आया था।

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ताश्कंद की महिलाएँ : एक सशक्त समाज की जीवंत तस्वीर -17

सन् 1980 का ताश्कंद, तत्कालीन सोवियत संघ का एक आधुनिक, प्रगतिशील और जीवंत नगर था। भारत से आए एक युवा विद्यार्थी के रूप में यहाँ की अनेक बातें मुझे आकर्षित करती थीं, परन्तु उनमें सबसे अधिक प्रभाव यदि किसी ने डाला तो वह था वहाँ की महिलाओं का सामाजिक स्थान, उनका आत्मविश्वास और समाज निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी।

भारतीय संस्कृति में महिलाओं का स्थान प्राचीन काल से अत्यन्त सम्माननीय रहा है। वेदों की अनेक ऋचाओं की रचयिता ऋषिकाएँ रही हैं। गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने भारतीय ज्ञान-परम्परा को समृद्ध किया। यद्यपि आधुनिक भारत में महिलाओं ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, फिर भी सामाजिक जीवन में समानता की यात्रा अभी अधूरी प्रतीत होती है।

मेरे अपने परिवार में महिलाओं को सदैव सम्मान और अवसर प्राप्त हुए। मेरी माता श्रीमती सीतारामण एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उनका आर्य समाज, कांग्रेस तथा अनेक समाजसेवी संगठनों से गहरा जुड़ाव था। वे हमारे नगर की उन प्रथम महिलाओं में थीं जिन्होंने घूँघट की परम्परा को चुनौती देते हुए आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की। इसलिए बचपन से ही मैंने महिलाओं को परिवार और समाज में बराबरी का स्थान पाते देखा था।

किन्तु जब मैं सोवियत उज़्बेकिस्तान पहुँचा तो वहाँ महिलाओं की स्थिति को देखकर मुझे एक नई सामाजिक व्यवस्था की झलक मिली। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में जहाँ भी हम गए, वहाँ महिला विद्यार्थियों की संख्या उल्लेखनीय थी। इतना ही नहीं, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और प्रशासनिक अधिकारियों में भी महिलाओं की बड़ी भागीदारी दिखाई देती थी।

उस समय यह सामान्य धारणा थी कि मिलिशिया (पुलिस), चिकित्सा सेवाओं, शिक्षा, बाल-कल्याण केन्द्रों, क्रेचों तथा सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में 70 से 80 प्रतिशत तक महिलाएँ कार्यरत थीं। मुझे विशेष प्रसन्नता तब हुई जब मैंने अपने कॉम्सोमोल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट में देखा कि निदेशक से लेकर अनेक प्रमुख पदों पर महिलाएँ कार्य कर रही थीं। हमारी अधिकांश शिक्षिकाएँ महिलाएँ थीं और संस्थान के प्रशासनिक कार्यों में भी उनकी प्रमुख भूमिका थी।

ताश्कंद में रहते हुए मुझे एक छोटी-सी घटना ने बहुत प्रभावित किया। प्रतिदिन प्रातः हमारे संस्थान की सफाई करने एक महिला आती थीं। साधारण कार्य करने वाली उस महिला को हम सामान्य कर्मचारी समझते थे। एक दिन संध्या समय जब हम बाजार में घूम रहे थे, तब हमने उन्हें देखा। वे अत्यन्त सुसज्जित, आत्मविश्वासी और गरिमामयी व्यक्तित्व के साथ अपने परिवार के बीच थीं। पहली दृष्टि में हम उन्हें पहचान ही नहीं पाए। जब हमने उनका अभिवादन किया तो उन्होंने जिस स्नेह और अपनत्व से हमारा स्वागत किया, वह आज भी स्मृति में ताज़ा है। उन्होंने हमें अपने बच्चों की तरह दुलारा और पास की दुकान से कुछ खाने-पीने की वस्तुएँ भी दिलाईं। उस क्षण मैंने अनुभव किया कि मातृत्व और वात्सल्य की भावना संसार के हर कोने में एक समान होती है।

मेरी रूसी भाषा की अध्यापिका रईसा करिमोवना भी मेरे लिए महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक प्रतिमा थीं। वे ज्ञान, अनुशासन, आत्मविश्वास और ममता का अद्भुत संगम थीं। उनके व्यक्तित्व में मैंने देखा कि एक महिला एक साथ उत्कृष्ट शिक्षिका, संवेदनशील मार्गदर्शक और सशक्त नागरिक हो सकती है।

ताश्कंद की महिलाएँ केवल गृहिणी नहीं थीं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, बस चालक, मेट्रो कर्मचारी, कलाकार, प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय थीं। दुकानों, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों, सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों में महिलाओं की बड़ी संख्या दिखाई देती थी। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके व्यक्तित्व में एक विशेष आत्मविश्वास भर दिया था।

सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात यह थी कि महिलाएँ सामाजिक जीवन में पूर्ण स्वतंत्रता और सुरक्षा का अनुभव करती थीं। वे देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेतीं, मित्रों के साथ घूमतीं और विभिन्न सामाजिक संगठनों में सक्रिय रहतीं। सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करते समय उनके चेहरे पर जो सहजता और सुरक्षा का भाव दिखाई देता था, वह उस समाज की परिपक्वता का परिचायक था।

कला, संस्कृति और खेलों में भी महिलाओं का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। प्रसिद्ध नृत्यांगना जैसी विभूतियाँ न केवल उज़्बेक संस्कृति की प्रतिनिधि थीं, बल्कि उन्होंने एक युग को अपनी कला से आलोकित किया। जब भी हम सर्कस या सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने जाते, वहाँ बड़ी संख्या में महिला कलाकारों को देखकर आश्चर्य और प्रसन्नता दोनों होती थी। उनकी प्रतिभा, परिश्रम और आत्मविश्वास मंच पर स्पष्ट दिखाई देता था।

ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा के दौरान भी मैंने पाया कि महिलाओं की भागीदारी केवल शहरों तक सीमित नहीं थी। ग्राम सोवियतों और स्थानीय प्रशासन में उनकी उपस्थिति प्रभावशाली थी। शिक्षा और सामाजिक अवसरों ने उन्हें ग्रामीण जीवन में भी नेतृत्व प्रदान किया था। उस समय भारत में जहाँ महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा चल रही थी, वहीं सोवियत उज़्बेकिस्तान में महिलाएँ अपनी योग्यता और शिक्षा के बल पर अनेक जिम्मेदार पदों पर कार्य कर रही थीं।

मुझे यह भी अनुभव हुआ कि उज़्बेकिस्तान और भारत की महिलाओं में अनेक समानताएँ हैं। विशेषकर कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की महिलाओं का शारीरिक गठन और व्यक्तित्व उज़्बेक महिलाओं से काफी मिलता-जुलता प्रतीत होता था। मुझे अक्सर लगता था कि यदि भारतीय महिलाओं को भी समान अवसर, पौष्टिक आहार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वस्थ सामाजिक वातावरण मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में विश्व की सर्वश्रेष्ठ महिलाओं से कम नहीं होंगी।

सोवियत व्यवस्था में महिलाओं की समानता केवल एक आदर्श नहीं थी, बल्कि जीवन का व्यावहारिक सत्य थी। 1917 की महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति के बाद ने महिलाओं की मुक्ति और समान अधिकारों को समाज निर्माण का अनिवार्य अंग माना था। ताश्कंद में बिताए गए दिनों में मुझे उस विचारधारा का वास्तविक स्वरूप देखने का अवसर मिला।

आज जब मैं उन दिनों को स्मरण करता हूँ तो ताश्कंद की महिलाएँ मेरे मन में केवल किसी देश की नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की निर्माता के रूप में उभरती हैं जिसने शिक्षा, श्रम और समान अवसरों के माध्यम से महिलाओं को सम्मान और आत्मविश्वास प्रदान किया। वे शिक्षिका थीं, वैज्ञानिक थीं, कलाकार थीं, कर्मचारी थीं, नेता थीं और सबसे बढ़कर एक नए समाज की सृजनकर्ता थीं।

मेरे लिए सोवियत उज़्बेकिस्तान की महिलाएँ इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि जब किसी समाज में महिलाओं को समान अवसर, शिक्षा और सम्मान मिलता है, तो वे केवल अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को भी आलोकित कर देती हैं। ताश्कंद की उन सशक्त महिलाओं की स्मृति आज भी मेरे मन में आशा, सम्मान और प्रेरणा का दीप जलाए रखती है।
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ताश्कंद के बच्चे : शिक्षा, संस्कार और सुखद बचपन की दुनिया-18

1980 में ताश्कंद में बिताए गए मेरे आठ महीनों के प्रवास के दौरान मुझे वहाँ के समाज को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला। ऐतिहासिक इमारतों, संग्रहालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त जिस बात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह थी वहाँ के बच्चों की दुनिया। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास, जीवन में अनुशासन, शिक्षा के प्रति गंभीरता और समाज द्वारा उनके प्रति दिखाई जाने वाली संवेदनशीलता मुझे बार-बार आकर्षित करती थी।

भारत से आए एक युवा विद्यार्थी के रूप में मैं अक्सर ताश्कंद के बच्चों को देखकर अपने देश के बच्चों की तुलना करता था। दोनों देशों के बच्चों में उत्साह, जिज्ञासा और चंचलता समान थी, परन्तु सोवियत व्यवस्था में बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो सुव्यवस्थित व्यवस्था दिखाई देती थी, वह मेरे लिए एक नया अनुभव था।

ताश्कंद की सड़कों, मेट्रो स्टेशनों, पार्कों और बाजारों में बच्चे बड़ी संख्या में दिखाई देते थे। वे साफ-सुथरे कपड़ों में, आत्मविश्वास के साथ अपने विद्यालय जाते या खेल के मैदानों में खेलते दिखाई देते थे। यह देखकर आश्चर्य होता था कि शहर की व्यस्तता के बीच भी बच्चों के लिए पर्याप्त स्थान और सुविधाएँ उपलब्ध थीं। लगभग हर आवासीय क्षेत्र में बच्चों के खेलने के लिए पार्क, झूले और खेल मैदान बने हुए थे।

वहाँ की शिक्षा व्यवस्था अत्यंत संगठित थी। विद्यालयों में शिक्षा निःशुल्क थी और लगभग प्रत्येक बच्चा नियमित रूप से स्कूल जाता था। बच्चों के लिए पुस्तकालय, खेल केंद्र और सांस्कृतिक गतिविधियों की भरपूर व्यवस्था थी। कई बार मैंने विद्यालयों के समूहों को संग्रहालयों, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाते हुए देखा। ऐसा प्रतीत होता था कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बच्चे बहुत स्वस्थ दिखाई देते थे। विद्यालयों और बाल केंद्रों में पौष्टिक भोजन की व्यवस्था थी। दूध, दही, मक्खन, फल और सब्जियाँ उनके दैनिक भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। मुझे शायद ही कोई ऐसा बच्चा दिखाई दिया हो जो कुपोषित या अस्वस्थ प्रतीत होता हो। खेलकूद उनके जीवन का स्वाभाविक अंग था और यही कारण था कि अधिकांश बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय दिखाई देते थे।

मुझे विशेष रूप से यह बात प्रभावित करती थी कि बच्चों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अलग-अलग प्रकार की दुकानें बनाई गई थीं। बच्चों के कपड़े, खिलौने, पुस्तकें, विद्यालयी सामग्री और जूते आदि के लिए विशेष दुकानें होती थीं, जहाँ अच्छी गुणवत्ता का सामान अपेक्षाकृत कम मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता था। ऐसा लगता था मानो पूरा समाज बच्चों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता हो।

इसी संदर्भ में मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है।

मेरा कद उस समय अपेक्षाकृत छोटा था और उसी कारण मेरे पैरों का आकार भी छोटा था। मुझे एक जोड़ी अच्छे जूते खरीदने थे। कई दुकानों में जाकर मैंने जूते देखे, परन्तु जो जूते मुझे पसंद आते थे उनकी कीमत मेरे छात्र बजट से कहीं अधिक थी। मैं असमंजस में था कि क्या करूँ।

एक दिन मैंने अपनी रूसी भाषा की अध्यापिका से अपनी समस्या बताई। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम 'मालचिस्की' (Malchiski) दुकान पर जाओ। वहाँ बच्चों और किशोरों के लिए सामान मिलता है। तुम्हारे पैर का आकार छोटा है, इसलिए तुम्हें वहाँ उपयुक्त जूते मिल जाएंगे।"

उनकी सलाह मानकर मैं उस दुकान पर पहुँचा। दुकान में प्रवेश करते ही मैं आश्चर्यचकित रह गया। वहाँ बच्चों और किशोरों के लिए कपड़ों, जूतों और अन्य आवश्यक वस्तुओं का विशाल संग्रह था। मैंने कई जोड़ी जूते देखे और उनमें से एक जोड़ी मुझे बहुत पसंद आ गई। वही जूते यदि सामान्य दुकान में होते तो शायद मेरी पहुँच से बाहर होते, परन्तु वहाँ उनकी कीमत बहुत कम थी। मैंने तुरंत उन्हें खरीद लिया।

जब मैं नए जूते पहनकर छात्रावास लौटा तो मुझे केवल जूते मिलने की खुशी नहीं थी, बल्कि इस बात का भी सुखद अनुभव था कि वहाँ बच्चों और युवाओं की आवश्यकताओं को कितनी गंभीरता से समझा जाता था। उस छोटी-सी घटना ने मुझे सोवियत समाज की उस सोच से परिचित कराया जिसमें बच्चों और युवाओं को राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति माना जाता था।

ताश्कंद के बच्चों को देखकर मुझे यह अनुभव हुआ कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी ऊँची इमारतों या औद्योगिक विकास से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की मुस्कान, स्वास्थ्य और शिक्षा से आँकी जानी चाहिए। वहाँ के बच्चे न केवल अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, बल्कि उन्हें ऐसा वातावरण भी मिल रहा था जिसमें वे आत्मविश्वासी, स्वस्थ और जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

आज, लगभग आधी सदी बाद भी, जब मैं ताश्कंद के उन दिनों को याद करता हूँ, तो वहाँ के बच्चों के प्रसन्न चेहरे, उनके खेल के मैदान, उनकी विद्यालयी वर्दियाँ और "मालचिस्की" की वह दुकान मेरी स्मृतियों में वैसे ही जीवित हो उठती है जैसे यह सब कल की ही बात हो। यह अनुभव मेरे लिए केवल एक विदेशी यात्रा की याद नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की झलक है जिसने अपने बच्चों के भविष्य को अत्यंत महत्व दिया था।
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ताश्कंद में बुजुर्गों का सम्मान -19

ताश्कंद में रहते हुए मुझे वहाँ के बुजुर्गों के जीवन, उनकी सामाजिक स्थिति और उन्हें प्राप्त सम्मान को निकट से देखने का अवसर मिला। सोवियत संघ के संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए गए थे, परन्तु इसके साथ-साथ महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुविधाओं और संरक्षण की व्यवस्था भी थी। यह केवल सरकारी घोषणाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि दैनिक जीवन में स्पष्ट दिखाई देता था।

1980 का वर्ष था। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुए लगभग पैंतीस वर्ष बीत चुके थे, परन्तु उसके घाव और उसकी स्मृतियाँ अभी भी समाज में जीवित थीं। फासीवाद के विरुद्ध लड़े गए उस महायुद्ध में सोवियत संघ के लगभग दो करोड़ लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और उससे भी अधिक लोग घायल हुए थे। इस कारण युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति पूरे समाज में गहरा सम्मान था।

ताश्कंद की सड़कों, पार्कों, मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक संस्थानों में अक्सर ऐसे बुजुर्ग दिखाई देते थे जिनके सीने पर वीरता के पदक चमक रहे होते थे। वे पदक केवल अलंकरण नहीं थे, बल्कि त्याग, संघर्ष और देशभक्ति के प्रतीक थे। अनेक पूर्व सैनिक, चाहे वे पूर्णतः स्वस्थ हों अथवा युद्ध में घायल होकर दिव्यांग हो गए हों, विभिन्न संस्थानों में सुरक्षा, रख-रखाव और प्रशासनिक कार्यों में लगे हुए थे। वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए युवाओं और विद्यार्थियों को फासीवाद के विरुद्ध लड़ी गई ऐतिहासिक लड़ाई, उसके खतरों तथा सोवियत सेना की भूमिका के बारे में भी बताते थे।

वे बड़े गर्व से कहते थे कि हिटलर और मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद ने पूरी दुनिया को अपने अधीन करने का प्रयास किया था, परन्तु सोवियत जनता और लाल सेना ने अभूतपूर्व साहस और बलिदान के साथ उसका सामना किया। उनके अनुभव इतिहास की पुस्तकों के शुष्क अध्याय नहीं थे, बल्कि जीवन्त स्मृतियाँ थीं। जब उन्हें यह पता चलता कि हम भारत से आए विद्यार्थी हैं, तो उनके व्यवहार में एक विशेष आत्मीयता आ जाती थी। भारत और सोवियत संघ की मित्रता का प्रभाव सामान्य नागरिकों के हृदय में भी स्पष्ट दिखाई देता था।

मुझे आज भी एक रोचक घटना याद है। एक दिन मैं बाल कटवाने के लिए एक सैलून में गया। वहाँ कोई कर्मचारी दिखाई नहीं दिया। केवल एक सज्जन व्यक्ति अत्यंत सलीके से सूट-बूट पहनकर एक कुर्सी पर बैठे थे। मैंने समझा कि वे भी किसी ग्राहक की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। जब मैंने बाल कटवाने की इच्छा व्यक्त की, तो वे मुस्कुराकर उठे, अपना कोट उतारकर हैंगर पर टाँगा, एप्रन पहना और मेरी कटिंग शुरू कर दी। बातचीत के दौरान पता चला कि वे भी द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व सैनिक थे। बाल काटते-काटते उन्होंने अपने युद्धकाल के अनुभव सुनाने शुरू किए। उनके शब्दों में गर्व था, परन्तु अहंकार नहीं; संघर्ष था, परन्तु शिकायत नहीं। उस दिन मुझे लगा कि इतिहास केवल संग्रहालयों और पुस्तकों में नहीं, बल्कि ऐसे साधारण दिखाई देने वाले लोगों के जीवन में भी सुरक्षित रहता है।

सोवियत व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था थी। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें नियमित पेंशन प्राप्त होती थी। सरकारी अस्पतालों और पॉलीक्लीनिकों में निःशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी। अनेक दवाइयाँ रियायती दरों पर मिलती थीं। विश्राम गृहों और स्वास्थ्य केंद्रों में उनके लिए विशेष व्यवस्था होती थी। कई स्थानों पर सार्वजनिक परिवहन में भी उन्हें रियायतें प्राप्त थीं। यह देखकर मुझे अनुभव हुआ कि वृद्धावस्था को वहाँ समाज पर बोझ नहीं, बल्कि जीवन के सम्मानित चरण के रूप में देखा जाता था।

फिर भी मुझे सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात सरकारी सुविधाएँ नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक सम्मान था। ताश्कंद और उसके आसपास के मध्य एशियाई क्षेत्रों में पारिवारिक व्यवस्था काफी हद तक हमारे भारतीय समाज से मिलती-जुलती थी। अधिकांश बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में नहीं, बल्कि अपने बच्चों और परिवार के साथ रहते थे। घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के मार्गदर्शक माने जाते थे। विवाह, त्योहार और अन्य सामाजिक अवसरों पर उन्हें सबसे सम्मानजनक स्थान दिया जाता था। परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी राय को महत्व दिया जाता था।

मुझे अनेक बार ऐसा लगा मानो मैं किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि अपने ही देश के किसी परिवार में बैठा हूँ। दादा-दादी, नाना-नानी और परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्य बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। वे केवल परिवार के बुजुर्ग नहीं, बल्कि बच्चों के पहले शिक्षक और सबसे घनिष्ठ मित्र भी थे। शाम को पार्कों और घरों के आँगनों में उन्हें अपने पोते-पोतियों और नाती-नातिनों के साथ बैठकर बातें करते देखना अत्यंत सुखद अनुभव था।

वे अपने जीवन के अनुभवों को कहानियों के रूप में सुनाते थे। युद्ध की घटनाएँ, कठिन समय के संघर्ष, लोककथाएँ, पारिवारिक प्रसंग और जीवन के मूल्य—सब कुछ उनकी कहानियों में समाहित होता था। वास्तव में यदि कोई व्यक्ति आत्मीयता और संवेदना के साथ कहानी सुना सकता है, तो वह बुजुर्ग ही होते हैं। उनके शब्दों में अनुभव की गहराई होती है और उनके स्नेह में जीवन की तपस्या।

ताश्कंद में बिताए उन दिनों ने मुझे यह सिखाया कि किसी समाज की वास्तविक सभ्यता उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या आधुनिक तकनीक से नहीं आँकी जा सकती। उसका सही आकलन इस बात से होता है कि वह अपने बच्चों, महिलाओं, दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। मैंने वहाँ देखा कि आधुनिक समाजवादी व्यवस्था और पारम्परिक उज़्बेक संस्कृति मिलकर वृद्धजनों के सम्मान की एक सुंदर व्यवस्था का निर्माण करती थीं।

आज भी जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो ताश्कंद की मेट्रो, उसके बाजार और उसकी भव्य इमारतों से अधिक मुझे वे बुजुर्ग चेहरे याद आते हैं—सीने पर चमकते पदक, आँखों में जीवनभर का अनुभव, चेहरे पर संतोष की मुस्कान और हृदय में अगली पीढ़ी के लिए अथाह स्नेह। वे केवल अपने परिवारों की धरोहर नहीं थे, बल्कि पूरे समाज की जीवित स्मृति, उसकी नैतिक शक्ति और उसके गौरवशाली इतिहास के चलित प्रतीक थे। ताश्कंद की मेरी स्मृतियों में उनका स्थान सदैव सबसे ऊँचा रहेगा।

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ताश्कंद की शिक्षा व्यवस्था : एक भारतीय विद्यार्थी की आँखों से -20

ताश्कंद में बिताए गए मेरे जीवन के वे आठ महीने केवल एक विदेशी देश में रहने का अनुभव भर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे समाज को निकट से देखने और समझने का अवसर थे जिसने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रखा था। भारत से एक युवा विद्यार्थी के रूप में जब मैं सोवियत उज़्बेकिस्तान पहुँचा, तब मेरे मन में यह उत्सुकता थी कि आखिर वह शिक्षा व्यवस्था कैसी है जिसके बारे में हम भारत में अक्सर सुनते थे। वहाँ पहुँचने के बाद मुझे अनेक विद्यालयों, महाविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों को देखने का अवसर मिला। मेरे अनेक भारतीय मित्र भी विभिन्न शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत थे और उनसे बातचीत करके मुझे इस व्यवस्था को समझने का अवसर मिला।

भारत में मैं पहले से ही उच्च शिक्षा के कुछ प्रतिष्ठित केन्द्रों के बारे में सुनता आया था। जैसे कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ,  Aligarh मुस्लिम यूनिवर्सिटी तथा जामिया मिल्लिया इस्लामीया। इन विश्वविद्यालयों की अपनी गौरवशाली परम्पराएँ थीं और आज भी हैं। ताश्कंद पहुँचकर मुझे लगा कि सोवियत संघ ने भी अपने विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और सामाजिक परिवर्तन के केन्द्रों के रूप में विकसित किया था। अंतर केवल इतना था कि वहाँ उच्च शिक्षा व्यवस्था पूरे देश में एक समान सरकारी नीति के अंतर्गत संचालित होती थी और आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती थी।

मुझे यह देखकर अत्यंत आश्चर्य और प्रसन्नता हुई कि शिक्षा को वहाँ केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं माना जाता था, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति का आधार समझा जाता था। सोवियत संघ में शिक्षा प्रत्येक नागरिक का अधिकार थी और प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक अधिकांश शिक्षा निःशुल्क उपलब्ध थी। किसी विद्यार्थी के भविष्य का निर्धारण उसके परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, परिश्रम और रुचि से होता था।

ताश्कंद की सड़कों पर चलते हुए अक्सर छोटे-छोटे बच्चों के समूह दिखाई देते थे जो अपने शिक्षकों के साथ किंडरगार्टन या बाल उद्यानों की ओर जाते थे। तीन-चार वर्ष की आयु से ही बच्चों के लिए व्यवस्थित पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था थी। वहाँ शिक्षा का प्रारम्भ खेल, गीत, चित्रकला और सामूहिक गतिविधियों से होता था। बच्चों को छोटी आयु से ही अनुशासन, सहयोग और सामूहिक जीवन का अभ्यास कराया जाता था।

विद्यालयों को देखने का अवसर मिला तो उनकी व्यवस्था ने मुझे प्रभावित किया। विशाल भवन, साफ-सुथरे कक्ष, सुसज्जित प्रयोगशालाएँ, समृद्ध पुस्तकालय और खेल के मैदान—सब कुछ यह दर्शाता था कि शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। उस समय भारत के अनेक विद्यालय अभी भी संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे, जबकि ताश्कंद के विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशालाएँ, खेल सुविधाएँ और सांस्कृतिक गतिविधियाँ सामान्य बात थीं। यह देखकर मुझे अपने देश में भी ऐसी सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता महसूस होती थी।

मुझे यह देखकर भी अच्छा लगा कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में लड़कियाँ बड़ी संख्या में शिक्षा प्राप्त कर रही थीं। महिला शिक्षक, चिकित्सक, वैज्ञानिक और इंजीनियर वहाँ सामान्य दृश्य थे। शिक्षा के क्षेत्र में स्त्री और पुरुष के बीच किसी प्रकार का भेदभाव दिखाई नहीं देता था। यह स्थिति मुझे भारत के उन प्रगतिशील शिक्षण संस्थानों की याद दिलाती थी जहाँ महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही थी, परन्तु सोवियत समाज में यह अधिक व्यापक रूप से दिखाई देती थी।

सोवियत शिक्षा व्यवस्था की एक विशेषता तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा थी। हर विद्यार्थी का विश्वविद्यालय जाना आवश्यक नहीं माना जाता था। जो विद्यार्थी तकनीकी क्षेत्रों में रुचि रखते थे, उनके लिए विशेष संस्थान थे जहाँ उन्हें इंजीनियरिंग, मशीनरी, कृषि, निर्माण और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों का प्रशिक्षण दिया जाता था। मुझे कई बार ऐसा लगा कि जिस प्रकार भारत में बाद के वर्षों में आईआईटी और अन्य तकनीकी संस्थानों को महत्व मिला, उसी प्रकार सोवियत व्यवस्था ने पहले से ही तकनीकी शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार बना रखा था।

ताश्कंद उस समय मध्य एशिया का एक प्रमुख शैक्षणिक केन्द्र था। यहाँ अनेक विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान थे जहाँ केवल उज़्बेकिस्तान ही नहीं, बल्कि सोवियत संघ के अन्य गणराज्यों तथा एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों से भी विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। मुझे स्वयं ऐसे अनेक संस्थानों को देखने का अवसर मिला और वहाँ की व्यवस्था, अनुशासन तथा शैक्षणिक गुणवत्ता ने मुझे प्रभावित किया।

मेरे कई भारतीय मित्र भी इन संस्थानों में अध्ययन कर रहे थे। उनमें से कुछ विज्ञान और तकनीकी विषयों में, कुछ चिकित्सा शिक्षा में और कुछ सामाजिक विज्ञानों में अध्ययनरत थे। उनसे बातचीत करने पर यह अनुभव हुआ कि वे अपनी शिक्षा और वहाँ उपलब्ध सुविधाओं से संतुष्ट थे। उनमें से अधिकांश अपनी योग्यता और शैक्षणिक उपलब्धियों के आधार पर चयनित होकर आए थे, जबकि कुछ ऐसे भी थे जिन्हें अंतरराष्ट्रीय सहयोग कार्यक्रमों के अंतर्गत अवसर प्राप्त हुआ था। वे सभी निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तथा छात्रावास, पुस्तकालय और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी उठा रहे थे।

ताश्कंद में रहते हुए मुझे अनेक देशों के विद्यार्थियों से मिलने का अवसर मिला। अलग-अलग भाषाएँ, अलग-अलग संस्कृतियाँ और अलग-अलग जीवन अनुभव होने के बावजूद उनमें एक प्रकार की आत्मीयता दिखाई देती थी। ऐसा लगता था मानो शिक्षा वास्तव में विश्व मैत्री का माध्यम बन गई हो। मुझे कई बार दिल्ली के जेएनयू परिसर की कल्पना आती थी, जहाँ विभिन्न राज्यों और देशों के विद्यार्थी एक साथ अध्ययन करते हैं। अंतर केवल इतना था कि सोवियत संघ ने इस अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को अपनी विदेश नीति और शिक्षा नीति का महत्वपूर्ण अंग बना दिया था।

उस समय सोवियत संघ में विदेशी विद्यार्थियों के लिए सबसे प्रसिद्ध संस्थानों में से एक मॉस्को स्थित Patrice Lumumba Peoples' Friendship University थी। यह विश्वविद्यालय एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वतंत्र देशों के विद्यार्थियों के लिए आशा और अवसर का केन्द्र माना जाता था। भारत सहित अनेक देशों के छात्र वहाँ अध्ययन कर रहे थे। मुझे यह विश्वविद्यालय कुछ-कुछ भारत के उन संस्थानों जैसा प्रतीत होता था जो राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करते हैं, परन्तु उसके पैमाने और विविधता का दायरा कहीं अधिक व्यापक था।

सोवियत शिक्षा व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि विज्ञान और अनुसंधान को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। अंतरिक्ष विज्ञान, गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सोवियत उपलब्धियाँ विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत थीं। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर बल दिया जाता था। मुझे कई बार यह अनुभव हुआ कि जिस प्रकार भारत में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने अपने-अपने समय में आधुनिक शिक्षा और राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उसी प्रकार सोवियत विश्वविद्यालय भी अपने समाज के आधुनिकीकरण और वैज्ञानिक विकास के प्रमुख केन्द्र थे।

मुझे आज भी याद है कि जब मैं किसी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय के परिसर में प्रवेश करता था, तो वहाँ अध्ययनरत विद्यार्थियों के चेहरों पर एक आत्मविश्वास दिखाई देता था। उन्हें यह चिंता नहीं थी कि फीस कहाँ से आएगी या आर्थिक अभाव के कारण पढ़ाई बीच में छूट जाएगी। उनके सामने अपने विषय में दक्ष बनने और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनने का लक्ष्य था।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो मुझे लगता है कि सोवियत उज़्बेकिस्तान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था थी। वहाँ शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास का साधन थी। विद्यालयों में ज्ञान था, विश्वविद्यालयों में अनुसंधान था, तकनीकी संस्थानों में कौशल था और इन सबके पीछे एक ऐसा दृष्टिकोण था जो मानता था कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके शिक्षित नागरिकों में निहित होती है।

ताश्कंद की मेरी स्मृतियों में उसके सुन्दर परिवेश के साथ-साथ उसके विद्यालय, विश्वविद्यालय और उनमें पढ़ने वाले उत्साही विद्यार्थी भी उतनी ही उज्ज्वलता से बसे हुए हैं। वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को देखकर मुझे बार-बार अपने देश के विश्वविद्यालयों—जेएनयू, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों—की याद आती थी। मुझे लगता था कि भले ही दोनों देशों की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ भिन्न हों, परन्तु एक बात समान है—किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ही निर्मित होता है। ताश्कंद ने मुझे इस सत्य का साक्षात् अनुभव कराया।
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ताश्कंद में धर्म, आस्था और मेरी एक छोटी-सी खोज-21

1980 में जब मुझे सोवियत उज़्बेकिस्तान में लगभग आठ महीने रहने का अवसर मिला, तब वहाँ के समाज के अनेक पक्षों को निकट से देखने और समझने का मौका मिला। उन अनुभवों में एक विषय ऐसा भी था जिसने मुझे बार-बार सोचने पर विवश किया—वह था धर्म और धार्मिक आस्था का प्रश्न।

भारत जैसे देश से आने वाले व्यक्ति के लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं होता। वह हमारे सामाजिक जीवन, पारिवारिक संस्कारों, त्योहारों, मेलों, लोकगीतों और दैनिक व्यवहार तक में समाहित रहता है। गाँव की चौपाल से लेकर नगरों की गलियों तक मंदिरों की घंटियाँ, मस्जिदों की अज़ान, गुरुद्वारों का कीर्तन और चर्चों की प्रार्थनाएँ हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। इसलिए जब मैं ताश्कंद पहुँचा तो स्वाभाविक रूप से मेरी उत्सुकता वहाँ के धार्मिक जीवन को लेकर भी थी।

मुझे अनेक मस्जिदों, मदरसों और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को देखने का अवसर मिला। विशेष रूप से पुराने ताश्कंद, समरकंद और बुखारा के धार्मिक स्मारक अपनी भव्यता, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व के कारण मन को आकर्षित करते थे। विशाल गुंबद, नीली टाइलों से सजी दीवारें, सुंदर मेहराबें और सदियों पुरानी इमारतें यह बताती थीं कि यह भूमि कभी इस्लामी संस्कृति और विद्या का एक महान केन्द्र रही है।

परन्तु एक बात मुझे बहुत विचित्र लगी। ये धार्मिक स्थल अत्यन्त सुंदर, स्वच्छ और सुव्यवस्थित तो थे, परन्तु वहाँ वैसी चहल-पहल दिखाई नहीं देती थी जैसी हम भारत में देखने के अभ्यस्त हैं। जुमे के दिन भीड़ अवश्य बढ़ जाती थी, परन्तु सामान्य दिनों में वहाँ अपेक्षाकृत शांति रहती थी। धार्मिक शिक्षा भी सार्वजनिक जीवन में बहुत कम दिखाई देती थी। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विज्ञान, तकनीक और आधुनिक शिक्षा पर बल दिया जाता था। राज्य की विचारधारा वैज्ञानिक समाजवाद पर आधारित थी और धर्म को व्यक्ति का निजी विषय माना जाता था।

पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता था मानो धर्म समाज के जीवन से लगभग विलुप्त हो गया हो। परन्तु धीरे-धीरे मुझे अनुभव होने लगा कि वास्तविकता इतनी सरल नहीं है।

एक छोटी-सी घटना आज भी मेरी स्मृतियों में ताज़ा है।

एक दिन मैं और मेरे मित्र नवतेज सिंह एक सर्कस देखने गए। नवतेज सिंह अपनी सिख पगड़ी में थे और मैंने उत्साहवश एक पारम्परिक उज़्बेक टोपी पहन रखी थी। हम दोनों अपनी सीटों पर बैठ गए। हमारी अगली पंक्ति में लगभग आठ-दस वर्ष की आयु के दो बच्चे बैठे हुए थे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले वे बार-बार मुड़कर हमें देख रहे थे। उनकी आँखों में जिज्ञासा साफ झलक रही थी।

कुछ देर बाद उनमें से एक बच्चे ने हिम्मत करके हमसे पूछा—

“तुम मुसलमान हो? क्या तुम मुसलमान हो?”

हम मुस्कुराए। फिर उन्होंने दोबारा पूछा। इसके बाद वे बार-बार हमारी ओर देखकर “अस्सलाम वालेकुम” कहते और फिर हँसने लगते।

उनकी उत्सुकता में कोई शरारत नहीं थी, बल्कि बालसुलभ जिज्ञासा थी। शायद मेरी उज़्बेक टोपी और नवतेज सिंह की पगड़ी उन्हें किसी परिचित धार्मिक पहचान की याद दिला रही थी।

थोड़ी देर बाद उनके साथ बैठे अभिभावकों ने उन्हें चुप कराया और सर्कस देखने पर ध्यान देने को कहा। घटना तो बहुत छोटी थी, परन्तु उसने मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया।

यदि लगभग सत्तर वर्षों से धर्म सार्वजनिक जीवन में गौण था, यदि विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाती थी, यदि नई पीढ़ी समाजवादी वातावरण में पली-बढ़ी थी, तो फिर इन छोटे बच्चों के मन में यह धार्मिक पहचान कहाँ से आई?

उस दिन पहली बार मुझे लगा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक संस्थानों तक सीमित नहीं होता। वह परिवारों की स्मृतियों में, दादा-दादी की कहानियों में, घरों की परम्पराओं में और सांस्कृतिक व्यवहारों में भी जीवित रहता है। संभव है कि इन बच्चों ने अपने घरों में अपने बुजुर्गों से सलाम का महत्व सीखा हो, या किसी धार्मिक परम्परा की चर्चा सुनी हो। चाहे वह कितनी ही सीमित क्यों न रही हो, परन्तु वह पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

उसके बाद मैंने समाज को एक नए दृष्टिकोण से देखना शुरू किया। मुझे महसूस हुआ कि धर्म सार्वजनिक रूप से भले कम दिखाई देता हो, परन्तु लोगों की सांस्कृतिक स्मृति में वह कहीं न कहीं जीवित है। विवाह, जन्म, मृत्यु, पारिवारिक समारोहों और लोक परम्पराओं में उसके चिह्न स्पष्ट दिखाई देते थे। विशेषकर बुजुर्ग पीढ़ी के व्यवहार में उसकी झलक मिल जाती थी।

वर्षों बाद, जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और उसके बाद के समाचार आने लगे, तो मैंने एक नया दृश्य देखा। मस्जिदों में नमाज़ियों की संख्या बढ़ने लगी। चर्चों के बाहर लंबी कतारें दिखाई देने लगीं। धार्मिक विद्यालय पुनः खुलने लगे। अनेक पुराने धार्मिक स्थलों का पुनरुद्धार हुआ। जो लोग दशकों तक अपनी आस्था को निजी दायरे तक सीमित रखे हुए थे, वे अब खुलकर अपनी धार्मिक पहचान व्यक्त करने लगे।

उस समय मुझे ताश्कंद के उस सर्कस के दो छोटे बच्चे याद आए।

मुझे लगा कि शायद धर्म कभी पूरी तरह समाप्त हुआ ही नहीं था। वह लोगों के मन की गहराइयों में, उनके पारिवारिक संस्कारों में और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों में जीवित था। सोवियत व्यवस्था ने उसे सार्वजनिक जीवन से पीछे अवश्य कर दिया था, परन्तु मनुष्य की आंतरिक चेतना से मिटा नहीं सकी थी। जब राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ी, तो वही सुप्त आस्थाएँ फिर से बाहर आने लगीं।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस सर्कस में बैठे वे दो छोटे बच्चे अनजाने में मुझे एक बहुत बड़ा सामाजिक सत्य समझा रहे थे। मनुष्य केवल आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक प्राणी ही नहीं होता; वह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्मृतियों का भी वाहक होता है। विचारधाराएँ शासन बदल सकती हैं, व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं, पीढ़ियाँ बदल सकती हैं, परन्तु मनुष्य की गहरी सांस्कृतिक पहचानें अक्सर लंबे समय तक जीवित रहती हैं।

ताश्कंद में धर्म के विषय में मेरा सबसे बड़ा निष्कर्ष यही रहा कि वहाँ आस्था का स्वर ऊँचा नहीं था, परन्तु उसकी धड़कन अवश्य मौजूद थी। वह मस्जिदों के शांत प्रांगणों में, बुजुर्गों की स्मृतियों में, परिवारों की परम्पराओं में और उन जिज्ञासु बच्चों के मासूम प्रश्नों में कहीं न कहीं जीवित थी। बाद के वर्षों में जब धार्मिक जीवन पुनः सार्वजनिक रूप से उभरकर सामने आया, तो मुझे उसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि उसके बीज मैंने 1980 में ही लोगों के मनों में देख लिए थे।
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ताश्कंद की रसोई में भारत की महक-22

1980 में जब मुझे सोवियत उज़्बेकिस्तान में लगभग आठ महीने रहने का अवसर मिला, तब मैंने वहाँ की संस्कृति, भाषा, शिक्षा, सामाजिक जीवन और लोगों के व्यवहार को निकट से देखा। परन्तु इन सबके बीच एक ऐसा अनुभव भी था जिसने मुझे बार-बार अपने देश की याद दिलाई। वह था वहाँ का खानपान और भोजन बनाने का तरीका।

किसी भी देश को समझने का सबसे अच्छा माध्यम उसकी रसोई होती है। वहाँ के लोग क्या खाते हैं, कैसे बनाते हैं, किस प्रकार अतिथि का स्वागत करते हैं और भोजन को किस दृष्टि से देखते हैं, उससे उस समाज की आत्मा का परिचय मिलता है। ताश्कंद पहुँचने के बाद शुरू के कुछ दिनों तक मुझे लगता था कि भोजन के मामले में मुझे बहुत कठिनाई होगी। भाषा अलग थी, देश अलग था और संस्कृति भी भिन्न थी। परन्तु धीरे-धीरे जब मुझे उज़्बेक परिवारों के घरों में जाने, छात्रावासों की सामूहिक रसोइयों को देखने और स्थानीय भोजन का स्वाद लेने का अवसर मिला, तो मुझे आश्चर्य होने लगा कि यहाँ बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे अपने घर जैसा लगता है।

मुझे आज भी याद है कि पहली बार जब मैंने किसी उज़्बेक परिवार में सब्जी बनते देखी, तो मैं कुछ देर तक रसोई में खड़ा होकर उसे देखता ही रह गया। सबसे पहले प्याज़ काटे गए, फिर उन्हें तेल में भुना गया। उसके बाद गाजर, टमाटर और अन्य सब्जियाँ डाली गईं। मसाले भारत की तुलना में कम थे, परन्तु सब्जी बनाने की मूल पद्धति लगभग वही थी जिसे मैं अपने घर में बचपन से देखता आया था। मुझे लगा मानो मैं ताश्कंद में नहीं, बल्कि दिल्ली, पानीपत या किसी भारतीय नगर के घर की रसोई में खड़ा हूँ।

यह समानता केवल सब्जियों तक सीमित नहीं थी। वहाँ के भोजन में भी अनेक ऐसी चीजें थीं जो भारतीय भोजन की याद दिलाती थीं। चावल का विशेष महत्व था। उज़्बेकिस्तान का प्रसिद्ध व्यंजन पलोव पूरे देश में लोकप्रिय था। जब मैंने पहली बार पलोव खाया, तो मुझे हमारी पुलाव और बिरयानी की याद आ गई। अंतर केवल इतना था कि उसमें गाजर और मांस का उपयोग अधिक होता था, परन्तु चावल को पकाने की कला और उसके प्रति लोगों का प्रेम वैसा ही था जैसा भारत के अनेक भागों में देखने को मिलता है।

रोटी के प्रति उनका लगाव भी मुझे बहुत परिचित लगा। वहाँ की पारंपरिक रोटी "नॉन" लगभग हर भोजन का हिस्सा होती थी। तंदूर में बनी हुई यह गोल रोटी देखकर मुझे अपने गाँव और उत्तर भारत के तंदूरों की याद आ जाती थी। कई बार तो मुझे लगता था कि यदि नाम बदल दिए जाएँ तो कोई पहचान ही न सके कि यह रोटी भारत की है या उज़्बेकिस्तान की।

दालों के उपयोग ने भी मेरा ध्यान आकर्षित किया। यद्यपि भारत की तरह विविध प्रकार की दालें वहाँ प्रतिदिन नहीं बनती थीं, फिर भी मूंग, मसूर, मटर और चने का उपयोग काफी होता था। विशेष रूप से "मश" नामक दाल का प्रयोग देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। यह हमारी मूंग दाल ही थी। उनसे बनने वाला व्यंजन "मशखुर्दा" मुझे हमारी खिचड़ी का निकट संबंधी प्रतीत हुआ। पहली बार उसका स्वाद लेते समय मेरे मन में घर की याद ताज़ा हो गई थी।

भोजन के साथ-साथ भाषा में भी अनेक समानताएँ दिखाई देती थीं। कई शब्द तो ऐसे थे जिन्हें सुनकर लगता था कि मैं किसी उज़्बेक से नहीं, बल्कि किसी हिंदी या उर्दू बोलने वाले व्यक्ति से बात कर रहा हूँ। "चाय" वहाँ "चोय" बन जाती थी, "सब्जी" वहाँ भी "सब्जी" जैसी ही सुनाई देती थी, "नान" वहाँ "नॉन" कहलाती थी और "पुलाव" "पलोव" बन जाता था। पहली बार जब मैंने इन शब्दों को सुना तो मेरे चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। भाषा के ये छोटे-छोटे पुल दो देशों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी को एक क्षण में समाप्त कर देते थे।

बर्तनों के नाम भी कई बार परिचित लगते थे। विशाल कड़ाही जैसी देग को वे "क़ज़ान" कहते थे, जिसमें सामूहिक भोज के लिए पलोव बनाया जाता था। चाय बनाने के पात्र को "चोयनाक" कहा जाता था। तंदूर वहाँ भी था और बड़ी थालियों का प्रयोग भी होता था। इन सबको देखकर मुझे बार-बार यह अनुभव होता था कि भारत और मध्य एशिया के बीच संबंध केवल इतिहास की पुस्तकों का विषय नहीं हैं, बल्कि वे आज भी लोगों के दैनिक जीवन में जीवित हैं।

मेरे मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता था कि इतनी समानताएँ आखिर आई कहाँ से? बाद में जब मैंने इतिहास को समझने का प्रयास किया तो उत्तर भी मिलने लगा। सदियों तक भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक मार्ग सक्रिय रहे। समरकंद, बुखारा और ताश्कंद के व्यापारी भारत आते थे और भारत के व्यापारी मध्य एशिया जाते थे। सूफी संतों, यात्रियों और विद्वानों का भी लगातार आवागमन होता रहा। बाद में मध्य एशिया से आए मुगलों ने भारत में अपना राज्य स्थापित किया। इन सदियों पुराने संपर्कों ने दोनों क्षेत्रों की भाषा, संस्कृति, संगीत, वेशभूषा और खानपान को एक-दूसरे से जोड़ दिया।

परन्तु मेरे लिए यह सब केवल ऐतिहासिक अध्ययन का विषय नहीं था। मैं इसे प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा था। जब किसी उज़्बेक परिवार में बैठकर चाय पीता था, जब तंदूर से निकली गरम नॉन मेरे सामने रखी जाती थी, जब रसोई में सब्जी बनने की परिचित सुगंध आती थी, तब मुझे लगता था कि मैं किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि अपने ही किसी दूर बसे रिश्तेदार के घर बैठा हूँ।

उज़्बेक लोगों की मेहमाननवाज़ी भी भारतीयों जैसी ही थी। अतिथि का स्वागत करना, उसे भरपेट भोजन कराना और बार-बार आग्रह करके खिलाना वहाँ भी सम्मान का विषय माना जाता था। कई बार मुझे अपने हरियाणा के गाँवों की याद आ जाती थी, जहाँ मेहमान के थाली छोड़ने तक घर के लोग संतुष्ट नहीं होते।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो ताश्कंद की चौड़ी सड़कों, भव्य इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों के साथ-साथ उसकी रसोई की सुगंध भी स्मृतियों में ताज़ा हो उठती है। वहाँ की रसोई ने मुझे यह सिखाया कि देशों की सीमाएँ राजनीतिक हो सकती हैं, परन्तु संस्कृति की कोई सीमा नहीं होती। हजारों वर्षों के संपर्क ने भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच एक ऐसा सांस्कृतिक रिश्ता बनाया है जो भाषा, संगीत और इतिहास के साथ-साथ भोजन की थाली में भी दिखाई देता है।

ताश्कंद में रहते हुए मैंने अनुभव किया कि संस्कृतियाँ केवल पुस्तकों में नहीं मिलतीं, वे रसोई के धुएँ में, चाय की भाप में, तंदूर की गर्माहट में और सब्जी की परिचित खुशबू में भी जीवित रहती हैं। शायद यही कारण है कि उज़्बेकिस्तान में रहते हुए मुझे कभी पूरी तरह पराया होने का एहसास नहीं हुआ। वहाँ की रसोई में मुझे अपने भारत की महक मिल जाती थी, और वही महक आज भी मेरी स्मृतियों को सुगंधित करती है।

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भारत, उज़्बेकिस्तान और पानीपत : सूफ़ी प्रेम की वह अमर धारा -23
 मेरे मन में एक विद्यार्थी की उत्सुकता थी। मैं वहाँ की शिक्षा व्यवस्था, संस्कृति, इतिहास और जनजीवन को देखने-समझने गया था। उस समय मैं यह नहीं जानता था कि मैं केवल एक विदेशी देश की यात्रा नहीं कर रहा हूँ, बल्कि उन ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंधों के स्रोत तक पहुँच रहा हूँ जिन्होंने सदियों से भारत और मध्य एशिया को एक-दूसरे से जोड़ रखा है।

समय के साथ जब मैंने इतिहास, संस्कृति और सूफ़ी परंपराओं का अध्ययन किया, तब मुझे अनुभव हुआ कि भारत और उज़्बेकिस्तान का संबंध केवल राजनीतिक या व्यापारिक नहीं रहा है। यह संबंध आत्माओं का संबंध है। यह वह संबंध है जिसे सूफ़ी संतों, फ़क़ीरों, यात्रियों और विद्वानों ने प्रेम, करुणा और मानवता के सूत्र में पिरोया था।

आज भी जब मैं ताश्कंद, समरकंद और बुखारा की अपनी स्मृतियों को याद करता हूँ, तो लगता है कि उन नगरों की गलियों में केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता की एक ऐसी सुगंध भी व्याप्त थी, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

सूफ़ी संतों का आवागमन : दो देशों के बीच आत्मा का सेतु

भारत और वर्तमान Uzbekistan के बीच सदियों तक संतों, सूफ़ियों, व्यापारियों और विद्वानों का आवागमन होता रहा। उस समय न आज जैसी सीमाएँ थीं और न ही पासपोर्ट और वीज़ा की जटिलताएँ। ज्ञान की खोज में लोग एक देश से दूसरे देश की यात्रा करते थे।

मध्य एशिया के महान नगर Bukhara, Samarkand, Tashkent और Andijan उस समय इस्लामी शिक्षा, सूफ़ी साधना और साहित्य के प्रमुख केंद्र थे। यहाँ से अनेक सूफ़ी संत भारत आए और भारत की मिट्टी में प्रेम और भाईचारे के बीज बोए।

भारत में सूफ़ी परंपरा को लोकप्रिय बनाने वाले महान संत Khwaja Moinuddin Chishti की आध्यात्मिक यात्रा मध्य एशिया के अनेक केंद्रों से होकर गुज़री थी। उन्होंने भारत आकर अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाया और प्रेम को धर्म से ऊपर रखा। उनके बाद Khwaja Qutbuddin Bakhtiar Kaki, Baba Farid तथा Nizamuddin Auliya ने उस परंपरा को जन-जन तक पहुँचाया।

उधर बुखारा की धरती पर जन्मे Bahauddin Naqshband ने नक़्शबंदी सूफ़ी परंपरा की स्थापना की। यह परंपरा बाद में भारत पहुँची और भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को भी प्रभावित किया। उनके अनुयायियों ने भारत और मध्य एशिया के बीच आध्यात्मिक संवाद को और मजबूत बनाया।

इन सूफ़ियों का संदेश सरल था—ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम, सेवा, विनम्रता और मानवता से होकर जाता है। यही संदेश भारत के भक्ति संतों ने भी दिया। यही कारण है कि भारतीय भक्ति आंदोलन और मध्य एशियाई सूफ़ी आंदोलन में आश्चर्यजनक समानताएँ दिखाई देती हैं।

पानीपत : भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक द्वार

जब भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों की चर्चा होती है तो मुझे अपना प्रिय नगर पानीपत भी याद आता है। अधिकांश लोग पानीपत को केवल युद्धों के लिए जानते हैं, परंतु मेरे विचार में पानीपत भारत और मध्य एशिया के बीच सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक संपर्क का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

फ़रग़ना घाटी के राजकुमार Zahir-ud-Din Muhammad Babur, जिनका जन्म वर्तमान उज़्बेकिस्तान के Andijan में हुआ था, भारत आए और First Battle of Panipat के बाद भारतीय इतिहास की नई दिशा निर्धारित हुई। इस दृष्टि से पानीपत वह स्थल है जहाँ मध्य एशिया और भारत का इतिहास एक-दूसरे से मिलते हैं।

परंतु पानीपत का महत्व केवल युद्धों तक सीमित नहीं है। यहाँ के महान सूफ़ी संत Bu Ali Shah Qalandar ने प्रेम, समानता और मानवता का संदेश दिया। उनकी दरगाह आज भी लोगों को आकर्षित करती है। जब मैं उनकी शिक्षाओं को पढ़ता हूँ और बुखारा तथा समरकंद की सूफ़ी परंपराओं को याद करता हूँ, तो मुझे दोनों में एक ही आत्मा दिखाई देती है।

ऐसा लगता है जैसे बुखारा की ख़ानक़ाहों और पानीपत की दरगाहों के बीच कोई अदृश्य आध्यात्मिक पुल सदियों से बना हुआ हो।
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1980 का ताश्कंद : जहाँ इतिहास की गूँज सुनाई देती थी-24

जब मैं 1980 में ताश्कंद पहुँचा, तब उज़्बेकिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था। सार्वजनिक जीवन में धर्म का प्रभाव बहुत कम दिखाई देता था। मस्जिदें सीमित थीं, धार्मिक गतिविधियाँ नियंत्रित थीं और समाज आधिकारिक रूप से नास्तिक विचारधारा की ओर उन्मुख था।

किन्तु इसके बावजूद मुझे वहाँ के लोगों के व्यवहार में कुछ ऐसा दिखाई देता था जो किसी भी राजनीतिक व्यवस्था से कहीं अधिक पुराना था।

लोगों का अपनापन, अतिथि-सत्कार, बड़ों के प्रति सम्मान और मित्रता का भाव मुझे बार-बार भारतीय संस्कृति की याद दिलाता था।

जब हम चोरसू बाज़ार में जाते थे, जब ग्रामीण क्षेत्रों में कपास चुनने जाते थे, जब स्थानीय परिवारों से मिलते थे, तब उनके व्यवहार में एक विशेष आत्मीयता दिखाई देती थी। वे हमें विदेशी नहीं, बल्कि अपने जैसा ही समझते थे।

उस समय मैं इस भावना का कारण पूरी तरह नहीं समझ पाया था। आज लगता है कि यह वही सांस्कृतिक विरासत थी जिसे सदियों से सूफ़ी संतों ने पोषित किया था।

बुखारा और समरकंद : सूफ़ी सभ्यता के उज्ज्वल दीप

मेरे लिए बुखारा और समरकंद केवल ऐतिहासिक नगर नहीं थे। वे ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रतीक थे।

समरकंद की भव्य इमारतें, नीले गुम्बद और प्राचीन मदरसे देखकर मन में बार-बार यह प्रश्न उठता था कि कितने विद्वान, कितने सूफ़ी और कितने यात्री इन मार्गों से गुज़रे होंगे।

बुखारा का नाम सुनते ही मुझे बहाउद्दीन नक़्शबंद और उन अनगिनत फ़क़ीरों की याद आती है जिन्होंने अपने जीवन को मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

वहाँ की मिट्टी में इतिहास था, पर उस इतिहास में केवल राजाओं और साम्राज्यों की कथा नहीं थी। उसमें साधकों, कवियों, संतों और प्रेमियों की भी कहानी थी।

एक अदृश्य आध्यात्मिक निकटता

मुझे आज भी स्मरण है कि उज़्बेक मित्र भारतीय फ़िल्मों, गीतों और संस्कृति के प्रति कितना प्रेम रखते थे। राज कपूर के गीत हों या भारतीय नृत्य, लोगों के मन में भारत के लिए विशेष आकर्षण था।

उस समय मुझे यह केवल सांस्कृतिक लगाव प्रतीत होता था। परंतु आज सोचता हूँ कि शायद इसके पीछे सदियों पुराने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी थे। जब दो समाज सदियों तक एक-दूसरे से सीखते हैं, एक-दूसरे के संतों और कवियों का सम्मान करते हैं, तो उनके बीच एक गहरी आत्मीयता स्वतः विकसित हो जाती है।

मेरी अनुभूति

आज जब मैं अपने जीवन के उस अध्याय को स्मरण करता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि मैं केवल ताश्कंद की सड़कों पर नहीं चल रहा था। मैं उन पदचिह्नों के बीच चल रहा था जिन्हें सदियों पहले सूफ़ी संतों ने अपने प्रेम और मानवता के संदेश से पवित्र किया था।

एक ओर बुखारा की ख़ानक़ाहें थीं, दूसरी ओर पानीपत की दरगाहें। एक ओर समरकंद की आध्यात्मिक परंपरा थी, दूसरी ओर दिल्ली और अजमेर के सूफ़ी केंद्र। दूरी हजारों किलोमीटर की थी, पर आत्मा का मार्ग एक ही था।

आज भी जब मैं पानीपत में Bu Ali Shah Qalandar Dargah की ओर श्रद्धा से देखता हूँ और ताश्कंद की अपनी स्मृतियों को याद करता हूँ, तो मुझे लगता है कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सबसे मजबूत संबंध राजनीति या व्यापार का नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, आध्यात्मिकता और मानवता का है।

सूफ़ी संतों ने हमें सिखाया कि मनुष्य की पहचान उसकी भाषा, जाति, धर्म या देश से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से होती है। शायद यही कारण है कि 1980 के सोवियत उज़्बेकिस्तान की मेरी स्मृतियाँ आज भी केवल एक विदेशी यात्रा की याद नहीं हैं; वे मुझे उस महान आध्यात्मिक परंपरा की याद दिलाती हैं जिसने भारत, उज़्बेकिस्तान और पानीपत को एक ही प्रेमसूत्र में बाँध रखा है।

और यही वह अमर धारा है जो समय, सीमाओं और व्यवस्थाओं से परे आज भी निरंतर बह रही है।

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ताश्कंद की धुनों में भारत की गूँज-25

भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच संगीत, लोकगीत और सिनेमा का सांस्कृतिक सेतु
 जब मैं सोवियत उज़्बेकिस्तान की धरती पर पहुँचा, तब मेरे मन में एक विद्यार्थी की उत्सुकता थी। मैं वहाँ की शिक्षा, संस्कृति, इतिहास और समाज को समझना चाहता था। परन्तु मुझे कहाँ ज्ञात था कि इस यात्रा में मुझे एक ऐसी सांस्कृतिक आत्मीयता का अनुभव होगा जो हजारों किलोमीटर की दूरी को भी अर्थहीन बना देगी।

ताश्कंद में बिताए गए वे दिन आज भी मेरी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ जीवित हैं। वहाँ की चौड़ी सड़कें, सुव्यवस्थित नगर, मेहनतकश लोग और सांस्कृतिक गतिविधियाँ मुझे प्रभावित करती थीं, परन्तु सबसे अधिक आश्चर्य मुझे तब होता था जब कोई साधारण उज़्बेक नागरिक भारतीय फ़िल्मों, गीतों और कलाकारों के बारे में इतनी आत्मीयता से बात करता था मानो वह भारत का ही निवासी हो।

उस समय सोवियत संघ में भारतीय फ़िल्मों का एक अलग ही स्थान था। राज कपूर केवल अभिनेता नहीं थे, बल्कि लाखों उज़्बेक लोगों के प्रिय मित्र की तरह थे। उनके गीत "आवारा हूँ" और "मेरा जूता है जापानी" लोगों की जुबान पर रहते थे। कई बार ऐसा होता कि कोई उज़्बेक मित्र मुस्कुराते हुए इन गीतों की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगता और मैं क्षण भर के लिए भूल जाता कि मैं अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर हूँ।

मुझे तब अनुभव हुआ कि राजनीति और भूगोल देशों को अलग कर सकते हैं, परन्तु कला और संगीत मनुष्यों को जोड़ देते हैं।

धीरे-धीरे मैंने उज़्बेकिस्तान के लोकसंगीत और लोकजीवन को भी समझना प्रारम्भ किया। वहाँ के लोकगीतों को सुनते समय मुझे बार-बार अपने हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की याद आती थी। भाषा अलग थी, शब्द अलग थे, परन्तु भाव एक जैसे थे।

वहाँ भी प्रेम था, विरह था, खेतों की हरियाली थी, ऋतुओं का उल्लास था, परिवार का स्नेह था और जीवन के संघर्षों की कहानी थी। विवाह समारोहों में सामूहिक गीत गाए जाते थे। उत्सवों में स्त्री-पुरुष मिलकर नृत्य करते और लोकधुनों पर झूम उठते थे। यह सब देखकर मुझे अपने गाँव के फाग, तीज, बन्ना-बन्नी और विवाह गीतों की याद आ जाती थी।

ऐसा लगता था मानो दो देशों की भाषाएँ भिन्न हों, परन्तु उनके हृदय एक ही लय में धड़कते हों।

उज़्बेकिस्तान के पारंपरिक वाद्ययंत्र भी मुझे विशेष रूप से आकर्षित करते थे। दुतार और तानबूर जैसे वाद्ययंत्रों की ध्वनि में मुझे भारतीय सितार और तंबूरे की झलक मिलती थी। लोकधुनों की लय में भी एक आत्मीय परिचय का अनुभव होता था। तब मुझे पहली बार यह विचार आया कि सदियों से भारत और मध्य एशिया के बीच जो सांस्कृतिक यात्राएँ हुई हैं, उनमें संगीत भी एक यात्री रहा होगा। व्यापारियों के कारवाँ केवल वस्तुएँ ही नहीं लाते थे; वे धुनें, कहानियाँ और भावनाएँ भी साथ लाते थे।

संगीत की इस समानता के पीछे एक और गहरी धारा बहती है—सूफ़ी परंपरा की धारा।

भारत की कव्वाली हो या मध्य एशिया का सूफ़ी संगीत, दोनों का मूल भाव ईश्वर के प्रति प्रेम और मानवता के प्रति समर्पण है। जब कोई सूफ़ी गायक अपनी तल्लीनता में डूबकर गाता है, तो उसकी आवाज़ केवल कानों तक नहीं पहुँचती, बल्कि हृदय को स्पर्श करती है।

मुझे लगता है कि यही कारण है कि भारत और उज़्बेकिस्तान के लोग एक-दूसरे के संगीत को सहज रूप से समझ लेते हैं। दोनों की आत्माओं में कहीं न कहीं वही आध्यात्मिक स्वर गूँजता है।

मेरे उज़्बेकिस्तान प्रवास की स्मृतियों में एक नाम विशेष रूप से अंकित है—तमारा ख़ानुम। जब मैंने उन्हें भारतीय गीतों पर नृत्य करते देखा, तब मुझे पहली बार कला की वास्तविक शक्ति का अनुभव हुआ। एक उज़्बेक कलाकार भारतीय गीतों को उसी भाव से प्रस्तुत कर रही थी जैसे वे उसके अपने देश के गीत हों।

उस समय मुझे लगा कि यह केवल नृत्य नहीं है; यह दो संस्कृतियों का आलिंगन है।

तमारा ख़ानुम जैसी कलाकारों ने भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच वह सांस्कृतिक पुल बनाया जिसे कोई राजनीतिक परिवर्तन कभी नहीं तोड़ सकता।

समय बीतता गया, परन्तु मेरे मन में यह विश्वास और गहरा होता गया कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच यदि कोई सबसे मजबूत सेतु है तो वह संगीत और संस्कृति का है।

सरकारें समझौते करती हैं, राजनयिक संबंध बनाती हैं और व्यापारिक साझेदारियाँ स्थापित करती हैं। परन्तु दिलों के संबंध कलाकार बनाते हैं। गीत बनाते हैं। लोककथाएँ बनाती हैं। वे धुनें बनाती हैं जिन्हें सुनकर कोई अनजान व्यक्ति भी अपना लगने लगता है।

आज जब मैं ताश्कंद में बिताए उन दिनों को याद करता हूँ, तो मेरे सामने एक दृश्य उभर आता है। किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में भारतीय गीत बज रहा है। उज़्बेक युवक-युवतियाँ मुस्कुरा रहे हैं। कुछ लोग गीत के शब्दों को अपनी भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं। और मैं एक कोने में बैठा यह सोच रहा हूँ कि वास्तव में संस्कृतियाँ कभी परायी नहीं होतीं।

उस क्षण मुझे अनुभव हुआ था कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच केवल राजनयिक संबंध नहीं हैं; उनके बीच एक भावनात्मक रिश्ता है। यह रिश्ता सूफ़ी संतों की शिक्षाओं से शुरू होता है, लोकगीतों की धुनों में बहता है और फ़िल्मों के गीतों में खिल उठता है।

यही कारण है कि आज भी जब मैं ताश्कंद की स्मृतियों को याद करता हूँ, तो मुझे केवल एक विदेशी देश याद नहीं आता। मुझे अपनेपन की वह अनुभूति याद आती है जो वहाँ के लोगों की मुस्कान, उनके गीतों और उनकी आत्मीयता में दिखाई देती थी।

और तब मन स्वतः कह उठता है कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सबसे सुंदर सेतु न तो पत्थरों से बना है और न लोहे से। वह सेतु संगीत का है, संस्कृति का है, प्रेम का है—और वही सेतु सदियों से दोनों देशों के हृदयों को जोड़ता आया है।
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ताश्कंद के कारखाने, श्रमिक और उनका जीवन -26

एक भारतीय विद्यार्थी की आँखों से सोवियत उज़्बेकिस्तान का श्रमिक संसार

सन् 1980 में जब मैं अध्ययन के लिए सोवियत उज़्बेकिस्तान पहुँचा, तब मेरे मन में अनेक जिज्ञासाएँ थीं। भारत से निकलकर मैं एक ऐसे देश में आया था जिसके बारे में हमने पुस्तकों में बहुत कुछ पढ़ा था। यह वह देश था जहाँ श्रमिक और किसान को समाज की आधारशिला माना जाता था। वहाँ की व्यवस्था स्वयं को श्रमिकों का राज्य कहती थी। स्वाभाविक था कि मेरे मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि वास्तव में वहाँ के श्रमिकों का जीवन कैसा है।

ताश्कंद में रहते हुए मुझे अनेक अवसर मिले जब मैं केवल विश्वविद्यालय और छात्रावास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर के विभिन्न भागों, औद्योगिक क्षेत्रों, श्रमिक बस्तियों और सामान्य नागरिकों के जीवन को भी निकट से देखने का अवसर मिला। उन्हीं अनुभवों ने मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ी।

भारत में उस समय मजदूर शब्द सुनते ही हमारे मन में कठिन परिश्रम, सीमित आय और जीवन संघर्ष की तस्वीर उभरती थी। परन्तु ताश्कंद में मैंने श्रमिकों को एक अलग ही रूप में देखा।

सुबह जब मैं अपने छात्रावास से निकलता था, तो बसों और ट्रामों में बड़ी संख्या में लोग अपने कार्यस्थलों की ओर जाते दिखाई देते थे। उनके हाथों में भोजन का डिब्बा अवश्य होता था, परन्तु उनके चेहरों पर वह तनाव कम दिखाई देता था जो उस समय भारत के अनेक बड़े शहरों में काम पर जाने वाले श्रमिकों के चेहरों पर देखा जा सकता था।

एक दिन हमारे संस्थान के एक शिक्षक ने हमें शहर के औद्योगिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ताश्कंद केवल शिक्षा और संस्कृति का केंद्र ही नहीं है, बल्कि मशीन निर्माण, वस्त्र उद्योग, विद्युत उपकरण निर्माण और अनेक अन्य उद्योगों का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।

उस दिन पहली बार मेरा ध्यान इस ओर गया कि जिस शहर को मैं केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देख रहा था, उसके पीछे हजारों श्रमिकों का परिश्रम भी छिपा हुआ है।

शाम को जब कारखानों की पाली समाप्त होती थी, तब बड़ी संख्या में श्रमिक अपने घरों की ओर लौटते दिखाई देते थे। मैंने देखा कि उनमें पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी बड़ी संख्या में थीं। बसों में बैठी हुई इंजीनियर महिलाएँ, तकनीकी कर्मचारी और कारखानों में कार्यरत युवतियाँ उस समय मेरे लिए एक नया दृश्य थीं।

भारत में उस समय महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही थी, परन्तु उज़्बेकिस्तान में यह दृश्य कहीं अधिक सामान्य प्रतीत होता था।

मुझे बताया गया कि अधिकांश कारखानों में आठ घंटे का कार्य-दिवस निर्धारित था। श्रमिकों को साप्ताहिक अवकाश मिलता था और ओवरटाइम भी नियमों के अंतर्गत होता था। यह व्यवस्था मुझे इसलिए रोचक लगी क्योंकि भारत में उस समय अनेक श्रमिकों के लिए लंबे कार्य घंटे सामान्य बात थी।

परन्तु जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था श्रमिकों का पारिवारिक जीवन।

शाम के समय ताश्कंद के पार्कों में घूमते हुए मैंने देखा कि बड़ी संख्या में परिवार अपने बच्चों के साथ समय बिता रहे हैं। कहीं बच्चे झूलों पर खेल रहे थे, कहीं माता-पिता बेंचों पर बैठे बातचीत कर रहे थे। ऐसा लगता था कि लोगों के जीवन में केवल काम ही नहीं है, परिवार के लिए भी पर्याप्त समय है।

धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि इसका एक कारण यह भी था कि लोगों को जीवन की कुछ मूलभूत चिंताओं से मुक्ति प्राप्त थी।

मुझे बताया गया कि अधिकांश कर्मचारियों को राज्य द्वारा आवास उपलब्ध कराया जाता था। एक दिन मैं अपने एक स्थानीय परिचित के घर गया। वह किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्यरत था। उसका घर किसी महल जैसा नहीं था, परन्तु साफ-सुथरा, व्यवस्थित और सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त था।

मुझे सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का हुआ कि सामान्य कर्मचारी भी सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। उस समय भारत के बड़े शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों का दृश्य सामान्य था, इसलिए ताश्कंद की सुव्यवस्थित आवासीय कॉलोनियाँ मुझे विशेष रूप से प्रभावित करती थीं।

एक अन्य बात जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया, वह थी शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था।

मैं स्वयं एक विद्यार्थी था, इसलिए शिक्षा के महत्व को समझता था। मुझे बताया गया कि श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा निःशुल्क है। चिकित्सा सुविधाएँ भी राज्य द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं। इसका अर्थ यह था कि किसी साधारण कर्मचारी को अपने बच्चे की पढ़ाई या बीमारी के इलाज के लिए उतनी चिंता नहीं करनी पड़ती थी जितनी हमारे देश में सामान्य परिवारों को करनी पड़ती थी।

जब हम कपास चुनने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में गए, तब भी मुझे यही अनुभव हुआ। वहाँ के किसानों और श्रमिकों का जीवन बहुत सम्पन्न नहीं था, परन्तु उनमें एक प्रकार की आर्थिक सुरक्षा दिखाई देती थी। वे जानते थे कि उनके बच्चों को शिक्षा मिलेगी, बीमारी में उपचार मिलेगा और रहने के लिए घर उपलब्ध होगा।

उनके जीवन में विलासिता कम थी, परन्तु स्थिरता अधिक थी।

मुझे याद है कि ताश्कंद में पुस्तकालय, सांस्कृतिक केंद्र, थिएटर और पार्क सामान्य लोगों से भरे रहते थे। ऐसा नहीं लगता था कि संस्कृति केवल सम्पन्न वर्ग के लिए आरक्षित है। एक साधारण श्रमिक भी नाटक देखने जा सकता था, संगीत कार्यक्रम में भाग ले सकता था या अपने परिवार के साथ अवकाश बिता सकता था।

यहीं मुझे पहली बार यह समझ में आया कि किसी समाज की समृद्धि का अर्थ केवल धन नहीं होता। यह भी महत्वपूर्ण है कि सामान्य नागरिक अपने जीवन को कितना सुरक्षित और सम्मानजनक महसूस करता है।

बेशक, उस व्यवस्था की अपनी सीमाएँ भी थीं। दुकानों में वस्तुओं की विविधता भारत की तुलना में कम थी। व्यक्तिगत आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के अवसर भी सीमित थे। परन्तु सामाजिक सुरक्षा की भावना बहुत मजबूत दिखाई देती थी।

एक युवा भारतीय विद्यार्थी के रूप में मैं इन सब बातों को बड़ी उत्सुकता से देखता और उनकी तुलना अपने देश की परिस्थितियों से करता था।

आज जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो मुझे ताश्कंद के विशाल कारखाने उतने याद नहीं आते जितने वहाँ काम करने वाले लोग याद आते हैं।

मुझे वे श्रमिक याद आते हैं जो सुबह समय पर काम पर जाते थे, शाम को अपने बच्चों के साथ पार्क में घूमते थे, सप्ताहांत में परिवार के साथ समय बिताते थे और अपने जीवन को सम्मान के साथ जीते थे।

वे बहुत धनी नहीं थे, परन्तु उन्हें अपने भविष्य का भय भी कम था।

मेरे लिए सोवियत उज़्बेकिस्तान का सबसे बड़ा  वास्तविक परिचय वे साधारण श्रमिक थे, जिनके परिश्रम पर पूरा समाज खड़ा था और जिन्हें उस समाज में सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त था।

ताश्कंद की मेरी स्मृतियों में आज भी उन श्रमिकों के चेहरे सुरक्षित हैं। जब मैं उन्हें याद करता हूँ, तो लगता है कि मैंने केवल एक देश नहीं देखा था; मैंने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को निकट से देखा था, जिसमें श्रमिक केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि समाज का सम्मानित नागरिक माना जाता था।

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एक वकील की नज़र से सोवियत उज़्बेकिस्तान की न्याय व्यवस्था -27

1980-81 के ताश्कंद प्रवास की स्मृतियाँ

सन् 1980 में जब मैं अध्ययन के लिए सोवियत उज़्बेकिस्तान पहुँचा, तब मैं केवल एक विद्यार्थी ही नहीं था, बल्कि समाज और उसकी संस्थाओं को समझने की उत्सुकता रखने वाला एक जिज्ञासु भारतीय भी था। बाद के वर्षों में जब मैंने विधि व्यवसाय को अपनाया और न्यायालयों के वातावरण से निकट परिचय हुआ, तब मुझे बार-बार अपने ताश्कंद प्रवास की स्मृतियाँ याद आने लगीं।

आज जब मैं एक अधिवक्ता के रूप में पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि उज़्बेकिस्तान में रहते समय मेरी रुचि केवल वहाँ के इतिहास, संस्कृति और जनजीवन तक सीमित नहीं थी। मैं यह भी जानना चाहता था कि उस समाज में कानून कैसे काम करता है, न्यायालय कैसे चलते हैं, वकीलों की भूमिका क्या है और सामान्य नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश से आने के कारण मेरे मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा थी कि एक समाजवादी व्यवस्था में न्याय का स्वरूप कैसा होगा।

ताश्कंद पहुँचने के कुछ ही दिनों बाद मुझे यह अनुभव होने लगा कि वहाँ का समाज अत्यंत अनुशासित है। बसें समय पर चलती थीं, सार्वजनिक स्थान स्वच्छ रहते थे और नागरिक जीवन में नियमों का पालन सामान्य बात थी। उस समय मैं सोचता था कि केवल पुलिस व्यवस्था से इतना अनुशासन संभव नहीं है। इसके पीछे अवश्य ही कोई व्यापक कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था कार्य कर रही होगी।

धीरे-धीरे मुझे जानकारी मिली कि सोवियत संघ की न्याय व्यवस्था पश्चिमी देशों और भारत की न्याय व्यवस्था से कुछ भिन्न थी। वहाँ कानून का उद्देश्य केवल विवादों का निपटारा करना नहीं था, बल्कि समाजवादी व्यवस्था की रक्षा करना और सामाजिक अनुशासन बनाए रखना भी था।

एक भारतीय के रूप में मेरे लिए यह एक नया दृष्टिकोण था।

भारत में हम न्यायालय को नागरिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में देखते हैं। हमारे यहाँ न्यायपालिका शासन के अन्य अंगों से स्वतंत्र मानी जाती है। परन्तु सोवियत व्यवस्था में न्यायालय राज्य की व्यापक समाजवादी संरचना का हिस्सा थे।

ताश्कंद में रहते हुए मुझे न्यायालयों के भीतर जाकर कार्यवाही देखने का अवसर तो नहीं मिला, परन्तु स्थानीय लोगों, शिक्षकों और विभिन्न चर्चाओं से जो जानकारी मिली, उसने मेरी उत्सुकता को बढ़ाया।

मुझे बताया गया कि वहाँ जिला स्तर से लेकर उच्च स्तर तक न्यायालयों की व्यवस्था थी। दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई होती थी। न्यायाधीशों के साथ-साथ कुछ मामलों में जनप्रतिनिधियों जैसी भूमिका निभाने वाले "पीपुल्स असेसर" भी बैठते थे, जिनका उद्देश्य यह था कि न्याय केवल तकनीकी न रहे, बल्कि समाज की भागीदारी भी उसमें बनी रहे।

यह व्यवस्था मुझे रोचक लगी क्योंकि भारत में न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय प्रक्रिया के मुख्य स्तंभ होते हैं, जबकि वहाँ समाजवादी विचारधारा के अनुरूप जनता की सहभागिता पर भी बल दिया जाता था।

वकीलों की भूमिका भी कुछ भिन्न थी।

भारत में अधिवक्ता स्वतंत्र व्यवसायी होता है। वह अपने मुवक्किल का पक्ष पूरी स्वतंत्रता से प्रस्तुत करता है। परन्तु सोवियत व्यवस्था में अधिवक्ताओं के संगठन राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त ढाँचे के अंतर्गत कार्य करते थे। वकालत एक पेशा अवश्य थी, किन्तु उसका स्वरूप भारत जैसा पूर्णतः स्वतंत्र नहीं था।

एक भारतीय विधि-व्यवसायी की दृष्टि से यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है।

मुझे यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि वहाँ सामान्य नागरिकों के लिए कानूनी सहायता अपेक्षाकृत सुलभ थी। न्याय को एक सामाजिक सेवा के रूप में देखा जाता था। आर्थिक असमानता के कारण किसी व्यक्ति का न्याय से वंचित रह जाना अपेक्षाकृत कम माना जाता था।

कानून-व्यवस्था के विषय में मेरा अनुभव यह था कि सार्वजनिक जीवन में अपराध अपेक्षाकृत कम दिखाई देते थे।

ताश्कंद जैसे बड़े शहर में भी देर शाम तक लोग निश्चिंत होकर घूमते दिखाई देते थे। महिलाएँ सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करती थीं। पार्कों में परिवार देर तक समय बिताते थे। एक विदेशी छात्र होने के बावजूद मुझे कभी असुरक्षा की भावना का अनुभव नहीं हुआ।

उस समय मैं अक्सर भारत की परिस्थितियों से तुलना करता था।

मुझे लगता था कि इसका एक कारण कठोर कानून प्रवर्तन भी था और दूसरा कारण वह सामाजिक सुरक्षा थी जो राज्य अपने नागरिकों को प्रदान करता था। जब रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की चिंता कम हो, तो समाज में अपराध की कुछ प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक रूप से कम हो जाती हैं।

हालाँकि एक वकील के रूप में आज मैं यह भी समझता हूँ कि किसी न्याय व्यवस्था का मूल्यांकन केवल अपराध की कम संख्या से नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और शासन की आलोचना करने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

सोवियत व्यवस्था में सामाजिक सुरक्षा और अनुशासन अवश्य था, परन्तु राजनीतिक स्वतंत्रता की सीमाएँ भी थीं। उस समय एक विदेशी छात्र के रूप में मैं इन जटिलताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाता था। वर्षों बाद इतिहास का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित हुई।

फिर भी, मेरी स्मृतियों में ताश्कंद की न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे प्रमुख प्रभाव उसका अनुशासन है।

मुझे आज भी वे स्वच्छ सड़कें, समय का पालन करते नागरिक, नियमों का सम्मान और सार्वजनिक जीवन की व्यवस्थितता याद आती है। एक विधि-व्यवसायी के रूप में मैं समझता हूँ कि किसी भी समाज में यह सब केवल कानून की पुस्तकों से नहीं आता; इसके पीछे नागरिक संस्कृति, प्रशासनिक दक्षता और न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास भी आवश्यक होता है।

जब मैं अपने ताश्कंद प्रवास को याद करता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैंने वहाँ केवल एक विदेशी समाज को नहीं देखा था, बल्कि कानून और समाज के संबंध का एक अलग मॉडल भी देखा था। वह मॉडल भारत से भिन्न था, उसकी अपनी शक्तियाँ थीं और अपनी सीमाएँ भी।

एक भारतीय अधिवक्ता के रूप में मेरे लिए यह अनुभव अत्यंत शिक्षाप्रद रहा। उसने मुझे यह समझने में सहायता की कि न्याय केवल अदालतों की चारदीवारी में नहीं रहता; वह समाज के दैनिक जीवन, नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्था और लोगों की मानसिकता में भी दिखाई देता है।
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ताश्कंद के अस्पताल और सोवियत उज़्बेकिस्तान की स्वास्थ्य सेवाएँ -28

एक भारतीय विद्यार्थी की आँखों से

सन् 1980 में जब मैं अध्ययन के लिए सोवियत उज़्बेकिस्तान पहुँचा, तब मुझे वहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था को निकट से देखने का अवसर बहुत अधिक नहीं मिला। सौभाग्य से मैं अधिकांश समय स्वस्थ रहा। फिर भी दो अवसर ऐसे आए जब मुझे अस्पताल और चिकित्सा व्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिला।

पहला अवसर तब आया जब हम पाश्चकन (प्रारम्भिक प्रशिक्षण केंद्र) पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही हमारा विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण किया गया। हमारे स्वास्थ्य की पूरी जाँच की गई। उस समय मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि विदेश से आए प्रत्येक विद्यार्थी का स्वास्थ्य परीक्षण इतनी गंभीरता और व्यवस्थित ढंग से किया जा रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो राज्य अपने नागरिकों और विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व मानता हो।

दूसरा अवसर तब आया जब मुझे पेट की कुछ शिकायत हुई। मैं स्थानीय अस्पताल गया। वहाँ जो अनुभव हुआ, उसने मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ी।

अस्पताल अत्यंत व्यवस्थित था। वहाँ अनावश्यक भीड़भाड़ नहीं थी। डॉक्टर और नर्सें अपने कार्य में व्यस्त थीं, परन्तु उनके व्यवहार में जल्दबाज़ी या अव्यवस्था दिखाई नहीं देती थी। रोगियों के पंजीकरण से लेकर चिकित्सकीय परीक्षण तक सब कुछ एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार चल रहा था।

उस समय भारत के अनेक सरकारी अस्पतालों में लंबी कतारें, भीड़ और संसाधनों की कमी सामान्य बात थी। इसलिए ताश्कंद के अस्पताल की व्यवस्था मुझे विशेष रूप से प्रभावित कर गई।

धीरे-धीरे मुझे जानकारी मिली कि सोवियत संघ की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह राज्य के नियंत्रण में थी। चिकित्सा सेवा को व्यापार नहीं माना जाता था। उसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करना था।

प्रत्येक नागरिक का अधिकार था कि उसे निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त हो।

शहरों में पॉलीक्लिनिक नामक स्वास्थ्य केंद्र होते थे, जहाँ सामान्य रोगों का उपचार किया जाता था। आवश्यकता पड़ने पर रोगी को बड़े अस्पतालों में भेजा जाता था। इस प्रकार प्राथमिक चिकित्सा से लेकर विशेषज्ञ चिकित्सा तक एक संगठित व्यवस्था विकसित की गई थी।

मुझे बताया गया कि गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता था। विद्यालयों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होते थे। कारखानों और बड़े संस्थानों के अपने चिकित्सा केंद्र होते थे जहाँ कर्मचारियों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता था।

यह सब सुनकर मुझे लगा कि वहाँ बीमारी का उपचार करने से अधिक महत्व बीमारी को रोकने पर दिया जाता था।

डॉक्टरों की स्थिति भी मेरे लिए अध्ययन का विषय थी।

भारत में डॉक्टरों को समाज में अत्यंत सम्मान प्राप्त है और उनकी आर्थिक स्थिति भी सामान्यतः अच्छी मानी जाती है। सोवियत व्यवस्था में डॉक्टरों को भी सम्मान प्राप्त था, परन्तु उनका जीवन किसी बड़े उद्योगपति या धनी व्यवसायी जैसा नहीं होता था।

वे राज्य के कर्मचारी होते थे। उनका वेतन निश्चित होता था। उनके पास सामाजिक प्रतिष्ठा तो थी, परन्तु आर्थिक असमानता अपेक्षाकृत कम थी।

मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ डॉक्टर बनने की शिक्षा भी राज्य द्वारा उपलब्ध कराई जाती थी। प्रतिभाशाली विद्यार्थी आर्थिक कठिनाइयों के कारण चिकित्सा शिक्षा से वंचित नहीं रहते थे।

डॉक्टरों को समाज में एक सेवाभावी पेशे के रूप में देखा जाता था। वे केवल रोगों का उपचार करने वाले विशेषज्ञ नहीं, बल्कि समाज के स्वास्थ्य संरक्षक माने जाते थे।

ताश्कंद में रहते हुए मैंने यह भी देखा कि नर्सों और चिकित्सा कर्मचारियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। अस्पतालों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने में उनकी भूमिका प्रमुख थी।

स्वास्थ्य सेवाओं की एक और विशेषता थी—सैनिटोरियम और स्वास्थ्य विश्राम केंद्र।

सोवियत व्यवस्था में यह विश्वास था कि स्वस्थ समाज केवल अस्पतालों से नहीं बनता। इसलिए कर्मचारियों और श्रमिकों के लिए विश्राम केंद्र, स्वास्थ्य शिविर और पुनर्वास सुविधाएँ भी विकसित की गई थीं। कई कर्मचारी छुट्टियों में अपने परिवारों के साथ ऐसे केंद्रों में जाकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते थे।

एक भारतीय विद्यार्थी के रूप में यह विचार मुझे अत्यंत आकर्षक लगा कि सरकार केवल बीमारी का इलाज ही नहीं करती, बल्कि लोगों को स्वस्थ बनाए रखने का भी प्रयास करती है।

बेशक, समय के साथ मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि सोवियत स्वास्थ्य व्यवस्था की अपनी सीमाएँ थीं। आधुनिक दवाओं और नवीनतम चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता कभी-कभी पश्चिमी देशों की तुलना में कम होती थी। रोगी को डॉक्टर चुनने की स्वतंत्रता भी सीमित थी।

किन्तु इसके बावजूद एक बात स्पष्ट थी—कोई व्यक्ति केवल इस कारण चिकित्सा सुविधा से वंचित नहीं रहता था कि उसके पास धन नहीं है।

यह बात मेरे मन को विशेष रूप से प्रभावित करती थी।

आज जब मैं उन दिनों को स्मरण करता हूँ, तो मुझे अपना वह पहला स्वास्थ्य परीक्षण याद आता है और वह छोटा-सा अस्पताल भी याद आता है जहाँ मैं पेट की शिकायत लेकर गया था। शायद उस समय मैं स्वास्थ्य व्यवस्था की गहराइयों को नहीं समझता था, परन्तु इतना अवश्य महसूस करता था कि वहाँ चिकित्सा सेवा को एक सामाजिक अधिकार माना जाता है, न कि केवल एक सुविधा।

ताश्कंद की मेरी स्मृतियों में अस्पतालों की चमक-दमक नहीं, बल्कि उनकी व्यवस्था, स्वच्छता, अनुशासन और रोगी के प्रति उत्तरदायित्व की भावना आज भी अंकित है।

एक भारतीय विद्यार्थी के रूप में मैंने वहाँ यह अनुभव किया कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसके कारखानों, विश्वविद्यालयों और स्मारकों से नहीं होती; उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने बीमार, कमजोर और असहाय नागरिकों की कितनी संवेदनशीलता से देखभाल करता है।

सोवियत उज़्बेकिस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था में मैंने इसी संवेदनशीलता की झलक देखी थी, और यही स्मृति आज भी मेरे मन में सम्मान के साथ सुरक्षित है।
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ताश्कंद से समरकंद : इतिहास की ओर बढ़ते हमारे कदम-29

सन् 1980 की वह सुबह आज भी मेरी स्मृतियों में उतनी ही ताज़ा है, जैसे यह सब कल ही घटित हुआ हो। समय का पहिया भले ही छियालीस वर्ष आगे बढ़ चुका हो, परन्तु ताश्कंद से समरकंद की वह यात्रा आज भी मेरी आंखों में जीवित है। जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, मन फिर उसी युवा विद्यार्थी में बदल जाता है जो उत्सुकता, जिज्ञासा और सपनों से भरा हुआ मध्य एशिया के महान नगरों को देखने निकल पड़ा था।

कॉम्सोमोल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट के अधिकारियों ने हमें कई दिन पहले ही सूचित कर दिया था कि एक सप्ताह की शैक्षणिक यात्रा आयोजित की जा रही है। इस यात्रा में हमें समरकंद, बुखारा और फरगना जैसे ऐतिहासिक नगरों का भ्रमण कराना था। यह समाचार सुनते ही हम सबके मन में उत्साह की लहर दौड़ गई। हममें से अनेक छात्रों ने इन नगरों के बारे में पुस्तकों में पढ़ा था, इतिहास के पन्नों में उनके वैभव की कथाएँ सुनी थीं और भारत की लोककथाओं में उनके नाम सुने थे। अब उन्हें अपनी आँखों से देखने का अवसर मिलने वाला था।

यात्रा के दिन प्रातःकाल ही छात्रावास में असाधारण चहल-पहल थी। कोई कैमरा संभाल रहा था, कोई अपने बैग की अंतिम जांच कर रहा था और कोई खिड़की से बाहर झांककर बसों के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई पर्व मनाया जा रहा हो। हम सब समय से पहले ही संस्थान के बाहर पहुँच गए, जहाँ हमारी बसें तैयार खड़ी थीं।

सूरज की पहली किरणों के साथ हमारी बस ताश्कंद से पश्चिम-दक्षिण दिशा में समरकंद की ओर चल पड़ी। उस समय ताश्कंद सोवियत उज़्बेकिस्तान की राजधानी होने के साथ-साथ आधुनिकता और विकास का प्रतीक था। चौड़ी सड़कें, सुव्यवस्थित भवन और हरियाली से भरा यह नगर पीछे छूटता जा रहा था और हमारे सामने मध्य एशिया का विशाल भूभाग खुलता जा रहा था।

ताश्कंद से समरकंद की दूरी लगभग 309 किलोमीटर है। आज यह दूरी आधुनिक रेल और तेज़ मार्गों के कारण कम समय में पूरी हो जाती है, किन्तु उस समय हमारी बस यात्रा लगभग साढ़े छह घंटे की थी। परन्तु हमें समय का कोई एहसास नहीं था। यात्रा का प्रत्येक क्षण रोमांच से भरा हुआ था।

बस की खिड़कियों से बाहर देखते हुए हम उज़्बेकिस्तान के ग्रामीण जीवन की झलकियाँ देख रहे थे। कहीं दूर तक फैले कपास के खेत दिखाई देते थे, कहीं गेहूँ की सुनहरी बालियाँ हवा के साथ लहरा रही थीं। छोटे-छोटे गाँव, मिट्टी और ईंटों से बने घर, सड़क किनारे खड़े वृक्ष और खेतों में काम करते किसान—यह सब हमें अपने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की याद दिला रहे थे। कई बार तो ऐसा लगता था मानो हम किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि अपने ही देश के किसी ग्रामीण क्षेत्र से गुजर रहे हों।

रास्ते में हम जिज़ाख (Jizzakh) नगर में रुके। यह स्थान ताश्कंद और समरकंद के मध्य एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहाँ हमारे लिए पहले से ही अल्पाहार की व्यवस्था की गई थी। यात्रा की थकान के बीच गर्म चाय और हल्के नाश्ते ने नई ऊर्जा भर दी। कुछ छात्रों ने स्मृति-चित्र लिए, कुछ स्थानीय लोगों से बातचीत करने लगे और कुछ आसपास के वातावरण का आनंद लेने लगे।

इसके बाद हमारी यात्रा पुनः आरम्भ हुई। बस में गीतों का दौर शुरू हो गया। भारतीय छात्र हिंदी फिल्मी गीत गा रहे थे तो अन्य देशों के छात्र अपनी-अपनी भाषाओं के गीत सुनाते थे। कभी तालियाँ बजतीं, कभी ठहाके गूँजते और कभी खिड़की के बाहर फैले प्राकृतिक दृश्यों में सब खो जाते। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि विभिन्न देशों और संस्कृतियों के युवाओं के बीच मैत्री का उत्सव भी था।

जैसे-जैसे समरकंद निकट आता गया, मेरे मन में उत्सुकता बढ़ती गई। आखिर यह वही नगर था जिसका नाम मैंने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा था। यह वही समरकंद था जो सदियों तक मध्य एशिया की सांस्कृतिक और राजनीतिक राजधानी रहा। यह वही नगर था जिसने विश्व इतिहास के महान विजेता को अपनी राजधानी के रूप में देखा था और जिसने रेशम मार्ग के स्वर्णिम युग को अपनी आँखों से देखा था।

समरकंद को केवल एक शहर कहना उसके महत्व को कम करना होगा। यह नगर एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व की सभ्यताओं के मिलन का केंद्र था। चीन से आने वाले कारवाँ, भारत से आने वाले व्यापारी, ईरान के विद्वान और अरब देशों के यात्री यहाँ एकत्रित होते थे। ज्ञान, व्यापार, कला और संस्कृति की अनेक धाराएँ यहाँ मिलकर एक विशाल नदी का रूप लेती थीं।

इतिहासकारों ने समरकंद को "पूर्व का रत्न" और "मध्य एशिया का मुकुट" कहा है। इसकी पहचान केवल इसके भव्य भवनों से नहीं है, बल्कि उस ज्ञान-परम्परा से है जिसने इसे विश्व मानचित्र पर अमर बना दिया। यहाँ के मदरसे, पुस्तकालय, वेधशालाएँ और शैक्षणिक संस्थान मध्यकालीन विश्व के प्रमुख ज्ञान-केंद्रों में गिने जाते थे।

जब हमारी बस ने समरकंद नगर की सीमा में प्रवेश किया, तो मैं खिड़की से बाहर देखता रह गया। मेरे मन में एक विचित्र भावना थी। ऐसा लग रहा था मानो इतिहास की पुस्तक के पन्ने जीवित होकर हमारे सामने खड़े हो गए हों। हम किसी साधारण नगर में प्रवेश नहीं कर रहे थे; हम उस धरती पर कदम रखने जा रहे थे जहाँ सदियों से इतिहास लिखा जाता रहा था।

उस क्षण मुझे यह एहसास हुआ कि हमारी यह यात्रा केवल दर्शनीय स्थलों को देखने की यात्रा नहीं होगी। यह अतीत को समझने, सभ्यताओं के संवाद को महसूस करने और भारत तथा मध्य एशिया के ऐतिहासिक संबंधों को निकट से जानने की यात्रा होगी।

समरकंद हमारे सामने था—अपने गौरवशाली इतिहास, भव्य स्थापत्य, नीले गुंबदों और अनगिनत कहानियों के साथ। और हम, दूर भारत से आए कुछ युवा विद्यार्थी, उसके द्वार पर खड़े थे, उसकी कहानी सुनने और उसे अपनी स्मृतियों में सहेजने के लिए।यह लेख आपकी यात्रा का स्वाभाविक आरंभ बनाता है। 


समरकंद में हमारा प्रवेश : सपनों के नगर से पहली मुलाकात. -30

लगभग साढ़े छह घंटे की यात्रा के बाद हमारी बस समरकंद नगर की सीमा में प्रवेश कर रही थी। बस की खिड़की से बाहर झांकते हुए मैं उन दृश्यों को अपनी आंखों में समेट लेने का प्रयास कर रहा था, जिन्हें देखने की कल्पना मैंने वर्षों से कर रखी थी। इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा हुआ समरकंद अब हमारे सामने वास्तविक रूप में उपस्थित था।

नगर के बाहरी भाग में चौड़ी और सुव्यवस्थित सड़कें दिखाई दे रही थीं। दोनों ओर वृक्षों की लंबी कतारें थीं, जिनकी छाया सड़क पर एक सुंदर छत्र की तरह फैली हुई थी। कहीं-कहीं फूलों की क्यारियां नगर की शोभा बढ़ा रही थीं। यह देखकर मुझे आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी कि हजारों वर्षों का इतिहास अपने भीतर समेटे यह नगर आधुनिकता और स्वच्छता का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण था।

बस धीरे-धीरे नगर के भीतरी भाग की ओर बढ़ रही थी। सड़क पर चलते लोगों के चेहरे, उनके पहनावे और उनके व्यवहार को देखकर मुझे कहीं भी परायेपन का अनुभव नहीं हो रहा था। अनेक लोगों के चेहरे भारतीयों से मिलते-जुलते लगते थे। कई बार तो ऐसा लगता था कि जैसे हम किसी विदेशी नगर में नहीं, बल्कि भारत के किसी ऐतिहासिक शहर में घूम रहे हों।

हमारी बस अंततः उस होटल के सामने आकर रुकी, जहाँ हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी। उसका नाम ही "समरकंद होटल" था। उस समय सोवियत संघ में पर्यटन और अतिथियों के स्वागत की जो व्यवस्था थी, वह अत्यंत अनुशासित और व्यवस्थित थी। होटल का भवन भव्य तो था ही, साथ ही उसमें एक आत्मीयता का भाव भी था।

बस से उतरते ही हमारी सारी थकान जैसे हवा हो गई। हम सबकी निगाहें होटल से अधिक उस नगर को देखने के लिए उत्सुक थीं, जिसकी ख्याति सदियों से संसार भर में फैली हुई थी।

होटल के विशाल स्वागत कक्ष में हमारा औपचारिक पंजीकरण हुआ। कर्मचारियों ने मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया। कुछ ही देर में हमें हमारे कमरे आवंटित कर दिए गए। मैं अपने कमरे की खिड़की तक गया और बाहर झांककर देखने लगा। दूर तक फैले वृक्ष, चौड़ी सड़कें और नगर की शांत गरिमा मुझे आकर्षित कर रही थी।

कमरे में पहुँचकर सामान रखा ही था कि सूचना मिली कि नीचे चाय और हल्के नाश्ते की व्यवस्था की गई है। हम सब शीघ्रता से भोजन कक्ष में पहुँच गए। यात्रा के दौरान हमने नाश्ता अवश्य किया था, परन्तु अब समरकंद की धरती पर बैठकर चाय पीने का आनंद कुछ और ही था।

गर्म चाय की प्याली हाथ में लिए मैं बार-बार खिड़की से बाहर देख रहा था। मेरे मन में एक ही विचार चल रहा था—क्या सचमुच मैं उसी समरकंद में बैठा हूँ जिसका नाम मैंने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा था? क्या यही वह नगर है जहाँ से कभी कारवां भारत, चीन और पश्चिमी एशिया की ओर जाते थे? क्या यही वह नगर है जिसकी भव्यता का वर्णन यात्रियों और इतिहासकारों ने सदियों तक किया?

चाय समाप्त होते-होते हम सबकी बेचैनी बढ़ने लगी। सामान्यतः इतनी लंबी बस यात्रा के बाद विश्राम करने की इच्छा होती है, किन्तु उस दिन स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। शरीर भले ही यात्रा करके आया था, पर मन पूरी तरह जागृत और उत्साहित था।

मुझे आज भी याद है कि हममें से किसी ने भी थकान की चर्चा तक नहीं की। ऐसा लगता था कि समरकंद की मिट्टी में ही कोई अदृश्य आकर्षण है, जो यात्रियों को विश्राम नहीं करने देता। कमरे में जाकर लेटने का विचार किसी के मन में नहीं था। सबकी आँखों में केवल एक ही उत्सुकता थी—जितनी जल्दी हो सके, इस ऐतिहासिक नगर को देखा जाए।

हम होटल के बाहर निकल आए। सामने समरकंद की सड़कें थीं और उन सड़कों के पीछे छिपी थीं सदियों की कहानियाँ। हमारे कदम स्वतः ही आगे बढ़ने लगे। हम पर्यटक नहीं थे, केवल दर्शक भी नहीं थे; हम विद्यार्थी थे और हमारे भीतर इस नगर को समझने, जानने और महसूस करने की तीव्र इच्छा थी।

मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी शहर में नहीं, बल्कि इतिहास के एक जीवित संग्रहालय में प्रवेश कर रहा हूँ। यहाँ की हवा में अतीत की सुगंध थी। यहाँ के वृक्ष, भवन और सड़कें मानो अपने भीतर अनगिनत कथाएँ समेटे हुए थे।

उस शाम सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम की ओर झुक रहा था। उसकी सुनहरी किरणें समरकंद के भवनों पर पड़ रही थीं और पूरा वातावरण एक अद्भुत आभा से भर उठा था। हम होटल से बाहर निकलकर नगर की ओर बढ़ चले। हमें नहीं मालूम था कि अगले कुछ दिनों में हम कितने महान स्मारकों, कितनी ऐतिहासिक घटनाओं और कितनी सांस्कृतिक विरासतों से परिचित होने वाले हैं।

परन्तु उस समय हमारे मन में केवल एक ही भावना थी—सपनों का नगर हमारे सामने था और हम उसकी गोद में प्रवेश कर चुके थे।

समरकंद से यह हमारी पहली भेंट थी, और पहली ही भेंट में उसने हमें अपना बना लिया था।


समरकंद की पहली संध्या : इतिहास के साये में एक अविस्मरणीय शाम -31

समरकंद पहुँचे हमें कुछ ही घंटे हुए थे, परन्तु ऐसा लग रहा था जैसे यह नगर हमें वर्षों से जानता हो और अपनी बाँहें फैलाकर हमारा स्वागत कर रहा हो। होटल में चाय पीने और थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हम सब बाहर निकल आए। शरीर यात्रा से थका हुआ अवश्य था, लेकिन मन में ऐसा उत्साह था कि थकान कहीं दिखाई ही नहीं दे रही थी।

समरकंद की वह पहली संध्या आज भी मेरी स्मृतियों में उसी प्रकार सुरक्षित है, जैसे किसी पुराने एलबम में रखा हुआ प्रिय चित्र।

होटल से बाहर निकलते ही सबसे पहले मेरी दृष्टि नगर की स्वच्छता और सुव्यवस्था पर गई। चौड़ी सड़कें, दोनों ओर लगे वृक्ष, सुंदर फूलों की क्यारियाँ और शांत वातावरण—सब कुछ मिलकर एक अलग ही संसार की अनुभूति करा रहे थे। भारत के बड़े नगरों की तरह यहाँ भी लोगों की चहल-पहल थी, परन्तु कहीं भी भागदौड़ या शोरगुल नहीं था।

सूर्य पश्चिम के क्षितिज की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा था। उसकी सुनहरी किरणें समरकंद के भवनों पर पड़कर उन्हें एक विशेष आभा प्रदान कर रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं इस ऐतिहासिक नगर को स्वर्णिम रंगों से सजा रही हो।

हम पैदल ही आसपास के क्षेत्र में घूमने निकल पड़े। रास्ते में स्थानीय लोग दिखाई देते थे। कुछ परिवार शाम की सैर पर निकले हुए थे। बच्चे खेल रहे थे। बुजुर्ग बेंचों पर बैठकर बातचीत कर रहे थे। कई बार ऐसा लगता था कि हम किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि अपने देश के किसी सांस्कृतिक नगर में घूम रहे हैं। लोगों के चेहरे-मोहरे, उनका अपनापन और उनका व्यवहार हमें कहीं न कहीं अपनेपन का अनुभव करा रहा था।

मेरे लिए सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि यहाँ के लोगों के मन में भारत के प्रति अत्यंत सम्मान और स्नेह था। जैसे ही उन्हें पता चलता कि हम भारत से आए हैं, उनके चेहरे पर मुस्कान फैल जाती। कई लोग "इंदिरा गांधी", "राज कपूर" और "हिंदुस्तान" जैसे शब्द बोलकर अपना स्नेह प्रकट करते थे। उस समय मुझे पहली बार गहराई से अनुभव हुआ कि भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक भी हैं।

संध्या गहराने लगी थी। नगर की रोशनियाँ एक-एक करके जगमगाने लगी थीं। वृक्षों से घिरी सड़कों पर टहलते हुए मैं बार-बार सोच रहा था कि कितने महान यात्री, विद्वान, व्यापारी और शासक इसी नगर की सड़कों पर चले होंगे। यही वह धरती थी जहाँ से रेशम मार्ग के कारवाँ गुजरे थे। यही वह नगर था जिसने मध्य एशिया के उत्थान और पतन के अनेक युग देखे थे।

उस समय मेरे मन में एक विचित्र अनुभूति हो रही थी। मैं केवल एक पर्यटक की तरह इमारतों को नहीं देख रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं इतिहास के साथ संवाद कर रहा हूँ। समरकंद की हवा में एक गंभीरता थी, एक गरिमा थी, जो उसे साधारण नगरों से अलग बनाती थी।

हमारी टोली धीरे-धीरे नगर के प्रमुख भागों की ओर बढ़ रही थी। दूर कहीं नीले गुंबदों की झलक दिखाई दे जाती थी। उन गुंबदों को देखकर मन में उत्सुकता और बढ़ जाती थी कि अगले दिन हम उन्हें निकट से देखेंगे। इतिहास की जिन तस्वीरों को हमने पुस्तकों में देखा था, वे अब हमारे सामने वास्तविक रूप में उपस्थित होने वाली थीं।

शाम के समय समरकंद का वातावरण अत्यंत मनोहारी था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। वृक्षों की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं। सड़क की रोशनियाँ जल उठी थीं और पूरा नगर एक शांत गरिमा में डूबा हुआ प्रतीत होता था।

मुझे अपने देश के अनेक ऐतिहासिक नगर याद आ रहे थे—दिल्ली, आगरा, जयपुर और वाराणसी। जैसे इन नगरों की आत्मा उनके इतिहास में बसती है, वैसे ही समरकंद की आत्मा भी उसके अतीत में निवास करती है। अंतर केवल इतना था कि मैं पहली बार उस इतिहास को अपनी आँखों से देख रहा था जिसके बारे में वर्षों से पढ़ता आया था।

धीरे-धीरे रात का अंधकार फैलने लगा। हमें अगले दिन प्रातःकाल से ही विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करना था। इसलिए हम वापस होटल की ओर लौट पड़े। किन्तु सच कहूँ तो मेरे मन की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

उस रात होटल के कमरे में पहुँचकर भी देर तक नींद नहीं आई। खिड़की से बाहर झिलमिलाती रोशनियों को देखते हुए मैं समरकंद के इतिहास के बारे में सोचता रहा। तैमूर, विद्वान, व्यापारी, कारवाँ, रेशम मार्ग और सदियों पुरानी सभ्यताओं की छवियाँ मन में घूमती रहीं।

समरकंद की वह पहली संध्या केवल एक शाम नहीं थी। वह मेरे जीवन के उन दुर्लभ क्षणों में से एक थी जब किसी नगर से पहली मुलाकात ही उसे हृदय के बहुत निकट पहुँचा देती है। उस दिन मुझे अनुभव हुआ कि कुछ नगर केवल देखे नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। समरकंद भी ऐसा ही नगर था।उसकी पहली संध्या ने ही मुझे अपना बना लिया था।

प्रातःकाल का समरकंद : जब इतिहास ने आँखें खोलीं -32

समरकंद में हमारी पहली रात कब बीत गई, इसका पता ही नहीं चला। यात्रा की थकान शरीर में अवश्य थी, परन्तु मन में अगले दिन के प्रति ऐसी उत्सुकता थी कि नींद भी बार-बार टूट जाती थी। कभी खिड़की से बाहर झाँकता, कभी अगले दिन के कार्यक्रम के बारे में सोचता और कभी इतिहास की उन घटनाओं को स्मरण करता जिनसे समरकंद का नाम जुड़ा हुआ था।

प्रातःकाल जब मेरी आँख खुली तो कमरे की खिड़की से हल्की सुनहरी किरणें भीतर प्रवेश कर रही थीं। मैंने परदा हटाकर बाहर देखा। सामने एक नया समरकंद खड़ा था। पिछली शाम का समरकंद और इस सुबह का समरकंद मानो दो अलग-अलग रूप थे।

सुबह की शीतल हवा वातावरण में ताजगी घोल रही थी। सड़कें अभी पूरी तरह व्यस्त नहीं हुई थीं। वृक्षों की पत्तियों पर ओस की नमी चमक रही थी। दूर-दूर तक फैली हरियाली और स्वच्छ वातावरण मन को एक अद्भुत शांति प्रदान कर रहे थे।

मैं जल्दी से तैयार होकर होटल के बाहर निकल आया। मेरे कुछ साथी भी पहले से ही वहाँ टहल रहे थे। हम सभी के चेहरों पर उत्साह स्पष्ट दिखाई दे रहा था। ऐसा लगता था कि हम किसी साधारण शहर में नहीं, बल्कि इतिहास के एक विशाल अध्याय के बीच खड़े हैं।

सुबह का समरकंद अत्यंत शांत और गरिमामय दिखाई देता था। यहाँ की हवा में एक प्रकार की गंभीरता थी, जैसे यह नगर अपने भीतर सदियों की स्मृतियों को संजोए हुए हो। सड़कों पर चलते हुए बार-बार ऐसा महसूस होता था कि इन मार्गों पर कभी रेशम मार्ग के व्यापारी चले होंगे, विद्वान गुजरे होंगे और दूर देशों से आने वाले यात्री इसी नगर को देखकर चकित हुए होंगे।

सूर्य धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था। उसकी किरणें नगर के भवनों और दूर दिखाई देने वाले नीले गुंबदों पर पड़ रही थीं। उन गुंबदों का रंग सुबह की रोशनी में और भी अधिक आकर्षक दिखाई देता था। ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश का एक अंश धरती पर उतर आया हो।

उस क्षण मुझे पहली बार समझ में आया कि समरकंद को संसार के सबसे सुंदर ऐतिहासिक नगरों में क्यों गिना जाता है। इसकी सुंदरता केवल इसकी इमारतों में नहीं है, बल्कि उस वातावरण में है जो इतिहास, संस्कृति और प्रकृति को एक साथ जोड़ देता है।

होटल के भोजन कक्ष में नाश्ते की व्यवस्था थी। वहाँ विभिन्न देशों से आए छात्र एकत्रित हो रहे थे। मेजों पर ताज़ी रोटी, मक्खन, पनीर, फल और चाय रखी हुई थी। हम नाश्ता कर रहे थे, परन्तु चर्चा केवल एक ही विषय पर हो रही थी—आज हम क्या-क्या देखने वाले हैं।

किसी को प्राचीन मदरसों को देखने की उत्सुकता थी, किसी को ऐतिहासिक मकबरों को। मैं स्वयं उस नगर के स्थापत्य को देखने के लिए अत्यंत उत्साहित था जिसके बारे में मैंने वर्षों तक पढ़ा था।

नाश्ते के बाद हमारी बस ऐतिहासिक स्थलों की ओर चलने वाली थी। हम समय से पहले ही तैयार होकर बाहर आ गए। प्रतीक्षा करते हुए मैं आसपास के वातावरण को ध्यान से देख रहा था। स्थानीय लोग अपने दैनिक कार्यों में लग चुके थे। बच्चे विद्यालय की ओर जा रहे थे। कार्यालयों और संस्थानों की ओर जाने वाले लोग दिखाई देने लगे थे।

एक बात जिसने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया, वह थी यहाँ का अनुशासन और स्वच्छता। न कहीं अनावश्यक शोर, न अव्यवस्था। पूरा नगर एक व्यवस्थित लय में चलता हुआ प्रतीत होता था।

उस सुबह मुझे बार-बार अपने देश के ऐतिहासिक नगरों की याद आ रही थी। जैसे दिल्ली की सुबह अपने भीतर मुगलकाल की स्मृतियाँ लिए होती है, जैसे वाराणसी की सुबह आध्यात्मिकता का अनुभव कराती है, वैसे ही समरकंद की सुबह इतिहास की गहराइयों का एहसास कराती थी।

मैं सोच रहा था कि यह वही नगर है जिसने महान साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा है। यह वही नगर है जहाँ ज्ञान, व्यापार और संस्कृति ने मिलकर एक ऐसी विरासत का निर्माण किया जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया।

हमारी बस अब होटल के सामने आकर खड़ी हो चुकी थी। साथी छात्र अपनी-अपनी सीटों पर बैठने लगे। मैं एक बार फिर मुड़कर समरकंद की उस सुबह को देखना चाहता था। सूर्य अब पूरी तरह निकल चुका था और उसकी किरणों में नहाया हुआ नगर किसी चित्रकार की उत्कृष्ट कृति जैसा लग रहा था।

मुझे उस समय यह आभास नहीं था कि अगले कुछ घंटों में मैं ऐसे दृश्य देखने वाला हूँ जो जीवन भर मेरी स्मृतियों का हिस्सा बने रहेंगे। रेगिस्तान चौक के भव्य मदरसे, नीले गुंबद, विशाल मेहराबें और तैमूरी स्थापत्य की अद्भुत कला मेरे सामने आने वाली थी।

परन्तु उन सबके पहले मेरे मन में समरकंद की उस सुबह की छवि अंकित हो चुकी थी—एक शांत, गौरवशाली और आत्मविश्वास से भरा नगर, जो अपनी हजारों वर्षों की विरासत के साथ हर नए आगंतुक का स्वागत करता है।

आज भी जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ तो समरकंद की वही सुबह सबसे पहले स्मृति में उभरती है। वह केवल एक सुबह नहीं थी, बल्कि 

रेगिस्तान चौक का प्रथम दर्शन : जब इतिहास हमारे सामने खड़ा था 33

समरकंद की उस मनोहारी सुबह के बाद हमारी बस नगर के ऐतिहासिक स्थलों की ओर बढ़ रही थी। हम सभी विद्यार्थियों के मन में उत्सुकता थी, क्योंकि आज हमें उस स्थान को देखने का अवसर मिलने वाला था, जिसे समरकंद की पहचान माना जाता है। पुस्तकों, पत्रिकाओं और इतिहास के अध्यायों में जिसके चित्र देखे थे, आज वह हमारे सामने वास्तविक रूप में उपस्थित होने वाला था।

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं नगर के दृश्य अपने भीतर समेट रहा था। चौड़ी सड़कें, वृक्षों की कतारें और दूर-दूर तक फैली हुई ऐतिहासिक भव्यता यह संकेत दे रही थी कि हम किसी साधारण नगर में नहीं, बल्कि मध्य एशिया की सांस्कृतिक राजधानी में हैं।

कुछ ही देर बाद हमारी बस एक विशाल खुले क्षेत्र के निकट आकर रुकी। हम सब धीरे-धीरे बस से उतरे। हमारे मार्गदर्शक ने मुस्कुराते हुए कहा—"यह है रेगिस्तान।"

मैंने सामने दृष्टि उठाई और कुछ क्षणों के लिए जैसे स्तब्ध रह गया।

मेरे सामने जो दृश्य था, उसे शब्दों में बाँधना आज भी आसान नहीं है।

एक विशाल चौक, जिसके तीन ओर आकाश को छूती हुई भव्य इमारतें खड़ी थीं। ऊँचे-ऊँचे मेहराब, नीले और फिरोज़ी रंग के चमकते गुंबद, दीवारों पर बनी हुई अद्भुत नक्काशी और ज्यामितीय अलंकरण—सब कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी कलाकार ने अपनी कल्पना की सम्पूर्ण शक्ति इस स्थान पर उँडेल दी हो।

मैं कुछ देर तक निःशब्द खड़ा रहा।

इतिहास की पुस्तक में देखा गया चित्र और वास्तविकता में खड़े होकर उसे देखना—इन दोनों में कितना अंतर होता है, यह उस दिन अनुभव हुआ। चित्र केवल आकृति दिखाता है, परन्तु वास्तविकता उसकी आत्मा से परिचित कराती है।

रेगिस्तान चौक का पहला दर्शन मेरे लिए वैसा ही था जैसा पहली बार कोई व्यक्ति ताजमहल या कुतुब मीनार को देखकर अनुभव करता है। तस्वीरें उसकी भव्यता का परिचय दे सकती हैं, परन्तु उसकी विराटता का नहीं।

मेरे सामने तीन महान मदरसे अपनी पूरी शान के साथ खड़े थे—,  और ।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि सदियों तक यह स्थान केवल स्थापत्य का चमत्कार नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन का केंद्र भी था। यहाँ विद्वानों के व्याख्यान होते थे, विद्यार्थियों की शिक्षा होती थी और महत्वपूर्ण घोषणाएँ की जाती थीं।

मैंने चौक के मध्य खड़े होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। ऐसा लग रहा था मानो समय रुक गया हो। आसपास पर्यटक थे, स्थानीय लोग थे, परन्तु मेरी कल्पना मुझे कई शताब्दियों पीछे ले जा रही थी।

मुझे प्रतीत हुआ जैसे कहीं से घोड़ों की टापें सुनाई दे रही हों। जैसे रेशम मार्ग के व्यापारी अपने ऊँटों के कारवाँ के साथ इस चौक से होकर गुजर रहे हों। जैसे दूर देशों से आए विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन मदरसों की ओर जा रहे हों। इतिहास मानो मेरे सामने जीवंत हो उठा था।

नीले गुंबदों की चमक विशेष रूप से मेरा ध्यान आकर्षित कर रही थी। भारतीय स्थापत्य में हमने लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का व्यापक उपयोग देखा है, परन्तु यहाँ नीले रंग का जो सौंदर्य था, वह बिल्कुल अलग था। सूर्य की किरणें जब उन टाइलों पर पड़ती थीं तो ऐसा लगता था जैसे आकाश स्वयं इन इमारतों पर उतर आया हो।

मुझे दिल्ली के पुराने स्मारक याद आए। कुतुब परिसर, हुमायूँ का मकबरा और लाल किला अपनी जगह अद्वितीय हैं, परन्तु रेगिस्तान चौक का प्रभाव भिन्न था। यहाँ स्थापत्य केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि ज्ञान और संस्कृति का भी प्रतीक बन जाता है।

हमारे समूह के अनेक छात्र चित्र लेने में व्यस्त हो गए। उस समय कैमरे आज की तरह मोबाइल फोन में नहीं होते थे। हर तस्वीर सोच-समझकर ली जाती थी। मैं भी अपने कैमरे से कुछ चित्र लेने लगा, परन्तु शीघ्र ही मुझे लगा कि इस दृश्य को कैमरे से अधिक अपने हृदय में संजोना चाहिए।

मैं चौक के बीचोंबीच कुछ देर अकेला खड़ा रहा। मेरे मन में एक अद्भुत भाव उत्पन्न हो रहा था। मैं सोच रहा था कि भारत और मध्य एशिया का संबंध केवल व्यापार या राजनीति तक सीमित नहीं रहा है। ज्ञान, कला, स्थापत्य और संस्कृति की अनेक धाराएँ सदियों तक इन दोनों क्षेत्रों के बीच प्रवाहित होती रही हैं। शायद इसी कारण यहाँ खड़े होकर भी मुझे परायेपन का अनुभव नहीं हो रहा था।

रेगिस्तान चौक केवल पत्थरों और ईंटों से बनी इमारतों का समूह नहीं है। यह मध्य एशिया की आत्मा का प्रतीक है। यह उस युग का स्मारक है जब ज्ञान को सम्मान प्राप्त था, जब शिक्षा समाज की शक्ति मानी जाती थी और जब स्थापत्य कला आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छूने का प्रयास करती थी।

उस दिन जब मैं पहली बार रेगिस्तान चौक के सामने खड़ा था, तब मुझे लगा कि मैं केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं देख रहा हूँ, बल्कि मानव सभ्यता की एक महान उपलब्धि के सामने खड़ा हूँ।

समरकंद की उस सुबह का सबसे अमूल्य उपहार यही था—रेगिस्तान चौक का प्रथम दर्शन।

आज भी, दशकों बाद, जब मैं आँखें बंद करता हूँ तो सबसे पहले वही दृश्य उभरता है—नीले गुंबदों से सजा विशाल चौक, सूर्य की स्वर्णिम किरणों में चमकती हुई दीवारें और इतिहास की मौन उपस्थिति, जो हर आगंतुक से कहती है कि सभ्यताएँ मिटती नहीं, वे अपनी स्मृतियों के रूप में जीवित रहती हैं।यह अध्याय आपके संस्मरण का एक महत्वपूर्ण मोड़ बन सकता है। इसके बाद स्वाभाविक अगला लेख होगा — "उलुग बेग मदरसे के भीतर : ज्ञान के उस मंदिर में एक भारतीय विद्यार्थी", जिसमें आप मदरसे के आँगन, कक्षों, शिक्षा-व्यवस्था और भारत के प्राचीन नालंदा-तक्षशिला से उसकी तुलना कर सकते हैं।


उलुग बेग मदरसे के भीतर : ज्ञान के उस मंदिर में एक भारतीय विद्यार्थी 34

रेगिस्तान चौक के प्रथम दर्शन ने हमें विस्मय से भर दिया था। उसकी भव्यता, उसके नीले गुंबद और उसकी स्थापत्य कला ने हमारे मन को अभिभूत कर दिया था। परन्तु मेरे लिए असली आकर्षण उन इमारतों के भीतर छिपा हुआ इतिहास था। मैं केवल उन्हें बाहर से देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहता था। मैं जानना चाहता था कि उन दीवारों के पीछे कैसी दुनिया रही होगी, जहाँ कभी ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित होती थी।

हमारा पहला पड़ाव था ।

विशाल प्रवेश द्वार के सामने खड़े होकर मैंने ऊपर दृष्टि उठाई। ऊँची मेहराबों पर बनी हुई नक्काशी, रंग-बिरंगी टाइलों का अद्भुत संयोजन और ज्यामितीय आकृतियों की बारीकी देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। ऐसा लग रहा था मानो पत्थरों और टाइलों में भी गणित और सौंदर्य का अद्भुत संगम उपस्थित हो।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि इस मदरसे का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में तैमूर के पौत्र  ने करवाया था। यह सुनकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई, क्योंकि मैं जानता था कि उलुग बेग केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि एक महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और विद्वान भी थे।

इतिहास में ऐसे शासक बहुत कम हुए हैं जिन्होंने तलवार से अधिक महत्व पुस्तक को दिया हो। उलुग बेग उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे।

जैसे ही हम मदरसे के भीतर प्रवेश किए, एक विशाल चौकोर प्रांगण हमारे सामने खुल गया। चारों ओर दो मंज़िला बरामदे और उनसे जुड़े छोटे-छोटे कक्ष दिखाई दे रहे थे। मार्गदर्शक ने बताया कि इन्हीं कक्षों में विद्यार्थी रहते और अध्ययन करते थे।

मैं कुछ देर तक उन कमरों को देखता रहा। वे साधारण थे, परन्तु उनके भीतर इतिहास की असाधारण स्मृतियाँ बसती थीं।

मेरे मन में तुरंत भारत के प्राचीन शिक्षा केंद्रों की छवि उभर आई। मुझे नालंदा और तक्षशिला की याद आने लगी। मैंने सोचा कि सदियों पहले भारत में भी विद्यार्थी अपने घरों से दूर ज्ञान की खोज में निकलते थे और ऐसे ही छात्रावासों में रहकर अध्ययन करते थे। यहाँ समरकंद में खड़ा होकर मुझे लगा कि ज्ञान की परम्परा की कोई सीमा नहीं होती। वह देशों, भाषाओं और धर्मों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानवता की धरोहर बन जाती है।

प्रांगण के बीच खड़े होकर मैंने कल्पना की कि लगभग पाँच सौ वर्ष पहले यहाँ कैसा वातावरण रहा होगा। सुबह विद्यार्थी अपने कक्षों से निकलते होंगे। कोई गणित पढ़ रहा होगा, कोई दर्शनशास्त्र, कोई खगोल विज्ञान और कोई धर्मशास्त्र। कहीं शिक्षक अपने शिष्यों को व्याख्यान दे रहे होंगे और कहीं विद्यार्थियों के बीच वाद-विवाद चल रहा होगा।

अचानक मुझे लगा कि मैं केवल एक इमारत नहीं देख रहा, बल्कि एक जीवित विश्वविद्यालय के अवशेषों के बीच खड़ा हूँ।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि उलुग बेग स्वयं विद्वानों के बीच बैठकर चर्चा किया करते थे। वे केवल शासन तक सीमित नहीं थे। उन्हें तारों और ग्रहों की गति में विशेष रुचि थी। उनके संरक्षण में समरकंद उस समय विश्व के प्रमुख ज्ञान केंद्रों में गिना जाने लगा था।

यह सुनकर मेरे मन में उनके प्रति गहरा सम्मान उत्पन्न हुआ। इतिहास में विजेताओं और योद्धाओं का नाम तो बहुत मिलता है, परन्तु ज्ञान को अपना जीवन समर्पित करने वाले शासक बहुत कम मिलते हैं।

मदरसे की दीवारों पर बनी हुई अलंकरण कला भी अद्भुत थी। उनमें केवल सजावट नहीं थी, बल्कि गणितीय संतुलन और वैज्ञानिक दृष्टि भी दिखाई देती थी। प्रत्येक आकृति मानो यह बता रही थी कि सौंदर्य और ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

मैंने अपने साथियों से कहा कि यह स्थान मुझे किसी धार्मिक भवन से अधिक एक ज्ञान-मंदिर जैसा प्रतीत हो रहा है। भारत में हम सरस्वती को विद्या की देवी मानते हैं और ज्ञान को पूजा के समान सम्मान देते हैं। उसी प्रकार यहाँ भी शिक्षा को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया था।

कुछ देर बाद मैं एक पुराने कक्ष के सामने रुक गया। वह कमरा अब खाली था, परन्तु मेरी कल्पना में वह विद्यार्थियों से भरा हुआ था। मुझे लगा जैसे कोई छात्र अपनी पुस्तक खोलकर बैठा है, कोई शिक्षक प्रश्न पूछ रहा है और कोई युवा विद्वान संसार के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा है।

एक भारतीय विद्यार्थी के रूप में उस स्थान पर खड़े होकर मुझे एक विशेष आत्मीयता का अनुभव हुआ। मुझे लगा कि ज्ञान की यह परम्परा केवल समरकंद की नहीं है, यह सम्पूर्ण एशिया की साझा विरासत है। भारत, उज़्बेकिस्तान, ईरान, चीन और अरब जगत—सभी ने मिलकर इस ज्ञान-संस्कृति को विकसित किया है।

जब हम मदरसे से बाहर निकलने लगे तो मैंने एक बार पीछे मुड़कर उसे देखा। उसकी दीवारें मौन थीं, परन्तु उनका मौन भी बहुत कुछ कह रहा था। वे मानो हमें याद दिला रही थीं कि साम्राज्य बनते और मिटते रहते हैं, राजाओं के नाम इतिहास की धूल में खो जाते हैं, परन्तु ज्ञान की ज्योति कभी नहीं बुझती।

उस दिन मुझे अनुभव हुआ कि किसी नगर की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेनाएँ या उसके महल नहीं होते, बल्कि उसके विद्यालय, उसके शिक्षक और उसके विद्यार्थी होते हैं।

उलुग बेग मदरसे के प्रांगण में खड़े होकर मुझे अपने विद्यार्थी जीवन पर गर्व हुआ। मैं भारत से आया हुआ एक युवा छात्र था और मेरे सामने एक ऐसा ज्ञान-मंदिर खड़ा था जिसने सदियों पहले शिक्षा और विज्ञान को अपना सर्वोच्च आदर्श बनाया था।

समरकंद की यात्रा के अनेक दृश्य समय के साथ धुंधले पड़ सकते हैं, परन्तु उलुग बेग मदरसे के उस शांत प्रांगण में बिताए हुए वे क्षण आज भी मेरी स्मृतियों में उतने ही जीवंत हैं। वहाँ मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ था कि ज्ञान वास्तव में मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विरासत है।यह अध्याय आगे चलकर "उलुग बेग की वेधशाला : जब समरकंद ने तारों को मापा" से बहुत सुंदर ढंग से जुड़ सकता है, क्योंकि मदरसे के बाद उलुग बेग के वैज्ञानिक योगदान का वर्णन आपके संस्मरण को केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि इतिहास, विज्ञान और संस्कृति के संगम में बदल देगा।
[6/1, 7:31 PM] Ram Mohan Rai: उलुग बेग की वेधशाला : जब समरकंद ने तारों को मापा

उलुग बेग मदरसे के भ्रमण के बाद हमारे मन में उस महान शासक और विद्वान के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न हो चुकी थी। हमने उसकी बनाई हुई शिक्षा संस्था को देखा था, उसके ज्ञान-प्रेम के बारे में सुना था, परन्तु अभी उसके व्यक्तित्व का सबसे अद्भुत पक्ष हमारे सामने आना बाकी था।

हमारी अगली यात्रा थी—।

बस समरकंद नगर से कुछ दूरी पर स्थित उस ऐतिहासिक स्थान की ओर बढ़ रही थी। रास्ते भर मैं सोचता रहा कि लगभग छह सौ वर्ष पहले, जब यूरोप का अधिकांश भाग अभी मध्यकालीन सीमाओं में बंधा हुआ था, तब समरकंद में एक ऐसा व्यक्ति था जो आकाश के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा था।

वेधशाला के निकट पहुँचते ही सबसे पहले मुझे आश्चर्य हुआ कि यह स्थान किसी राजमहल की तरह भव्य नहीं था। यहाँ वैभव की नहीं, ज्ञान की प्रतिष्ठा थी। यह स्थान उस व्यक्ति की सोच का परिचायक था, जिसने सत्ता की शक्ति को विज्ञान और शिक्षा की सेवा में लगाया।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित यह वेधशाला उस समय संसार की सबसे उन्नत खगोलीय वेधशालाओं में से एक थी। उस युग में न दूरबीनें थीं, न आधुनिक कंप्यूटर और न ही आज जैसे वैज्ञानिक उपकरण। फिर भी यहाँ ऐसे अवलोकन किए गए जिन्होंने खगोल विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

मैंने मन ही मन सोचा कि यह कितना अद्भुत है कि जिस समय दुनिया के अनेक शासक युद्धों में व्यस्त थे, उसी समय समरकंद का शासक सितारों की गति को समझने में लगा हुआ था।

वेधशाला के अवशेषों को देखते हुए हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि इसका सबसे महत्वपूर्ण भाग एक विशाल खगोलीय यंत्र था, जिसकी सहायता से ग्रहों और तारों की स्थिति का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन किया जाता था।

आज उसके केवल कुछ हिस्से ही शेष हैं, परन्तु उन्हें देखकर भी उसकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है।

मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा था कि आखिर उस समय के वैज्ञानिकों ने इतनी सटीक गणनाएँ कैसे की होंगी?

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि उलुग बेग और उनके सहयोगियों ने वर्षों तक निरंतर आकाश का अवलोकन किया। उन्होंने तारों की स्थिति का ऐसा विस्तृत अभिलेख तैयार किया जो अपने समय में अद्वितीय माना जाता था। उनकी प्रसिद्ध कृति ज़ीज़-ए-सुल्तानी में सैकड़ों तारों का विवरण और उनकी स्थिति दर्ज की गई थी।

यह सुनकर मैं विस्मित रह गया।

आज जब हम एक बटन दबाकर तारों की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं, तब शायद हमें यह एहसास नहीं होता कि सदियों पहले यह कार्य कितनी कठिन साधना का परिणाम रहा होगा।

वेधशाला के परिसर में खड़े होकर मैंने ऊपर आकाश की ओर देखा। दिन का समय था, इसलिए तारे दिखाई नहीं दे रहे थे। परन्तु मेरी कल्पना में पंद्रहवीं शताब्दी का समरकंद जीवित हो उठा।

मुझे लगा जैसे रात्रि का समय है। विद्वानों का एक समूह आकाश का निरीक्षण कर रहा है। कोई गणना कर रहा है, कोई अभिलेख तैयार कर रहा है और स्वयं उलुग बेग तारों की गति पर चर्चा कर रहे हैं।

इतिहास की यही विशेषता है। कभी-कभी किसी स्थान पर खड़े होकर हम केवल पत्थर नहीं देखते, बल्कि उन लोगों के स्वप्न भी देख पाते हैं जिन्होंने उन्हें बनाया था।

एक भारतीय विद्यार्थी के रूप में वहाँ खड़े होकर मुझे अपने देश की वैज्ञानिक परम्पराएँ भी याद आने लगीं। मुझे ,  और  जैसे महान विद्वानों की स्मृति हो आई। भारत और मध्य एशिया दोनों ही क्षेत्रों में आकाश के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा प्राचीन काल से रही है।

मुझे लगा जैसे समरकंद और भारत के बीच केवल व्यापार और संस्कृति का ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का भी एक अदृश्य सेतु रहा है।

उलुग बेग की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने विज्ञान को राजसत्ता का सहयोग दिया। वे केवल विद्वानों के संरक्षक नहीं थे, बल्कि स्वयं भी अध्ययन और अनुसंधान में सक्रिय रहते थे। इसीलिए उनका नाम केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि विज्ञान के इतिहास में भी आदर के साथ लिया जाता है।

हमारे मार्गदर्शक ने एक बात और बताई जिसने मुझे गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि उलुग बेग की मृत्यु के बाद यह वेधशाला नष्ट कर दी गई थी और धीरे-धीरे मिट्टी के नीचे दब गई। सदियों बाद पुरातत्वविदों ने इसके अवशेषों को खोज निकाला।

यह सुनकर मेरे मन में एक गहरी भावना उत्पन्न हुई।

मैंने सोचा, इमारतें नष्ट हो सकती हैं, पुस्तकें खो सकती हैं, साम्राज्य समाप्त हो सकते हैं, परन्तु ज्ञान का प्रकाश कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह किसी न किसी रूप में भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँच ही जाता है।

वेधशाला से लौटते समय मैं बार-बार पीछे मुड़कर उसे देखता रहा। मेरे लिए वह केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं था। वह मानव जिज्ञासा का स्मारक था। वह इस बात का प्रमाण था कि मनुष्य ने सदियों से पृथ्वी की सीमाओं से आगे बढ़कर आकाश को समझने का प्रयास किया है।

समरकंद की यात्रा के अनेक दृश्य मेरी स्मृतियों में अंकित हैं, परन्तु उलुग बेग की वेधशाला का अनुभव उनमें विशेष स्थान रखता है। वहाँ मैंने पहली बार अनुभव किया कि सभ्यता की वास्तविक महानता उसकी इमारतों की ऊँचाई में नहीं, बल्कि उसके विचारों की ऊँचाई में होती है।

और समरकंद की धरती पर खड़ी वह वेधशाला आज भी संसार को यही संदेश देती है—कि ज्ञान की खोज ही मानवता की सबसे महान यात्रा है। गुर-ए-अमीर : तैमूर की समाधि पर एक भारतीय की अनुभूति

उलुग बेग की वेधशाला से लौटते समय मेरे मन में ज्ञान, विज्ञान और मानव जिज्ञासा के अनेक विचार उमड़ रहे थे। समरकंद का वह रूप मेरे सामने था जो शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक उत्कर्ष का प्रतीक था। परन्तु समरकंद की कहानी केवल विद्वानों और वैज्ञानिकों की कहानी नहीं है। यह उन शासकों की भी कहानी है जिन्होंने इस नगर को विश्व इतिहास के मानचित्र पर स्थापित किया।


इन्हीं विचारों के बीच हम समरकंद के एक और महत्वपूर्ण स्थल की ओर बढ़ रहे थे—।

यह वही स्थान है जहाँ महान विजेता और तैमूरी साम्राज्य के संस्थापक  की समाधि स्थित है।

भारत में पले-बढ़े व्यक्ति के लिए तैमूर का नाम सुनते ही अनेक भाव एक साथ मन में उठते हैं। इतिहास की पुस्तकों में हमने उसे एक महान सेनापति, कुशल रणनीतिकार और विशाल साम्राज्य के निर्माता के रूप में पढ़ा है। वहीं भारतीय इतिहास के पन्नों में उसका नाम 1398 में दिल्ली पर किए गए आक्रमण और उससे जुड़ी त्रासद घटनाओं के कारण भी स्मरण किया जाता है।

इसीलिए जब मैं उसकी समाधि की ओर जा रहा था, तो मेरे मन में केवल श्रद्धा या केवल आलोचना का भाव नहीं था। मैं इतिहास को उसकी सम्पूर्ण जटिलता में समझना चाहता था।

जैसे ही हम गुर-ए-अमीर के निकट पहुँचे, सबसे पहले उसकी स्थापत्य भव्यता ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। दूर से दिखाई देता उसका विशाल नीला गुंबद मानो समरकंद के आकाश से संवाद कर रहा था। सूर्य की किरणें उस पर पड़कर उसे और भी आकर्षक बना रही थीं।

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पहली दृष्टि में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह किसी साधारण व्यक्ति की समाधि नहीं है।

प्रवेश द्वार से भीतर जाते हुए मैंने दीवारों और मेहराबों पर की गई बारीक कारीगरी को देखा। नीले, फिरोज़ी और सुनहरे रंगों का ऐसा सुंदर संयोजन मैंने पहले बहुत कम देखा था। उज़्बेक स्थापत्य कला अपने उत्कर्ष पर दिखाई दे रही थी।

परन्तु जैसे-जैसे मैं भीतर बढ़ता गया, मेरे मन में एक अलग प्रकार की शांति उतरने लगी।

मकबरे के मुख्य कक्ष में प्रवेश करते ही वातावरण बदल जाता है। बाहर की चहल-पहल पीछे छूट जाती है और भीतर एक गंभीर मौन आपका स्वागत करता है। ऊँची छत, सुनहरी सजावट, कलात्मक नक्काशी और प्रकाश की मद्धिम आभा मिलकर ऐसा वातावरण बनाती हैं जो किसी भी आगंतुक को कुछ क्षणों के लिए निःशब्द कर देता है।

कक्ष के मध्य स्थित समाधियों की ओर मेरी दृष्टि गई।

वहीं तैमूर की प्रसिद्ध समाधि भी स्थित है।

मैं कुछ देर तक मौन खड़ा रहा।

मेरे सामने वह व्यक्ति था जिसने एशिया और यूरोप के विशाल भूभाग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया था। जिसने अनगिनत युद्ध लड़े, नगरों को जीता और इतिहास की दिशा बदल दी। कभी जिसकी सेनाओं के नाम से दूर-दूर तक भय उत्पन्न होता था, आज वह स्वयं एक शांत समाधि में विश्राम कर रहा था।

उस क्षण मुझे इतिहास का एक गहरा सत्य समझ में आया।

सत्ता, विजय और साम्राज्य चाहे कितने ही विशाल क्यों न हों, अंततः वे भी समय के प्रवाह में स्मृति बन जाते हैं।

मैंने मन ही मन दिल्ली की याद की। भारत का इतिहास तैमूर को केवल एक विजेता के रूप में नहीं देखता। उसकी स्मृति हमारे यहाँ पीड़ा और विनाश की घटनाओं से भी जुड़ी हुई है। इसलिए एक भारतीय के रूप में मेरे मन में स्वाभाविक रूप से मिश्रित भाव थे।

परन्तु उसी समय मुझे यह भी लगा कि इतिहास को केवल भावनाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। हमें उसे उसके समय और परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखना चाहिए।

तैमूर की समाधि के सामने खड़े होकर मैं किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि इतिहास के एक युग का सामना कर रहा था।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि मूलतः यह मकबरा तैमूर के प्रिय पौत्र के लिए बनवाया गया था, परन्तु बाद में स्वयं तैमूर को भी यहीं दफनाया गया। उनके अतिरिक्त तैमूरी वंश के अन्य महत्वपूर्ण सदस्यों की कब्रें भी इसी परिसर में स्थित हैं।

जब मैंने यह सुना तो मुझे लगा कि यह केवल एक समाधि नहीं, बल्कि एक पूरे वंश और एक पूरे युग की स्मृति है।

मुझे विशेष रूप से यह तथ्य प्रभावित कर रहा था कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का अधिकांश समय युद्धों और विजयों में बिताया, उसकी अंतिम विश्रामस्थली इतनी शांत और सुंदर है।

कक्ष के भीतर खड़े-खड़े मैंने ऊपर गुंबद की ओर देखा। वहाँ की कला और स्थापत्य मानो यह संदेश दे रहे थे कि मनुष्य केवल विनाश का नहीं, सृजन का भी पात्र है।

समरकंद की यही विशेषता है। यहाँ तैमूर की शक्ति भी है, उलुग बेग का ज्ञान भी है और मध्य एशिया की सांस्कृतिक आत्मा भी।

गुर-ए-अमीर से बाहर निकलते समय मैंने एक बार पीछे मुड़कर उस गुंबद को देखा। मन में एक विचित्र भावना थी। इतिहास के प्रति सम्मान, उसके जटिल पक्षों को समझने की इच्छा और मानव जीवन की क्षणभंगुरता का बोध—ये सभी भाव एक साथ उपस्थित थे।

उस दिन मैंने अनुभव किया कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है। वह हमें वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए सीख लेने का अवसर भी देता है।

गुर-ए-अमीर की यात्रा मेरे लिए किसी विजेता की समाधि देखने भर की यात्रा नहीं थी। वह सत्ता और समय के संबंध को समझने की यात्रा थी।

समरकंद की धरती पर खड़ा एक भारतीय विद्यार्थी उस दिन यह सोच रहा था कि चाहे साम्राज्य कितने भी बड़े क्यों न हों, अंततः मनुष्य को अमर बनाती हैं उसकी इमारतें, उसके विचार, उसकी संस्कृति और उसकी स्मृतियाँ।

और शायद इसी कारण तैमूर आज भी जीवित है—अपने साम्राज्य में नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों और समरकंद के इस भव्य स्मारक में।


 शाह-ए-ज़िंदा : आस्था, कला और इतिहास का संगम-36

समरकंद की यात्रा के दौरान हमने ज्ञान का प्रतीक उलुग बेग मदरसा देखा था, विज्ञान का गौरव उसकी वेधशाला में अनुभव किया था और गुर-ए-अमीर में इतिहास की शक्ति और उसकी क्षणभंगुरता का बोध किया था। परन्तु अभी समरकंद का एक ऐसा रूप देखना शेष था, जहाँ आस्था, कला और इतिहास एक-दूसरे में इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग करना कठिन हो जाता है।

हम उस दिन समरकंद के सबसे पवित्र और भावनात्मक स्थलों में से एक,  की ओर जा रहे थे।

हमारी बस ऐतिहासिक क्षेत्र के निकट पहुँची और फिर कुछ दूरी हमें पैदल चलना पड़ा। दूर से ही नीले और फिरोज़ी रंगों से सजे हुए गुंबद और मीनारें दिखाई देने लगीं। पहली दृष्टि में ही यह स्थान किसी स्थापत्य संग्रहालय जैसा प्रतीत होता था, परन्तु जैसे-जैसे हम निकट पहुँचते गए, हमें एहसास होने लगा कि यह केवल स्थापत्य का चमत्कार नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था का केंद्र भी है।

प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही मैंने देखा कि स्थानीय लोग अत्यंत श्रद्धा के साथ भीतर जा रहे थे। कुछ लोग प्रार्थना कर रहे थे, कुछ अपने परिवारों के साथ आए थे और कुछ चुपचाप इस पवित्र वातावरण को आत्मसात कर रहे थे। यह दृश्य मुझे भारत के अनेक तीर्थस्थलों की याद दिला रहा था, जहाँ आस्था और संस्कृति एक-दूसरे का हाथ थामे चलती हैं।

हम धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर बढ़ने लगे। शाह-ए-ज़िंदा का पूरा परिसर एक लंबी गलियारेनुमा संरचना में विकसित हुआ है। दोनों ओर मकबरे, स्मारक और धार्मिक इमारतें स्थित हैं। प्रत्येक भवन अपने आप में कला का एक अनुपम उदाहरण है।

जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रहा था, मेरी दृष्टि बार-बार दीवारों पर बनी हुई रंगीन टाइलों पर टिक जाती थी। नीला, फिरोज़ी, सफेद और सुनहरा रंग इस प्रकार संयोजित थे कि लगता था मानो किसी चित्रकार ने पत्थरों पर कविता लिख दी हो।

आज भी मुझे याद है कि उस दिन मैंने अपने साथियों से कहा था कि यदि समरकंद को "नीले गुंबदों का शहर" कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हमारे मार्गदर्शक ने बताया कि शाह-ए-ज़िंदा का अर्थ है—"जीवित राजा"। यह नाम एक प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यहाँ  की समाधि स्थित है, जिन्हें पैग़म्बर मुहम्मद के निकट संबंधियों में माना जाता है। स्थानीय लोकविश्वास के अनुसार वे आध्यात्मिक रूप से आज भी जीवित हैं, इसी कारण इस परिसर को शाह-ए-ज़िंदा कहा जाता है।

एक भारतीय के रूप में मुझे यह कथा सुनकर अपने देश की संत-परंपराओं की याद आ गई। भारत में भी अनेक संतों और सूफियों के बारे में ऐसी मान्यताएँ मिलती हैं कि वे शरीर से भले चले गए हों, परन्तु उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति आज भी लोगों का मार्गदर्शन करती है।

परिसर में चलते हुए मुझे बार-बार ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि इतिहास और आस्था के जीवित संगम में उपस्थित हूँ।

यहाँ केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, बल्कि तैमूरी युग की कला और स्थापत्य का उत्कर्ष भी दिखाई देता है। अनेक मकबरे तैमूर के परिवार के सदस्यों, राजकुमारों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हैं। प्रत्येक मकबरे की बनावट अलग है, परन्तु सभी में सौंदर्य और संतुलन का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।

मुझे विशेष रूप से यह बात प्रभावित कर रही थी कि यहाँ कला का उद्देश्य केवल सौंदर्य प्रदर्शन नहीं था। प्रत्येक आकृति, प्रत्येक अलंकरण और प्रत्येक रंग किसी न किसी आध्यात्मिक भावना को व्यक्त करता प्रतीत होता था।

सीढ़ियों के एक मोड़ पर खड़े होकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। दूर तक फैला समरकंद दिखाई दे रहा था। हवा में एक अनोखी शांति थी। नीचे नगर का जीवन अपनी गति से चल रहा था और ऊपर इस परिसर में समय जैसे ठहर गया था।

उस क्षण मुझे अपने देश के अजमेर शरीफ, निजामुद्दीन औलिया और अन्य सूफी दरगाहों की याद आने लगी। वहाँ भी मैंने यही अनुभव किया था कि आस्था लोगों को जोड़ती है, उनके भीतर आशा जगाती है और उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।

शाह-ए-ज़िंदा में मुझे मध्य एशिया और भारत के बीच एक और सांस्कृतिक सेतु दिखाई दिया। सूफी परंपरा ने सदियों तक इन दोनों क्षेत्रों को जोड़ने का कार्य किया है। विचारों, संगीत, कविता और आध्यात्मिकता की अनेक धाराएँ इसी मार्ग से भारत तक पहुँची थीं।

हम लगभग दो घंटे तक इस परिसर में घूमते रहे। जितना अधिक देखते, उतना ही अधिक आश्चर्य होता। प्रत्येक मकबरा एक नई कहानी कहता था। प्रत्येक दीवार एक नए कलाकार की प्रतिभा का परिचय देती थी।

जब लौटने का समय आया तो मेरे मन में एक अजीब-सी तृप्ति थी। समरकंद के अन्य स्मारकों ने मुझे इतिहास और ज्ञान की शक्ति का अनुभव कराया था, परन्तु शाह-ए-ज़िंदा ने मेरे मन को छुआ था।

यह केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं था। यह वह स्थान था जहाँ मनुष्य की आस्था, कलाकार की कल्पना और इतिहास की स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित थीं।

आज भी जब मैं समरकंद को याद करता हूँ तो रेगिस्तान चौक की भव्यता, गुर-ए-अमीर की गंभीरता और उलुग बेग की वेधशाला का वैज्ञानिक वैभव अपनी जगह हैं, परन्तु शाह-ए-ज़िंदा की शांत और आध्यात्मिक छवि मन में एक अलग ही स्थान रखती है।

समरकंद ने मुझे बहुत कुछ दिखाया, परन्तु शाह-ए-ज़िंदा ने मुझे यह सिखाया कि सभ्यताओं की सबसे सुंदर विरासत केवल उनके स्मारक नहीं होते, बल्कि वे भावनाएँ होती हैं जिन्हें वे सदियों तक जीवित रखती हैं।

समरकंद का बाज़ार, उज़्बेक परिवारों से मुलाकात और भारतीयों के प्रति उनका स्नेह --37

इतिहास के भव्य स्मारकों, नीले गुंबदों और प्राचीन इमारतों को देखने के बाद मेरे मन में एक इच्छा बार-बार उठ रही थी। मैं केवल समरकंद के अतीत को ही नहीं, उसके वर्तमान को भी देखना चाहता था। किसी नगर को वास्तव में समझना हो तो उसके बाज़ारों में जाइए, उसके लोगों से मिलिए और उनके दैनिक जीवन को देखिए। स्मारक हमें इतिहास बताते हैं, परन्तु लोग हमें उस समाज की आत्मा से परिचित कराते हैं।

समरकंद प्रवास के दौरान एक दिन हमें नगर के मुख्य बाज़ारों और स्थानीय क्षेत्रों में घूमने का अवसर मिला। मेरे लिए यह अनुभव रेगिस्तान चौक या गुर-ए-अमीर से कम महत्वपूर्ण नहीं था।

सुबह हम कुछ छात्र अपने मार्गदर्शक के साथ समरकंद के एक बड़े बाज़ार की ओर निकले। जैसे-जैसे हम बाज़ार के निकट पहुँचते गए, वातावरण में चहल-पहल बढ़ती गई। दूर से ही लोगों की बातचीत, दुकानदारों की आवाज़ें और खरीदारी की हलचल सुनाई देने लगी।

बाज़ार में प्रवेश करते ही मुझे अपने देश की याद आ गई।

फल, सब्जियाँ, सूखे मेवे, मसाले, रोटियाँ, कपड़े और दैनिक उपयोग की वस्तुओं से सजी दुकानें देखकर ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी भारतीय मंडी में घूम रहा हूँ। अंतर केवल भाषा का था, जीवन की धड़कन तो लगभग एक जैसी थी।

विशेष रूप से फलों और सूखे मेवों की भरमार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। अंगूर, खूबानी, आड़ू, अनार, खरबूजे और तरबूज की इतनी किस्में मैंने पहले बहुत कम देखी थीं। दुकानों पर बादाम, अखरोट, किशमिश और पिस्ते के ढेर लगे हुए थे। विक्रेता मुस्कुराकर ग्राहकों को स्वाद चखाते थे और उनकी आत्मीयता किसी भारतीय दुकानदार से कम नहीं थी।

मुझे अपने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाट-बाज़ार याद आने लगे। वहाँ भी किसान अपनी उपज लेकर आते हैं, लोग बातचीत करते हुए खरीदारी करते हैं और बाज़ार केवल व्यापार का नहीं, सामाजिक मेल-जोल का भी केंद्र होता है।

समरकंद के बाज़ार में घूमते हुए एक बात विशेष रूप से ध्यान खींच रही थी। जैसे ही लोगों को पता चलता कि हम भारत से आए हैं, उनके चेहरे खिल उठते थे।

कई लोग मुस्कुराकर "हिंदुस्तान" कहते और हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ आते।

उस समय सोवियत संघ में भारतीय फ़िल्में अत्यंत लोकप्रिय थीं। विशेष रूप से  का नाम लगभग हर व्यक्ति जानता था। अनेक लोगों ने हमसे मिलते ही "आवारा", "श्री 420" और "मेरा जूता है जापानी" का उल्लेख किया। कुछ लोगों ने तो फ़िल्मों के गीतों की पंक्तियाँ भी गुनगुनाईं।

हमारे लिए यह अत्यंत सुखद अनुभव था। हजारों किलोमीटर दूर एक विदेशी देश में लोग भारत को इतनी आत्मीयता से याद करते हैं, यह देखकर मन गर्व से भर उठता था।

बाज़ार में ही हमारी मुलाकात एक उज़्बेक परिवार से हुई। वे अपने बच्चों के साथ खरीदारी करने आए थे। बातचीत का सिलसिला आरम्भ हुआ तो उन्होंने बड़े स्नेह से हमारे बारे में पूछा—हम कहाँ से आए हैं, क्या पढ़ते हैं और उज़्बेकिस्तान कैसा लग रहा है।

जब हमने बताया कि हम भारत से हैं तो उनके चेहरे पर विशेष प्रसन्नता दिखाई दी।

परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य ने कहा कि भारत और उज़्बेकिस्तान का संबंध बहुत पुराना है। उन्होंने भारत के बारे में बड़ी आत्मीयता से बातें कीं। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वे भारतीय संस्कृति के बारे में काफी जानकारी रखते थे।

कुछ ही देर में बातचीत इतनी सहज हो गई जैसे हम वर्षों से एक-दूसरे को जानते हों।

उन्होंने हमें अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया। यद्यपि कार्यक्रम की सीमाओं के कारण हम उनके घर नहीं जा सके, परन्तु उनका वह स्नेह आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित है।

समरकंद में मैंने एक बात बार-बार अनुभव की कि उज़्बेक समाज में अतिथि को अत्यंत सम्मान दिया जाता है। यह परंपरा भारतीय संस्कृति से बहुत मिलती-जुलती है। हमारे यहाँ कहा जाता है—"अतिथि देवो भवः।" उज़्बेक समाज में भी अतिथि को परिवार का सदस्य समझा जाता है।

यही कारण था कि हमें कहीं भी परायेपन का अनुभव नहीं हुआ।

एक अन्य रोचक अनुभव स्थानीय रोटियों को देखकर हुआ। वहाँ की गोल, सुंदर और कलात्मक रोटियाँ मुझे बहुत आकर्षित करती थीं। उनकी बनावट कुछ-कुछ हमारे तंदूरी नान और देसी रोटियों की याद दिलाती थी। भोजन की अनेक वस्तुओं में भी भारतीय खान-पान से समानता दिखाई देती थी।

समरकंद के लोगों के चेहरे, उनका रहन-सहन, उनका पारिवारिक जीवन और उनका व्यवहार मुझे बार-बार यह अनुभव करा रहा था कि भारत और मध्य एशिया के बीच केवल भौगोलिक संबंध नहीं रहे हैं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक और मानवीय संबंध भी हैं।

उस दिन बाज़ार से लौटते समय मेरे बैग में कुछ स्मृति-चिह्न अवश्य थे, परन्तु उससे कहीं अधिक मूल्यवान स्मृतियाँ मेरे मन में थीं।

रेगिस्तान चौक ने मुझे समरकंद का वैभव दिखाया था।

उलुग बेग की वेधशाला ने उसका ज्ञान दिखाया था।

शाह-ए-ज़िंदा ने उसकी आध्यात्मिकता का परिचय कराया था।

परन्तु समरकंद के बाज़ार और उसके लोगों ने मुझे उसका हृदय दिखाया था।

आज भी जब मैं समरकंद को याद करता हूँ तो केवल उसके गुंबद और स्मारक ही नहीं याद आते। मुझे उन बाज़ारों की चहल-पहल याद आती है, उन मुस्कुराते चेहरों की छवि याद आती है और वह आत्मीय स्वर याद आता है जिसमें लोग "हिंदुस्तान" कहकर हमारा स्वागत करते थे।

यही वे क्षण थे जिन्होंने मुझे यह अनुभव कराया कि देशों के बीच वास्तविक मित्रता केवल समझौतों से नहीं बनती; वह लोगों के दिलों में बसती है।

और समरकंद के लोगों के दिलों में भारत के लिए जो स्नेह मैंने देखा, वह मेरी इस यात्रा की सबसे अमूल्य स्मृतियों में से एक है। समरकंद ने आपको तैमूर, उलुग बेग, रेगिस्तान और शाह-ए-ज़िंदा का वैभव दिखाया; अब बुखारा आपको मध्य एशिया की आत्मा, सूफी परंपरा, व्यापारिक संस्कृति और लोकजीवन से परिचित कराएगा।

समरकंद से बुखारा : एक नए इतिहास की ओर-38

समरकंद में बिताए गए तीन दिन कब बीत गए, इसका हमें पता ही नहीं चला। ऐसा लगता था मानो हम किसी ऐतिहासिक उपन्यास के पात्र बन गए हों और उसके पन्नों के बीच घूम रहे हों। रेगिस्तान चौक की भव्यता, उलुग बेग की वेधशाला का वैज्ञानिक वैभव, गुर-ए-अमीर की गंभीरता और शाह-ए-ज़िंदा की आध्यात्मिक शांति अभी भी हमारे मन में ताज़ा थी।

परन्तु हमारी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

आज हमें समरकंद से बुखारा के लिए प्रस्थान करना था।

सुबह-सुबह ही हम अपने कमरों से बाहर निकल आए। होटल के प्रांगण में हलचल शुरू हो चुकी थी। कुछ साथी अपने कैमरों की जाँच कर रहे थे, कुछ अपने सामान को व्यवस्थित कर रहे थे और कुछ अंतिम बार समरकंद की सड़कों को निहार रहे थे।

मैं भी होटल के बाहर खड़ा होकर इस ऐतिहासिक नगर को विदा की दृष्टि से देख रहा था।

मन में एक अजीब-सी भावना थी।

समरकंद से मेरा परिचय कुछ ही दिनों का था, परन्तु ऐसा लगता था जैसे वर्षों का संबंध हो। यहाँ की इमारतें, यहाँ के लोग और यहाँ का वातावरण मेरे मन का हिस्सा बन चुके थे।

नाश्ते के बाद हमारी बस बुखारा के लिए रवाना हुई।

हमारे उज़्बेक गाइड, जिनका इतिहास का ज्ञान अत्यंत समृद्ध था, बस में आते ही मुस्कुराए और बोले—

"आपने समरकंद देखा है, जो तैमूर की राजधानी था। अब आप बुखारा देखने जा रहे हैं, जो मध्य एशिया की आत्मा है।"

उनके इन शब्दों ने हम सबकी उत्सुकता और बढ़ा दी।

बस समरकंद से पश्चिम की ओर चल पड़ी।

खिड़की से बाहर देखते हुए मैं उज़्बेकिस्तान के ग्रामीण जीवन को फिर से निहारने लगा। दूर-दूर तक फैले कपास के खेत, गेहूँ की फसलें, छोटे-छोटे गाँव और कभी-कभी दिखाई देने वाले चरवाहे—ये सभी दृश्य मुझे अपने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की याद दिला रहे थे।

रास्ते में गाइड हमें बुखारा का इतिहास सुनाते जा रहे थे।

उन्होंने बताया कि यदि समरकंद मध्य एशिया का मुकुट है, तो बुखारा उसकी आत्मा है।

समरकंद जहाँ साम्राज्यों और राजाओं की राजधानी रहा, वहीं बुखारा सदियों तक विद्वानों, सूफी संतों, व्यापारियों और कारीगरों का नगर रहा।

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब इस्लामी जगत में यह कहावत प्रसिद्ध थी कि "यदि ज्ञान की तलाश है तो बुखारा जाओ।"

यह सुनकर मुझे भारत के नालंदा और तक्षशिला की याद आ गई।

गाइड ने आगे बताया कि बुखारा केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं था। यह रेशम मार्ग का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी था। चीन, भारत, ईरान, अरब और रूस से आने वाले व्यापारी यहाँ एकत्रित होते थे।

यहीं पर वस्तुओं का ही नहीं, विचारों का भी आदान-प्रदान होता था।

हमारे एक साथी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "क्या यही वह बुखारा है जिसके बारे में भारत में कहावत है—'जो सुख बल्ख न बुखारे...'?"

गाइड हँस पड़े।

उन्होंने कहा, "हाँ, वही बुखारा।"

बस में ठहाका गूँज उठा।

मुझे लगा कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संबंध कितने गहरे रहे होंगे कि एक नगर का नाम भारतीय लोककथाओं और कहावतों तक में पहुँच गया।

यात्रा के दौरान हमारे गाइड ने हमें एक और रोचक बात बताई।

उन्होंने कहा कि बुखारा केवल व्यापार और शिक्षा का नगर नहीं है, बल्कि यह  की भूमि भी माना जाता है।

यह सुनते ही बस में फिर उत्साह फैल गया।

भारत में भी मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनकी हाजिरजवाबी और बुद्धिमत्ता की कहानियाँ हम बचपन से सुनते आए थे।

अब हम उस धरती की ओर जा रहे थे जहाँ उन कथाओं की स्मृतियाँ आज भी जीवित थीं।

बस आगे बढ़ती जा रही थी और मेरे मन में बुखारा की छवि बनती जा रही थी।

मैं सोच रहा था—

क्या बुखारा वास्तव में वैसा ही होगा जैसा मैंने कल्पना की है?

क्या वहाँ की गलियों में अभी भी पुराने कारवाँसरायों की स्मृतियाँ जीवित होंगी?

क्या वहाँ के बाज़ारों में आज भी रेशम मार्ग की गूँज सुनाई देती होगी?

क्या वहाँ के लोग भी समरकंद के लोगों की तरह भारत के प्रति स्नेह रखते होंगे?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें कुछ ही घंटों बाद मिलने वाले थे।

बस अपनी गति से पश्चिम की ओर बढ़ रही थी और हम इतिहास के एक नए अध्याय की ओर।

समरकंद पीछे छूट रहा था।

बुखारा हमारा इंतज़ार कर रहा था।अगला अध्याय स्वाभाविक रूप से होगा — "बुखारा का प्रथम दर्शन : जब कारवाँओं का शहर हमारे सामने था", जिसमें बस से उतरते ही बुखारा की पहली झलक, उसकी पुरानी गलियाँ, मिट्टी के रंग की इमारतें और समरकंद से उसका भिन्न व्यक्तित्व वर्णित किया जा सकता है। यह समरकंद और बुखारा के बीच का सांस्कृतिक अंतर भी पाठकों को बहुत रोचक लगेगा।
[6/1, 7:48 PM] Ram Mohan Rai: बुखारा का प्रथम दर्शन : जब कारवाँओं का शहर हमारे सामने था

समरकंद से चलने के बाद कई घंटों की यात्रा के पश्चात हमारी बस धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। रास्ते भर हमारे गाइड ने बुखारा के इतिहास, उसके वैभव और उसकी सांस्कृतिक महत्ता के बारे में इतनी रोचक बातें बताई थीं कि हमारी उत्सुकता चरम पर पहुँच चुकी थी।

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं बार-बार यह कल्पना कर रहा था कि वह नगर कैसा होगा, जिसका नाम बचपन से कहावतों, लोककथाओं और इतिहास की पुस्तकों में सुनता आया हूँ।

अचानक हमारे गाइड ने मुस्कुराते हुए घोषणा की—

"दोस्तों, अब बुखारा दूर नहीं है।"

यह सुनते ही बस में बैठे सभी छात्र खिड़कियों की ओर झुक गए।

कुछ ही देर बाद दूर क्षितिज पर पुराने गुंबदों और मीनारों की धुँधली आकृतियाँ दिखाई देने लगीं। सूर्य पश्चिम की ओर झुक रहा था और उसकी सुनहरी किरणें उन इमारतों पर पड़कर उन्हें एक विशेष आभा प्रदान कर रही थीं।

मैंने मन ही मन सोचा—तो यह है बुखारा!

वह बुखारा जिसका नाम भारत के गाँवों तक में प्रसिद्ध है।

वह बुखारा जिसके बारे में कहावतें कही गईं।

वह बुखारा जहाँ कभी रेशम मार्ग के कारवाँ विश्राम करते थे।

वह बुखारा जहाँ से ज्ञान, व्यापार और संस्कृति की किरणें दूर-दूर तक फैली थीं।

जैसे-जैसे हम नगर के निकट पहुँचते गए, मुझे एक बात स्पष्ट रूप से अनुभव होने लगी। समरकंद और बुखारा दोनों ऐतिहासिक नगर अवश्य हैं, परन्तु दोनों का स्वभाव बिल्कुल अलग है।

समरकंद एक सम्राट की राजधानी जैसा लगता है—भव्य, विशाल और गौरवपूर्ण।

बुखारा पहली दृष्टि में ही एक प्राचीन विद्वान की तरह प्रतीत होता है—गंभीर, शांत और आत्ममंथन में डूबा हुआ।

नगर में प्रवेश करते ही मैंने देखा कि यहाँ का वातावरण समरकंद की अपेक्षा अधिक पारंपरिक था। गलियाँ अपेक्षाकृत संकरी थीं, भवनों का रंग मिट्टी और धूप से रचा-बसा था और सम्पूर्ण नगर में एक ऐतिहासिक निरंतरता का अनुभव होता था।

ऐसा लगता था मानो समय यहाँ धीरे-धीरे चलता हो।

बस जब पुराने शहर के निकट पहुँची तो मेरी दृष्टि बार-बार उन प्राचीन इमारतों पर ठहर जाती थी, जो सदियों से खड़ी होकर यात्रियों का स्वागत कर रही थीं।

मुझे ऐसा लग रहा था कि अभी किसी मोड़ से ऊँटों का कोई कारवाँ निकल आएगा और उसके पीछे-पीछे रेशम, मसालों और कीमती वस्तुओं से लदे व्यापारी चले आ रहे होंगे।

इतिहास यहाँ केवल पुस्तकों में नहीं था।

वह इन दीवारों में था।

वह इन गलियों में था।

वह इस हवा में था।

हमारी बस अंततः उस स्थान पर रुकी जहाँ हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी।

बस से उतरते ही सबसे पहले मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई।

समरकंद की चमक-दमक की तुलना में बुखारा का सौंदर्य अधिक संयमित था। वह पहली दृष्टि में चकाचौंध नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे अपने आकर्षण में बाँध लेता है।

उसकी मिट्टी के रंग की इमारतों, पुराने गुंबदों और शांत वातावरण में एक ऐसी आत्मीयता थी जो सीधे हृदय को स्पर्श करती थी।

मुझे अचानक अपने देश के कुछ पुराने नगरों की याद आने लगी।

जैसे राजस्थान के किसी प्राचीन नगर में प्रवेश करने पर इतिहास की उपस्थिति महसूस होती है, या जैसे पुरानी दिल्ली की गलियों में चलते हुए अतीत की झलक दिखाई देती है, वैसे ही बुखारा का वातावरण भी अपने अतीत को आज तक सँजोए हुए था।

हमारे गाइड ने हमें बताया कि जिस पुराने नगर को हम देख रहे हैं, वह सदियों तक मध्य एशिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक रहा है।

उन्होंने कहा—

"यदि समरकंद साम्राज्यों का नगर था, तो बुखारा विद्वानों, सूफियों और व्यापारियों का नगर था।"

उनके ये शब्द सुनकर मैं फिर चारों ओर देखने लगा।

वास्तव में इस नगर का व्यक्तित्व अलग था।

यहाँ शक्ति की नहीं, परम्परा की अनुभूति होती थी।

यहाँ विजय की नहीं, ज्ञान की गूँज सुनाई देती थी।

यहाँ राजमहलों से अधिक मदरसों, मस्जिदों और कारवाँसरायों की स्मृतियाँ जीवित थीं।

संध्या धीरे-धीरे गहराने लगी थी।

मीनारों के पीछे डूबता हुआ सूर्य बुखारा को एक अद्भुत रंग प्रदान कर रहा था। मिट्टी के रंग की दीवारें सुनहरी प्रतीत हो रही थीं और वातावरण में एक अलौकिक शांति व्याप्त थी।

मैं कुछ क्षणों के लिए वहीं खड़ा रहा।

मेरे मन में कोई विशेष विचार नहीं था।

मैं केवल उस वातावरण को महसूस करना चाहता था।

इतिहास को पढ़ना एक बात है।

इतिहास को देखना दूसरी बात है।

परन्तु इतिहास को महसूस करना एक बिल्कुल अलग अनुभव है।

बुखारा के प्रथम दर्शन ने मुझे यही अनुभव कराया।

उस क्षण मुझे समझ में आया कि आखिर क्यों सदियों तक यात्रियों, व्यापारियों, विद्वानों और सूफियों ने इस नगर की प्रशंसा की है।

बुखारा केवल एक शहर नहीं है।

यह मध्य एशिया की स्मृति है।

यह रेशम मार्ग की धड़कन है।

यह उन असंख्य कारवाँओं की कहानी है जिन्होंने एशिया के विभिन्न भागों को एक-दूसरे से जोड़ा।

और अब, 1980 की उस संध्या में, मैं स्वयं भी उन यात्रियों की लंबी परंपरा का एक छोटा-सा हिस्सा बन चुका था।

मेरे सामने बुखारा था—शांत, गंभीर, ऐतिहासिक और अपनी अनगिनत कहानियों के साथ हमारा स्वागत करता हुआ।ल्याबी-हौज़ की संध्या : बुखारा की आत्मा से पहली मुलाकात

बुखारा के प्रथम दर्शन ने हमारे मन पर गहरा प्रभाव डाला था। दिन भर की यात्रा के बाद भी थकान का नामोनिशान नहीं था। नए नगर को देखने की उत्सुकता इतनी प्रबल थी कि थोड़े विश्राम और चाय के बाद हम फिर बाहर निकल पड़े।

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हमारे गाइड ने मुस्कुराते हुए कहा, "यदि आप बुखारा को समझना चाहते हैं, तो सबसे पहले ल्याबी-हौज़ चलिए।"

उस समय हमें इस नाम का विशेष अर्थ ज्ञात नहीं था, परंतु कुछ ही देर बाद हमें समझ में आ गया कि बुखारा के लोग इसे अपने नगर का हृदय क्यों मानते हैं।

संध्या का समय था। सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था और उसकी सुनहरी किरणें बुखारा की पुरानी इमारतों पर पड़कर उन्हें एक अलग ही सौंदर्य प्रदान कर रही थीं। हम संकरी गलियों से होते हुए उस ऐतिहासिक चौक की ओर बढ़ रहे थे।

अचानक सामने एक विशाल जलाशय दिखाई दिया।

उसके चारों ओर पुराने वृक्ष खड़े थे, जिनकी शाखाएँ पानी में अपना प्रतिबिंब बना रही थीं। तालाब के चारों ओर ऐतिहासिक इमारतें थीं, चायखाने थे, विश्राम करते लोग थे और एक ऐसा वातावरण था जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।

यह था बुखारा का प्रसिद्ध ।

गाइड ने बताया कि "ल्याबी" का अर्थ है "किनारा" और "हौज़" का अर्थ है "तालाब"। अर्थात् "तालाब के किनारे"। नाम सुनने में जितना सरल था, उसका महत्व उतना ही गहरा था।

सदियों पहले मध्य एशिया के नगरों में जल का विशेष महत्व था। इस शुष्क क्षेत्र में ऐसे जलाशय केवल पानी के स्रोत नहीं होते थे, बल्कि सामाजिक जीवन के केंद्र भी होते थे। लोग यहाँ मिलते, बातें करते, विश्राम करते और समाचारों का आदान-प्रदान करते थे।

मैं तालाब के किनारे खड़ा होकर चारों ओर देख रहा था।

समरकंद में मैंने साम्राज्य की भव्यता देखी थी।

परंतु यहाँ मैं जीवन की सहजता देख रहा था।

यहाँ कोई राजसी प्रदर्शन नहीं था। कोई विशाल चौक या आकाश छूते भवन नहीं थे। फिर भी इस स्थान में एक ऐसी आत्मीयता थी जो सीधे हृदय तक पहुँचती थी।

तालाब के किनारे बैठे कुछ बुज़ुर्ग आपस में बातचीत कर रहे थे। कुछ लोग शतरंज खेल रहे थे। बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे। कुछ परिवार शाम की सैर का आनंद ले रहे थे।

मुझे अचानक अपने देश के पुराने नगरों की चौपालें याद आ गईं।

हरियाणा के गाँवों में बरगद के नीचे बैठकर बातचीत करते बुज़ुर्ग, उत्तर प्रदेश के कस्बों में चाय की दुकानों पर चलने वाली चर्चाएँ और राजस्थान की बावड़ियों के आसपास का सामाजिक जीवन—इन सबकी झलक मुझे ल्याबी-हौज़ में दिखाई दे रही थी।

हम भी एक चायखाने में बैठ गए।

चाय के साथ स्थानीय मिठाइयाँ और हल्के नाश्ते परोसे गए। सामने तालाब का शांत जल था और उसके पीछे ऐतिहासिक इमारतों की परछाइयाँ।

उस क्षण मुझे लगा कि किसी नगर को समझने के लिए उसके स्मारकों से अधिक उसके ऐसे सार्वजनिक स्थलों को देखना चाहिए।

यहीं पर समाज की वास्तविक धड़कन सुनाई देती है।

हमारे गाइड ने हमें आसपास स्थित ऐतिहासिक भवनों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र सदियों तक व्यापारियों, यात्रियों और विद्वानों का प्रमुख मिलन स्थल रहा है।

रेशम मार्ग से आने वाले कारवाँ जब बुखारा पहुँचते थे तो उनके यात्री भी इसी क्षेत्र में विश्राम करते थे। यहीं से वे नगर की गतिविधियों में सम्मिलित होते थे।

मैंने अपनी आँखें बंद कर कल्पना की।

मुझे लगा जैसे सामने ऊँटों का एक कारवाँ खड़ा है। दूर चीन से आया कोई व्यापारी अपने सामान की रक्षा कर रहा है। भारत से आए व्यापारी मसालों और कपड़ों की कीमतों पर चर्चा कर रहे हैं। ईरान से आए विद्वान किसी सूफी संत से मिलने की तैयारी कर रहे हैं।

कुछ क्षणों के लिए वर्तमान और अतीत की सीमाएँ धुंधली पड़ गईं।

उसी समय पास बैठे एक बुज़ुर्ग उज़्बेक ने यह जानकर कि हम भारत से आए हैं, मुस्कुराकर हमारा अभिवादन किया।

बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने बड़े प्रेम से भारत का उल्लेख किया। उन्होंने राज कपूर की फिल्मों का जिक्र किया, भारतीय संगीत की प्रशंसा की और बताया कि उनके युवाकाल में भारतीय फ़िल्में कितनी लोकप्रिय थीं।

उनकी आँखों में भारत के प्रति जो आत्मीयता थी, वह बनावटी नहीं थी।

वह पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों का परिणाम थी।

मैंने महसूस किया कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच केवल व्यापारिक या राजनीतिक संबंध नहीं रहे हैं। लोगों के दिलों के बीच भी एक अदृश्य सेतु मौजूद है।

धीरे-धीरे संध्या गहराने लगी।

तालाब के जल में रोशनियों का प्रतिबिंब झिलमिलाने लगा। वृक्षों की छाया और भी गहरी हो गई। वातावरण में एक सुखद शांति व्याप्त हो गई।

मैंने चारों ओर देखा।

यह स्थान वास्तव में बुखारा की आत्मा था।

यदि रेगिस्तान चौक समरकंद की पहचान है, तो ल्याबी-हौज़ बुखारा का हृदय है।

यहाँ इतिहास है, परन्तु वह संग्रहालयों में बंद नहीं है।

यहाँ संस्कृति है, परन्तु वह केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है।

यहाँ जीवन है, जो सदियों से बहते हुए आज भी उतना ही जीवंत है।

उस रात जब हम अपने विश्राम स्थल की ओर लौट रहे थे, तब मेरे मन में बुखारा की जो छवि बनी, वह किसी मीनार या महल की नहीं थी।

वह थी शांत जल से भरे उस हौज़ की, उसके किनारे बैठे लोगों की, हवा में घुली हुई चाय की सुगंध की और उस आत्मीय मुस्कान की, जिसके साथ एक अनजान उज़्बेक बुज़ुर्ग ने हम भारतीय छात्रों का स्वागत किया था।

शायद उसी क्षण मेरी बुखारा से वास्तविक पहचान हुई थी।

क्योंकि उस शाम मैंने केवल एक स्थान नहीं देखा था—मैंने बुखारा की आत्मा को महसूस किया था। कल्याण मीनार और पो-ए-कल्याण परिसर : जब बुखारा का गौरव हमारे सामने खड़ा था

ल्याबी-हौज़ की शांत और आत्मीय संध्या ने हमें बुखारा के हृदय से परिचित कराया था। वहाँ हमने बुखारा के लोगों का जीवन देखा, उनकी संस्कृति को महसूस किया और उस नगर की आत्मा को समझने का प्रयास किया। परन्तु अगले दिन हमें बुखारा के उस स्वरूप से परिचित होना था, जिसने सदियों तक उसे मध्य एशिया का धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र बनाए रखा।
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सुबह नाश्ते के बाद हम अपने गाइड के साथ बुखारा के ऐतिहासिक केंद्र की ओर चल पड़े। रास्ते भर वे हमें बताते जा रहे थे कि आज हम उस स्थल को देखने जा रहे हैं जिसे बुखारा की पहचान माना जाता है।

कुछ ही देर बाद हम एक खुली जगह पर पहुँचे और अचानक मेरी दृष्टि एक ऊँची मीनार पर जा टिकी।

मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया।

मेरे सामने खड़ी थी — ।

नीले आकाश की पृष्ठभूमि में उठती हुई यह विशाल मीनार इतनी प्रभावशाली थी कि पहली दृष्टि में ही मन पर अमिट छाप छोड़ देती थी। उसकी ऊँचाई, उसकी संतुलित बनावट और उसकी सादगी में छिपी भव्यता अद्भुत थी।

हमारे गाइड ने मुस्कुराकर कहा—

"बुखारा में आपका स्वागत है। यह केवल एक मीनार नहीं, बल्कि बुखारा का प्रतीक है।"

मैंने गर्दन उठाकर उसकी चोटी की ओर देखा। उस समय मुझे दिल्ली की कुतुब मीनार याद आ गई। दोनों अलग-अलग स्थापत्य परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, परन्तु दोनों को देखकर मनुष्य की सृजनशीलता के प्रति सम्मान स्वतः जाग उठता है।

गाइड ने बताया कि कल्याण मीनार का निर्माण बारहवीं शताब्दी में कराया गया था और यह लगभग नौ सौ वर्षों से अधिक समय से बुखारा की पहचान बनी हुई है।

इतिहास के इतने उतार-चढ़ाव, आक्रमण, युद्ध और राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद यह मीनार आज भी उसी दृढ़ता से खड़ी है।

यह सुनकर मैं उसकी ओर नए दृष्टिकोण से देखने लगा।

यह केवल ईंटों की बनी एक ऊँची संरचना नहीं थी।

यह समय की साक्षी थी।

यह उन अनगिनत पीढ़ियों की मौन गवाह थी जिन्होंने बुखारा को बनते, बिगड़ते और फिर सँवरते देखा था।

मीनार के चारों ओर बनी हुई ईंटों की कलात्मक सजावट ने मेरा विशेष ध्यान आकर्षित किया। बिना किसी रंगीन टाइल के केवल ईंटों के माध्यम से इतना सुंदर सौंदर्य उत्पन्न किया जा सकता है, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था।

मीनार के निकट ही विस्तृत  स्थित था।

यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि कई ऐतिहासिक संरचनाओं का समूह है। यहाँ मस्जिद, मदरसा और मीनार मिलकर एक ऐसा स्थापत्य संसार निर्मित करते हैं जो बुखारा की महानता का प्रतीक है।

जैसे ही हम परिसर में प्रवेश किए, एक विशाल खुला प्रांगण हमारे सामने था। चारों ओर भव्य मेहराबें, सुंदर आंगन और ऐतिहासिक इमारतें दिखाई दे रही थीं।

मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि बुखारा को केवल व्यापारिक नगर कहना उसके साथ अन्याय होगा।

यह वास्तव में शिक्षा, धर्म और संस्कृति का भी महान केंद्र रहा था।

हमारे गाइड ने बताया कि सदियों तक मध्य एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और यहाँ तक कि भारत से भी विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

यह सुनकर मेरे मन में एक विशेष भाव उत्पन्न हुआ।

मैं स्वयं भारत से आया हुआ एक विद्यार्थी था और उस स्थान पर खड़ा था जहाँ कभी दूर-दूर देशों से विद्यार्थी ज्ञान की तलाश में आया करते थे।

इतिहास का यह अदृश्य संबंध मुझे गहराई से स्पर्श कर रहा था।

परिसर में घूमते हुए मैंने अनेक बार आँखें बंद कर अतीत की कल्पना करने का प्रयास किया।

मुझे लगा जैसे प्रांगण में विद्वानों के समूह चर्चा कर रहे हैं।

कहीं शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं।

कहीं दूर से आए व्यापारी विश्राम कर रहे हैं।

कहीं सूफी संत अपने अनुयायियों को जीवन का संदेश दे रहे हैं।

और इन सबके ऊपर कल्याण मीनार उसी प्रकार खड़ी है, जैसे आज खड़ी है।

हमारे गाइड ने एक रोचक तथ्य भी बताया।

उन्होंने कहा कि जब  ने बुखारा पर आक्रमण किया, तब नगर की अधिकांश इमारतें नष्ट हो गईं, परन्तु कल्याण मीनार को देखकर वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसे नष्ट नहीं कराया।

कहानी कितनी ऐतिहासिक है और कितनी लोककथा, यह अलग विषय हो सकता है, परन्तु इससे यह अवश्य स्पष्ट होता है कि इस मीनार ने सदियों से लोगों की कल्पना और सम्मान दोनों को आकर्षित किया है।

प्रांगण के एक कोने में खड़े होकर मैं उस पूरे दृश्य को निहार रहा था।

सूर्य की किरणें मीनार पर पड़ रही थीं।

नीला आकाश उसके पीछे फैला हुआ था।

हल्की हवा चल रही थी।

और मेरे सामने बुखारा का लगभग एक हजार वर्ष पुराना गौरव खड़ा था।

मुझे लगा कि समरकंद और बुखारा का अंतर यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है।

समरकंद अपनी भव्यता से चकित करता है।

बुखारा अपनी गरिमा से प्रभावित करता है।

समरकंद एक विजेता की राजधानी जैसा लगता है।

बुखारा एक विद्वान की सभा जैसा।

और पो-ए-कल्याण परिसर उस विद्वता, आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का सबसे सुंदर प्रतीक है।

जब हम वहाँ से लौटने लगे तो मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा।

कल्याण मीनार आकाश की ओर उसी प्रकार उठी हुई थी, मानो सदियों से आने वाले यात्रियों का स्वागत कर रही हो।

उस क्षण मुझे लगा कि बुखारा का वास्तविक गौरव उसके महलों में नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, उसकी परंपराओं और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों में है।

और उन सबका सबसे भव्य प्रतीक मेरे सामने था—कल्याण मीनार और पो-ए-कल्याण परिसर।

आज भी जब मैं बुखारा को याद करता हूँ, तो सबसे पहले उसी मीनार की छवि आँखों के सामने उभर आती है, जो समय के प्रवाह के बीच अडिग खड़ी होकर मानो यह संदेश देती है कि सभ्यताओं की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सांस्कृतिक विरासत होती है।


 बुखारा के ढके हुए बाज़ार (टाकी) और कारवाँसराय : जहाँ भारत, चीन और ईरान मिलते थे. 41

कल्याण मीनार और पो-ए-कल्याण परिसर के दर्शन के बाद हमें ऐसा लग रहा था कि हमने बुखारा के धार्मिक और सांस्कृतिक वैभव को समझ लिया है। परन्तु हमारे गाइड मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा—

"आपने अभी बुखारा का एक चेहरा देखा है। अब मैं आपको उसका दूसरा चेहरा दिखाऊँगा—व्यापारियों का बुखारा, कारवाँओं का बुखारा और रेशम मार्ग का बुखारा।"

इतना कहकर वे हमें पुराने नगर की घुमावदार गलियों की ओर ले चले।

कुछ ही देर बाद हम एक ऐसे क्षेत्र में पहुँचे जहाँ सड़कें अचानक गुंबददार छतों के नीचे से गुजरने लगीं। ऊपर ईंटों से बने विशाल गोलाकार गुंबद थे और नीचे दुकानों की कतारें।

मैंने आश्चर्य से ऊपर देखा।

यह मेरे लिए एक नया अनुभव था।

हमारे गाइड ने बताया कि इन्हें "टाकी" कहा जाता है। ये बुखारा के प्रसिद्ध ढके हुए बाज़ार हैं, जिनका निर्माण सदियों पहले व्यापारियों और यात्रियों की सुविधा के लिए किया गया था।

मध्य एशिया की गर्म जलवायु में खुले बाज़ारों में व्यापार करना कठिन होता था। इसलिए इन विशेष संरचनाओं का निर्माण किया गया, जहाँ व्यापारी धूप, वर्षा और तेज़ हवाओं से सुरक्षित रहकर अपना व्यापार कर सकें।

आज भी मुझे याद है कि उन गुंबदों के भीतर प्रवेश करते ही तापमान में अंतर महसूस हुआ था। बाहर की गर्मी की तुलना में भीतर सुखद ठंडक थी।

मैंने मन ही मन सोचा—सदियों पहले के लोगों की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता कितनी अद्भुत थी।

हम धीरे-धीरे उन ऐतिहासिक बाज़ारों से होकर गुजरने लगे। हर मोड़ पर नई दुकानें दिखाई देती थीं। कहीं कालीन बिक रहे थे, कहीं रेशमी वस्त्र, कहीं आभूषण और कहीं हस्तशिल्प की वस्तुएँ।

मेरे सामने केवल एक बाज़ार नहीं था।

मेरे सामने रेशम मार्ग का जीवित इतिहास था।

गाइड ने हमें बताया कि कभी इसी मार्ग से चीन का रेशम, भारत के मसाले, ईरान के कालीन, रूस की फरें और अरब देशों की अनेक वस्तुएँ यहाँ आती थीं।

बुखारा केवल वस्तुओं का व्यापारिक केंद्र नहीं था।

यह संस्कृतियों का संगम था।

यहीं पर व्यापारी मिलते थे, यहीं भाषाएँ मिलती थीं और यहीं विचारों का आदान-प्रदान होता था।

एक भारतीय के रूप में यह बात सुनकर मेरे मन में विशेष उत्सुकता जागी।

मैं सोचने लगा कि संभव है कि सदियों पहले भारत से आए व्यापारी भी इन्हीं गलियों में चले हों। शायद उन्होंने भी इसी प्रकार दुकानों में वस्तुएँ देखी होंगी, मोलभाव किया होगा और अपने व्यापारिक साथियों से मुलाकात की होगी।

अचानक मुझे लगा कि मैं केवल बीसवीं शताब्दी का एक यात्री नहीं हूँ।

मैं उन असंख्य भारतीय यात्रियों की परंपरा का हिस्सा हूँ जो सदियों से मध्य एशिया की यात्रा करते आए थे।

बाज़ार में घूमते हुए हमारी दृष्टि एक विशाल पुराने भवन पर पड़ी।

गाइड ने बताया कि यह एक प्राचीन कारवाँसराय है।

मेरे लिए यह शब्द नया नहीं था। इतिहास की पुस्तकों में मैंने इसके बारे में पढ़ा था, परन्तु पहली बार किसी वास्तविक कारवाँसराय को देखने का अवसर मिल रहा था।

हम उसके भीतर प्रवेश कर गए।

एक विशाल चौकोर आँगन हमारे सामने था। चारों ओर कमरे बने हुए थे और बीच में खुला स्थान था।

गाइड ने बताया कि जब व्यापारी दूर देशों से यात्रा करके आते थे, तो वे अपने ऊँटों, घोड़ों और सामान के साथ यहीं ठहरते थे।

नीचे जानवरों और माल की व्यवस्था होती थी तथा ऊपर या आसपास बने कमरों में व्यापारी विश्राम करते थे।

मैंने कुछ देर के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं।

और अचानक मेरे सामने अतीत जीवित हो उठा।

मुझे लगा जैसे आँगन में ऊँट बैठे हुए हैं।

उनकी घंटियों की आवाज़ सुनाई दे रही है।

एक व्यापारी भारत से मसाले लेकर आया है।

दूसरा चीन से रेशम लेकर पहुँचा है।

कोई फ़ारसी भाषा में बात कर रहा है, कोई तुर्की में और कोई अरबी में।

दूर किसी कोने में बैठा एक भारतीय व्यापारी शायद अपने घर वालों को याद कर रहा है।

इतिहास जैसे मेरे सामने चलचित्र की तरह चलने लगा।

गाइड ने बताया कि बुखारा में ऐसे अनेक कारवाँसराय हुआ करते थे। कुछ व्यापार विशेष के लिए प्रसिद्ध थे, कुछ दूर देशों से आने वाले यात्रियों के लिए।

उन दिनों होटल नहीं होते थे।

कारवाँसराय ही यात्रियों के घर हुआ करते थे।

यहीं वे विश्राम करते, व्यापार करते और समाचारों का आदान-प्रदान करते थे।

मुझे अपने देश की पुरानी सरायों की याद आ गई, जो कभी दिल्ली, आगरा और ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे यात्रियों के लिए बनाई गई थीं।

मनुष्य चाहे किसी भी देश का हो, उसकी आवश्यकताएँ और उसके सपने बहुत समान होते हैं।

यात्रा करते समय उसे विश्राम चाहिए, सुरक्षा चाहिए और कुछ आत्मीय चेहरे चाहिए।

कारवाँसराय सदियों तक यही भूमिका निभाते रहे।

हमारा समूह उस पुराने भवन में काफी देर तक घूमता रहा। हर दीवार, हर मेहराब और हर कमरा मानो कोई कहानी सुनाना चाहता था।

जब हम बाहर निकले तो बुखारा का बाज़ार अपने पूरे जीवन्त रूप में हमारे सामने था।

लोग खरीदारी कर रहे थे।

दुकानदार ग्राहकों से बातचीत कर रहे थे।

कहीं हँसी सुनाई दे रही थी, कहीं मोलभाव चल रहा था।

और मुझे लग रहा था कि बहुत कुछ बदल जाने के बावजूद बुखारा की आत्मा आज भी वही है।

आज ऊँटों के कारवाँ नहीं आते, परन्तु यात्रियों का आना जारी है।

आज रेशम मार्ग पहले जैसा नहीं रहा, परन्तु संस्कृतियों का संवाद अभी भी जारी है।

बुखारा के टाकी और कारवाँसराय देखकर मुझे पहली बार गहराई से समझ में आया कि किसी नगर की महानता केवल उसकी इमारतों में नहीं होती।

वह उन रास्तों में भी होती है जहाँ से लोग गुजरते हैं।

वह उन कहानियों में भी होती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं।

और वह उन संबंधों में भी होती है जो दूर देशों के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।

बुखारा के इन ढके हुए बाज़ारों में चलते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे भारत, चीन, ईरान, अरब और मध्य एशिया आज भी एक-दूसरे से बातें कर रहे हों।

और मैं उस संवाद का एक विनम्र श्रोता बन गया था।
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रेशम मार्ग की जीवंत दुनिया : जहाँ सभ्यताएँ मिलती थीं-42

बुखारा के ढके हुए बाज़ारों और कारवाँसरायों में घूमते हुए मेरे मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था। मैं जिन गलियों से होकर गुजर रहा था, वे केवल ईंट-पत्थर की बनी सड़कें नहीं थीं। ये वे रास्ते थे जिन पर सदियों तक संसार की महान सभ्यताएँ एक-दूसरे से मिली थीं।

इतिहास की पुस्तकों में हम रेशम मार्ग के बारे में पढ़ते हैं, परन्तु बुखारा पहुँचकर पहली बार मुझे उसकी वास्तविकता का अनुभव हुआ।

रेशम मार्ग कोई एक सड़क नहीं था।

यह हजारों किलोमीटर लंबा व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का विशाल जाल था, जो चीन से प्रारम्भ होकर मध्य एशिया, भारत, ईरान, अरब और यूरोप तक फैला हुआ था।

इसी मार्ग से केवल वस्तुएँ ही नहीं चलती थीं, बल्कि विचार, धर्म, कला, विज्ञान और जीवन-दर्शन भी यात्रा करते थे।

बुखारा इस विशाल नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

हमारे गाइड ने हमें एक पुराने नक्शे के सामने खड़ा करके समझाया कि चीन से निकलने वाले कारवाँ पहले मध्य एशिया के नगरों तक पहुँचते थे। उनमें से अनेक बुखारा होकर आगे ईरान, तुर्की और यूरोप की ओर जाते थे। कुछ मार्ग अफगानिस्तान होते हुए भारत की दिशा में मुड़ जाते थे।

मैं उस नक्शे को देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि आधुनिक हवाई जहाजों और रेलमार्गों के युग से बहुत पहले मनुष्य ने कितनी विशाल दुनिया को आपस में जोड़ दिया था।

रेशम मार्ग का नाम सुनते ही सबसे पहले रेशम का स्मरण होता है।

चीन का रेशम उस समय संसार की सबसे मूल्यवान वस्तुओं में गिना जाता था। व्यापारी उसे ऊँटों पर लादकर हजारों किलोमीटर दूर तक ले जाते थे।

परन्तु रेशम मार्ग केवल रेशम का मार्ग नहीं था।

भारत से मसाले, कपास, कीमती पत्थर और सुगंधित पदार्थ आते थे।

मध्य एशिया से घोड़े और उत्कृष्ट हस्तशिल्प भेजे जाते थे।

ईरान से कालीन और धातु-कला की वस्तुएँ आती थीं।

अरब देशों से ज्ञान-विज्ञान और व्यापारिक अनुभवों का आदान-प्रदान होता था।

इन वस्तुओं के साथ-साथ लोगों की कहानियाँ भी यात्रा करती थीं।

मुझे अपने देश का इतिहास याद आने लगा।

भारत और मध्य एशिया के बीच संपर्क कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से व्यापारी, विद्वान, सूफी संत और यात्री इन मार्गों से आते-जाते रहे हैं।

बुखारा की गलियों में चलते हुए मुझे बार-बार ऐसा लगता था कि शायद कभी इन्हीं रास्तों से भारत का कोई व्यापारी गुजरा होगा। संभव है कि उसने यहीं किसी कारवाँसराय में रात्रि विश्राम किया हो। शायद उसने किसी उज़्बेक व्यापारी से मित्रता की हो और अपने देश लौटकर बुखारा की कहानियाँ सुनाई हों।

शायद इसी प्रकार बुखारा का नाम भारतीय लोकजीवन में भी पहुँच गया होगा।

हमारे गाइड ने एक अत्यंत रोचक बात कही।

उन्होंने कहा, "रेशम मार्ग की सबसे बड़ी देन व्यापार नहीं थी, बल्कि संस्कृतियों का मिलन था।"

मैंने इस वाक्य पर बहुत देर तक विचार किया।

वास्तव में, यदि केवल वस्तुओं का आदान-प्रदान होता तो इतिहास की दिशा इतनी नहीं बदलती। परन्तु इन मार्गों ने लोगों को एक-दूसरे के निकट लाया। उन्होंने भाषाओं को मिलाया, संगीत को फैलाया, भोजन की परंपराओं को साझा किया और विचारों को सीमाओं से मुक्त किया।

यही कारण है कि उज़्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है और भारत में मध्य एशिया की स्मृतियाँ।

बुखारा के बाज़ार में मुझे कुछ शब्द ऐसे सुनाई दिए जिनकी ध्वनि हिंदी-उर्दू से मिलती-जुलती लगी। भोजन की कुछ वस्तुएँ भी परिचित-सी प्रतीत हुईं।

यह केवल संयोग नहीं था।

यह सदियों के सांस्कृतिक संवाद का परिणाम था।

मुझे विशेष रूप से यह देखकर प्रसन्नता हुई कि 1980 में भी उज़्बेक लोग भारत के प्रति गहरा स्नेह रखते थे। भारतीय फ़िल्में, गीत और कलाकार वहाँ लोकप्रिय थे।

यह आधुनिक युग का सांस्कृतिक संवाद था, परन्तु इसकी जड़ें कहीं न कहीं उन पुराने संपर्कों में भी थीं जो रेशम मार्ग के माध्यम से विकसित हुए थे।

कारवाँसराय के आँगन में खड़े होकर मैंने कल्पना की कि रात्रि का समय है। दूर-दूर से आए व्यापारी अपने-अपने देशों की बातें कर रहे हैं।

कोई चीन के सम्राट की चर्चा कर रहा है।

कोई भारत के बाज़ारों का वर्णन कर रहा है।

कोई फ़ारस की कविता सुना रहा है।

कोई अरब के रेगिस्तानों की कहानी कह रहा है।

भाषाएँ अलग हैं, परन्तु मनुष्य की जिज्ञासा एक है।

उस क्षण मुझे लगा कि रेशम मार्ग वस्तुतः मानव सभ्यता का संवाद-पथ था।

आज राजनीतिक सीमाएँ हमें अलग-अलग देशों में बाँट सकती हैं, परन्तु इतिहास बताता है कि मनुष्य हमेशा एक-दूसरे से जुड़ने के रास्ते खोजता रहा है।

बुखारा की यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि किसी सभ्यता की महानता केवल उसकी सैन्य शक्ति में नहीं होती।

वह उसकी खुली सोच, उसके संवाद और उसके आदान-प्रदान की क्षमता में भी होती है।

रेशम मार्ग इसलिए महान नहीं बना कि वहाँ से करोड़ों का व्यापार होता था।

वह इसलिए महान बना क्योंकि उसने दुनिया के विभिन्न हिस्सों को एक-दूसरे से परिचित कराया।

उसने अजनबियों को मित्र बनाया।

उसने दूर देशों को पड़ोसी बनाया।

और उसने मानवता को यह सिखाया कि संस्कृतियाँ तब सबसे अधिक समृद्ध होती हैं जब वे एक-दूसरे से सीखती हैं।

बुखारा के पुराने बाज़ारों से लौटते समय सूर्य अस्त होने लगा था। मैं पीछे मुड़कर उन गुंबदों और कारवाँसरायों को देख रहा था।

वे मुझे केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं लग रहे थे।

वे मुझे उन असंख्य यात्रियों की स्मृतियाँ प्रतीत हो रहे थे, जिन्होंने सदियों तक इस मार्ग को जीवित रखा।

उनमें भारतीय भी थे।

उज़्बेक भी थे।

चीनी भी थे।

ईरानी भी थे।

और शायद इसी कारण रेशम मार्ग की कहानी किसी एक देश की कहानी नहीं है।

वह सम्पूर्ण मानव सभ्यता की साझा विरासत है।

और बुखारा, उस महान विरासत के सबसे उज्ज्वल अध्यायों में से एक है।


मुल्ला नसरुद्दीन की तलाश में : बुखारा की गलियों में हास्य, बुद्धिमत्ता और लोककथाएँ-43

बुखारा के भव्य मदरसों, प्राचीन कारवाँसरायों और रेशम मार्ग की कहानियों के बीच एक नाम बार-बार मेरे कानों में पड़ रहा था—मुल्ला नसरुद्दीन।

भारत में बचपन से ही हम मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से सुनते आए हैं। कभी वे अपने गधे पर उल्टा बैठकर यात्रा करते दिखाई देते हैं, कभी किसी जटिल प्रश्न का ऐसा उत्तर देते हैं कि सुनने वाला हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर हो जाए। उनकी कहानियाँ मनोरंजन भी करती हैं और जीवन का कोई न कोई गहरा सत्य भी सिखा जाती हैं।

इसलिए जब मैं बुखारा पहुँचा, तो मेरे मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा थी।

क्या वास्तव में मुल्ला नसरुद्दीन का संबंध बुखारा से है?

क्या इस नगर में आज भी उनकी स्मृतियाँ जीवित हैं?

और क्या उन गलियों में घूमते हुए उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए एक दिन हम अपने गाइड के साथ बुखारा की पुरानी गलियों में निकल पड़े।

हमारे गाइड स्वयं बड़े हँसमुख व्यक्ति थे। जैसे ही मैंने उनसे मुल्ला नसरुद्दीन का नाम लिया, उनके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

उन्होंने कहा,

"यदि आप बुखारा को समझना चाहते हैं, तो आपको मुल्ला नसरुद्दीन को भी समझना होगा।"

मैंने उत्सुकता से पूछा, "क्या वे वास्तव में यहीं रहते थे?"

वे हँस पड़े।

"इतिहासकार आज भी इस प्रश्न पर एकमत नहीं हैं। तुर्की वाले कहते हैं कि वे उनके थे। उज़्बेक कहते हैं कि वे हमारे थे। ईरान वाले भी उन्हें अपना मानते हैं। लेकिन एक बात निश्चित है—वे पूरे पूर्वी संसार के प्रिय पात्र हैं।"

उनका उत्तर सुनकर मुझे लगा कि शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।

वे किसी एक नगर या देश के नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत हैं।

हम चलते-चलते एक चौक पर पहुँचे। वहाँ मैंने देखा कि एक व्यक्ति गधे पर बैठा हुआ है।

पहले तो मुझे लगा कि कोई स्थानीय व्यक्ति होगा, परंतु निकट जाकर देखा तो वह एक मूर्ति थी।

वह थी ।

मूर्ति में मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर बैठे हुए थे और उनके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी जिसकी कल्पना हम उनकी कहानियाँ पढ़ते समय करते हैं।

मैं कुछ क्षणों तक उस प्रतिमा को देखता रहा।

अचानक मुझे अपना बचपन याद आ गया।

गाँव की चौपाल में, स्कूल की पुस्तकों में और मित्रों की बातचीत में मुल्ला नसरुद्दीन के कितने ही किस्से सुने थे।

और आज मैं उस नगर में खड़ा था जहाँ उनकी स्मृतियाँ जीवित थीं।

हमारे गाइड ने हमें एक प्रसिद्ध कथा सुनाई।

एक दिन किसी ने मुल्ला से पूछा, "आप अपना घर कैसे खोज लेते हैं?"

मुल्ला ने उत्तर दिया, "मैं अपना घर नहीं खोजता, मेरा घर मुझे खोज लेता है।"

सभी लोग हँस पड़े।

परन्तु हँसी के पीछे छिपा हुआ दर्शन भी उतना ही गहरा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की यही विशेषता थी।

वे जीवन की गंभीर बातों को इतने सरल और हास्यपूर्ण ढंग से कहते थे कि व्यक्ति पहले हँसता था और बाद में सोचता था।

बुखारा की गलियों में घूमते हुए मुझे बार-बार महसूस हो रहा था कि यह नगर केवल विद्वानों और व्यापारियों का नगर नहीं था।

यह लोकबुद्धि का भी नगर था।

यहाँ केवल बड़े-बड़े दार्शनिक विचार ही नहीं जन्मे, बल्कि सामान्य लोगों के अनुभवों से निकली वह बुद्धिमत्ता भी विकसित हुई जिसने मुल्ला नसरुद्दीन जैसे पात्र को जन्म दिया।

मैंने अपने गाइड से कहा,

"भारत में भी मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से बहुत लोकप्रिय हैं।"

उन्होंने प्रसन्न होकर उत्तर दिया,

"तो फिर भारत और बुखारा पुराने मित्र हुए।"

उनकी बात सुनकर हम सब मुस्कुरा उठे।

वास्तव में यह केवल मज़ाक नहीं था।

लोककथाएँ देशों को जोड़ने का कार्य करती हैं।

जिस पात्र पर बुखारा का बच्चा हँसता है, उसी पर भारत का बच्चा भी हँसता है।

यही सांस्कृतिक निकटता की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।

हमने उस दिन बुखारा की अनेक पुरानी गलियों में घूमते हुए लोगों से भी बातचीत की।

कई बुज़ुर्गों ने नसरुद्दीन के किस्से सुनाए।

कुछ कहानियाँ मैंने पहले सुन रखी थीं, कुछ बिल्कुल नई थीं।

परन्तु सभी में एक बात समान थी—हास्य के माध्यम से जीवन का कोई सत्य सामने आता था।

धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मुल्ला नसरुद्दीन केवल एक हास्य पात्र नहीं हैं।

वे समाज के दर्पण हैं।

वे मूर्खता पर व्यंग्य करते हैं।

वे अहंकार को चुनौती देते हैं।

वे सत्ता और पाखंड का मज़ाक उड़ाते हैं।

और सबसे बढ़कर, वे हमें स्वयं पर हँसना सिखाते हैं।

शाम होने लगी थी।

बुखारा की पुरानी गलियों पर सुनहरी धूप बिखर रही थी।

मैं एक क्षण के लिए रुका और पीछे मुड़कर देखा।

मुझे लगा जैसे किसी मोड़ से अभी मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर आते दिखाई देंगे और कोई नई कहानी शुरू हो जाएगी।

बेशक, यह केवल कल्पना थी।

परन्तु हर महान लोकनायक अपने पीछे ऐसी ही अनुभूति छोड़ जाता है।

वह इतिहास की पुस्तकों में नहीं, लोगों की स्मृतियों में जीवित रहता है।

उस दिन मैंने महसूस किया कि मुल्ला नसरुद्दीन को खोजने के लिए किसी मकबरे या स्मारक की आवश्यकता नहीं है।

वे बुखारा की हवा में हैं।

वे उसके हास्य में हैं।

वे उसके लोगों की मुस्कान में हैं।

वे उन कहानियों में हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं।

और शायद यही किसी भी लोकनायक की सबसे बड़ी अमरता है।

बुखारा ने मुझे अपने मदरसे दिखाए, अपनी मीनारें दिखाईं, अपने बाज़ार दिखाए और अपना इतिहास दिखाया।

परन्तु मुल्ला नसरुद्दीन की तलाश में मैंने बुखारा का एक और रूप देखा—एक ऐसा रूप जो हँसना जानता है, सोचता है और जीवन को सरलता से स्वीकार करता है।

आज भी जब मैं बुखारा को याद करता हूँ, तो कल्याण मीनार की ऊँचाई और रेशम मार्ग की कहानियों के साथ-साथ एक मुस्कुराता हुआ चेहरा भी याद आता है।

वह चेहरा है मुल्ला नसरुद्दीन का, जो मानो आज भी अपने गधे पर सवार होकर बुखारा की गलियों में घूम रहे हों और लोगों को हँसते-हँसते जीवन का ज्ञान बाँट रहे हों।

बुखारा की एक शाम : लोकसंगीत, नृत्य और उज़्बेक मेहमाननवाज़ी-44

बुखारा में बिताए गए हमारे दिन इतिहास, संस्कृति और लोककथाओं के बीच गुजर रहे थे। सुबह हम कभी किसी मदरसे में होते, कभी किसी मीनार के नीचे खड़े होकर सदियों पुराने इतिहास को समझने का प्रयास कर रहे होते और कभी रेशम मार्ग के उन बाज़ारों में घूम रहे होते जहाँ कभी संसार की विभिन्न सभ्यताएँ एक-दूसरे से मिलती थीं।

परन्तु किसी नगर को केवल दिन में देखकर नहीं समझा जा सकता।

हर शहर की एक अलग शाम होती है।

और बुखारा की शाम तो मानो उसकी आत्मा का सबसे मधुर गीत थी।

उस दिन भी हम दिनभर भ्रमण करके लौटे थे। थोड़ी देर विश्राम के बाद हमें बताया गया कि शाम को हमारे सम्मान में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम और रात्रिभोज का आयोजन किया गया है। यह सुनकर हमारे समूह में उत्साह की लहर दौड़ गई।

विदेश यात्रा के दौरान किसी देश की संस्कृति को सबसे निकट से देखने का अवसर ऐसे ही कार्यक्रमों में मिलता है।

सूर्य अस्त होने लगा था। बुखारा की पुरानी इमारतों पर पड़ती हुई सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे फीकी पड़ रही थी। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। हम सभी निर्धारित समय पर कार्यक्रम स्थल की ओर चल पड़े।

कार्यक्रम एक पारंपरिक शैली से सजाए गए प्रांगण में आयोजित किया गया था। चारों ओर रंगीन कालीन, सुंदर कढ़ाई वाले वस्त्र और स्थानीय कलाकृतियाँ सजी हुई थीं। वातावरण में एक आत्मीयता थी, कोई औपचारिकता नहीं।

अतिथियों का स्वागत जिस गर्मजोशी से किया गया, उसने हमारे मन को छू लिया।

हमारे बैठते ही चाय परोसी गई। मध्य एशिया में चाय केवल पेय नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जैसे भारत में मेहमान के स्वागत में चाय का विशेष स्थान है, वैसे ही उज़्बेकिस्तान में भी चाय सम्मान और मित्रता का प्रतीक है।

कुछ ही देर बाद लोकसंगीत का कार्यक्रम आरम्भ हुआ।

मंच पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ कलाकार आए। जैसे ही संगीत की पहली धुन वातावरण में गूँजी, पूरा प्रांगण मानो किसी और ही दुनिया में पहुँच गया।

उन धुनों में रेगिस्तान की विशालता भी थी और कारवाँओं की थकान भी।

उनमें प्रेम था, विरह था, उत्सव था और लोकजीवन की सहजता भी।

यद्यपि हम गीतों के शब्द पूरी तरह नहीं समझ पा रहे थे, परन्तु संगीत की भाषा किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती।

संगीत सीधे हृदय से संवाद करता है।

मैं मंत्रमुग्ध होकर उन धुनों को सुन रहा था।

अचानक मुझे अपने देश के लोकगीत याद आने लगे। हरियाणा के रागनी गायक, राजस्थान के मांड गीत, उत्तर प्रदेश के लोकस्वर—सब किसी न किसी रूप में मानव जीवन की समान भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

देश बदल जाते हैं, भाषाएँ बदल जाती हैं, परन्तु मनुष्य का हृदय नहीं बदलता।

यही बात उस शाम मुझे बार-बार महसूस हो रही थी।

संगीत के बाद नृत्य कार्यक्रम आरम्भ हुआ।

उज़्बेक नृत्य अपनी कोमलता, लय और अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। नृत्यांगनाएँ रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में मंच पर आईं। उनके हाथों की मुद्राएँ, आँखों की अभिव्यक्ति और शरीर की लयबद्ध गति इतनी सुंदर थी कि दर्शकों की दृष्टि उन पर टिक गई।

उनके नृत्य में कहीं फूलों की कोमलता थी, कहीं पक्षियों की उड़ान का आभास और कहीं मध्य एशिया के लोकजीवन की झलक।

मुझे अचानक ताश्कंद में देखे गए सांस्कृतिक कार्यक्रमों की याद आ गई, जहाँ मैंने पहली बार उज़्बेक नृत्य की सुंदरता को निकट से देखा था।

उस शाम बुखारा में वह अनुभव और भी गहरा हो गया।

कार्यक्रम के बीच-बीच में हमारे साथ बातचीत भी होती रही। स्थानीय कलाकारों और आयोजकों को जब पता चला कि हम भारत से आए हैं, तो उनके चेहरे पर विशेष प्रसन्नता दिखाई दी।

कुछ लोगों ने भारतीय फ़िल्मों का उल्लेख किया।

किसी ने  का नाम लिया।

किसी ने भारतीय गीतों की चर्चा की।

एक बुज़ुर्ग कलाकार ने मुस्कुराते हुए कहा,

"हमारे युवाकाल में भारतीय फ़िल्में देखने का इंतज़ार रहता था।"

उनकी बात सुनकर हम सब भावुक हो गए।

हजारों किलोमीटर दूर स्थित एक देश में भारत के प्रति इतना स्नेह देखकर गर्व का अनुभव होना स्वाभाविक था।

रात्रिभोज का समय आया।

विभिन्न स्थानीय व्यंजन परोसे गए। मेज़ पर सजे हुए व्यंजनों में उज़्बेक खान-पान की विविधता दिखाई दे रही थी। रोटी, चावल, सलाद, फल और अनेक पारंपरिक पकवान हमारे सामने थे।

भोजन के दौरान भी बातचीत का सिलसिला चलता रहा।

मैंने देखा कि उज़्बेक लोगों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आत्मीयता है।

वे अतिथि को केवल अतिथि नहीं मानते, बल्कि परिवार का सदस्य बना लेते हैं।

यह गुण मुझे भारतीय संस्कृति से बहुत मिलता-जुलता लगा।

शायद इसी कारण उज़्बेकिस्तान में हमें कभी परायेपन का अनुभव नहीं हुआ।

रात धीरे-धीरे गहराने लगी थी।

संगीत की अंतिम धुनें वातावरण में तैर रही थीं।

पुरानी बुखारा की इमारतें चाँदनी में नहाई हुई थीं।

हल्की हवा चल रही थी और पूरा वातावरण किसी स्वप्न जैसा प्रतीत हो रहा था।

वापसी के समय मैंने पीछे मुड़कर उस प्रांगण को देखा।

मुझे लगा कि मैंने उस शाम केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं देखा।

मैंने उज़्बेकिस्तान के हृदय की धड़कन सुनी थी।

इतिहास हमें किसी देश का अतीत बताता है।

स्मारक उसकी उपलब्धियाँ दिखाते हैं।

परन्तु संगीत, नृत्य और लोगों का व्यवहार हमें उसकी आत्मा से परिचित कराते हैं।

बुखारा की वह शाम मेरे लिए इसी आत्मा से साक्षात्कार का अवसर थी।

आज, लगभग आधी शताब्दी बाद भी, जब मैं बुखारा को याद करता हूँ, तो कल्याण मीनार, रेशम मार्ग और मुल्ला नसरुद्दीन के साथ-साथ वह मधुर शाम भी स्मृति में जीवित हो उठती है।

वह शाम, जब लोकसंगीत की धुनों ने देशों की दूरियाँ मिटा दी थीं।

वह शाम, जब उज़्बेक मेहमाननवाज़ी ने हमें अपना बना लिया था।

और वह शाम, जब बुखारा केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं रहा था—वह हमारे हृदय का एक हिस्सा बन गया था।


बुखारा से विदाई : स्मृतियों के कारवाँ के साथ-45

समय का अपना स्वभाव है। वह कभी रुकता नहीं।

ऐसा लगता है कि अभी कल ही हम समरकंद से चलकर बुखारा पहुँचे थे और इतिहास, संस्कृति तथा लोकजीवन के उस अद्भुत संसार में प्रवेश किया था। परन्तु देखते ही देखते बुखारा में हमारे प्रवास के दिन भी समाप्ति की ओर बढ़ने लगे।

उस सुबह जब मैं अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा था, तब मन में एक अजीब-सी उदासी थी।

यह उदासी किसी दुःख की नहीं थी।

यह उस आत्मीयता की थी जो किसी नगर, किसी स्थान और उसके लोगों से कुछ ही दिनों में स्थापित हो जाती है।

खिड़की से बाहर बुखारा की पुरानी इमारतें दिखाई दे रही थीं। सूरज धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था। गलियों में जीवन जागने लगा था। कहीं कोई दुकानदार अपनी दुकान खोल रहा था, कहीं कोई बुज़ुर्ग सुबह की सैर पर निकला था और कहीं किसी घर से चाय की सुगंध आती हुई प्रतीत हो रही थी।

मैं चुपचाप उन दृश्यों को देखता रहा।

शायद मन उन्हें अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए संजो लेना चाहता था।

नाश्ते के बाद हमारे सामान बस में रखे जाने लगे।

साथियों के बीच भी एक अनकही खामोशी थी।

सभी जानते थे कि आज हम बुखारा को अलविदा कहने वाले हैं।

कुछ दिन पहले तक यह नगर हमारे लिए इतिहास की पुस्तकों का एक नाम था।

अब यह हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन चुका था।

बस में बैठने से पहले मैं कुछ देर के लिए अकेला टहलने निकल पड़ा।

मैं उन गलियों को अंतिम बार देखना चाहता था जिनमें चलते हुए मैंने रेशम मार्ग की पदचाप सुनी थी।

मैं उन गुंबदों को अंतिम बार देखना चाहता था जिनके नीचे सदियों तक व्यापारियों और यात्रियों का संसार बसता रहा।

मैं उस वातावरण को एक बार फिर अपने भीतर महसूस करना चाहता था जिसने मुझे बार-बार यह अहसास कराया था कि सभ्यताएँ सीमाओं से बड़ी होती हैं।

दूर खड़ी  की आकृति दिखाई दे रही थी।

उसकी ओर देखते हुए मुझे लगा जैसे वह सदियों से आने वाले यात्रियों को विदा करती रही है।

कितने ही कारवाँ आए होंगे।

कितने ही व्यापारी यहाँ ठहरे होंगे।

कितने ही विद्वान और यात्री यहाँ से गुज़रे होंगे।

आज उन्हीं की परंपरा में हम भी इस नगर से विदा ले रहे थे।

मुझे पिछली शाम का लोकसंगीत याद आया।

ल्याबी-हौज़ का शांत जल याद आया।

मुल्ला नसरुद्दीन की मुस्कुराती हुई प्रतिमा याद आई।

टाकी बाज़ारों की चहल-पहल याद आई।

और सबसे बढ़कर, वे लोग याद आए जिनकी आत्मीयता ने हमें अपना बना लिया था।

यात्रा के दौरान हम अनेक स्मारक देखते हैं।

उनकी तस्वीरें खींचते हैं।

उनके इतिहास को समझते हैं।

परन्तु वर्षों बाद स्मृति में सबसे अधिक जो बचा रह जाता है, वह पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि इंसानों के चेहरे होते हैं।

मुझे वे दुकानदार याद आ रहे थे जिन्होंने मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया था।

वे बुज़ुर्ग याद आ रहे थे जिन्होंने भारत का नाम सुनते ही अपनापन दिखाया था।

वे कलाकार याद आ रहे थे जिन्होंने अपने लोकसंगीत के माध्यम से हमें अपने समाज की आत्मा से परिचित कराया था।

यही बुखारा की सबसे बड़ी संपत्ति थी।

उसकी इमारतें नहीं।

उसके लोग।

बस चलने के लिए तैयार थी।

हम सभी अपने स्थानों पर बैठ गए।

इंजन की आवाज़ के साथ यात्रा का नया अध्याय प्रारंभ होने वाला था।

बस धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

खिड़की से बाहर देखते हुए मैं बुखारा को विदा की दृष्टि से देख रहा था।

पुरानी गलियाँ पीछे छूट रही थीं।

गुंबद दूर होते जा रहे थे।

मीनारें धीरे-धीरे क्षितिज में विलीन हो रही थीं।

परन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि बुखारा हमसे दूर नहीं जा रहा था।

वह हमारे भीतर बसता जा रहा था।

तभी मुझे भारत की वह प्रसिद्ध कहावत याद आई—

"जो सुख बल्ख न बुखारे, वो सुख छज्जू के चौबारे।"

बचपन में मैंने इस कहावत को केवल सुना था।

आज मैं उस बुखारा को अपनी आँखों से देखकर लौट रहा था जिसकी समृद्धि और ख्याति ने सदियों पहले भारतीय लोकजीवन में भी अपना स्थान बना लिया था।

अब यह कहावत मेरे लिए केवल शब्द नहीं रह गई थी।

इसके पीछे एक जीवंत नगर, उसकी संस्कृति, उसके बाज़ार, उसके लोग और उसकी स्मृतियाँ थीं।

बस अब बुखारा की सीमा से बाहर निकल रही थी।

हमारी अगली मंज़िल हमारा इंतज़ार कर रही थी।

परन्तु मैं जानता था कि बुखारा की यह यात्रा समाप्त नहीं हुई है।

कुछ यात्राएँ पैरों से पूरी होती हैं।

कुछ यात्राएँ स्मृतियों में चलती रहती हैं।

बुखारा की यात्रा दूसरी प्रकार की यात्रा थी।

आज भी जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं फिर उसी कारवाँसराय के आँगन में खड़ा हूँ।

फिर उसी बाज़ार में घूम रहा हूँ।

फिर ल्याबी-हौज़ के किनारे बैठा हूँ।

और फिर किसी उज़्बेक मित्र की आत्मीय मुस्कान का उत्तर दे रहा हूँ।

हमारी बस आगे बढ़ती रही।

बुखारा पीछे छूटता गया।

परन्तु उसकी स्मृतियाँ हमारे साथ चलती रहीं—बिल्कुल उन पुराने कारवाँओं की तरह, जो अपना पड़ाव छोड़ देते थे, परन्तु यात्रा की कहानियाँ हमेशा अपने साथ लेकर चलते थे।

और मैं भी उस दिन बुखारा से केवल विदा नहीं ले रहा था।

मैं उसकी मित्रता, उसकी संस्कृति और उसके स्नेह को अपने हृदय में लेकर आगे बढ़ रहा था।
●□□●●●


फरगना की ओर : उपजाऊ घाटी का आमंत्रण -46

उज़्बेकिस्तान में रहते हुए हमें लगभग छह महीने बीत चुके थे। इस दौरान हमने ताश्कंद की आधुनिकता देखी थी, समरकंद का ऐतिहासिक वैभव देखा था और बुखारा की सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विरासत को निकट से अनुभव किया था। ऐसा लगता था कि मध्य एशिया का इतिहास हमारे सामने एक-एक करके अपने पन्ने खोल रहा है।

फिर भी हमारी यात्रा अधूरी थी।

एक नाम बार-बार हमारी चर्चाओं में आता था—फरगना।

जब भी हम अपने उज़्बेक मित्रों, अध्यापकों या गाइडों से उज़्बेकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों की चर्चा करते, वे बड़े गर्व से फरगना घाटी का उल्लेख करते। कोई उसकी उपजाऊ भूमि की प्रशंसा करता, कोई उसके फलों की, कोई वहाँ के मेहनती लोगों की और कोई उसकी प्राकृतिक सुंदरता की।

धीरे-धीरे हमारे मन में भी उस क्षेत्र को देखने की उत्सुकता बढ़ती गई।

अंततः वह दिन आ ही गया।

जनवरी का दूसरा रविवार था।

सुबह अभी पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ था कि हम अपनी यात्रा की तैयारी में लग गए। ताश्कंद की सर्दी अपने पूरे यौवन पर थी। सड़कों के किनारे जमी बर्फ, पेड़ों की नंगी शाखाएँ और ठंडी हवा हमें याद दिला रही थीं कि हम मध्य एशिया की कठोर सर्दियों के बीच यात्रा पर निकल रहे हैं।

लेकिन हमारे उत्साह के सामने यह ठंड कोई महत्व नहीं रखती थी।

हम सब विद्यार्थी समय से पहले ही एकत्रित हो गए। कुछ के हाथों में कैमरे थे, कुछ अपने साथ खाने-पीने का सामान लिए हुए थे और कुछ केवल इस नई यात्रा की कल्पनाओं में खोए हुए थे।

थोड़ी ही देर में हमारी बस ताश्कंद से फरगना की ओर चल पड़ी।

बस के भीतर हमेशा की तरह हँसी-मज़ाक और गीतों का वातावरण था। कोई खिड़की से बाहर के दृश्य देख रहा था, कोई अपने मित्रों से बातचीत कर रहा था और कोई आने वाले अनुभवों की कल्पना कर रहा था।

मैं खिड़की के पास बैठा था।

मेरी दृष्टि बाहर फैले हुए शीतकालीन दृश्य पर टिकी हुई थी।

ताश्कंद पीछे छूट रहा था और हम उज़्बेकिस्तान के उस भाग की ओर बढ़ रहे थे जिसे देश का सबसे उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है।

हमारे साथ चल रहे गाइड ने यात्रा प्रारंभ होते ही फरगना घाटी का परिचय देना शुरू कर दिया।

उन्होंने बताया कि फरगना केवल एक शहर का नाम नहीं है, बल्कि एक विशाल घाटी का नाम है, जो मध्य एशिया के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में गिनी जाती है।

चारों ओर पर्वतों से घिरी यह घाटी सदियों से कृषि, व्यापार और संस्कृति का केंद्र रही है।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

"यदि बुखारा उज़्बेकिस्तान की आत्मा है और समरकंद उसका गौरव, तो फरगना उसकी जीवनदायिनी भूमि है।"

उनके इस वाक्य ने हमारा ध्यान पूरी तरह उनकी ओर खींच लिया।

उन्होंने आगे बताया कि इसी क्षेत्र में कपास, फल, अंगूर और अनेक कृषि उत्पाद बड़ी मात्रा में पैदा होते हैं। उज़्बेकिस्तान की आर्थिक समृद्धि में फरगना घाटी का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मुझे तुरंत कपास चुनने के अपने अनुभव याद आ गए, जब हम ताश्कंद के निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में गए थे। अब हम उस क्षेत्र की ओर जा रहे थे जहाँ कृषि केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन का आधार थी।

यात्रा आगे बढ़ती रही।

रास्ते में कहीं-कहीं बर्फ से ढके पहाड़ दिखाई देने लगे। यह दृश्य हमारे लिए नया था। उज़्बेकिस्तान का वह स्वरूप, जो समरकंद और बुखारा के ऐतिहासिक नगरों में दिखाई नहीं देता था, अब हमारे सामने प्रकट हो रहा था।

हमारे गाइड ने बताया कि फरगना घाटी का भूगोल ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। पर्वतों से आने वाली नदियाँ और उपजाऊ मिट्टी इसे मध्य एशिया का एक कृषि स्वर्ग बनाती हैं।

मैं सोच रहा था कि सभ्यताओं का विकास केवल राजाओं और युद्धों से नहीं होता।

नदियाँ, खेत और किसान भी इतिहास का निर्माण करते हैं।

शायद इसी कारण फरगना का महत्व सदियों से बना हुआ है।

बस एक पहाड़ी मार्ग से गुजर रही थी। बाहर का दृश्य लगातार बदल रहा था।

कहीं बर्फ से ढकी ढलानें थीं।

कहीं छोटे-छोटे गाँव दिखाई देते थे।

कहीं दूर धुएँ की पतली रेखा किसी घर की चिमनी से उठती दिखाई देती थी।

यह दृश्य मुझे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की कुछ यात्राओं की याद दिला रहा था, यद्यपि यहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान बिल्कुल अलग थी।

यात्रा के दौरान हमारे गाइड ने एक और रोचक बात बताई।

उन्होंने कहा कि फरगना घाटी सदियों से विभिन्न संस्कृतियों और जातीय समूहों का मिलन स्थल रही है। यहाँ के लोग अपनी मेहनत, मेहमाननवाज़ी और जीवंत लोकसंस्कृति के लिए प्रसिद्ध हैं।

यह सुनकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई।

समरकंद ने हमें इतिहास दिया था।

बुखारा ने हमें संस्कृति दी थी।

अब फरगना हमें लोगों के दैनिक जीवन और प्रकृति के साथ उनके संबंध को समझने का अवसर देने वाला था।

दोपहर की ओर बढ़ते हुए हमारी बस अपनी मंज़िल के निकट पहुँच रही थी।

मैं खिड़की से बाहर देख रहा था और मन में एक नया उत्साह अनुभव कर रहा था।

छह महीने पहले जब हम भारत से उज़्बेकिस्तान आए थे, तब यह सब केवल मानचित्र पर बने कुछ नाम थे।

आज वे नाम स्मृतियों, अनुभवों और मित्रताओं में बदल चुके थे।

और अब उसी यात्रा का एक नया अध्याय हमारे सामने खुलने वाला था।

फरगना हमारा इंतज़ार कर रहा था।

उसकी उपजाऊ धरती, उसके खेत, उसके बाग़, उसके लोग और उसकी कहानियाँ हमारा स्वागत करने को तैयार थीं।

हमारी बस आगे बढ़ रही थी और मुझे लग रहा था कि मैं केवल एक नए नगर की ओर नहीं, बल्कि उज़्बेकिस्तान के एक नए रूप की ओर यात्रा कर रहा हूँ।

फरगना : उज़्बेकिस्तान के श्रम, कृषि, बाग़ों, रेशम उद्योग और लोकजीवन का प्रवेशद्वार -47

समरकंद और बुखारा की यात्रा के बाद जब हम फरगना पहुँचे, तो ऐसा लगा मानो हम उज़्बेकिस्तान के एक नए रूप से परिचित होने जा रहे हैं। यदि समरकंद इतिहास का नगर है, बुखारा संस्कृति और ज्ञान का केंद्र है, तो फरगना उज़्बेकिस्तान के श्रम, कृषि और लोकजीवन की जीवंत पाठशाला है।

यहाँ पहुँचते ही मुझे सबसे पहले जो बात प्रभावित करती थी, वह थी प्रकृति और मनुष्य के श्रम का अद्भुत सामंजस्य।

चारों ओर फैले खेत, दूर तक दिखाई देने वाले बाग़, सुव्यवस्थित गाँव और मेहनतकश लोग—ये सब मिलकर फरगना को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। यहाँ की धरती केवल उपजाऊ नहीं है, बल्कि सदियों से मानव श्रम और प्रकृति के सहयोग की कहानी कहती है।

हमारे गाइड ने बस में ही बताया था कि फरगना घाटी को मध्य एशिया का "उद्यान" कहा जाता है। चारों ओर पर्वतों से घिरी यह घाटी नदियों और सिंचाई नहरों के कारण अत्यंत उपजाऊ बनी है। यही कारण है कि उज़्बेकिस्तान की कृषि व्यवस्था में इसका विशेष स्थान है।

फरगना पहुँचकर मुझे अपने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों की याद आने लगी।

अंतर अवश्य था, परंतु किसान का जीवन हर जगह एक जैसा ही होता है।

वह धरती पर विश्वास करता है।

वह मौसम से संवाद करता है।

वह अपने श्रम से भविष्य का निर्माण करता है।

फरगना के किसानों को देखकर मुझे यही अनुभव हुआ।

1980 में जब हम वहाँ पहुँचे थे, तब सोवियत व्यवस्था अपने चरम पर थी। कृषि उत्पादन संगठित ढंग से किया जाता था। बड़े-बड़े खेत, कृषि मशीनें और योजनाबद्ध खेती देखकर हमें यह समझने का अवसर मिला कि किस प्रकार एक विशाल देश अपनी खाद्य और औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृषि का उपयोग करता है।

कपास का नाम आते ही उज़्बेकिस्तान की पहचान सामने आ जाती है।

हम स्वयं कपास चुनने के अनुभव से गुजर चुके थे। परन्तु फरगना में आकर समझ में आया कि कपास केवल एक फसल नहीं है, बल्कि यहाँ के आर्थिक जीवन की धुरी है।

जहाँ तक दृष्टि जाती, वहाँ तक फैले कपास के खेत इस बात के प्रमाण थे कि क्यों उज़्बेकिस्तान को कभी "सफेद सोने की भूमि" कहा जाता था।

परन्तु फरगना केवल कपास तक सीमित नहीं है।

यह फलों की भी धरती है।

यहाँ के अंगूर, सेब, नाशपाती, खुबानी, आड़ू और अनार पूरे सोवियत संघ में प्रसिद्ध थे। यद्यपि हम जनवरी के महीने में वहाँ थे और अधिकांश बाग़ विश्राम की अवस्था में थे, फिर भी उनके विस्तार और सुव्यवस्थित व्यवस्था को देखकर अनुमान लगाया जा सकता था कि वसंत और ग्रीष्म ऋतु में यह क्षेत्र कितना सुंदर दिखाई देता होगा।

हमारे एक स्थानीय मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा,

"यदि आप फरगना को वसंत में देखें, तो आपको लगेगा कि पूरी घाटी फूलों से बनी है।"

उसकी बात सुनकर मुझे भारत के कश्मीर और हिमाचल के फलोद्यान याद आ गए।

फरगना का एक और परिचय है—रेशम।

सदियों से यह क्षेत्र रेशम उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। निकटवर्ती नगर तो विशेष रूप से अपनी रेशम बुनाई के लिए प्रसिद्ध है।

जब हमें रेशम उद्योग की प्रक्रिया के बारे में बताया गया, तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कितने धैर्य, कौशल और परिश्रम की आवश्यकता होती है एक सुंदर रेशमी वस्त्र तैयार करने में।

रेशम मार्ग की कहानियाँ हमने बुखारा में सुनी थीं।

फरगना में आकर हमने उस रेशम को जन्म लेते हुए समझा।

यहाँ इतिहास किसी संग्रहालय में नहीं था।

वह लोगों के श्रम में जीवित था।

फरगना की सबसे बड़ी विशेषता उसके लोग हैं।

यहाँ के लोग सरल, परिश्रमी और अत्यंत आत्मीय हैं।

हम जहाँ भी गए, लोगों ने हमारा स्वागत मुस्कुराकर किया।

जब उन्हें पता चलता कि हम भारत से आए हैं, तो बातचीत और भी आत्मीय हो जाती।

कई लोग भारतीय फ़िल्मों का उल्लेख करते।

कुछ राज कपूर का नाम लेते।

कुछ भारतीय गीतों की चर्चा करते।

और कुछ भारत के बारे में जानने की उत्सुकता प्रकट करते।

उनसे बातचीत करते हुए मुझे लगा कि किसी देश को समझने का सबसे अच्छा माध्यम उसके सामान्य लोग होते हैं।

राजनीति बदलती रहती है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं।

परन्तु लोगों के हृदय में बसे भाव स्थायी होते हैं।

फरगना में मैंने उज़्बेकिस्तान का वही मानवीय चेहरा देखा।

यहाँ के गाँवों में घूमते हुए मुझे अपने देश के गाँवों की याद आती थी।

बच्चों की चंचलता।

बुज़ुर्गों की आत्मीयता।

परिवारों का सामूहिक जीवन।

त्योहारों और परंपराओं के प्रति सम्मान।

इन सबमें एक ऐसी समानता दिखाई देती थी जो भौगोलिक दूरियों को महत्वहीन बना देती है।

धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि यदि कोई विदेशी विद्यार्थी उज़्बेकिस्तान को वास्तव में समझना चाहता है, तो उसे केवल समरकंद और बुखारा के स्मारक नहीं देखने चाहिए।

उसे फरगना भी आना चाहिए।

क्योंकि यहाँ आकर वह समझ पाता है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके इतिहास में नहीं, बल्कि उसके खेतों, उसके कारखानों, उसके बाग़ों और उसके श्रमिकों में भी होती है।

समरकंद ने मुझे उज़्बेकिस्तान का गौरव दिखाया।

बुखारा ने उसकी आत्मा से परिचय कराया।

परन्तु फरगना ने मुझे उसका जीवन दिखाया।

धरती से जुड़ा हुआ जीवन।

श्रम से निर्मित जीवन।

और आशा से भरा हुआ जीवन।

इसीलिए आज भी जब मैं उज़्बेकिस्तान को याद करता हूँ, तो फरगना मेरे मन में केवल एक नगर या घाटी के रूप में नहीं उभरता।

वह मुझे उस विशाल देश के श्रम, कृषि, बाग़ों, रेशम उद्योग और लोकजीवन के प्रवेशद्वार के रूप में दिखाई देता है—एक ऐसे प्रवेशद्वार के रूप में, जहाँ से होकर मैंने उज़्बेकिस्तान के वास्तविक जीवन को निकट से समझने का सौभाग्य प्राप्त किया।

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