उजबेकिस्तान की यात्रा
ताशकंद की ओर मेरी पहली उड़ान -1
रूस जाने की मेरी कहानी अपने आप में अत्यंत रोचक, रोमांचकारी और अविस्मरणीय है। आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ तो मन उत्साह और आनंद से भर उठता है।
एक दिन प्रातःकाल हमारे घर जिला पानीपत की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सचिव कॉमरेड रघबीर सिंह जी आए। वे मेरे पिता स्वर्गीय मास्टर सीताराम जी के छात्र रह चुके थे और परिवार से उनका आत्मीय संबंध था। आते ही उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राममोहन, कुछ ही दिनों बाद तुम्हें सोवियत संघ (रूस) जाना है।"
यह समाचार सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय मेरे लिए विदेश यात्रा किसी स्वप्न से कम नहीं थी। मैं भोलेपन में यह समझता था कि जैसे रेल का टिकट लेकर हम ट्रेन में बैठ जाते हैं, उसी प्रकार हवाई जहाज में भी बैठ जाया जाता होगा। तभी उन्होंने बताया कि विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट आवश्यक होता है। "पासपोर्ट" शब्द मेरे लिए बिल्कुल नया था। मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और यात्रा में केवल दस दिन शेष थे।
भागदौड़ शुरू हुई। चंडीगढ़ के एक मित्र की सहायता से मेरा पासपोर्ट आवेदन तो हो गया, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह इतने कम समय में कैसे प्राप्त होगा। उस समय हरियाणा के ऊर्जा मंत्री श्री शमशेर सिंह सुरजेवाला थे। उनके साथ मैं एंटी-फासिस्ट आन्दोलन तथा अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के कार्यों में जुड़ा हुआ था। मैंने उनसे संपर्क किया और अपनी समस्या बताई। उन्होंने अगले दिन अपने कार्यालय में बुलाया।
मैं उनके कार्यालय पहुँचा और पूरी स्थिति बताई। उन्होंने तत्काल क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (आर.पी.ओ.) को फोन किया और कहा, "ये हमारे अच्छे साथी हैं, इनका पासपोर्ट शीघ्र बनवाइए।" मुस्कुराते हुए उन्होंने अधिकारी से कहा, "सुरजेवाला किसी का एहसान नहीं रखता, कभी मेरी सेवा की आवश्यकता हो तो अवश्य याद करना।"
उनकी कृपा से मैं उसी दिन पासपोर्ट कार्यालय, चंडीगढ़ पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि आर.पी.ओ. कार्यालय के बाहर मेरे नाम की घोषणा की जा रही थी। मैं भीतर गया, आवश्यक दस्तावेज जमा किए। अधिकारी ने कहा कि सामान्यतः इसमें पुलिस सत्यापन सहित लंबी प्रक्रिया होती है, परन्तु सुरजेवाला साहब के विशेष अनुरोध के कारण आप प्रतीक्षा कीजिए। मैं बाहर बैठ गया। लगभग शाम चार बजे मुझे मेरा पासपोर्ट मिल गया। वह क्षण मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था।
अब सारी तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी थीं। बचपन से ही हवाई जहाज के प्रति मेरे मन में विशेष आकर्षण था। जब भी आकाश में कोई विमान उड़ता दिखाई देता, उसकी आवाज सुनकर मैं और मोहल्ले के अन्य बच्चे उसकी दिशा में दौड़ पड़ते। जब तक वह हमारी आँखों से ओझल नहीं हो जाता, हम उसे निहारते रहते। आज वही सपना साकार होने जा रहा था—मैं स्वयं हवाई जहाज में बैठने वाला था।
मेरे साथ पानीपत से कॉमरेड जगदीश शर्मा जी मुझे विदा करने दिल्ली हवाई अड्डे तक आए। दिन में हमारी मुलाकात ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के अध्यक्ष तथा तत्कालीन राज्यसभा सदस्य कॉमरेड सी. के. चंद्रप्पन जी से हुई। उन्होंने हमें यात्रा से संबंधित अनेक आवश्यक निर्देश दिए।
हवाई अड्डे पर मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे साथ दो अन्य युवा साथी भी इस यात्रा पर जा रहे हैं—नवतेज सिंह, जो कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से थे और पूर्व परिचित भी थे, तथा इलाहाबाद (प्रयागराज) के सुरेश त्रिपाठी। इस प्रकार हम तीन भारतीय युवा सोवियत संघ की यात्रा के लिए तैयार थे।
उस समय डॉलर की कीमत लगभग बीस रुपये थी। यात्रा के लिए हमने चार सौ रुपये देकर बीस अमेरिकी डॉलर खरीदे, जिन्हें साथ रखना आवश्यक था। इसके अतिरिक्त सौ रुपये हवाई अड्डा कर (एयरपोर्ट टैक्स) के रूप में जमा कराए। सारी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद हम एअरोफ्लोट के विमान में सवार हुए।
रात्रि लगभग एक बजे विमान ने दिल्ली से उड़ान भरी। यह मेरे जीवन की पहली हवाई यात्रा थी। उत्साह, जिज्ञासा और रोमांच से मन भरा हुआ था। रात के अँधेरे में बादलों के ऊपर उड़ते हुए मैं बार-बार खिड़की से बाहर झाँकता और सोचता कि मैं सचमुच अपने देश की सीमाओं से बाहर निकल रहा हूँ।
लगभग चार बजे प्रातः हमारा विमान ताशकंद के आकाश में पहुँच गया। उतरने से पहले विमान कुछ देर ताशकंद शहर के ऊपर चक्कर लगा रहा था। नीचे दूर-दूर तक फैली हुई जगमगाती रोशनियाँ मानो किसी स्वप्नलोक का दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। चौड़ी सड़कों पर चलती रोशनी की कतारें, सुसज्जित नगर और अनुशासित प्रकाश व्यवस्था देखकर मन अभिभूत हो उठा।
कुछ ही क्षण बाद विमान ताशकंद हवाई अड्डे पर उतर गया। जैसे ही मैंने उस धरती पर पहला कदम रखा, मन में एक अनोखा उल्लास और गर्व की अनुभूति हुई। यह केवल एक विदेशी यात्रा नहीं थी, बल्कि मेरे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। ताशकंद की वह पहली सुबह, हवाई अड्डे की वह पहली झलक और जीवन की वह पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान आज भी मेरी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ सुरक्षित है।
राम मोहन राय
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ताशकंद में पहला दिन : अनिश्चितता, संघर्ष और नई शुरुआत
प्रातः लगभग चार बजे हमारा विमान ताशकंद हवाई अड्डे पर उतरा। उस समय ताशकंद तत्कालीन सोवियत संघ का एक प्रमुख नगर था और मध्य एशिया का महत्वपूर्ण केंद्र भी। हवाई अड्डा आधुनिक सुविधाओं तथा आकर्षक साज-सज्जा से युक्त था। हम अपना सामान प्राप्त करके उस स्थान पर जाकर बैठ गए जहाँ हमें विश्वास था कि कोई न कोई अधिकारी अथवा प्रतिनिधि हमें लेने अवश्य आएगा।
किन्तु समय बीतता गया। एक घंटा, दो घंटे, तीन घंटे और देखते-देखते पूरे छह घंटे गुजर गए। सुबह के दस बज चुके थे, परन्तु हमें लेने कोई नहीं आया। बाद में अनुमान हुआ कि संभवतः संबंधित कार्यालय सुबह दस बजे खुला होगा और तभी किसी अधिकारी को हमारी जानकारी मिली होगी।
अंततः एक युवा महिला वहाँ पहुँचीं। उनका नाम स्वेतलाना था। वह लगभग छह फुट लंबी, आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी तथा अत्यंत आत्मविश्वासी थीं। सौभाग्य से उन्हें अंग्रेज़ी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने हमारा स्वागत किया और फिर हमें वाहन में बैठाकर कॉम्सोमोल विश्वविद्यालय ले गईं, जहाँ हमारे रहने और ठहरने की व्यवस्था की गई थी।
हवाई अड्डे पर बिताए वे छह घंटे आज भी स्मृति-पटल पर अंकित हैं। हमारे पास रूसी मुद्रा नहीं थी। यदि चाय अथवा कॉफी पीनी होती तो उसके लिए लगभग डेढ़ डॉलर खर्च करने पड़ते। उस समय सोवियत रूबल का मूल्य अमेरिकी डॉलर से भी कुछ अधिक था। हमारे पास कुल बीस डॉलर ही थे, जिन्हें हमें पूरे आठ महीने के प्रवास के दौरान किसी आपातकालीन आवश्यकता के लिए सँभालकर रखना था। इसलिए हम चाहकर भी कोई अनावश्यक खर्च नहीं कर सकते थे।
समस्या केवल धन की ही नहीं थी। हमें समय का भी सही अनुमान नहीं था। भारतीय समय और ताशकंद के समय में लगभग तीन से चार घंटे का अंतर था। सोवियत संघ इतना विशाल देश था कि उसके विभिन्न क्षेत्रों में समय भी अलग-अलग था। ताशकंद मध्य एशिया में स्थित होने के कारण भारत की अपेक्षा भिन्न समय क्षेत्र में था।
सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की थी। हमें रूसी भाषा का एक शब्द भी नहीं आता था और अधिकांश लोग अंग्रेज़ी नहीं समझते थे। हम जानना चाहते थे कि सूर्योदय कब होगा, परन्तु किसी से पूछ नहीं पा रहे थे। अंततः हमें एक कागज़ और कलम मिली। हमने कागज़ पर एक गोल घेरा बनाया और उसके चारों ओर किरणें खींच दीं, ताकि वह सूर्य जैसा दिखाई दे। फिर हम लोगों को वह चित्र दिखाकर इशारों से पूछने लगे कि सूर्य कब निकलेगा। लोग हमारी बात समझ नहीं पाते और हम उनकी बात नहीं समझ पाते। इस प्रकार संकेतों और मुस्कानों के सहारे संवाद का प्रयास चलता रहा, किन्तु कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाया।
वे छह घंटे हमें बहुत भारी लग रहे थे। मन में बार-बार यही विचार आता था कि यदि पहले ही दिन इतनी कठिनाइयाँ हैं, तो आने वाले आठ महीने कैसे बीतेंगे? क्या हम इस अनजान देश में अपने आप को ढाल पाएँगे? क्या यहाँ मन लग सकेगा? ऐसे अनेक प्रश्न मन को उद्वेलित कर रहे थे।
किन्तु हॉस्टल पहुँचते ही परिस्थितियाँ बदलने लगीं। हमें अपना कमरा आवंटित कर दिया गया। सामान सुरक्षित रख दिया गया और थोड़ी राहत का अनुभव हुआ। तभी सूचना मिली कि नाश्ता करने के बाद हमें मेडिकल जाँच के लिए जाना है।
एक सरल और सौम्य स्वभाव के उज़्बेक युवक को हमारी सहायता की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे हमें मेडिकल परीक्षण केंद्र लेकर गए। वहाँ हमारा विस्तृत स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। सौभाग्य से सभी रिपोर्ट सामान्य पाई गईं। इसके बाद हमें आधिकारिक रूप से हॉस्टल में रहने की अनुमति प्रदान कर दी गई।
इस प्रकार ताशकंद में हमारा पहला दिन अनिश्चितता, प्रतीक्षा, भाषा की कठिनाइयों और मानसिक संघर्ष से आरम्भ हुआ, किन्तु धीरे-धीरे वही दिन एक नए जीवन, नई संस्कृति और नए अनुभवों की सुखद शुरुआत का आधार बन गया।
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ताशकंद : इतिहास, संस्कृति और आत्मीयता का अनुपम नगर-3
ताशकंद केवल उज़्बेकिस्तान की राजधानी ही नहीं, बल्कि मध्य एशिया के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र भी है। प्राचीन काल से ही भारत और ताशकंद के बीच घनिष्ठ संबंध रहे हैं। व्यापार, संस्कृति, शिक्षा और राजनयिक संपर्कों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के लोग सदियों से एक-दूसरे के निकट रहे हैं। इतिहास के अनेक अध्याय इस बात के साक्षी हैं कि भारत और मध्य एशिया का संबंध केवल भौगोलिक निकटता का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मीयता का भी रहा है।
"ताशकंद" शब्द का अर्थ ही एक सुंदर और आकर्षक नगर माना जाता है, और वास्तव में इसकी सुंदरता देखने योग्य है। चौड़ी सड़कों, हरियाली से भरपूर उद्यानों, सुव्यवस्थित भवनों और स्वच्छ वातावरण से सुसज्जित यह नगर आगंतुकों के मन पर गहरी छाप छोड़ता है। अक्टूबर क्रांति के बाद जब उज़्बेकिस्तान सोवियत संघ का एक गणराज्य बना, तब ताशकंद के विकास को नई गति मिली। शिक्षा, विज्ञान, उद्योग और संस्कृति के क्षेत्रों में यहाँ उल्लेखनीय प्रगति हुई और यह नगर पूरे सोवियत संघ के प्रमुख शहरों में गिना जाने लगा।
उज़्बेक भाषा यहाँ की प्रमुख भाषा है, किंतु रूसी भाषा का प्रभाव भी व्यापक रूप से दिखाई देता है। सोवियत काल में अनेक लोगों के नामों के रूसीकरण की प्रक्रिया भी देखने को मिली। उदाहरण के लिए, पारंपरिक उज़्बेक अथवा इस्लामी नामों को रूसी शैली में ढालकर बोला जाने लगा। फिर भी, इस परिवर्तन के बावजूद उज़्बेक समाज ने अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखा। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी उन्होंने अपनी जड़ों से नाता नहीं तोड़ा।
ताशकंद के बाज़ारों में घूमना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है। सोवियत काल में दुकानों को रूसी शब्द "मगाज़िन" कहा जाता था, किंतु स्थानीय लोग आज भी "बाज़ार" शब्द को आत्मीयता से प्रयोग करते हैं। इन बाज़ारों में स्थानीय जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। नगर की गलियों, चौकों और मोहल्लों के नाम स्थानीय नायकों, कवियों, कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों के नाम पर रखे गए हैं। कहीं उज़्बेक इतिहास के महान व्यक्तित्वों की स्मृतियाँ जीवित हैं तो कहीं रूस और अन्य देशों के प्रसिद्ध लोगों का सम्मान किया गया है।
उज़्बेक लोगों की वेशभूषा भी उनकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुरुष प्रायः चुस्त पायजामा, लंबा कोट या अचकन और सिर पर पारंपरिक उज़्बेक टोपी पहनते हैं। महिलाएँ भी शालीन और पूर्ण परिधान धारण करती हैं, जिनमें सलवार, लंबा कुर्ता, जैकेट और सिर पर टोपी या स्कार्फ शामिल होते हैं। आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पोशाक के प्रति उनका सम्मान आज भी बना हुआ है।
यहाँ के लोगों में सोने के प्रति विशेष आकर्षण देखने को मिलता है। अनेक लोग अपने दाँतों पर सोने की परत चढ़वाते हैं, जिससे मुस्कान में एक विशिष्ट सुनहरी चमक दिखाई देती है। यह स्थानीय संस्कृति की एक रोचक विशेषता है।
मेरे लिए ताशकंद की सबसे बड़ी विशेषता वहाँ के लोगों का प्रेम और अपनापन रहा। मेरा चेहरा कुछ गोल-मटोल होने के कारण जब मैं उज़्बेक टोपी पहनकर बाहर निकलता था, तो कई लोग मुस्कुराते हुए पूछ बैठते—"क्या आप उज़्बेक हैं?" जब मैं उन्हें बताता कि मैं हिंदुस्तान से हूँ, तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता की एक अलग ही चमक आ जाती। "हिंदुस्तानी" शब्द वे बड़े स्नेह और सम्मान के साथ उच्चारित करते थे। ऐसा लगता था मानो भारत का नाम सुनते ही उनके हृदय में कोई पुरानी आत्मीय स्मृति जाग उठती हो।
भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों की चर्चा बाबर के बिना अधूरी है। फ़रगना की धरती से निकला वह युवा शासक भारत आया और 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित कर मुगल साम्राज्य की स्थापना की। यद्यपि इतिहास की इन घटनाओं को आज के संबंधों का आधार नहीं माना जा सकता, फिर भी वे दोनों क्षेत्रों के साझा अतीत की एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य हैं।
मेरे अनुभव में ताशकंद की सबसे बड़ी पहचान उसकी इमारतें, सड़कें या बाज़ार नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों का स्नेह है। उन्होंने हर अवसर पर भारतीयों के प्रति सम्मान, प्रेम और आत्मीयता का परिचय दिया। यही कारण है कि ताशकंद मेरे लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि यादों, मित्रताओं और सांस्कृतिक निकटता का जीवंत प्रतीक बन गया है। अपनी इस यात्रा के आगामी संस्मरणों में मैं ऐसे अनेक प्रसंग साझा करूँगा, जो भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सदियों से चले आ रहे इस मानवीय संबंध की सुंदर कहानी को और अधिक उजागर करेंगे।
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ताशकंद के बाज़ार, भारतीयों के प्रति प्रेम और अविस्मरणीय आत्मीयता -4
ताशकंद में बिताए गए दिनों की अनेक स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में उसी ताजगी के साथ जीवित हैं, जैसे वे कल की ही बातें हों। उन स्मृतियों में सबसे आकर्षक स्थान ताशकंद के बाज़ारों का है। वहाँ के बाज़ार केवल खरीद-बिक्री के केंद्र नहीं थे, बल्कि स्थानीय संस्कृति, मानवीय संबंधों और आत्मीयता के जीवंत प्रतीक थे।
ताशकंद के आधुनिक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अपनी जगह थे, किंतु मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती थीं वे पारंपरिक मंडियाँ, जहाँ ताज़े फल, सब्जियाँ, दूध, मेवे, रंग-बिरंगे वस्त्र और दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुएँ सहजता से उपलब्ध हो जाती थीं। हम प्रायः सप्ताह भर की सब्जियाँ और फल एक साथ खरीद लाते और फिर निश्चिंत हो जाते कि अब कई दिनों तक बाज़ार जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
मेरे साथ अक्सर मेरे प्रिय मित्र नवतेज सिंह भी होते थे। उनकी सिख पगड़ी और विशिष्ट वेशभूषा लोगों का ध्यान तुरंत आकर्षित कर लेती थी। उस क्षेत्र में सिख समुदाय के लोग बहुत कम दिखाई देते थे, इसलिए अनेक उज़्बेक उन्हें किसी बड़े धार्मिक विद्वान या उलेमा के रूप में देखते थे। जब वे बाज़ार से गुजरते, तो कई बुज़ुर्ग सम्मानपूर्वक उन्हें सलाम करते। यह दृश्य हमारे लिए जितना आश्चर्यजनक था, उतना ही सुखद भी।
एक दिन बाज़ार में एक अत्यंत रोचक घटना घटी। हम एक उज़्बेक दुकानदार से तरबूज खरीदने पहुँचे। हमने उसका मूल्य पूछा और तरबूज चुन लिया। जब हमने पैसे देने के लिए हाथ बढ़ाया, तो दुकानदार ने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए और बड़े सम्मान के साथ बोला—
"हिन्दुस्तानी और उज़्बेकिस्तानी दोस्त... भाई-भाई!"
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा—
"तोहफ़ा!"
यह सुनकर हम असमंजस में पड़ गए। भारत की तरह उज़्बेक भाषा में भी "तोहफ़ा" शब्द उपहार के लिए प्रयुक्त होता है। हम बार-बार पैसे देने का प्रयास करते रहे, लेकिन वह प्रेमपूर्वक मना करता रहा। अंततः उसके स्नेह के आगे हमें झुकना पड़ा। हमने उज़्बेक भाषा में "तशक्कुर" अर्थात धन्यवाद कहा और भावुक मन से वहाँ से विदा ली।
ऐसे अनुभव ताशकंद में अक्सर होते थे। जब लोग पहचान जाते कि हम भारत से हैं, तो वे बड़े उत्साह से बातचीत शुरू कर देते। रूसी भाषा में पूछते—
"काक द्येला?" (कैसे हो?)
और हम मुस्कुराकर उत्तर देते—
"खराशो!" (अच्छे हैं।)
इसके बाद लगभग हर बार दो नाम अवश्य आते—
"इंदिरा गांधी कैसी हैं?"
"राज कपूर कैसे हैं?"
उनकी जिज्ञासा और अपनापन देखकर हम मुस्कुरा देते। उन्हें लगता था कि हर भारतीय का सीधा संबंध इंदिरा गांधी और राज कपूर से होगा। हम उन्हें क्या बताते कि हमने भी इंदिरा गांधी को अधिकांशतः समाचारों और दूरदर्शन पर ही देखा है और राज कपूर को उनकी फिल्मों के माध्यम से जाना है। किंतु यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण था कि भारत उनके हृदय में बसता था, और भारत का प्रतिनिधित्व उनके लिए इंदिरा गांधी और राज कपूर करते थे।
उस समय सोवियत संघ में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता चरम पर थी। राज कपूर, अमिताभ बच्चन और भारतीय सिनेमा के अनेक कलाकार वहाँ के लोगों के दिलों पर राज करते थे। एक दिन हमें पता चला कि स्थानीय सिनेमाघर में हिन्दी फिल्म "त्रिशूल" का रूसी भाषा में डब किया हुआ संस्करण प्रदर्शित हो रहा है। हम फिल्म देखने पहुँचे।
हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब देखा कि पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था। जैसे ही दर्शकों को पता चला कि कुछ भारतीय युवक फिल्म देखने आए हैं, पूरे सभागार में तालियाँ गूँज उठीं। लोगों ने खड़े होकर हमारा स्वागत किया। उन्हें शायद लगा कि हम भारत के किसी सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं। उस क्षण हमें ऐसा लगा जैसे हम साधारण विद्यार्थी नहीं, बल्कि अपने देश के सांस्कृतिक दूत हों। उस आत्मीय स्वागत ने हमारे मन को गहराई से छू लिया।
एक और घटना आज भी याद आते ही रोमांचित कर देती है।
एक शाम भोजन के बाद मैं और नवतेज सिंह टहलने निकले थे। रास्ते में दो उज़्बेक युवक मिले। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा—
"हिन्दुस्तानी?"
हमने "हाँ" कहा तो वे बड़े उत्साह से हमें गले लगाकर बोले—
"दोस्त! दोस्त!"
फिर उन्होंने आग्रह किया कि हम उनके साथ चलें। हम उनके पीछे-पीछे चल पड़े, किंतु मन में हल्का भय भी था। वे हमें शहर से कुछ दूर उस स्थान पर ले गए जहाँ नई इमारतों का निर्माण हो रहा था। चारों ओर सन्नाटा था। रास्ते भर हमारे मन में तरह-तरह के विचार आते रहे। हम सोच रहे थे कि यदि कोई अनहोनी हो गई तो किसी को यह भी पता नहीं चलेगा कि हम कहाँ गए थे।
लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे, तो देखा कि उनके कुछ और मित्र भी मौजूद थे। वे खुले वातावरण में भोजन बना रहे थे। उन्होंने अत्यंत आग्रहपूर्वक हमें अपने साथ बैठाया और भोजन कराया। उनके व्यवहार में इतना अपनापन था कि थोड़ी ही देर में हमारा सारा भय दूर हो गया।
भोजन के बाद उन्होंने हमें उज़्बेक कला की सुंदर स्मृति-चिह्न भेंट किए—छोटी-छोटी आकर्षक मूर्तियाँ, जो संभवतः चीनी मिट्टी से बनी थीं। विदा लेते समय वे हमें मुख्य सड़क तक छोड़ने आए और उनमें से एक युवक तो हमारे छात्रावास तक हमारे साथ आया, ताकि हमें कोई असुविधा न हो।
जब हम सुरक्षित हॉस्टल पहुँचे, तब जाकर हमारी साँस में साँस आई। हम दोनों हँसते हुए एक-दूसरे से बोले—"आज तो हम व्यर्थ ही डरते रहे!"
उस दिन हमने एक महत्वपूर्ण बात सीखी—दुनिया में हर जगह इंसानियत की भाषा सबसे बड़ी होती है। उन उज़्बेक युवकों ने हमें यह अनुभव कराया कि देशों की सीमाएँ भले अलग हों, लेकिन दिलों की दूरी प्रेम और मित्रता से मिट जाती है।
ताशकंद की ये स्मृतियाँ केवल यात्रा के प्रसंग नहीं हैं, बल्कि भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच उस गहरे मानवीय संबंध की जीवंत मिसाल हैं, जिसमें औपचारिक कूटनीति से अधिक महत्व दिलों की निकटता का है। वहाँ के लोगों ने बार-बार यह अनुभव कराया कि उनके लिए "हिन्दुस्तानी" केवल किसी दूसरे देश का नागरिक नहीं, बल्कि एक मित्र, एक भाई और एक सम्मानित अतिथि है। यही प्रेम, यही अपनापन और यही मानवीय गर्माहट ताशकंद की मेरी सबसे अनमोल स्मृति है।
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