पानीपत का इतिहास-2

पानीपत : इतिहास की धड़कनों को सुनने का एक प्रयास

पानीपत का नाम सुनते ही सामान्यतः लोगों के मन में तीन महान युद्धों की स्मृति उभर आती है। इतिहास की पुस्तकों में भी पानीपत का परिचय प्रायः इन्हीं युद्धों के माध्यम से कराया जाता है। किंतु मेरे लिए पानीपत का अर्थ केवल युद्धों का मैदान नहीं है। यह एक जीवंत सभ्यता, बहुआयामी संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और साझी विरासत की वह धरती है जिसने सहस्राब्दियों से भारत के इतिहास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पानीपत के इतिहास के प्रति मेरी रुचि का आरंभ मेरे छात्र जीवन में हुआ, परंतु इस रुचि को दिशा और गहराई प्रदान करने का श्रेय मेरे पूज्य पिता मास्टर सीताराम जी सैनी को जाता है। उन्होंने सन् 1928 से 1948 तक जैन हाई स्कूल, पानीपत में अध्यापक के रूप में कार्य किया। इतिहास उनके प्रिय विषयों में था। बचपन में जब मैं उनके साथ बैठता, तो वे केवल घटनाएँ नहीं सुनाते थे, बल्कि उन घटनाओं के पीछे छिपे समाज, संस्कृति और मानवीय अनुभवों की भी चर्चा करते थे।

वे अक्सर कहा करते थे कि पानीपत का इतिहास केवल तीन युद्धों का इतिहास नहीं है। यह वह भूमि है जिसने महाभारत काल से लेकर आधुनिक युग तक असंख्य उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह कथन मेरे मन में गहराई से अंकित हो गया।

वर्ष 2013 में लाहौर यात्रा के दौरान पानीपत के सुपुत्र, प्रख्यात चिंतक और राजनेता डॉ. मुबाशिर हसन से हुई मुलाकात ने इस विश्वास को और अधिक दृढ़ किया। उनका कहना था कि पानीपत बार-बार युद्धभूमि इसलिए बना क्योंकि अफगान दर्रों से दिल्ली की ओर आने वाले मार्ग पर दिल्ली के निकट इतना विशाल और खुला मैदान अन्यत्र उपलब्ध नहीं था। एक ओर यमुना का प्रवाह और दूसरी ओर वन क्षेत्र होने के कारण यह स्थान विशाल सेनाओं के लिए उपयुक्त पड़ाव सिद्ध होता था। इतिहास की अनेक निर्णायक लड़ाइयों ने इसी कारण यहाँ अपना मंच पाया।

किन्तु पानीपत की कहानी युद्धों से कहीं अधिक पुरानी और व्यापक है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें महाभारत काल तक पहुँचती हैं। परंपरा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण शांति-दूत बनकर कौरवों के पास गए थे, तब उन्होंने युद्ध टालने के लिए पाँच गाँवों की मांग की थी। उन पाँच ग्रामों में पानीपत का नाम भी लिया जाता है। इस प्रकार पानीपत भारतीय सभ्यता की उन प्राचीन स्मृतियों से जुड़ जाता है जिनकी गूँज आज भी हमारे सांस्कृतिक जीवन में सुनाई देती है।

समय के साथ यह नगर केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया। यहाँ विभिन्न आस्थाओं और परंपराओं ने अपने पदचिह्न छोड़े हैं। इस्लाम के प्रारंभिक प्रचारकों के आगमन से जुड़ी स्मृतियाँ आज भी नगर में विद्यमान हैं। गुरु नानक देव जी के चरण इस भूमि पर पड़े और उनकी स्मृति में गुरुद्वारा पहला पातशाही स्थापित हुआ। जैन धर्म की समृद्ध परंपरा ने यहाँ अपनी अमिट छाप छोड़ी और प्राचीन जैन मंदिर आज भी उस गौरवशाली विरासत के साक्षी हैं।

पानीपत की धरती को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करने वालों में महान सूफी संत हजरत बू अली शाह कलंदर का स्थान सर्वोपरि है। उनकी साधना, करुणा और मानवता का संदेश सदियों से इस नगर की आत्मा में रचा-बसा है। इसी प्रकार देवी मंदिर, आर्य समाज और अन्य धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं ने भी इस नगर के सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बनाया।

जब मैं पानीपत के इतिहास पर विचार करता हूँ तो मुझे बार-बार यह अनुभव होता है कि इतिहासकारों ने प्रायः उन राजाओं और सेनाओं को याद रखा जिन्होंने यहाँ युद्ध लड़े, परंतु उन साधारण लोगों की पीड़ा और संघर्ष को अपेक्षित स्थान नहीं मिला जिन्होंने इन युद्धों का भार अपने कंधों पर उठाया। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि वे "पानीपत के युद्ध" नहीं थे, बल्कि "पानीपत में लड़े गए युद्ध" थे। पानीपत के निवासियों ने न तो उन्हें बुलाया और न ही उनका निर्णय किया। वे तो उन संघर्षों के मौन साक्षी और सबसे बड़े पीड़ित बने। हर युद्ध के बाद टूटे घर, उजड़े परिवार और बिखरे सपनों को समेटने का कार्य इसी धरती के लोगों ने किया।

इसीलिए पानीपत की वास्तविक पहचान युद्धभूमि के रूप में नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की भूमि के रूप में अधिक महत्वपूर्ण है। यहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं ने साथ-साथ जीवन व्यतीत किया है। यही वह साझी संस्कृति है जो भारत की आत्मा का मूल स्वर है।

प्रस्तुत पुस्तक में संकलित सामग्री पानीपत के इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण आयामों से परिचित कराने का विनम्र प्रयास है। यह न तो अंतिम सत्य का दावा करती है और न ही इतिहास के सभी पक्षों को समेटने का। इतिहास एक सतत प्रवाह है और प्रत्येक पीढ़ी उसे नए दृष्टिकोण से पढ़ती है। मेरी आशा है कि यह पुस्तक पाठकों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं में पानीपत के अतीत को और अधिक गहराई से जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करेगी।

यदि यह प्रयास पाठकों को इस नगर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति नई दृष्टि प्रदान कर सके, तो मैं अपने श्रम को सफल मानूँगा।

— राम मोहन राय
संपादक

●●●●●
यह लेख आपकी पुस्तक में “भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पानीपत की भूमिका” शीर्षक से एक स्वतंत्र अध्याय या परिशिष्ट के रूप में शामिल किया जा सकता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पानीपत की भूमिका

पानीपत का नाम भारतीय इतिहास में प्रायः उन तीन प्रसिद्ध युद्धों के कारण लिया जाता है जिन्होंने देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया। किंतु यदि पानीपत के इतिहास का अध्ययन केवल युद्धभूमि के रूप में किया जाए तो यह उसके योगदान का अधूरा चित्र होगा। वस्तुतः पानीपत केवल साम्राज्यों के उत्थान-पतन का साक्षी ही नहीं रहा, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की लंबी और कठिन लड़ाई का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

स्वाधीनता का विचार किसी एक दिन या एक आंदोलन की देन नहीं था। यह अनेक पीढ़ियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम था। पानीपत ने भी इस राष्ट्रीय चेतना को अपने भीतर संजोया और समय-समय पर उसे अभिव्यक्ति दी।

1857 की क्रांति और पानीपत

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रसिद्ध सन् 1857 की क्रांति का प्रभाव पानीपत पर भी स्पष्ट रूप से पड़ा। उस समय देश के अनेक भागों की भाँति यहाँ भी अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष और विरोध की भावना विद्यमान थी। स्थानीय परंपराओं तथा ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि पानीपत के अनेक नागरिकों ने विद्रोहियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और उन्हें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहयोग प्रदान किया।

अंग्रेजी शासन इस स्थिति से चिंतित था। कहा जाता है कि विद्रोह की संभावनाओं को देखते हुए अंग्रेजों ने जींद रियासत से तोपें मंगवाकर नगर के चारों ओर तैनात कर दी थीं। ये तोपें केवल सैन्य सुरक्षा का साधन नहीं थीं, बल्कि जनता को भयभीत करने और किसी भी प्रकार के प्रतिरोध को दबाने का प्रतीक भी थीं।

उस समय पानीपत के समाज में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। एक वर्ग ऐसा था जिसने अंग्रेजी शासन के समक्ष निष्ठा व्यक्त करते हुए शांति और सुरक्षा का आश्वासन दिया। वहीं दूसरा वर्ग वह था जिसने स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में भाग लिया और उसके परिणामस्वरूप दमन तथा दंड का सामना किया। यह स्थिति उस युग की जटिल सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है।

राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी युग

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन ने संगठित स्वरूप ग्रहण किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व ने इस आंदोलन को जन-आंदोलन में परिवर्तित कर दिया। इस काल में पानीपत भी राष्ट्रीय जागरण की धारा से अछूता नहीं रहा।

नगर और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस की गतिविधियाँ बढ़ीं और अनेक स्थानीय नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें लाला देशबंधु गुप्ता का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे एक निर्भीक पत्रकार, प्रखर राष्ट्रवादी और महात्मा गांधी के अत्यंत निकट सहयोगी थे। जनसामान्य उन्हें प्रेमपूर्वक "बापू का बेटा" कहकर संबोधित करता था।

लाला देशबंधु गुप्ता ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, अनेक बार जेल यात्राएँ कीं और राष्ट्रीय चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उन्होंने केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं दिया, बल्कि पत्रकारिता के माध्यम से भी स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के विचारों का प्रचार किया।

उनके अतिरिक्त पंडित माधोराम, सोमेशचंद, माता सीतारानी (बिजली वाले परिवार) तथा अनेक अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों में भाग लेकर राष्ट्रीय संघर्ष को मजबूती प्रदान की। इन कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह, असहयोग और जनजागरण के कार्यक्रमों के माध्यम से स्वतंत्रता की अलख जगाई।

ग्रामीण पानीपत और आज़ाद हिंद फौज

पानीपत की भूमिका केवल नगर तक सीमित नहीं थी। इसके गाँवों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फौज में इस क्षेत्र के अनेक युवकों ने भाग लिया।

आज भी पानीपत के अनेक गाँवों में ऐसे परिवार मिल जाते हैं जिनके पूर्वज आज़ाद हिंद फौज से जुड़े रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इनमें से अनेक सेनानियों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया गया। यह तथ्य दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की भावना केवल शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण समाज भी उससे समान रूप से प्रेरित था।

आर्य समाज और राष्ट्रीय चेतना

हरियाणा क्षेत्र में आर्य समाज ने राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक सुधार की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पानीपत भी इसका अपवाद नहीं था। आर्य समाज से जुड़े अनेक कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के सैनिक बने।

हैदराबाद रियासत में निजामशाही के विरुद्ध चले आंदोलनों में भी पानीपत के अनेक लोगों ने भाग लिया। इन आंदोलनों ने राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक सुधार की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया।
   यदि हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का गंभीरता से अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि पानीपत का योगदान केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं था। यह एक ऐसी भूमि थी जहाँ राष्ट्रीय चेतना ने नगर और गाँव दोनों स्तरों पर अपना प्रभाव छोड़ा। यहाँ के नागरिकों ने 1857 की क्रांति से लेकर गांधी युग, आज़ाद हिंद फौज और स्वतंत्रता के बाद के राष्ट्रनिर्माण तक हर चरण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।

पानीपत का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है; यह स्वतंत्रता, संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रसेवा का इतिहास भी है। इस धरती ने जहाँ विदेशी आक्रमणों की पीड़ा को सहा, वहीं उसने स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए अनगिनत देशभक्तों को भी जन्म दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में पानीपत का नाम इसलिए सदैव आदर और गौरव के साथ लिया जाएगा।

— राम मोहन राय
●●●●●


विभाजन के बाद पानीपत : स्वतंत्रता सेनानियों की नई कर्मभूमि

भारत की स्वतंत्रता और विभाजन साथ-साथ घटित हुई दो ऐसी ऐतिहासिक घटनाएँ थीं जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। विभाजन की पीड़ा लेकर भारत आने वाले लाखों शरणार्थियों में अनेक ऐसे लोग भी थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनमें से अनेक ने पानीपत को अपनी कर्मभूमि बनाया और इस नगर के सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक तथा सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की।

आज जब हम पानीपत के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो हमें केवल इसके प्राचीन वैभव और युद्धों को ही नहीं, बल्कि उन राष्ट्रनिर्माताओं को भी याद करना चाहिए जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस नगर को नई पहचान दी।

क्रान्तिकुमार : भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत के संवाहक

विभाजन के बाद पानीपत में बसने वाले स्वतंत्रता सेनानियों में क्रान्तिकुमार का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाना चाहिए। उनका वास्तविक नाम हंसराज था। युवावस्था में वे शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, और के विचारों और व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित हुए तथा नौजवान भारत सभा से जुड़ गए।

वे नौजवान भारत सभा के प्रथम सचिव बने। बाद में संगठन में उनके एक अन्य सहयोगी हंसराज के मुखबिर बन जाने के कारण भगत सिंह ने उन्हें नया नाम "क्रान्तिकुमार" दिया। यही नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

क्रान्तिकुमार ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लगभग तेरह वर्ष कारावास में बिताए। जेल की कठिन यातनाओं और संघर्षों ने उनके संकल्प को और अधिक मजबूत किया। स्वतंत्रता और विभाजन के बाद वे पानीपत आकर बस गए।

पानीपत में उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में समाचार-पत्रों का प्रकाशन किया तथा जालंधर से प्रकाशित "मिलाप" और दिल्ली से प्रकाशित "तेज" समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया। उनके लेखन में स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी।

हरियाणा राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान जब कुछ संकीर्णतावादी और हिंसक तत्व इस आंदोलन का विरोध कर रहे थे, तब क्रान्तिकुमार ने निर्भीकता के साथ हरियाणा की जनता की आकांक्षाओं का समर्थन किया। इसी संघर्ष के दौरान उन्हें उनके साथियों विमानचंद टक्कर और संतराम लांबा सहित जीवित जला दिया गया। उनका बलिदान हरियाणा के इतिहास में लोकतांत्रिक अधिकारों और जनआकांक्षाओं के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदानों में गिना जाता है।

उनकी सुपुत्री उर्वशी शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक "शहीद क्रान्तिकुमार" उनके जीवन और संघर्षों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। क्रान्तिकुमार का जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता सेनानी केवल विदेशी शासन के विरुद्ध ही नहीं लड़ते, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित के लिए संघर्षरत रहते हैं।

मास्टर नंदलाल : संविधान निर्माता और जननेता

पानीपत के सार्वजनिक जीवन में मास्टर नंदलाल का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे मूलतः अध्यापक नहीं थे, बल्कि एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता और नाट्यकर्मी थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और जनजागरण के लिए नुक्कड़ नाटकों तथा सामाजिक नाट्य प्रस्तुतियों का सहारा लिया।

एक कुशल निर्देशक और आयोजक के रूप में उन्हें इतनी ख्याति मिली कि लोग सम्मानपूर्वक उन्हें "मास्टर जी" कहने लगे और यही नाम उनकी पहचान बन गया।

विभाजन के बाद वे पानीपत आए और शीघ्र ही सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल हो गए। वे संविधान सभा के सदस्य रहे तथा बाद में पानीपत और करनाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए विधायक भी बने।

मास्टर नंदलाल का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा, सामाजिक समरसता और पुनर्वास कार्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनकी भागीदारी उन्हें पानीपत के इतिहास में विशेष स्थान प्रदान करती है।

उनके पुत्र स्वराज कुमार ने भी स्वतंत्रता आंदोलन की परंपराओं और जनसेवा के मूल्यों को आगे बढ़ाया।

कॉमरेड रामधिता : श्रमिक आंदोलन के अग्रदूत

विभाजन के बाद पानीपत आने वाले प्रमुख जननेताओं में कॉमरेड रामधिता का नाम भी विशेष उल्लेखनीय है। वे पानीपत में कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक निर्माताओं और संगठकों में से एक थे।

जीवन-यापन के लिए उन्होंने पहले साइकिलों का व्यवसाय किया और बाद में परिवहन क्षेत्र से जुड़े, किन्तु उनका वास्तविक जीवन श्रमिकों और मेहनतकश वर्ग के संघर्षों के लिए समर्पित रहा।

उन्होंने पानीपत इंडस्ट्रियल वर्कर्स यूनियन के गठन और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रमिक अधिकारों, उचित मजदूरी, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर वे सदैव अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। पानीपत के जनसंघर्षों का इतिहास उनके योगदान के बिना अधूरा है।

मदनलाल शास्त्री : हैंडलूम उद्योग के शिल्पकार

पानीपत को आज विश्वस्तर पर हैंडलूम उद्योग के लिए जो पहचान प्राप्त है, उसके पीछे अनेक व्यक्तियों का योगदान है, जिनमें मदनलाल शास्त्री का नाम विशेष सम्मान से लिया जाना चाहिए।

विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास की चुनौती उस समय अत्यंत गंभीर थी। महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से प्रेरित होकर मदनलाल शास्त्री ने विस्थापित परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य आरम्भ किया।

उन्होंने पुरुषार्थी परिवारों को हैंडलूम बुनाई का प्रशिक्षण दिलाने और रोजगार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से अनेक परिवारों को नया जीवन मिला। समय के साथ यही प्रयास एक बड़े औद्योगिक आंदोलन में परिवर्तित हुआ और आज पानीपत देश-विदेश में हैंडलूम उत्पादों के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है।

उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी और सांसद पंडित माधोराम शर्मा के साथ मिलकर अनेक सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों को आगे बढ़ाया।

चमनलाल आहूजा : गांधीवादी राजनीति के प्रतिनिधि

चमनलाल आहूजा भी विभाजन के बाद पानीपत आए। वे महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रभावित थे और कांग्रेस संगठन के सक्रिय नेता के रूप में कार्य करते रहे।

वे सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक विभाजन के विरुद्ध मुखर आवाज़ थे। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की निरंतर वकालत की। उन्होंने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, यद्यपि उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु जनजीवन में उनका सम्मान और प्रभाव सदैव बना रहा।

डॉ. परमानंद मनूजा : गांधीवादी विचारों के प्रचारक

डॉ. परमानंद मनूजा भी विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर पानीपत में बसे। वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ गांधीवादी विचारधारा के समर्पित प्रचारक थे।

उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में विधायक भी बने। उनका जीवन समाज सेवा, जनजागरण और गांधीवादी मूल्यों के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा। उन्होंने पानीपत के नागरिक जीवन में नैतिक राजनीति और सार्वजनिक सेवा की परंपरा को मजबूत किया।

इतिहास के अनलिखे नायक

क्रान्तिकुमार, मास्टर नंदलाल, कॉमरेड रामधिता, मदनलाल शास्त्री, चमनलाल आहूजा और डॉ. परमानंद मनूजा जैसे व्यक्तित्व उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने स्वतंत्रता संग्राम को भी देखा और स्वतंत्र भारत के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

ऐसे अनेक अन्य नाम भी हैं जो इतिहास के बंद पृष्ठों में कहीं दब गए हैं। उन्होंने पानीपत को अपना घर बनाया, इसकी सामाजिक चेतना को समृद्ध किया, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवा, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा छोड़ी।

आज का आधुनिक पानीपत केवल अपने प्राचीन इतिहास और युद्धों का परिणाम नहीं है; यह उन स्वतंत्रता सेनानियों, समाजसेवियों, श्रमिक नेताओं, पत्रकारों और राष्ट्रनिर्माताओं की तपस्या का भी परिणाम है जिन्होंने विभाजन की राख से एक नए भविष्य का निर्माण किया।

— राम मोहन राय

●●●●●●
“पानीपत : युद्धभूमि से उद्योग नगरी तक” 
पानीपत : उद्योग, श्रम और पुनर्निर्माण की अद्भुत गाथा

पानीपत को सामान्यतः इतिहास के महान युद्धों की भूमि के रूप में जाना जाता है, किंतु इस नगर की पहचान केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है। यह नगर सदियों से उद्योग, हस्तकला, श्रम और उद्यमिता का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यदि पानीपत के आर्थिक इतिहास का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि इसकी समृद्धि का आधार केवल व्यापार नहीं, बल्कि यहाँ के कारीगरों की मेहनत, कौशल और दूरदर्शिता रही है।

प्राचीन काल से ही पानीपत वस्त्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। विशेष रूप से अंसारी समुदाय के जुलाहे अपनी उत्कृष्ट बुनाई कला के लिए प्रसिद्ध थे। उनके द्वारा निर्मित कंबल, लोई, खेस और अन्य वस्त्र न केवल आसपास के क्षेत्रों में, बल्कि देश के विभिन्न भागों में भी अपनी गुणवत्ता के लिए पहचाने जाते थे। पानीपत की पहचान एक ऐसे नगर के रूप में बन चुकी थी जहाँ श्रम और कौशल का अद्भुत संगम दिखाई देता था।

विभाजन की त्रासदी और गांधीजी का प्रयास

सन् 1947 के विभाजन ने पानीपत के औद्योगिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। यहाँ के अनेक मुस्लिम बुनकर और कारीगर पाकिस्तान जाने के इच्छुक नहीं थे। उनकी इस भूमि से गहरी आत्मीयता थी। यह उनकी जन्मभूमि थी, उनके पूर्वजों की धरती थी और उनके पुश्तैनी उद्योगों का केंद्र भी।

महात्मा गांधी ने इस स्थिति की गंभीरता को समझा। स्वतंत्रता के बाद वे 10 नवम्बर और 11 दिसम्बर 1947 को पानीपत आए। उन्होंने यहाँ के मुस्लिम कारीगरों और बुनकरों को भारत में ही बने रहने के लिए प्रेरित करने का भरसक प्रयास किया। गांधीजी का मानना था कि पानीपत की आर्थिक और सामाजिक संरचना में इन कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इस कार्य में स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी नेता मौलवी लकाउल्ला का उल्लेखनीय योगदान रहा। उन्होंने गांधीजी के साथ मिलकर विश्वास और सद्भाव का वातावरण बनाने का प्रयास किया। किंतु 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की शहादत के बाद अनेक लोगों का विश्वास डगमगा गया और धीरे-धीरे बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर पाकिस्तान चले गए।

नए कारीगर, नई आशा और नया उद्योग

विभाजन के कारण जहाँ अनेक पुराने कारीगर पानीपत छोड़कर चले गए, वहीं पाकिस्तान से बड़ी संख्या में ऐसे शरणार्थी परिवार भारत आए जिनका पारंपरिक व्यवसाय भी हथकरघा और वस्त्र उद्योग से जुड़ा हुआ था।

गांधीवादी कार्यकर्ताओं और रचनात्मक संस्थाओं ने इन विस्थापित परिवारों को पुनर्वास देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। खादी और ग्रामोद्योग के माध्यम से उन्हें रोजगार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। इस कार्य में स्वतंत्रता सेनानी श्री सोमदत्त वेदालंकार, जिन्हें पूरा क्षेत्र स्नेहपूर्वक "सोम भाई" के नाम से जानता था, की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

सोम भाई को अंबाला जिले के बबियाल क्षेत्र से पानीपत लाया गया था। उन्होंने खादी आश्रम तथा अन्य रचनात्मक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर महिलाओं को चरखा और पुरुषों को खादी तथा ग्रामोद्योग से जोड़ने का अभियान चलाया। इससे अनेक परिवारों को सम्मानजनक आजीविका प्राप्त हुई।

इसी काल में हैदराबादी बिरादरी के प्रसिद्ध प्रशिक्षक उस्ताद नंदलाल ने भी पानीपत में हथकरघा उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने पाकिस्तान से आए बुनकर परिवारों को प्रशिक्षण दिया और उनके कौशल को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

दूसरी ओर मदनलाल शास्त्री जैसे समाजसेवियों ने विस्थापित परिवारों को हथकरघा उद्योग से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके प्रयासों ने हजारों परिवारों के जीवन में नई आशा का संचार किया।

विश्व मानचित्र पर पानीपत

इन सभी प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दशकों में पानीपत का हथकरघा उद्योग अभूतपूर्व रूप से विकसित हुआ। कंबल, दरी, खेस, कालीन, चादरें, तौलिये और गृह सज्जा से संबंधित वस्तुओं के निर्माण में पानीपत ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर ली।

आज पानीपत को भारत की "हैंडलूम सिटी" कहा जाता है। यहाँ निर्मित उत्पाद विश्व के अनेक देशों में निर्यात किए जाते हैं। पानीपत का नाम देश के सबसे बड़े हैंडलूम और होम-फर्निशिंग निर्यात केंद्रों में लिया जाता है। यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि हजारों कारीगरों, उद्यमियों और श्रमिकों के सामूहिक परिश्रम का परिणाम है।

अन्य उद्योगों का विकास

पानीपत का औद्योगिक विकास केवल हथकरघा उद्योग तक सीमित नहीं रहा। विभाजन के बाद यहाँ अनेक नए उद्योग विकसित हुए।

पानीपत के प्रसिद्ध अचार उद्योग की स्थापना में भी विभाजन के बाद आए परिवारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी प्रकार बर्तन निर्माण का कार्य, जो पहले छोटे स्तर पर होता था, धीरे-धीरे बड़े उद्योग के रूप में विकसित हुआ।

स्थानीय परंपराओं के अनुसार तृतीय पानीपत युद्ध के समय मराठा सेना अपने साथ धातु-कला में दक्ष ठठेरा समुदाय के कारीगरों को लाई थी। युद्ध के बाद उनमें से अनेक परिवार यहीं बस गए और उन्होंने धातु उद्योग को आगे बढ़ाया। समय के साथ यह परंपरा स्थानीय उद्योग का महत्वपूर्ण अंग बन गई।

इसके अतिरिक्त हाथीदाँत की चूड़ियों तथा अन्य हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्माण भी लंबे समय तक पानीपत की विशेष पहचान बना रहा।

आधुनिक औद्योगिक नगर

आज का पानीपत हरियाणा के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक नगरों में से एक है। यहाँ बड़े सार्वजनिक और निजी औद्योगिक प्रतिष्ठान स्थापित हैं। उर्वरक उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, पेट्रो-रसायन उद्योग तथा तेल शोधन जैसे क्षेत्रों में भी पानीपत ने राष्ट्रीय पहचान प्राप्त की है।

इसके साथ-साथ हजारों लघु और मध्यम उद्योग इस नगर की आर्थिक रीढ़ बने हुए हैं। यही उद्योग लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करते हैं।

मिनी इंडिया का स्वरूप

पानीपत की औद्योगिक प्रगति का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह हुआ कि इसने देश के विभिन्न राज्यों के लाखों लोगों को रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर प्रदान किया। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा देश के अनेक अन्य भागों से लोग यहाँ आकर बसे और इस नगर के विकास में सहभागी बने।

आज पानीपत केवल हरियाणा का नगर नहीं रह गया है। यह विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का संगम बन चुका है। इस दृष्टि से इसे "मिनी इंडिया" कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
   पानीपत का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है; यह श्रम, संघर्ष, पुनर्निर्माण और उद्यमिता का इतिहास भी है। इस नगर ने विभाजन की पीड़ा को अवसर में बदला, विस्थापितों को सम्मान दिया, कारीगरों को पहचान दी और उद्योग को संस्कृति का स्वरूप प्रदान किया।

यदि युद्धों ने पानीपत को इतिहास में स्थान दिलाया, तो इसके कारीगरों, श्रमिकों और उद्यमियों ने उसे आधुनिक भारत के आर्थिक मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया। यही पानीपत की वास्तविक शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत भी।

— राम मोहन राय

Comments

Popular posts from this blog

Global Youth Festival, 4th day ,Panipat/05.10.2025. Sant Nirankari Mission/National Youth Project/Gandhi Global Family

पानीपत की बहादुर बेटी सैयदा- जो ना थकी और ना झुकी :

Global Youth Festival, Panipat, .Some glimpses of 3rd day./04.10.2025. National Youth Project, Gandhi Global Family, Sant Nirankari Mission