पानीपत का इतिहास-2

पानीपत : इतिहास की धड़कनों को सुनने का एक प्रयास -1

पानीपत का नाम सुनते ही सामान्यतः लोगों के मन में तीन महान युद्धों की स्मृति उभर आती है। इतिहास की पुस्तकों में भी पानीपत का परिचय प्रायः इन्हीं युद्धों के माध्यम से कराया जाता है। किंतु मेरे लिए पानीपत का अर्थ केवल युद्धों का मैदान नहीं है। यह एक जीवंत सभ्यता, बहुआयामी संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और साझी विरासत की वह धरती है जिसने सहस्राब्दियों से भारत के इतिहास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पानीपत के इतिहास के प्रति मेरी रुचि का आरंभ मेरे छात्र जीवन में हुआ, परंतु इस रुचि को दिशा और गहराई प्रदान करने का श्रेय मेरे पूज्य पिता मास्टर सीताराम जी सैनी को जाता है। उन्होंने सन् 1928 से 1948 तक जैन हाई स्कूल, पानीपत में अध्यापक के रूप में कार्य किया। इतिहास उनके प्रिय विषयों में था। बचपन में जब मैं उनके साथ बैठता, तो वे केवल घटनाएँ नहीं सुनाते थे, बल्कि उन घटनाओं के पीछे छिपे समाज, संस्कृति और मानवीय अनुभवों की भी चर्चा करते थे।

वे अक्सर कहा करते थे कि पानीपत का इतिहास केवल तीन युद्धों का इतिहास नहीं है। यह वह भूमि है जिसने महाभारत काल से लेकर आधुनिक युग तक असंख्य उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह कथन मेरे मन में गहराई से अंकित हो गया।

वर्ष 2013 में लाहौर यात्रा के दौरान पानीपत के सुपुत्र, प्रख्यात चिंतक और राजनेता डॉ. मुबाशिर हसन से हुई मुलाकात ने इस विश्वास को और अधिक दृढ़ किया। उनका कहना था कि पानीपत बार-बार युद्धभूमि इसलिए बना क्योंकि अफगान दर्रों से दिल्ली की ओर आने वाले मार्ग पर दिल्ली के निकट इतना विशाल और खुला मैदान अन्यत्र उपलब्ध नहीं था। एक ओर यमुना का प्रवाह और दूसरी ओर वन क्षेत्र होने के कारण यह स्थान विशाल सेनाओं के लिए उपयुक्त पड़ाव सिद्ध होता था। इतिहास की अनेक निर्णायक लड़ाइयों ने इसी कारण यहाँ अपना मंच पाया।

किन्तु पानीपत की कहानी युद्धों से कहीं अधिक पुरानी और व्यापक है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें महाभारत काल तक पहुँचती हैं। परंपरा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण शांति-दूत बनकर कौरवों के पास गए थे, तब उन्होंने युद्ध टालने के लिए पाँच गाँवों की मांग की थी। उन पाँच ग्रामों में पानीपत का नाम भी लिया जाता है। इस प्रकार पानीपत भारतीय सभ्यता की उन प्राचीन स्मृतियों से जुड़ जाता है जिनकी गूँज आज भी हमारे सांस्कृतिक जीवन में सुनाई देती है।

समय के साथ यह नगर केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया। यहाँ विभिन्न आस्थाओं और परंपराओं ने अपने पदचिह्न छोड़े हैं। इस्लाम के प्रारंभिक प्रचारकों के आगमन से जुड़ी स्मृतियाँ आज भी नगर में विद्यमान हैं। गुरु नानक देव जी के चरण इस भूमि पर पड़े और उनकी स्मृति में गुरुद्वारा पहला पातशाही स्थापित हुआ। जैन धर्म की समृद्ध परंपरा ने यहाँ अपनी अमिट छाप छोड़ी और प्राचीन जैन मंदिर आज भी उस गौरवशाली विरासत के साक्षी हैं।

पानीपत की धरती को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करने वालों में महान सूफी संत हजरत बू अली शाह कलंदर का स्थान सर्वोपरि है। उनकी साधना, करुणा और मानवता का संदेश सदियों से इस नगर की आत्मा में रचा-बसा है। इसी प्रकार देवी मंदिर, आर्य समाज और अन्य धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं ने भी इस नगर के सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बनाया।

जब मैं पानीपत के इतिहास पर विचार करता हूँ तो मुझे बार-बार यह अनुभव होता है कि इतिहासकारों ने प्रायः उन राजाओं और सेनाओं को याद रखा जिन्होंने यहाँ युद्ध लड़े, परंतु उन साधारण लोगों की पीड़ा और संघर्ष को अपेक्षित स्थान नहीं मिला जिन्होंने इन युद्धों का भार अपने कंधों पर उठाया। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि वे "पानीपत के युद्ध" नहीं थे, बल्कि "पानीपत में लड़े गए युद्ध" थे। पानीपत के निवासियों ने न तो उन्हें बुलाया और न ही उनका निर्णय किया। वे तो उन संघर्षों के मौन साक्षी और सबसे बड़े पीड़ित बने। हर युद्ध के बाद टूटे घर, उजड़े परिवार और बिखरे सपनों को समेटने का कार्य इसी धरती के लोगों ने किया।

इसीलिए पानीपत की वास्तविक पहचान युद्धभूमि के रूप में नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की भूमि के रूप में अधिक महत्वपूर्ण है। यहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं ने साथ-साथ जीवन व्यतीत किया है। यही वह साझी संस्कृति है जो भारत की आत्मा का मूल स्वर है।

प्रस्तुत पुस्तक में संकलित सामग्री पानीपत के इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण आयामों से परिचित कराने का विनम्र प्रयास है। यह न तो अंतिम सत्य का दावा करती है और न ही इतिहास के सभी पक्षों को समेटने का। इतिहास एक सतत प्रवाह है और प्रत्येक पीढ़ी उसे नए दृष्टिकोण से पढ़ती है। मेरी आशा है कि यह पुस्तक पाठकों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं में पानीपत के अतीत को और अधिक गहराई से जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करेगी।

यदि यह प्रयास पाठकों को इस नगर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति नई दृष्टि प्रदान कर सके, तो मैं अपने श्रम को सफल मानूँगा।

— राम मोहन राय
संपादक

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पानीपत की भूमिका-2

पानीपत का नाम भारतीय इतिहास में प्रायः उन तीन प्रसिद्ध युद्धों के कारण लिया जाता है जिन्होंने देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया। किंतु यदि पानीपत के इतिहास का अध्ययन केवल युद्धभूमि के रूप में किया जाए तो यह उसके योगदान का अधूरा चित्र होगा। वस्तुतः पानीपत केवल साम्राज्यों के उत्थान-पतन का साक्षी ही नहीं रहा, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की लंबी और कठिन लड़ाई का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

स्वाधीनता का विचार किसी एक दिन या एक आंदोलन की देन नहीं था। यह अनेक पीढ़ियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम था। पानीपत ने भी इस राष्ट्रीय चेतना को अपने भीतर संजोया और समय-समय पर उसे अभिव्यक्ति दी।

1857 की क्रांति और पानीपत

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रसिद्ध सन् 1857 की क्रांति का प्रभाव पानीपत पर भी स्पष्ट रूप से पड़ा। उस समय देश के अनेक भागों की भाँति यहाँ भी अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष और विरोध की भावना विद्यमान थी। स्थानीय परंपराओं तथा ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि पानीपत के अनेक नागरिकों ने विद्रोहियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और उन्हें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहयोग प्रदान किया।

अंग्रेजी शासन इस स्थिति से चिंतित था। कहा जाता है कि विद्रोह की संभावनाओं को देखते हुए अंग्रेजों ने जींद रियासत से तोपें मंगवाकर नगर के चारों ओर तैनात कर दी थीं। ये तोपें केवल सैन्य सुरक्षा का साधन नहीं थीं, बल्कि जनता को भयभीत करने और किसी भी प्रकार के प्रतिरोध को दबाने का प्रतीक भी थीं।

उस समय पानीपत के समाज में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। एक वर्ग ऐसा था जिसने अंग्रेजी शासन के समक्ष निष्ठा व्यक्त करते हुए शांति और सुरक्षा का आश्वासन दिया। वहीं दूसरा वर्ग वह था जिसने स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में भाग लिया और उसके परिणामस्वरूप दमन तथा दंड का सामना किया। यह स्थिति उस युग की जटिल सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है।

राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी युग

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन ने संगठित स्वरूप ग्रहण किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व ने इस आंदोलन को जन-आंदोलन में परिवर्तित कर दिया। इस काल में पानीपत भी राष्ट्रीय जागरण की धारा से अछूता नहीं रहा।

नगर और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस की गतिविधियाँ बढ़ीं और अनेक स्थानीय नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें लाला देशबंधु गुप्ता का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे एक निर्भीक पत्रकार, प्रखर राष्ट्रवादी और महात्मा गांधी के अत्यंत निकट सहयोगी थे। जनसामान्य उन्हें प्रेमपूर्वक "बापू का बेटा" कहकर संबोधित करता था।

लाला देशबंधु गुप्ता ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, अनेक बार जेल यात्राएँ कीं और राष्ट्रीय चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उन्होंने केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं दिया, बल्कि पत्रकारिता के माध्यम से भी स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के विचारों का प्रचार किया।

उनके अतिरिक्त पंडित माधोराम, सोमेशचंद, माता सीतारानी (बिजली वाले परिवार) तथा अनेक अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों में भाग लेकर राष्ट्रीय संघर्ष को मजबूती प्रदान की। इन कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह, असहयोग और जनजागरण के कार्यक्रमों के माध्यम से स्वतंत्रता की अलख जगाई।

ग्रामीण पानीपत और आज़ाद हिंद फौज

पानीपत की भूमिका केवल नगर तक सीमित नहीं थी। इसके गाँवों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फौज में इस क्षेत्र के अनेक युवकों ने भाग लिया।

आज भी पानीपत के अनेक गाँवों में ऐसे परिवार मिल जाते हैं जिनके पूर्वज आज़ाद हिंद फौज से जुड़े रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इनमें से अनेक सेनानियों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया गया। यह तथ्य दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की भावना केवल शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण समाज भी उससे समान रूप से प्रेरित था।

आर्य समाज और राष्ट्रीय चेतना

हरियाणा क्षेत्र में आर्य समाज ने राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक सुधार की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पानीपत भी इसका अपवाद नहीं था। आर्य समाज से जुड़े अनेक कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के सैनिक बने।

हैदराबाद रियासत में निजामशाही के विरुद्ध चले आंदोलनों में भी पानीपत के अनेक लोगों ने भाग लिया। इन आंदोलनों ने राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक सुधार की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया।
   यदि हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का गंभीरता से अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि पानीपत का योगदान केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं था। यह एक ऐसी भूमि थी जहाँ राष्ट्रीय चेतना ने नगर और गाँव दोनों स्तरों पर अपना प्रभाव छोड़ा। यहाँ के नागरिकों ने 1857 की क्रांति से लेकर गांधी युग, आज़ाद हिंद फौज और स्वतंत्रता के बाद के राष्ट्रनिर्माण तक हर चरण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।

पानीपत का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है; यह स्वतंत्रता, संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रसेवा का इतिहास भी है। इस धरती ने जहाँ विदेशी आक्रमणों की पीड़ा को सहा, वहीं उसने स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए अनगिनत देशभक्तों को भी जन्म दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में पानीपत का नाम इसलिए सदैव आदर और गौरव के साथ लिया जाएगा।

— राम मोहन राय
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विभाजन के बाद पानीपत : स्वतंत्रता सेनानियों की नई कर्मभूमि-3

भारत की स्वतंत्रता और विभाजन साथ-साथ घटित हुई दो ऐसी ऐतिहासिक घटनाएँ थीं जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। विभाजन की पीड़ा लेकर भारत आने वाले लाखों शरणार्थियों में अनेक ऐसे लोग भी थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनमें से अनेक ने पानीपत को अपनी कर्मभूमि बनाया और इस नगर के सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक तथा सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की।

आज जब हम पानीपत के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो हमें केवल इसके प्राचीन वैभव और युद्धों को ही नहीं, बल्कि उन राष्ट्रनिर्माताओं को भी याद करना चाहिए जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस नगर को नई पहचान दी।

क्रान्तिकुमार : भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत के संवाहक

विभाजन के बाद पानीपत में बसने वाले स्वतंत्रता सेनानियों में क्रान्तिकुमार का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाना चाहिए। उनका वास्तविक नाम हंसराज था। युवावस्था में वे शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, और के विचारों और व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित हुए तथा नौजवान भारत सभा से जुड़ गए।

वे नौजवान भारत सभा के प्रथम सचिव बने। बाद में संगठन में उनके एक अन्य सहयोगी हंसराज के मुखबिर बन जाने के कारण भगत सिंह ने उन्हें नया नाम "क्रान्तिकुमार" दिया। यही नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

क्रान्तिकुमार ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लगभग तेरह वर्ष कारावास में बिताए। जेल की कठिन यातनाओं और संघर्षों ने उनके संकल्प को और अधिक मजबूत किया। स्वतंत्रता और विभाजन के बाद वे पानीपत आकर बस गए।

पानीपत में उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में समाचार-पत्रों का प्रकाशन किया तथा जालंधर से प्रकाशित "मिलाप" और दिल्ली से प्रकाशित "तेज" समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया। उनके लेखन में स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी।

हरियाणा राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान जब कुछ संकीर्णतावादी और हिंसक तत्व इस आंदोलन का विरोध कर रहे थे, तब क्रान्तिकुमार ने निर्भीकता के साथ हरियाणा की जनता की आकांक्षाओं का समर्थन किया। इसी संघर्ष के दौरान उन्हें उनके साथियों विमानचंद टक्कर और संतराम लांबा सहित जीवित जला दिया गया। उनका बलिदान हरियाणा के इतिहास में लोकतांत्रिक अधिकारों और जनआकांक्षाओं के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदानों में गिना जाता है।

उनकी सुपुत्री उर्वशी शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक "शहीद क्रान्तिकुमार" उनके जीवन और संघर्षों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। क्रान्तिकुमार का जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता सेनानी केवल विदेशी शासन के विरुद्ध ही नहीं लड़ते, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित के लिए संघर्षरत रहते हैं।

मास्टर नंदलाल : संविधान निर्माता और जननेता

पानीपत के सार्वजनिक जीवन में मास्टर नंदलाल का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे मूलतः अध्यापक नहीं थे, बल्कि एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता और नाट्यकर्मी थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और जनजागरण के लिए नुक्कड़ नाटकों तथा सामाजिक नाट्य प्रस्तुतियों का सहारा लिया।

एक कुशल निर्देशक और आयोजक के रूप में उन्हें इतनी ख्याति मिली कि लोग सम्मानपूर्वक उन्हें "मास्टर जी" कहने लगे और यही नाम उनकी पहचान बन गया।

विभाजन के बाद वे पानीपत आए और शीघ्र ही सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल हो गए। वे संविधान सभा के सदस्य रहे तथा बाद में पानीपत और करनाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए विधायक भी बने।

मास्टर नंदलाल का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा, सामाजिक समरसता और पुनर्वास कार्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनकी भागीदारी उन्हें पानीपत के इतिहास में विशेष स्थान प्रदान करती है।

उनके पुत्र स्वराज कुमार ने भी स्वतंत्रता आंदोलन की परंपराओं और जनसेवा के मूल्यों को आगे बढ़ाया।

कॉमरेड रामधिता : श्रमिक आंदोलन के अग्रदूत

विभाजन के बाद पानीपत आने वाले प्रमुख जननेताओं में कॉमरेड रामधिता का नाम भी विशेष उल्लेखनीय है। वे पानीपत में कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक निर्माताओं और संगठकों में से एक थे।

जीवन-यापन के लिए उन्होंने पहले साइकिलों का व्यवसाय किया और बाद में परिवहन क्षेत्र से जुड़े, किन्तु उनका वास्तविक जीवन श्रमिकों और मेहनतकश वर्ग के संघर्षों के लिए समर्पित रहा।

उन्होंने पानीपत इंडस्ट्रियल वर्कर्स यूनियन के गठन और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रमिक अधिकारों, उचित मजदूरी, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर वे सदैव अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। पानीपत के जनसंघर्षों का इतिहास उनके योगदान के बिना अधूरा है।

मदनलाल शास्त्री : हैंडलूम उद्योग के शिल्पकार

पानीपत को आज विश्वस्तर पर हैंडलूम उद्योग के लिए जो पहचान प्राप्त है, उसके पीछे अनेक व्यक्तियों का योगदान है, जिनमें मदनलाल शास्त्री का नाम विशेष सम्मान से लिया जाना चाहिए।

विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास की चुनौती उस समय अत्यंत गंभीर थी। महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से प्रेरित होकर मदनलाल शास्त्री ने विस्थापित परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य आरम्भ किया।

उन्होंने पुरुषार्थी परिवारों को हैंडलूम बुनाई का प्रशिक्षण दिलाने और रोजगार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से अनेक परिवारों को नया जीवन मिला। समय के साथ यही प्रयास एक बड़े औद्योगिक आंदोलन में परिवर्तित हुआ और आज पानीपत देश-विदेश में हैंडलूम उत्पादों के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है।

उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी और सांसद पंडित माधोराम शर्मा के साथ मिलकर अनेक सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों को आगे बढ़ाया।

चमनलाल आहूजा : गांधीवादी राजनीति के प्रतिनिधि

चमनलाल आहूजा भी विभाजन के बाद पानीपत आए। वे महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रभावित थे और कांग्रेस संगठन के सक्रिय नेता के रूप में कार्य करते रहे।

वे सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक विभाजन के विरुद्ध मुखर आवाज़ थे। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की निरंतर वकालत की। उन्होंने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, यद्यपि उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु जनजीवन में उनका सम्मान और प्रभाव सदैव बना रहा।

डॉ. परमानंद मनूजा : गांधीवादी विचारों के प्रचारक

डॉ. परमानंद मनूजा भी विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर पानीपत में बसे। वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ गांधीवादी विचारधारा के समर्पित प्रचारक थे।

उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में विधायक भी बने। उनका जीवन समाज सेवा, जनजागरण और गांधीवादी मूल्यों के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा। उन्होंने पानीपत के नागरिक जीवन में नैतिक राजनीति और सार्वजनिक सेवा की परंपरा को मजबूत किया।

इतिहास के अनलिखे नायक

क्रान्तिकुमार, मास्टर नंदलाल, कॉमरेड रामधिता, मदनलाल शास्त्री, चमनलाल आहूजा और डॉ. परमानंद मनूजा जैसे व्यक्तित्व उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने स्वतंत्रता संग्राम को भी देखा और स्वतंत्र भारत के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

ऐसे अनेक अन्य नाम भी हैं जो इतिहास के बंद पृष्ठों में कहीं दब गए हैं। उन्होंने पानीपत को अपना घर बनाया, इसकी सामाजिक चेतना को समृद्ध किया, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवा, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा छोड़ी।

आज का आधुनिक पानीपत केवल अपने प्राचीन इतिहास और युद्धों का परिणाम नहीं है; यह उन स्वतंत्रता सेनानियों, समाजसेवियों, श्रमिक नेताओं, पत्रकारों और राष्ट्रनिर्माताओं की तपस्या का भी परिणाम है जिन्होंने विभाजन की राख से एक नए भविष्य का निर्माण किया।

— राम मोहन राय

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“पानीपत : युद्धभूमि से उद्योग नगरी तक” 
पानीपत : उद्योग, श्रम और पुनर्निर्माण की अद्भुत गाथा-4

पानीपत को सामान्यतः इतिहास के महान युद्धों की भूमि के रूप में जाना जाता है, किंतु इस नगर की पहचान केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है। यह नगर सदियों से उद्योग, हस्तकला, श्रम और उद्यमिता का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यदि पानीपत के आर्थिक इतिहास का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि इसकी समृद्धि का आधार केवल व्यापार नहीं, बल्कि यहाँ के कारीगरों की मेहनत, कौशल और दूरदर्शिता रही है।

प्राचीन काल से ही पानीपत वस्त्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। विशेष रूप से अंसारी समुदाय के जुलाहे अपनी उत्कृष्ट बुनाई कला के लिए प्रसिद्ध थे। उनके द्वारा निर्मित कंबल, लोई, खेस और अन्य वस्त्र न केवल आसपास के क्षेत्रों में, बल्कि देश के विभिन्न भागों में भी अपनी गुणवत्ता के लिए पहचाने जाते थे। पानीपत की पहचान एक ऐसे नगर के रूप में बन चुकी थी जहाँ श्रम और कौशल का अद्भुत संगम दिखाई देता था।

विभाजन की त्रासदी और गांधीजी का प्रयास

सन् 1947 के विभाजन ने पानीपत के औद्योगिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। यहाँ के अनेक मुस्लिम बुनकर और कारीगर पाकिस्तान जाने के इच्छुक नहीं थे। उनकी इस भूमि से गहरी आत्मीयता थी। यह उनकी जन्मभूमि थी, उनके पूर्वजों की धरती थी और उनके पुश्तैनी उद्योगों का केंद्र भी।

महात्मा गांधी ने इस स्थिति की गंभीरता को समझा। स्वतंत्रता के बाद वे 10 नवम्बर और 11 दिसम्बर 1947 को पानीपत आए। उन्होंने यहाँ के मुस्लिम कारीगरों और बुनकरों को भारत में ही बने रहने के लिए प्रेरित करने का भरसक प्रयास किया। गांधीजी का मानना था कि पानीपत की आर्थिक और सामाजिक संरचना में इन कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इस कार्य में स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी नेता मौलवी लकाउल्ला का उल्लेखनीय योगदान रहा। उन्होंने गांधीजी के साथ मिलकर विश्वास और सद्भाव का वातावरण बनाने का प्रयास किया। किंतु 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की शहादत के बाद अनेक लोगों का विश्वास डगमगा गया और धीरे-धीरे बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर पाकिस्तान चले गए।

नए कारीगर, नई आशा और नया उद्योग

विभाजन के कारण जहाँ अनेक पुराने कारीगर पानीपत छोड़कर चले गए, वहीं पाकिस्तान से बड़ी संख्या में ऐसे शरणार्थी परिवार भारत आए जिनका पारंपरिक व्यवसाय भी हथकरघा और वस्त्र उद्योग से जुड़ा हुआ था।

गांधीवादी कार्यकर्ताओं और रचनात्मक संस्थाओं ने इन विस्थापित परिवारों को पुनर्वास देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। खादी और ग्रामोद्योग के माध्यम से उन्हें रोजगार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। इस कार्य में स्वतंत्रता सेनानी श्री सोमदत्त वेदालंकार, जिन्हें पूरा क्षेत्र स्नेहपूर्वक "सोम भाई" के नाम से जानता था, की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

सोम भाई को अंबाला जिले के बबियाल क्षेत्र से पानीपत लाया गया था। उन्होंने खादी आश्रम तथा अन्य रचनात्मक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर महिलाओं को चरखा और पुरुषों को खादी तथा ग्रामोद्योग से जोड़ने का अभियान चलाया। इससे अनेक परिवारों को सम्मानजनक आजीविका प्राप्त हुई।

इसी काल में हैदराबादी बिरादरी के प्रसिद्ध प्रशिक्षक उस्ताद नंदलाल ने भी पानीपत में हथकरघा उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने पाकिस्तान से आए बुनकर परिवारों को प्रशिक्षण दिया और उनके कौशल को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

दूसरी ओर मदनलाल शास्त्री जैसे समाजसेवियों ने विस्थापित परिवारों को हथकरघा उद्योग से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके प्रयासों ने हजारों परिवारों के जीवन में नई आशा का संचार किया।

विश्व मानचित्र पर पानीपत

इन सभी प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दशकों में पानीपत का हथकरघा उद्योग अभूतपूर्व रूप से विकसित हुआ। कंबल, दरी, खेस, कालीन, चादरें, तौलिये और गृह सज्जा से संबंधित वस्तुओं के निर्माण में पानीपत ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर ली।

आज पानीपत को भारत की "हैंडलूम सिटी" कहा जाता है। यहाँ निर्मित उत्पाद विश्व के अनेक देशों में निर्यात किए जाते हैं। पानीपत का नाम देश के सबसे बड़े हैंडलूम और होम-फर्निशिंग निर्यात केंद्रों में लिया जाता है। यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि हजारों कारीगरों, उद्यमियों और श्रमिकों के सामूहिक परिश्रम का परिणाम है।

अन्य उद्योगों का विकास

पानीपत का औद्योगिक विकास केवल हथकरघा उद्योग तक सीमित नहीं रहा। विभाजन के बाद यहाँ अनेक नए उद्योग विकसित हुए।

पानीपत के प्रसिद्ध अचार उद्योग की स्थापना में भी विभाजन के बाद आए परिवारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी प्रकार बर्तन निर्माण का कार्य, जो पहले छोटे स्तर पर होता था, धीरे-धीरे बड़े उद्योग के रूप में विकसित हुआ।

स्थानीय परंपराओं के अनुसार तृतीय पानीपत युद्ध के समय मराठा सेना अपने साथ धातु-कला में दक्ष ठठेरा समुदाय के कारीगरों को लाई थी। युद्ध के बाद उनमें से अनेक परिवार यहीं बस गए और उन्होंने धातु उद्योग को आगे बढ़ाया। समय के साथ यह परंपरा स्थानीय उद्योग का महत्वपूर्ण अंग बन गई।

इसके अतिरिक्त हाथीदाँत की चूड़ियों तथा अन्य हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्माण भी लंबे समय तक पानीपत की विशेष पहचान बना रहा।

आधुनिक औद्योगिक नगर

आज का पानीपत हरियाणा के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक नगरों में से एक है। यहाँ बड़े सार्वजनिक और निजी औद्योगिक प्रतिष्ठान स्थापित हैं। उर्वरक उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, पेट्रो-रसायन उद्योग तथा तेल शोधन जैसे क्षेत्रों में भी पानीपत ने राष्ट्रीय पहचान प्राप्त की है।

इसके साथ-साथ हजारों लघु और मध्यम उद्योग इस नगर की आर्थिक रीढ़ बने हुए हैं। यही उद्योग लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करते हैं।

मिनी इंडिया का स्वरूप

पानीपत की औद्योगिक प्रगति का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह हुआ कि इसने देश के विभिन्न राज्यों के लाखों लोगों को रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर प्रदान किया। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा देश के अनेक अन्य भागों से लोग यहाँ आकर बसे और इस नगर के विकास में सहभागी बने।

आज पानीपत केवल हरियाणा का नगर नहीं रह गया है। यह विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का संगम बन चुका है। इस दृष्टि से इसे "मिनी इंडिया" कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
   पानीपत का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है; यह श्रम, संघर्ष, पुनर्निर्माण और उद्यमिता का इतिहास भी है। इस नगर ने विभाजन की पीड़ा को अवसर में बदला, विस्थापितों को सम्मान दिया, कारीगरों को पहचान दी और उद्योग को संस्कृति का स्वरूप प्रदान किया।

यदि युद्धों ने पानीपत को इतिहास में स्थान दिलाया, तो इसके कारीगरों, श्रमिकों और उद्यमियों ने उसे आधुनिक भारत के आर्थिक मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया। यही पानीपत की वास्तविक शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत भी।

— राम मोहन राय
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 पानीपत : शिक्षा, अध्यात्म और सांस्कृतिक समन्वय की अमर परम्परा-5

पानीपत का नाम भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यद्यपि इसकी पहचान मुख्यतः तीन ऐतिहासिक युद्धों के कारण बनी, किन्तु यदि इसके इतिहास का गंभीर अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि पानीपत केवल युद्धों का नगर नहीं रहा। यह सदियों से शिक्षा, अध्यात्म, संस्कृति, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। यहाँ विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, संतों, फकीरों, आचार्यों और शिक्षाविदों ने अपने विचारों का प्रसार किया तथा समाज को नई दिशा प्रदान की।

प्राचीन परम्पराओं की भूमि

पानीपत का भूभाग भारतीय सभ्यता की उन प्राचीन स्मृतियों से जुड़ा हुआ है जिनका उल्लेख महाभारत जैसे महान ग्रन्थ में मिलता है। कुरुक्षेत्र क्षेत्र के निकट स्थित होने के कारण यह भूभाग वैदिक संस्कृति, धर्म और दर्शन की परम्पराओं से प्रभावित रहा। महाभारत का युद्ध चाहे ऐतिहासिक हो अथवा सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक, यह निर्विवाद है कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं।

युद्धों और राजनीतिक संघर्षों के बावजूद यह भूमि बार-बार पुनर्जीवित हुई और ज्ञान, अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन के नए केन्द्र विकसित होते रहे। यही कारण है कि विभिन्न कालों में अनेक धार्मिक धाराओं ने यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

सूफ़ी संतों की कर्मभूमि

मध्यकालीन भारत में पानीपत सूफ़ी चिंतन और आध्यात्मिक साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। स्थानीय परम्पराओं के अनुसार लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व इराक से अब्दुल्ला नामक एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व यहाँ आए और कुछ समय तक इस क्षेत्र में निवास किया। कहा जाता है कि उन्होंने यहाँ अपनी कुछ रुबाइयों की रचना भी की। यद्यपि इस पर ऐतिहासिक अनुसंधान की आवश्यकता है, फिर भी यह परम्परा इस बात का संकेत देती है कि पानीपत बहुत प्रारम्भिक काल से ही आध्यात्मिक यात्रियों को आकर्षित करता रहा।

तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हज़रत शर्फ़ुद्दीन नोमानी, जिन्हें संसार हज़रत बू अली शाह कलंदर के नाम से जानता है, पानीपत आए। उन्होंने प्रेम, मानवता, करुणा और ईश्वर की एकता का संदेश दिया। उनकी शिक्षाओं ने समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित किया। आज भी उनकी दरगाह सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में सूफ़ी आस्था के प्रमुख केन्द्रों में गिनी जाती है।

पानीपत और उसके आसपास लगभग ढाई सौ से अधिक सूफ़ी संतों, फकीरों और दरवेशों की मज़ारें विद्यमान हैं। इन मज़ारों पर आज भी विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह परम्परा पानीपत की गंगा-जमुनी संस्कृति तथा सामाजिक समरसता की सशक्त अभिव्यक्ति है।

जैन धर्म और विद्या की परम्परा

पानीपत के सांस्कृतिक विकास में जैन समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। विशेष रूप से अग्रवाल समुदाय और व्यापारिक वर्गों में जैन धर्म का प्रभाव व्यापक रूप से दिखाई देता है। जैन धर्म ने यहाँ केवल धार्मिक जीवन को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि शिक्षा, साहित्य और समाज सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया।

अनेक जैन मुनियों और विद्वानों ने पानीपत को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने दर्शन, धर्मशास्त्र, इतिहास और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। मुनि श्री जिनेन्द्र जी ‘ वर्णी' का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने  'जिनेंद्र सिद्धांत कोश'  की रचना तथा सम्पादन किया और जैन शब्दकोश जैसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक कार्यों में योगदान दिया।

जैन समाज द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थाओं की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे केवल किसी विशेष समुदाय तक सीमित नहीं थे। समाज के सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए उनके द्वार खुले रहे। इस प्रकार जैन समाज ने पानीपत में शिक्षा के लोकतंत्रीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आर्य समाज और नवजागरण

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आर्य समाज के उदय ने पानीपत के सामाजिक और शैक्षणिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रेरित आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार, स्त्री-उत्थान, स्वदेशी चेतना और राष्ट्रीय जागरण को बढ़ावा दिया।

पानीपत आर्य समाज की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बना। स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी इच्छरानन्द, रामचन्द्र देहलवी और भगत फूल सिंह, अनेक अन्य विद्वानों और समाजसेवियों ने यहाँ के जनजीवन को प्रभावित किया। आर्य समाज के सम्मेलनों, वैचारिक गोष्ठियों और शैक्षणिक संस्थाओं ने समाज में नई चेतना का संचार किया।

विशेष रूप से कन्या शिक्षा के क्षेत्र में आर्य समाज का योगदान ऐतिहासिक महत्व का है। उस समय जब स्त्री शिक्षा को व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं थी, तब आर्य समाज ने इस दिशा में साहसिक पहल की।

विभाजन और नई सांस्कृतिक धाराएँ

सन् 1947 का विभाजन पानीपत के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। पश्चिमी पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में विस्थापित परिवार यहाँ आकर बसे। वे अपने साथ केवल अपनी भौतिक संपत्ति ही नहीं लाए, बल्कि अपनी धार्मिक आस्थाएँ, सांस्कृतिक परम्पराएँ और सामाजिक संस्थाएँ भी साथ लेकर आए।

इसी काल में लालजी मंदिर, प्रेम मंदिर, डेरा बाबा जोध सचियार , डेरा बाबा बंदा सिंह बहादुर तथा अनेक अन्य धार्मिक केन्द्रों का विकास हुआ। इन संस्थाओं ने विस्थापित समाज को नई पहचान, मानसिक संबल और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया।

नगर का प्राचीन देवी मंदिर तथा मध्य स्थित हनुमान मंदिर पहले से ही श्रद्धा के प्रमुख केन्द्र थे। विभाजन के बाद सिख समुदाय ने अनेक गुरुद्वारों की स्थापना की। सहजधारी और केशधारी दोनों प्रकार के सिखों ने नगर के धार्मिक जीवन को समृद्ध बनाया।

ईसाई समुदाय ने भी चर्चों तथा शिक्षण संस्थानों के माध्यम से समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। आज पानीपत में अनेक चर्च सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।

आधुनिक आध्यात्मिक संस्थाएँ

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पानीपत में कई नई आध्यात्मिक संस्थाओं का उदय हुआ। श्रीराम शरणम् इसका एक प्रमुख उदाहरण है। स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की प्रेरणा तथा श्रद्धेय बहन शकुन्तला देवी जी के अथक प्रयासों से यह संस्था विकसित हुई। आज यह केवल धार्मिक आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण और मानव सेवा का भी महत्वपूर्ण केन्द्र है।

इसी प्रकार गीता मंदिर की स्थापना स्वामी गीतानन्द जी महाराज की प्रेरणा से हुई। यह संस्था धार्मिक आयोजनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से नगर के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

पानीपत में शिक्षा का विकास

यदि पानीपत के आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से किसी एक का उल्लेख करना हो तो वह शिक्षा का क्षेत्र है।

एक समय था जब नगर में हाली मुस्लिम हाई स्कूल और जैन हाई स्कूल ही प्रमुख शैक्षणिक संस्थाएँ थीं। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में आर्य समाज द्वारा स्थापित श्यामा पुत्री पाठशाला ने विशेष रूप से कन्या शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। यही संस्था आगे चलकर आर्य कन्या विद्यालय के रूप में विकसित हुई।

विभाजन के बाद आर्य हाई स्कूल और आर्य कॉलेज की स्थापना हुई, जिन्होंने उच्च शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाकिस्तान के लैया से आए पुरुषार्थी समुदाय ने आई.बी.एल. विद्यालय और महाविद्यालय की स्थापना की, जो आज भी शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

सनातन धर्म सभा द्वारा संचालित बालकराम विद्यालय बाद में विकसित होकर सनातन धर्म विद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों का आधार बना। इसी प्रकार अनेक अन्य धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने विद्यालयों तथा महाविद्यालयों की स्थापना की।

इन सभी संस्थाओं के पीछे एक साझा दृष्टिकोण था—धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की वास्तविक समझ शिक्षा के बिना संभव नहीं है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं ने शिक्षा को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण अंग माना।

वर्तमान परिदृश्य

आज पानीपत हरियाणा के प्रमुख शैक्षणिक नगरों में गिना जाता है। यहाँ विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग संस्थान, प्रबंधन संस्थान, महाविद्यालय तथा सैकड़ों विद्यालय संचालित हो रहे हैं। आधुनिक शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ-साथ यह नगर अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से भी जुड़ा हुआ है।

  पानीपत का इतिहास केवल युद्धों और राजनीतिक घटनाओं का इतिहास नहीं है। यह संतों और सूफ़ियों की करुणा, जैन आचार्यों की विद्वत्ता, आर्य समाज के नवजागरण, विभाजन पीड़ितों के पुनर्निर्माण, धार्मिक संस्थाओं की सामाजिक चेतना और शिक्षाविदों की दूरदृष्टि का भी इतिहास है।

यदि पानीपत को सही अर्थों में समझना हो तो उसे केवल रणभूमि के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञानभूमि, कर्मभूमि और अध्यात्मभूमि के रूप में देखना होगा। यही वह भूमि है जहाँ विविध धर्म, संस्कृतियाँ और परम्पराएँ एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में विकसित हुईं और जहाँ शिक्षा तथा अध्यात्म ने मिलकर समाज निर्माण का कार्य किया। यही पानीपत की वास्तविक पहचान है और यही उसकी सबसे मूल्यवान ऐतिहासिक धरोहर भी।
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पानीपत : साहित्य, संस्कृति और सृजन की अविरल धारा-6

पानीपत का नाम सुनते ही इतिहास के पन्नों पर अंकित वे निर्णायक युद्ध स्मरण हो आते हैं जिन्होंने भारत की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया। किंतु पानीपत का परिचय केवल युद्धभूमि के रूप में देना उसके गौरवशाली व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। यह नगर जितना वीरता, संघर्ष और इतिहास का प्रतीक है, उतना ही साहित्य, संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों की साधना का भी केन्द्र रहा है। इस धरती ने न केवल सेनानायकों और शासकों को देखा है, बल्कि संतों, सूफियों, कवियों, शायरों, चिंतकों और शिक्षाविदों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने अपने ज्ञान और सृजन से इसे विशिष्ट पहचान प्रदान की।

पानीपत की साहित्यिक चेतना की जड़ें भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम स्रोतों तक पहुँचती हैं। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का विश्वकोश है। कुरुक्षेत्र की वह पावन भूमि, जहाँ धर्म और अधर्म का महान संघर्ष हुआ, उसका सांस्कृतिक विस्तार वर्तमान पानीपत क्षेत्र तक माना जाता रहा है। इस दृष्टि से पानीपत भारतीय साहित्यिक और दार्शनिक परंपरा का भी एक महत्त्वपूर्ण साक्षी है।

मध्यकाल में इस क्षेत्र ने सूफी परंपरा के माध्यम से नई सांस्कृतिक ऊर्जा प्राप्त की। लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व अब्दुल्ला जैसे विद्वानों का उल्लेख मिलता है और इसके बाद सात सौ पचास वर्ष पूर्व हजरत शरफुद्दीन नोमानी, जिन्हें संसार बू अली शाह कलंदर के नाम से जानता है, ने इस भूमि को आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनकी नज़्मों, रुबाइयों और सूफियाना शिक्षाओं ने प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और इंसानियत का संदेश दिया। उनकी दरगाह आज भी सांस्कृतिक समन्वय और मानव एकता का प्रतीक है।

उन्नीसवीं शताब्दी में पानीपत को विश्व साहित्य के मानचित्र पर प्रतिष्ठित करने का महान कार्य ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली ने किया। हाली केवल उर्दू के महान शायर ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना के अग्रदूत भी थे। उनकी रचनाओं में स्त्री शिक्षा, नारी सम्मान, विधवा पुनर्वास, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों की गहन अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज परिवर्तन का सशक्त उपकरण बनाया।

हाली के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप प्रसिद्ध साहित्यकार राणा प्रताप गन्नौरी ने लिखा—

"तिरा यह शहर ऐ मौलाना 'हाली',
फ़क़त युद्धों से जाना जा रहा था।
अदब में नाम पैदा करके तूने,
किया ऊँचा है पानीपत का रुतबा।"

इन पंक्तियों में पानीपत की सांस्कृतिक यात्रा का संपूर्ण सार समाहित है। वास्तव में हाली ने इस नगर को युद्धों की स्मृतियों से निकालकर साहित्य और संस्कृति की प्रतिष्ठित पहचान प्रदान की।

हाली की इसी गौरवशाली परंपरा को उनके भांजे ख्वाजा अहमद अब्बास ने आगे बढ़ाया। वे साहित्यकार, पत्रकार, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक के रूप में भारतीय जनमानस में अमिट छाप छोड़ने वाले व्यक्तित्व थे। उनकी लेखनी में सामाजिक सरोकार, प्रगतिशील दृष्टि और मानवीय संवेदनाएँ समान रूप से विद्यमान थीं।

पानीपत की साहित्यिक परंपरा अनेक अन्य रचनाकारों की प्रतिभा से भी समृद्ध हुई। मीर मेहदी, जाफर पानीपती, सलीम पानीपती, पंडित बिशम्बर दास। शर्मा ‘पानीपती’, शूगनचंद ‘रोशन’ पानीपती, लाला अनूपचंद ‘आफ़ताब’, डॉ. दौलत राम, साबिर पानीपती, बशेश्वर नाथ अत्री' कंवल पानीपती', प्रोफेसर उत्तम चंद शरर, श्याम लाल शर्मा ‘धरणी’, राम रियाज़, डॉ कुमार पानीपती तथा देवेन्द्र कुमार भल्ला ‘ सिहर प्रेमी' , कृशन दत्त तूफान जैसे अनेक साहित्यकारों ने कविता, ग़ज़ल, नज़्म, आलोचना और कथा साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी रचनाओं में समाज की पीड़ा, मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय चेतना और स्थानीय जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

पानीपत हिंदी और उर्दू साहित्य के बीच सेतु निर्माण का भी केन्द्र रहा है। अनेक साहित्यकारों और शोधकर्ताओं ने दोनों भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को जनसामान्य तक पहुँचाने का कार्य किया। विशेष रूप से श्री रमेशचन्द्र पुहाल,डॉ राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी और श्री दीपचन्द्र निर्मोही ने हाली तथा अन्य उर्दू साहित्यकारों की रचनाओं को हिंदी पाठकों तक पहुँचाकर साहित्यिक संवाद को नई दिशा प्रदान की।

शिक्षा और बौद्धिक विकास के क्षेत्र में भी पानीपत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। डॉ. सैयदेन जैसे शिक्षाविदों ने शिक्षा जगत में उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान कीं और नगर की बौद्धिक पहचान को सुदृढ़ किया। इसी प्रकार विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. शांति स्वरूप भटनागर ने विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में जो योगदान दिया, उसने पूरे राष्ट्र को गौरवान्वित किया। उनकी उपलब्धियाँ इस तथ्य की प्रमाण हैं कि पानीपत केवल साहित्य और संस्कृति का ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का भी केन्द्र रहा है।

रंगमंच और चलचित्र जगत में भी पानीपत की प्रतिभाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। सत्येन कप्पू और राजेन्द्र गुप्ता जैसे कलाकारों ने अभिनय के माध्यम से इस नगर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया है। उनकी उपलब्धियाँ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

वर्तमान समय में भी पानीपत की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ निरंतर सक्रिय हैं। नगर में सैकड़ों कवि, लेखक, शायर और साहित्यकार अपनी रचनात्मक साधना में संलग्न हैं। प्रगतिशील लेखक संघ, हरियाणा साहित्यकार संघ, अंकन तथा अनेक अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ गोष्ठियों, मुशायरों, कवि सम्मेलनों, पुस्तक चर्चाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। युवा पीढ़ी भी साहित्य, रंगमंच, संगीत, चित्रकला और डिजिटल माध्यमों के जरिए इस धरोहर को नई ऊर्जा प्रदान कर रही है।

पानीपत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समन्वयकारी संस्कृति है। यहाँ सूफी परंपरा की उदारता, वैदिक चिंतन की गहराई, उर्दू शायरी की नज़ाकत, हिंदी साहित्य की व्यापकता और आधुनिक विचारधाराओं की सृजनात्मकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यही कारण है कि पानीपत केवल अतीत की स्मृतियों का नगर नहीं, बल्कि वर्तमान की सृजनशीलता और भविष्य की संभावनाओं का भी केन्द्र है।

राणा प्रताप गन्नौरी की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती हैं—

"ख़ुशी की बात—तुझसे लेकर अब तक,
क़लम की साधना का क्रम है जारी।"

वास्तव में यही पानीपत की सबसे बड़ी पहचान है। युद्धों की गाथाओं से लेकर साहित्य की साधना तक, सूफी प्रेम से लेकर वैज्ञानिक चिंतन तक, यह नगर निरंतर सृजन, संवाद और मानवता की ज्योति को प्रज्ज्वलित किए हुए है। यही इसकी सांस्कृतिक विरासत है और यही इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि।

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पानीपत के ऐतिहासिक दरवाजे : नगर सुरक्षा, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक-7

प्राचीन और मध्यकालीन पानीपत केवल युद्धों की भूमि ही नहीं था, बल्कि एक सुसंगठित, सुरक्षित और समृद्ध नगर भी था। नगर की सुरक्षा के लिए पूरे शहर को ऊँची और चौड़ी परकोटा-दीवार से घेरा गया था, जिसके भीतर प्रवेश के लिए अनेक विशाल दरवाजे बनाए गए थे। ये दरवाजे केवल आवागमन के साधन नहीं थे, बल्कि उस समय के सामाजिक, धार्मिक और जातीय जीवन के भी प्रतीक थे। अधिकांश दरवाजों का निर्माण उन समुदायों या प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा कराया गया था जो उनके आसपास निवास करते थे।

समय के प्रवाह, युद्धों, शहरी विस्तार और उपेक्षा के कारण अधिकांश दरवाजे नष्ट हो गए, किन्तु उनका इतिहास आज भी पानीपत की स्मृतियों में जीवित है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर पानीपत के पंद्रह प्रमुख दरवाजों का क्रमवार परिचय इस प्रकार है—

1. दरवाजा अंसार

यह दरवाजा वर्तमान लाल बत्ती अंसार बाजार क्षेत्र में स्थित था। इसका निर्माण अंसारी समुदाय ने कराया था। समय के साथ अंसार मोहल्ला सिमटता गया और यह दरवाजा भी इतिहास का हिस्सा बन गया।

2. दरवाजा दबगारान

यह दरवाजा नवल सिनेमा के सामने स्थित पुराने कुएँ के निकट था। इसका निर्माण दबगार समुदाय ने कराया था। आज यह स्थान संकुचित हो चुका है और दरवाजा पूरी तरह विलुप्त हो गया है।

3. दरवाजा राजपूतान

पशु चिकित्सालय मार्ग से जी.टी. रोड की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित यह दरवाजा राजपूत (रांघड़) समुदाय द्वारा निर्मित कराया गया था। यह क्षेत्र कभी रांघड़ मुसलमानों का प्रमुख निवास स्थान था।

4. दरवाजा घोसियान

वर्तमान घोसियान मस्जिद और गुरुद्वारा क्षेत्र के निकट स्थित यह दरवाजा धौसी समुदाय द्वारा बनवाया गया था। बाद में गुरुद्वारा प्रबंधकों द्वारा यहाँ नया प्रवेशद्वार बनाया गया, परन्तु मूल ऐतिहासिक दरवाजा नष्ट हो चुका है।

5. दरवाजा हज़रत शाह विलायत साहिब

हज़रत शाह विलायत की दरगाह के बाहर स्थित यह दरवाजा शहर के प्रमुख मार्गों में से एक पर था। इसके बाहर चुंगी भी स्थापित थी। दरगाह प्रबंधन द्वारा निर्मित यह दरवाजा भी समय की मार से बच नहीं सका।

6. दरवाजा अफगानान

भीमगोड़ा मंदिर के समीप स्थित इस दरवाजे का निर्माण पठान (अफगान) समुदाय ने कराया था। उस समय इस क्षेत्र में पठानों की बड़ी आबादी रहती थी।

7. लाल दरवाजा

रामायणी चौक क्षेत्र में स्थित यह दरवाजा अपने विशाल स्वरूप और लाल रंग के कारण प्रसिद्ध था। इसके निकट हाथियों के अस्तबल भी बताए जाते हैं। आज भी स्थानीय लोग इस क्षेत्र को "लाल दरवाजा" नाम से जानते हैं।

8. दरवाजा रानी महल

नई सब्जी मंडी के मुख्य द्वार के सामने, पुराने शहर की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित यह भव्य दरवाजा किसी नवाब द्वारा निर्मित कराया गया था। यह अत्यंत विशाल था, किन्तु अब अस्तित्व में नहीं है।

9. दरवाजा लोहड़ राजपूत

चाँदनी बाग की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित यह अपेक्षाकृत छोटा दरवाजा लोहड़ (लोधा) समुदाय द्वारा निर्मित कराया गया था। समय के साथ इसका भी नामोनिशान मिट गया।

10. दरवाजा बागड़ियान

महावीर आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सामने स्थित यह विशाल दरवाजा बागड़ी मुसलमानों तथा स्थानीय हिंदू समुदाय द्वारा बनवाया गया था। माना जाता है कि तीसरे पानीपत युद्ध के दौरान यह दरवाजा क्षतिग्रस्त हुआ था।

11. दरवाजा हज़रत मखदूम साहिब

हज़रत मखदूम साहिब की दरगाह की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित यह दरवाजा दरगाह की इंतजामिया कमेटी द्वारा बनवाया गया था। यह क्षेत्र आज भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

12. दरवाजा हज़रत बू अली शाह कलंदर

वीर भवन चौक से हज़रत बू अली शाह कलंदर की दरगाह की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित यह दरवाजा दरगाह प्रबंधन द्वारा निर्मित कराया गया था। कालांतर में यह भी नष्ट हो गया।

13. दरवाजा माधोगंज

यह दरवाजा आज भी अपने मूल स्थान पर विद्यमान है। किला क्षेत्र, हलवाई हट्टा और देवी मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित यह दरवाजा पानीपत की प्राचीन नगर-रचना का जीवंत साक्षी है। माना जाता है कि इसके संरक्षण में स्थानीय वैश्य समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अब इस दरवाजे को भी सड़क सीधी करने के नाम पर गिरा दिया गया है.

14. दरवाजा कायस्थान

यह ऐतिहासिक दरवाजा परम हंस कुटिया के सामने तथा कबीर चौरा मंदिर के बराबर वाले मोहल्ले के मुहाने पर स्थित था। लंबे समय तक यह दरवाजा मोहल्ले की पहचान बना रहा, किन्तु कुछ माह पूर्व स्थानीय निवासियों द्वारा इसे तोड़ दिया गया। अब गली अपने पारंपरिक दरवाजे से वंचित हो चुकी है।

15. दरवाजा सलारगंज

यह दरवाजा आज भी अपने स्थान पर खड़ा है और पानीपत की ऐतिहासिक धरोहरों में विशेष महत्व रखता है। इसके माथे पर सफेद पत्थर की एक शिलापट्टिका लगी हुई है, जिस पर "बाब नवाब फैज सादिक अली" अंकित है। वर्तमान में यह दरवाजा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है और नगर के गौरवशाली अतीत का सजीव प्रतीक माना जाता है।
    पानीपत के ये ऐतिहासिक दरवाजे केवल ईंट-पत्थरों की संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि नगर की सुरक्षा, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक एकता के प्रतीक थे। इन दरवाजों और परकोटा-दीवार ने सदियों तक नगरवासियों को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखा। आज भले ही अधिकांश दरवाजे इतिहास के गर्भ में समा चुके हों, किन्तु उनके नाम और उनसे जुड़ी स्मृतियाँ पानीपत की विरासत को जीवित रखे हुए हैं। इन अवशेषों का संरक्षण और उनके इतिहास का दस्तावेजीकरण आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे अपने नगर के गौरवशाली अतीत से परिचित हो सकें।
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पानीपत : राजनीतिक परिदृश्य और सामाजिक विविधता-7

पानीपत केवल युद्धों और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह हरियाणा के महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक केन्द्रों में भी अपना विशिष्ट स्थान रखता है। प्रशासनिक दृष्टि से वर्तमान पानीपत जिला पाँच विकास खण्डों—पानीपत, समालखा, इसराना, बापौली तथा मतलौडा—में विभाजित है। जिले में वर्तमान समय में दो उपमण्डल (सब-डिवीजन) हैं—पानीपत और समालखा। तीव्र औद्योगिक विकास, बढ़ती जनसंख्या तथा बहुसांस्कृतिक स्वरूप ने इसे हरियाणा के सबसे सक्रिय जिलों में स्थान दिलाया है।

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में पानीपत के नागरिकों ने भी अपने-अपने स्तर पर राष्ट्रीय जागरण में भागीदारी निभाई। यद्यपि अधिकांश जनसामान्य प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधियों से दूर था, फिर भी अनेक जागरूक नागरिक स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। कांग्रेस की विचारधारा से प्रेरित नेताओं में लाला देशबंधु गुप्ता, मौलवी लक्काउल्लाह तथा डॉ. माधोराम शर्मा जैसे व्यक्तित्व प्रमुख थे। दूसरी ओर आर्य समाज से जुड़े अनेक कार्यकर्ता हिन्दू महासभा के माध्यम से अपनी राजनीतिक और सामाजिक भूमिका निभा रहे थे।

देश के विभाजन के बाद पानीपत के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। पश्चिमी पंजाब और सिंध से विस्थापित होकर आए हजारों शरणार्थियों ने यहां नया जीवन आरम्भ किया। इन ‘पुरुषार्थी’ परिवारों ने अपने श्रम, साहस और संघर्ष के बल पर न केवल आर्थिक उन्नति की बल्कि नगर के राजनीतिक जीवन को भी नई दिशा प्रदान की। विभाजन की त्रासदी और विस्थापन की पीड़ा ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।

नवंबर 1947 में महात्मा गांधी के पानीपत आगमन का प्रसंग नगर के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। सांप्रदायिक तनाव के उस कठिन दौर में गांधी जी यहां शांति और सद्भाव का संदेश लेकर आए थे। उनके आगमन के दौरान कुछ असंतुष्ट तत्वों ने उनसे तीखे प्रश्न भी किए और एक व्यक्ति द्वारा उन पर हमला करने का प्रयास भी किया गया। उस समय पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संगठन मंत्री कॉमरेड टीकाराम सुखन ने तत्परता से हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित किया। यह प्रसंग पानीपत के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिस पर अलग से विस्तारपूर्वक चर्चा की जा सकती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नगर की राजनीति मुख्यतः कांग्रेस और भारतीय जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी) के बीच प्रतिस्पर्धा के इर्द-गिर्द घूमती रही। जहाँ कांग्रेस को परंपरागत राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत का लाभ मिला, वहीं जनसंघ को विभाजन के बाद आए शरणार्थी समुदाय और व्यापारिक वर्ग का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। 1953 में भारतीय जनसंघ की स्थानीय इकाई के गठन के साथ ही पानीपत में वैचारिक राजनीति का नया दौर आरम्भ हुआ।

नगर की राजनीति में कांग्रेस के शाह परिवार तथा जनसंघ एवं भारतीय जनता पार्टी के विज परिवार का विशेष प्रभाव रहा है। दोनों परिवारों ने अलग-अलग राजनीतिक धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हुए नगर की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। समय-समय पर अनेक अन्य नेताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परन्तु इन दोनों परिवारों का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है।

लोकसभा क्षेत्र के रूप में पानीपत लंबे समय तक करनाल संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रहा है। इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख सांसदों में पानीपत के ही निवासी डॉ. माधोराम शर्मा तथा हाल के वर्षों में श्री संजय भाटिया का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

  वर्तमान समय में पानीपत की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नगर निगम की सभी सीटों पर भाजपा का वर्चस्व है तथा लगातार दो कार्यकालों से महापौर पद पर भी इसी दल के उम्मीदवार निर्वाचित होते रहे हैं। इतना ही नहीं, वर्तमान में हरियाणा भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी पानीपत से संबंधित है। इसके विपरीत, एक समय नगर और जिले की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने वाली कांग्रेस का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है, यद्यपि उसका सामाजिक आधार अभी भी बना हुआ है।

पानीपत की राजनीतिक चेतना केवल मुख्यधारा की पार्टियों तक सीमित नहीं रही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) ने भी समय-समय पर यहां प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। औद्योगिक नगर होने के कारण श्रमिक राजनीति का यहां विशेष महत्व रहा है। एक समय अधिकांश कारखानों में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) का प्रभाव था। इसके साथ-साथ भारतीय मजदूर संघ और अन्य श्रमिक संगठन भी सक्रिय रहे। वर्तमान में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) सहित विभिन्न मजदूर संगठन श्रमिक हितों के लिए कार्यरत हैं।

पानीपत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी सामाजिक संरचना है। औद्योगिक विकास के कारण यहां देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक और कर्मचारी आकर बसे हैं। अनुमानतः नगर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी समुदायों से संबंधित है। पूर्वांचल, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा अन्य क्षेत्रों के लोग यहां निवास करते हैं और अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को जीवंत बनाए हुए हैं।

आज पानीपत में छठ पूजा, दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव, बिहू, गुरु पर्व, ईद, दीपावली और होली समान उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। यह विविधता केवल सांस्कृतिक उत्सवों तक सीमित नहीं है, बल्कि नगर के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी दिखाई देती है। यही कारण है कि पानीपत आज केवल हरियाणा का एक औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि भारत की विविधता में एकता की जीवंत मिसाल बन चुका है

 “बहुसांस्कृतिक सामाजिक जीवन” 

पानीपत की सामाजिक विशेषताओं में इसकी सांस्कृतिक विविधता और विभिन्न प्रांतों से आए लोगों का सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय है। औद्योगिक विकास के साथ देश के अनेक भागों से यहां बड़ी संख्या में लोग आकर बसे और उन्होंने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं तथा सामाजिक पहचान को संरक्षित रखने के लिए विभिन्न मित्र मंडलों और सामाजिक संगठनों की स्थापना की। राजस्थान मित्र मंडल, पूर्वांचल समाज, बंगीय सांस्कृतिक संगठन तथा अन्य प्रांतीय संस्थाएं समय-समय पर अपने सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। इन आयोजनों की विशेषता यह है कि इनमें केवल संबंधित समुदाय ही नहीं, बल्कि नगर के अन्य नागरिकों को भी सादर आमंत्रित किया जाता है, जिससे आपसी सद्भाव और सामाजिक एकता को बल मिलता है। राजस्थान मित्र मंडल द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित वार्षिक समारोह नगर के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है।

पानीपत रिफाइनरी तथा नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) जैसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने भी नगर के सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन संस्थानों में दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव, दीपावली, होली, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा अन्य अनेक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पर्व बड़े उत्साह और सहभागिता के साथ मनाए जाते हैं। इन आयोजनों में विभिन्न राज्यों और भाषायी पृष्ठभूमियों से जुड़े कर्मचारी और उनके परिवार सम्मिलित होकर भारत की सांस्कृतिक एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

विभाजन से पूर्व पानीपत की लगभग 30 हजार की आबादी में मुसलमानों का अनुपात लगभग सत्तर प्रतिशत था। 1947 के विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार पाकिस्तान चले गए, जिससे नगर की जनसंख्या संरचना में व्यापक परिवर्तन आया। किंतु समय के साथ औद्योगिक विस्तार और रोजगार के अवसरों के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तथा देश के अन्य भागों से बड़ी संख्या में मुस्लिम श्रमिक और परिवार यहां आकर बस गए। आज वे नगर के आर्थिक और सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं तथा ईद-उल-फितर, ईद-उल-अजहा, रमजान, मुहर्रम और अन्य धार्मिक अवसरों को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इन अवसरों पर विभिन्न समुदायों की सहभागिता और परस्पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान पानीपत की गंगा-जमुनी तहजीब और सामाजिक समरसता को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।

वास्तव में आज का पानीपत केवल एक औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि भारत की विविध संस्कृतियों, भाषाओं, परंपराओं और जीवन मूल्यों का संगम बन चुका है। यहां विभिन्न प्रदेशों से आए लोगों ने अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हुए स्थानीय समाज के साथ ऐसा आत्मीय संबंध स्थापित किया है कि पानीपत एक जीवंत “लघु भारत” के रूप में दिखाई देता है, जहां विविधता और एकता साथ-साथ विकसित होती है. इसकी सांस्कृतिक बहुलता, सामाजिक समरसता, 
इतिहास, उद्योग, राजनीति और सांस्कृतिक समन्वय की यह अनूठी विरासत पानीपत को एक ऐसे नगर के रूप में स्थापित करती है जहाँ अतीत की स्मृतियाँ, वर्तमान की चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ समान रूप से साथ-साथ चलती हैं।
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पानीपत में शिक्षा और स्वास्थ्य : विकास की एक प्रेरणादायक यात्रा -8

पानीपत का इतिहास केवल युद्धों और औद्योगिक प्रगति का इतिहास नहीं है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय विकास का भी इतिहास है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में पानीपत की शैक्षिक स्थिति अत्यंत सीमित थी। तत्कालीन अभिलेखों के अनुसार नगर में कुल लगभग बारह मदरसे और विद्यालय थे। सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम थी तथा अनेक विद्यालय लगभग खाली पड़े रहते थे। उस समय शिक्षा को लेकर सामाजिक जागरूकता सीमित थी और उच्च शिक्षा की सुविधाएँ तो लगभग नगण्य थीं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति तेजी से बदली। शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का आधार मानते हुए विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। आर्य समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाते हुए आर्य हाई स्कूल, आर्य कन्या हाई स्कूल तथा अन्य विद्यालयों की स्थापना की। बाद में इन संस्थाओं का विस्तार हुआ और उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की।

इसी प्रकार श्री सनातन धर्म एजुकेशन सोसाइटी ने सनातन धर्म प्राइमरी स्कूल, सनातन धर्म हाई स्कूल तथा प्रतिष्ठित सनातन धर्म महाविद्यालय की स्थापना कर क्षेत्र में उच्च शिक्षा के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इन संस्थाओं ने न केवल शिक्षा का प्रसार किया, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को भी सुदृढ़ बनाया।

आज स्थिति यह है कि पानीपत जिला शिक्षा के क्षेत्र में हरियाणा के अग्रणी जिलों में गिना जाता है। सरकारी अभिलेखों के अनुसार जिले में 416 सरकारी विद्यालय कार्यरत हैं, जिनमें 243 प्राथमिक विद्यालय, 49 माध्यमिक विद्यालय, 26 उच्च विद्यालय तथा 98 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं। जिले के लगभग प्रत्येक गाँव में कम से कम एक विद्यालय उपलब्ध है और सरकारी विद्यालयों में एक लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

सरकारी विद्यालयों के अतिरिक्त सैकड़ों निजी विद्यालय, तकनीकी संस्थान, कोचिंग संस्थान और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में जिले में एक हजार से अधिक छोटे-बड़े शैक्षणिक संस्थान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कार्य कर रहे हैं। अनेक महाविद्यालय, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, प्रबंधन संस्थान और तकनीकी शिक्षा केंद्र जिले की शैक्षणिक पहचान को सुदृढ़ कर रहे हैं।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी पानीपत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। शिक्षाविद् श्री एस.पी. बंसल के प्रयासों से स्थापित गीता विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। गीता यूनिवर्सिटी आज यह विश्वविद्यालय देश के विभिन्न राज्यों के विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहा है। इसी प्रकार श्री जगदीश तायल द्वारा समालखा क्षेत्र में स्थापित PIET उच्च शिक्षण संस्थानों ने ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।

सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने भी शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अनेक ट्रस्ट, सेवा संस्थाएँ और समाजसेवी संगठन छात्रवृत्तियाँ, पुस्तकालय, प्रशिक्षण केंद्र तथा छात्र सहायता कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं। परिणामस्वरूप पानीपत आज शिक्षा के क्षेत्र में एक जीवंत और प्रगतिशील जिला बन चुका है।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी इसी प्रकार परिवर्तनकारी रही है। एक समय था जब पानीपत में केवल एक छोटा-सा नागरिक अस्पताल था और गिने-चुने पंजीकृत चिकित्सक ही उपलब्ध थे। विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं का लगभग अभाव था तथा गंभीर रोगों के उपचार के लिए लोगों को दिल्ली, करनाल अथवा अन्य बड़े नगरों की ओर जाना पड़ता था।

आज पानीपत का स्वास्थ्य ढाँचा अत्यंत विस्तृत और आधुनिक स्वरूप ग्रहण कर चुका है। जिला नागरिक अस्पताल, जिसे लंबे समय तक भीमसेन सच्चर अस्पताल के नाम से भी जाना जाता रहा, जिले की प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य संस्था है। इसके अतिरिक्त समालखा नागरिक अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-स्वास्थ्य केंद्र ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करा रहे हैं।

वर्तमान में जिले में अनेक प्रमुख निजी अस्पताल और नर्सिंग होम भी कार्यरत हैं। इनमें डॉ. प्रेम अस्पताल, pahuja हॉस्पिटल, हवा सिंह अस्पताल, मलहोत्रा अस्पताल, रघुदीप अस्पताल, रविन्द्र अस्पताल, जी.सी. गुप्ता अस्पताल तथा अन्य अनेक आधुनिक चिकित्सा संस्थान शामिल हैं।

हाल के वर्षों में राज्य सरकार द्वारा पानीपत के 200-बेड जिला नागरिक अस्पताल को और अधिक सशक्त बनाने के लिए 219 नए पदों को स्वीकृति प्रदान की गई है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार की संभावना है।

यद्यपि निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों की सटीक संख्या समय-समय पर बदलती रहती है, तथापि वर्तमान में जिले में दर्जनों बड़े अस्पताल, अनेक नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक सेंटर और सैकड़ों चिकित्सक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हुए हैं। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जिला अस्पताल, नागरिक अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का व्यापक नेटवर्क कार्यरत है।

आज पानीपत शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में निरंतर प्रगति कर रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान हरियाणा सरकार में पानीपत जिले का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण स्तर पर है। हरियाणा के शिक्षा मंत्री श्री महिपाल ढांडा तथा परिवहन मंत्री कृष्ण लाल पंवार जिले के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं प्रमोद विज सहित अन्य जनप्रतिनिधि भी क्षेत्र के विकास के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।

यदि अतीत के बारह विद्यालयों और एक छोटे अस्पताल की तुलना आज के विशाल शैक्षिक एवं स्वास्थ्य ढाँचे से की जाए तो स्पष्ट होता है कि पानीपत ने एक लंबी और प्रेरणादायक यात्रा तय की है। 
आपके अध्याय में सामाजिक संगठनों की भूमिका का उल्लेख अवश्य होना चाहिए, क्योंकि पानीपत का विकास केवल सरकारी प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं, समाजसेवियों और जनसंगठनों की दशकों की तपस्या का भी प्रतिफल है। 

सामाजिक संगठनों का योगदान : सेवा, संवेदना और सामाजिक पुनर्निर्माण

पानीपत के शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रगति का उल्लेख सामाजिक संगठनों की भूमिका के बिना अधूरा रहेगा। सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ अनेक गैर-सरकारी संगठनों ने भी समाज के कमजोर, वंचित और पीड़ित वर्गों के उत्थान में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

विशेष रूप से वर्ष 1992 में स्थापित माता सीता रानी सेवा संस्थान ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई। संस्था ने परिवार परामर्श केंद्र के माध्यम से लगभग पाँच हजार टूटते हुए परिवारों को पुनः जोड़ने का सराहनीय कार्य किया। पारिवारिक विवादों को न्यायालयों तक पहुँचने से पूर्व संवाद और परामर्श के माध्यम से सुलझाने की इसकी पहल सामाजिक समरसता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

महिला सशक्तिकरण और संरक्षण के क्षेत्र में भी संस्था का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पानीपत में स्वाधार शेल्टर होम की स्थापना कर सैकड़ों पीड़ित, परित्यक्ता और संकटग्रस्त महिलाओं को आश्रय प्रदान किया गया तथा उनके पुनर्वास, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन के लिए निरंतर प्रयास किए गए। यह कार्य केवल राहत प्रदान करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अनेक महिलाओं के जीवन को नई दिशा देने का माध्यम बना।

स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में संस्था ने उस समय उल्लेखनीय पहल की, जब एड्स (एच.आई.वी.) के प्रति समाज में भय और भ्रांतियाँ व्याप्त थीं। विशेष रूप से महिला यौन कर्मियों के बीच जागरूकता, स्वास्थ्य परामर्श और रोकथाम कार्यक्रम चलाकर संस्था ने इस गंभीर चुनौती का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य चेतना के विस्तार और रोग नियंत्रण के प्रयासों को नई गति मिली।

महिला अधिकारों और न्याय तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए संस्था ने राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से हरियाणा की पहली तीन महिला लोक अदालतों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लोक अदालतों ने अनेक महिलाओं को त्वरित और सुलभ न्याय उपलब्ध कराने में सहायता की तथा महिला अधिकारों के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाई।

वर्ष 2001 से ही संस्था ने कन्या भ्रूण हत्या और लिंग भेदभाव के विरुद्ध बेटी बचाओ अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप देने में सक्रिय भूमिका निभाई। उस समय जब यह विषय राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा भी नहीं बना था, तब पानीपत में इस अभियान के माध्यम से जनजागरण, संवाद, रैलियों और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। बाद के वर्षों में यह अभियान राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।

वर्तमान में संस्था निर्मला देशपांडे स्मृति संस्थान के माध्यम से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मेधावी और प्रतिभाशाली बच्चों की शिक्षा के लिए कार्य कर रही है। शिक्षा सहायता, छात्रवृत्ति और मार्गदर्शन के माध्यम से अनेक विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जा रहा है। इस संस्था की स्थापना श्रीमती विद्यावती सिंगला की अध्यक्षता में वर्ष 1992 में हुई थी और उनके बाद सर्व श्रीमती ओमवती वर्मा, छोटी देवी, इंदिरा खुराना, निर्मल दत्त, सरोज बाला गुर  की अध्यक्षता में काम किया और अब श्रीमती कृष्णा कांता (अध्यक्ष) और श्रीमती पूजा सैनी (महासचिव) के नेतृत्व में बेहतर काम कर रहीं है. 

इसी प्रकार श्रीमती कंचन सागर के नेतृत्व में नारी कल्याण समिति महिलाओं के कल्याण, कौशल विकास, सामाजिक जागरूकता और सेवा कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही है। महिला शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में समिति के प्रयास सराहनीय हैं। श्रीमती  सविता आर्य  के नेतृत्व में'नारी तू कल्याणी तू' संगठन का भी कार्य प्रशंसनीय है.  

पानीपत में रोटरी क्लब, लायंस क्लब, इनर व्हील क्लब तथा अन्य अनेक सामाजिक और सेवा संगठन भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण, आपदा सहायता और जनकल्याण के विविध कार्यक्रमों के माध्यम से समाज की सेवा कर रहे हैं। समय-समय पर आयोजित चिकित्सा शिविर, छात्रवृत्ति योजनाएँ, पुस्तक वितरण कार्यक्रम और सामाजिक जागरूकता अभियान इन संगठनों की सक्रियता का प्रमाण हैं।

वास्तव में पानीपत का सामाजिक विकास केवल सरकारी योजनाओं की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन हजारों स्वयंसेवकों, समाजसेवियों और संस्थाओं की सामूहिक साधना का परिणाम है जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए अपना समय, श्रम और संसाधन समर्पित किए हैं। यही सामाजिक चेतना और जनभागीदारी पानीपत को एक संवेदनशील, प्रगतिशील और मानवीय समाज के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
यह यात्रा केवल संस्थानों के निर्माण की नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, जनसहभागिता और विकास के प्रति सामूहिक संकल्प की यात्रा है। यही कारण है कि आज पानीपत हरियाणा के सबसे गतिशील और प्रगतिशील जिलों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है.
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पानीपत को जिला बनाने का संघर्ष : जनचेतना, न्याय और नागरिक अधिकारों की गाथा -9

पानीपत का इतिहास केवल युद्धों, संतों और उद्योगों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले जागरूक नागरिकों का भी इतिहास है। ब्रिटिश काल में पानीपत एक जिला मुख्यालय था, परंतु उन्नीसवीं शताब्दी में इसे समाप्त कर जिला मुख्यालय करनाल स्थानांतरित कर दिया गया। इस विषय में इतिहासकारों ने विभिन्न कारण बताए हैं। एक मत के अनुसार उस समय नगर के चारों ओर जलभराव होने के कारण महामारी और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थीं, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक मुख्यालय को करनाल ले जाया गया। किंतु जनमानस में एक दूसरी धारणा भी लंबे समय तक प्रचलित रही।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में पानीपत के नागरिकों ने क्रांतिकारियों का खुलकर साथ दिया था। अंग्रेजी शासन इस क्षेत्र की राष्ट्रवादी चेतना से भली-भांति परिचित था। इसलिए अनेक लोगों का विश्वास रहा कि क्रांति में सहभागिता के दंडस्वरूप ही पानीपत से जिला मुख्यालय हटाकर करनाल ले जाया गया। यद्यपि दोनों तर्क अपने-अपने स्थान पर विचारणीय हैं, तथापि पानीपत के लोगों के मन में यह भावना गहराई से विद्यमान रही कि स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका के कारण उन्हें प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947 से लेकर 1990 के दशक तक पानीपत विकास और संक्रमण के दौर से गुजरा। औद्योगिक प्रगति के बावजूद लोगों को यह अनुभव होता रहा कि जिला मुख्यालय न होने के कारण अनेक प्रशासनिक और न्यायिक सुविधाओं के लिए उन्हें करनाल पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में पानीपत को पुनः जिला बनाने की मांग ने संगठित स्वरूप ग्रहण किया।

इस जनआंदोलन में "पानीपत नागरिक मंच" की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। मंच के नेतृत्व में यह विचार व्यापक रूप से उभरा कि पानीपत की ऐतिहासिक, औद्योगिक और जनसंख्या संबंधी स्थिति उसे जिला बनने का पूर्ण अधिकार प्रदान करती है। दूसरी ओर, पानीपत के अधिवक्ताओं को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उपमंडल स्तर की अदालतें तो पानीपत में थीं, किंतु सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) के लिए उन्हें करनाल जाना पड़ता था। फलस्वरूप अधिवक्ताओं ने भी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय स्थापित करने तथा पानीपत को जिला बनाने की मांग को लेकर आंदोलन प्रारंभ किया।

इसी दौरान हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल ने राज्य में चार नए जिलों—रेवाड़ी, यमुनानगर, कैथल और पानीपत—के गठन की घोषणा की। इस घोषणा से पानीपत में उत्साह की लहर दौड़ गई। लोगों को विश्वास हो गया कि अब जिला मुख्यालय, सत्र न्यायालय तथा अन्य प्रशासनिक सुविधाएँ उनके अपने नगर में उपलब्ध होंगी।

किन्तु राजनीतिक परिवर्तन के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। नई सरकार ने पानीपत को जिला बनाने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए उसे पुनः उपमंडल के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया। इससे नगर में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ। अधिवक्ताओं, व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने मिलकर संघर्ष को और अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया।

इस आंदोलन में पानीपत नागरिक मंच के अध्यक्ष श्री महेश दत्त शर्मा, श्री फतेहचंद विज, कामरेड रघुबीर सिंह, कामरेड रामदित्ता तथा अन्य अनेक साथियों के साथ मुझे भी सक्रिय रूप से कार्य करने का अवसर मिला। मंच के महासचिव होने के साथ-साथ मैं स्वयं अधिवक्ता भी था। हमारे साथ अधिवक्ता जोगिंदर राठी, के.सी. शर्मा, चौधरी ईश्वर सिंह, चौधरी रणधीर सिंह, महेंद्र सिंह, कामरेड सूरत सिंह ,नकुल सिंह तथा अनेक अन्य साथियों ने निरंतर संघर्ष किया।

एक अवसर पर लालबत्ती चौक पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान किसी ने यह अफवाह फैला दी कि कांग्रेस भवन पर लगे राष्ट्रीय ध्वज को आंदोलनकारियों ने उतारकर उसकी जगह काला झंडा लगा दिया है। यह पूर्णतः असत्य और भ्रामक प्रचार था, किंतु इसी आधार पर पुलिस ने आंदोलनकारियों पर कठोर कार्रवाई की। अनेक अधिवक्ताओं को चुन-चुन कर  पीटा गया जिन्हें गंभीर चोटें आईं और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इस दमनकारी कार्रवाई से आंदोलन कमजोर होने के बजाय और अधिक मजबूत हो गया।

जनदबाव के परिणामस्वरूप सरकार ने तत्कालीन गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की, जिसमें बारह प्रमुख संस्थाओं के प्रतिनिधियों को सदस्य बनाया गया। इस समिति का दायित्व जनता की राय प्राप्त करना तथा तथ्यों के आधार पर यह अनुशंसा करना था कि पानीपत को जिला बनाया जाना चाहिए या नहीं।

इसी अवधि में आई.बी. कॉलेज, पानीपत में आयोजित एक जनसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी भजन लाल ने पुनः पानीपत को जिला बनाने की सहमति व्यक्त की। अंततः वर्षों के संघर्ष, जनदबाव और लोकतांत्रिक आंदोलन के परिणामस्वरूप पानीपत को जिला का दर्जा प्राप्त हुआ। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि पानीपत की जनता की सामूहिक इच्छाशक्ति और लोकतांत्रिक संघर्ष की विजय थी।

इस संघर्ष में पानीपत बार एसोसिएशन की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। इसकी स्थापना वर्ष 1928 में हुई थी और तब से इसका इतिहास न्याय, जनहित और सामाजिक चेतना से जुड़ा रहा है। इसके अनेक सदस्य स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता,  साहित्यकार, शायर, समाजसेवी और आध्यात्मिक चिंतक रहे हैं। अनेक राज्य सरकारों में मंत्री रहे जिनमें चौधरी कटार सिंह छोकर, चौधरी सतबीर सिंह मलिक,  श्री सत्यदेव त्यागी और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्री सतबीर कादियान, विधायक चौधरी धर्म सिंह राठी और जयसिंह राठी प्रमुख हैं. 

पानीपत बार से जुड़े अनेक अधिवक्ताओं ने न्यायपालिका में उच्च पदों को सुशोभित किया। श्री रामेश्वर मलिक तथा श्री हरकेश मनुजा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। श्री पी.सी. गोयल जिला एवं सत्र न्यायाधीश रहे। श्रीमती बबीता त्यागी उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की न्यायाधीश के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। श्री लक्ष्मी नारायण जिंदल, श्री देवी सिंह तथा श्री मनमोहन सिंह जैसे अनेक अधिवक्ताओं ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान कीं।

जब मैंने वकालत प्रारंभ की थी, तब पानीपत बार एसोसिएशन के लगभग एक सौ सदस्य थे। आज यह संख्या चार हजार के आसपास पहुँच चुकी है। नियमित चुनाव, वार्षिक सभाएँ, विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक परंपराएँ इसे हरियाणा की प्रमुख बार एसोसिएशनों में स्थान दिलाती हैं।

पानीपत को जिला बनाने का यह संघर्ष हमें स्मरण कराता है कि किसी भी नगर का विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं होता, बल्कि उसके जागरूक नागरिकों, सामाजिक संगठनों और न्याय के लिए संघर्ष करने वाले लोगों की प्रतिबद्धता से होता है। यह अध्याय पानीपत की उसी संघर्षशील, लोकतांत्रिक और आत्मसम्मानी परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
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पानीपत : सद्भाव, शांति और मानवीय एकता की अनुपम विरासत -10

पानीपत का नाम सुनते ही सामान्यतः तीन ऐतिहासिक युद्धों, राजनीतिक संघर्षों और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं का स्मरण होता है। किंतु पानीपत का वास्तविक इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है। यह सह-अस्तित्व, सामाजिक समरसता, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय एकता की उस गौरवशाली परंपरा का भी इतिहास है जिसने सदियों से इस नगर की पहचान निर्मित की है।

भारत के प्राचीनतम नगरों में गिने जाने वाले पानीपत ने अनेक राजवंशों, संस्कृतियों, धर्मों और सभ्यताओं को आते-जाते देखा है। यहाँ वैदिक परंपराओं के साथ-साथ बौद्ध, जैन, सूफी और सिख विचारधाराओं का भी प्रभाव रहा है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग इस धरती पर बसते रहे और उन्होंने मिलकर ऐसी साझा संस्कृति का निर्माण किया जिसमें परस्पर सम्मान, सहयोग और भाईचारा सर्वोच्च मूल्य रहे।

साझा संस्कृति और सामाजिक समरसता

पानीपत की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहाँ की पहचान कभी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रही। नगर की गलियों, बाजारों, मोहल्लों और ग्राम्य जीवन में हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी बनकर रहते रहे। सामाजिक संबंध केवल पड़ोस तक सीमित नहीं थे, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक जीवन में भी गहरे जुड़े हुए थे।

सदियों तक यहाँ के कारीगर, व्यापारी, किसान और श्रमिक बिना किसी भेदभाव के मिलकर नगर की समृद्धि में योगदान देते रहे। यही कारण है कि पानीपत के इतिहास में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक संघर्षों के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय एकता

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में पानीपत के लोगों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया। यद्यपि यह आंदोलन अंततः सफल नहीं हो सका, किंतु इसने स्वतंत्रता और स्वाभिमान की चेतना को जीवित रखा।

बीसवीं शताब्दी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वतंत्रता आंदोलन में पानीपत के सभी समुदायों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। हिंदू और मुसलमान दोनों ने राष्ट्रीय आंदोलन को अपना आंदोलन माना। उस समय यहाँ के अनेक प्रमुख मुस्लिम नेता राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े हुए थे। मौलवी लियाकतुल्लाह, डॉ. जकी हसन, मोबश्शर हसन, सैयदैन,  अहमद अब्बास तथा अनेक अन्य लोग भारत की संयुक्त राष्ट्रीयता के समर्थक थे। वे धर्म के आधार पर देश के विभाजन के पक्ष में नहीं थे और भारत को ही अपनी मातृभूमि मानते थे।

विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाएँ

सन् 1947 का विभाजन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक गहरा घाव था। पानीपत भी इससे अछूता नहीं रहा। उस समय नगर और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी पर्याप्त संख्या में निवास करती थी। अधिकांश लोग अपना घर-बार छोड़ना नहीं चाहते थे, किंतु परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि बड़ी संख्या में परिवारों को पाकिस्तान जाना पड़ा।

उसी समय पश्चिमी पंजाब से हजारों विस्थापित हिंदू और सिख परिवार पानीपत आए और यहाँ बस गए। यह परिवर्तन केवल जनसंख्या का परिवर्तन नहीं था, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों और बिछोह का भी इतिहास था।

विभाजन के दौरान घटित अनेक घटनाएँ आज भी पानीपत की मानवीय चेतना का प्रमाण हैं। पाकिस्तान जाने वाले अनेक परिवारों ने अपने बर्तन, गहने, दस्तावेज और घरेलू सामान स्थानीय परिवारों के पास इस विश्वास के साथ सुरक्षित रखे कि हालात सुधरने पर वे लौट आएँगे। आश्चर्यजनक रूप से अनेक लोगों ने वर्षों तक इन वस्तुओं को पूरी ईमानदारी से सुरक्षित रखा। उन्हें विश्वास था कि उनके पड़ोसी एक दिन वापस आएँगे और अपनी अमानत ले जाएंगे।

यह घटना बताती है कि राजनीतिक सीमाएँ लोगों को अलग कर सकती हैं, लेकिन मानवीय संबंधों और विश्वास की जड़ों को समाप्त नहीं कर सकतीं।

सुरक्षा, संयम और सामाजिक जिम्मेदारी

विभाजन के समय पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का वातावरण था। पानीपत में भी रात्रि पहरे लगाए जाते थे। पुराने शहर के दरवाजे बंद कर दिए जाते थे और मोहल्लों के लोग सामूहिक रूप से सुरक्षा व्यवस्था संभालते थे।

इन प्रयासों का उद्देश्य किसी समुदाय के विरुद्ध कार्रवाई नहीं था, बल्कि हिंसा और अफवाहों से नगर को बचाना था। यही कारण था कि कठिन परिस्थितियों में भी पानीपत अपेक्षाकृत शांत बना रहा।

1984 : एक कठिन परीक्षा

सन् 1980 के दशक में पंजाब में उग्रवाद और आतंकवाद की घटनाओं का प्रभाव हरियाणा पर भी पड़ा। पानीपत में भी कुछ तत्वों ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का वातावरण बनाने का प्रयास किया। समाज में अविश्वास और भय फैलाने की कोशिशें हुईं।

इसी समय अनेक प्रगतिशील और राष्ट्रवादी युवाओं ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध अभियान चलाए। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। दुर्भाग्यवश फरवरी 1984 में कुछ हिंसक घटनाएँ हुईं, जिनमें गुरुद्वारों को क्षति पहुँचाई गई तथा निर्दोष सिख नागरिकों की हत्या हुई। यह पानीपत के इतिहास का अत्यंत पीड़ादायक अध्याय है।

किन्तु इन दुखद घटनाओं के बावजूद नगर की मूल चेतना जीवित रही। समाज के अधिकांश लोगों ने हिंसा का समर्थन नहीं किया। बाद में शांति स्थापित करने और विश्वास बहाली के लिए अनेक प्रयास किए गए।

इसी प्रकार अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में सिख-विरोधी हिंसा हुई। उस कठिन समय में पानीपत के अनेक नागरिकों ने अपने सिख भाइयों की सुरक्षा के लिए साहसिक कदम उठाए। अनेक परिवारों ने अपने घरों के द्वार खोल दिए और मानवता की रक्षा को धर्म से ऊपर रखा।

जाट आरक्षण आंदोलन और सामाजिक परिपक्वता

वर्ष 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा के अनेक हिस्से हिंसा और तनाव से प्रभावित हुए। अनेक नगरों में आगजनी और तोड़फोड़ हुई। किंतु पानीपत के लोगों ने अद्भुत संयम और परिपक्वता का परिचय दिया।

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और प्रशासन ने मिलकर शांति बनाए रखने का कार्य किया। यह घटना दर्शाती है कि पानीपत की सामाजिक चेतना केवल इतिहास की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत शक्ति भी है।

आध्यात्मिकता : सद्भाव का आधार

पानीपत की सामाजिक एकता का सबसे मजबूत आधार उसकी आध्यात्मिक परंपरा रही है। यहाँ धर्म को संघर्ष का नहीं, बल्कि मानव कल्याण का माध्यम माना गया है।

नगर में स्थित प्राचीन देवी मंदिर, हनुमान मंदिर, गुरुद्वारे, जैन मंदिर, सूफी संतों की दरगाहें तथा अन्य धार्मिक स्थल परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करते हैं।

निकटवर्ती पाथरी का देवी मंदिर, चुलकाना धाम का खाटू श्याम मंदिर तथा समालखा क्षेत्र में स्थित संत निरंकारी मिशन का विशाल आध्यात्मिक केंद्र लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। यहाँ लोगों को प्रेम, सेवा, भाईचारे और मानवता का संदेश मिलता है।

सूफी संतों की शिक्षाओं ने भी पानीपत की सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और मानव सेवा के उनके संदेश ने विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में बाँधे रखा।

सामाजिक संगठनों की भूमिका

पानीपत में सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने में अनेक स्वयंसेवी और सामाजिक संस्थाओं ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।

विशेष रूप से 1992 में स्थापित माता सीता रानी सेवा संस्थान ने समाज सेवा, महिला सशक्तिकरण और पारिवारिक सद्भाव के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। संस्थान द्वारा संचालित परिवार परामर्श केंद्र ने लगभग पाँच हजार से अधिक टूटते हुए परिवारों को पुनः जोड़ने और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने में सहायता की।

संस्थान द्वारा संचालित स्वाधार शेल्टर होम ने सैकड़ों पीड़ित, परित्यक्त और संकटग्रस्त महिलाओं को आश्रय, सुरक्षा और पुनर्वास प्रदान किया। यह कार्य केवल सेवा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा का एक महत्वपूर्ण प्रयास रहा है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं ने समय-समय पर सर्वधर्म सभाओं, शांति यात्राओं, रक्तदान शिविरों, राहत अभियानों और जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य किया है।

अमन और दोस्ती की परंपरा

पानीपत की पहचान केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही। यहाँ के अनेक सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति एवं सद्भाव के आंदोलनों से जुड़े रहे हैं।

अमन-दोस्ती यात्राओं, भारत-पाक मैत्री अभियानों तथा विश्व शांति आंदोलनों में पानीपत के नागरिकों की सक्रिय भागीदारी रही है। इन प्रयासों ने यह संदेश दिया है कि स्थायी शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि लोगों के बीच विश्वास और संवाद से स्थापित होती है।

      पानीपत का इतिहास हमें यह सिखाता है कि किसी नगर की महानता केवल उसकी युद्धभूमियों, स्मारकों या आर्थिक उपलब्धियों से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक पहचान उसके लोगों की संवेदनशीलता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों से निर्मित होती है।

विभाजन की त्रासदी हो, 1984 का तनावपूर्ण दौर हो या सामाजिक आंदोलनों की चुनौतियाँ—हर कठिन समय में पानीपत ने अंततः शांति, सद्भाव और भाईचारे का मार्ग चुना है।


हाली पानीपती और "हाली मेला" : सद्भाव और इंसानियत का संदेश

पानीपत की पहचान केवल ऐतिहासिक युद्धों और राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महान साहित्यकारों, सूफी विचारकों और मानवतावादी चिंतकों की भूमि भी रही है। इनमें उर्दू साहित्य के महान कवि और समाज सुधारक अल्ताफ हुसैन हाली, जिन्हें संसार "हाली पानीपती" के नाम से जानता है, का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।

हाली केवल एक महान शायर ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक जागरण, शिक्षा, महिला उत्थान और राष्ट्रीय एकता के समर्थक भी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अज्ञानता और विभाजनकारी प्रवृत्तियों का विरोध किया तथा मानवता, प्रेम और नैतिक मूल्यों का संदेश दिया। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके जीवनकाल में थे।

पानीपत में हाली की स्मृति को जीवित रखने तथा उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से समय-समय पर "हाली मेला" का आयोजन किया जाता रहा है। यह मेला केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

हाली मेले के विभिन्न आयोजनों में देश की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया। एक भव्य आयोजन में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, तत्कालीन उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी तथा देश के अनेक प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व उपस्थित हुए। इस अवसर पर हाली के विचारों को स्मरण करते हुए राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति, सामाजिक सद्भाव और महिला सशक्तिकरण के मूल्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया।

मेले के मंच से यह संदेश दिया गया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और समाज की प्रगति तभी संभव है जब सभी समुदाय प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना से साथ आगे बढ़ें। हाली के जीवन और साहित्य को इसी भावना का प्रतिनिधि माना गया।

हाली को पानीपत से अगाध प्रेम था। उन्होंने जीवन का अधिकांश समय यहीं बिताया और अपने नगर को अपनी पहचान का अभिन्न अंग माना। देश के अनेक नगरों और सांस्कृतिक केंद्रों से जुड़े रहने के बावजूद उनका मन अंततः पानीपत की मिट्टी में ही रमता था। यही कारण है कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि के प्रति गहरे अनुराग को अपने प्रसिद्ध शेर में व्यक्त किया—

हरगिज न लूँ, बहिष्त,

 तेरी एक मुश्त ए खाक के बदले

हाली का सम्पूर्ण साहित्य मानवता, शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना का संदेश देता है। उनके विचारों में धर्म के नाम पर विभाजन नहीं, बल्कि इंसानियत के आधार पर एकता का भाव दिखाई देता है। यही कारण है कि आज भी हाली पानीपत की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक उदारता के प्रतीक माने जाते हैं।

पानीपत के सद्भाव और शांति के इतिहास में हाली का योगदान केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे विचारक के रूप में भी स्मरणीय है जिसने अपने शब्दों से लोगों के दिलों को जोड़ने का कार्य किया। हाली मेला उसी विरासत को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और यह आने वाली पीढ़ियों को प्रेम, भाईचारे और मानवता का संदेश देता रहेगा।यह खंड आपके अध्याय "पानीपत : सद्भाव, शांति और सामाजिक एकता की विरासत" में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आधार वाले भाग के बाद जोड़ा जाए तो लेख और अधिक समृद्ध तथा ऐतिहासिक रूप से संतुलित लगेगा।

यही कारण है कि पानीपत केवल इतिहास का नगर नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और मानवीय एकता की जीवंत मिसाल है। इसकी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी और हमें यह स्मरण कराती रहेगी कि प्रेम, विश्वास और मानवता किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

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