मेरा घर : मेरी पहचान, मेरी विरासत
"घर केवल वह स्थान नहीं होता जहाँ हम रहते हैं; वह हमारी स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और समाज के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का जीवंत इतिहास होता है।"
जब भी मैं अपने जीवन की यात्रा पर दृष्टि डालता हूँ, तो सबसे पहले मेरे सामने दो घर उभरकर आते हैं—पानीपत के ऐतिहासिक मोहल्ला कायस्थान का हमारा पैतृक घर और सन् 1975 से हमारा निवास ओल्ड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी का घर। इन दोनों घरों ने मेरे व्यक्तित्व, मेरे विचारों और मेरे जीवन की दिशा को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मेरे पूज्य पिता, स्वर्गीय मास्टर सीताराम सैनी, अक्सर कहा करते थे—"बेटा, हमारा घर पानीपत के हृदय में है। जितने कदम हमारे घर से देवी मंदिर तक हैं, लगभग उतने ही कदम हज़रत बू अली शाह कलंदर की दरगाह तक हैं। लगभग उतनी ही दूरी पर गुरुद्वारा पहली पातशाही और आर्य समाज का मंदिर भी है।" उनके इन शब्दों में केवल भौगोलिक स्थिति का वर्णन नहीं था, बल्कि भारत की साझी संस्कृति, धार्मिक सद्भाव और सामाजिक समरसता का गहरा संदेश छिपा था।
हमारे घर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके चारों ओर इतिहास, अध्यात्म और संस्कृति की अमूल्य धरोहरें स्थित हैं। घर से कुछ ही दूरी पर लगभग आठ सौ वर्ष प्राचीन जैन मंदिर है, जो पानीपत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। निकट ही सम्राट बाबर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक काबुली बाग मस्जिद स्थित है, जो प्रथम पानीपत युद्ध के इतिहास की साक्षी है। हज़रत बू अली शाह कलंदर की पावन दरगाह, गुरुद्वारा पहली पातशाही, आर्य समाज मंदिर और देवी मंदिर—ये सभी हमारे घर के आसपास स्थित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो भारत की विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएँ हमारे घर के चारों ओर अपना आशीर्वाद बिखेर रही हों।
व्यावहारिक दृष्टि से भी हमारे घर का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पानीपत का मुख्य बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन दोनों ही निकट हैं, जिससे देशभर से आने वाले मित्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्वानों और अतिथियों का हमारे घर पहुँचना सदैव सहज रहा। शायद यही कारण है कि समय के साथ हमारा घर केवल परिवार का निवास नहीं रहा, बल्कि संवाद, सेवा, विचार-विमर्श और राष्ट्रीय एकता का एक जीवंत केंद्र बन गया।
सन् 1975 में जब हम ओल्ड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी आए, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह घर आगे चलकर केवल हमारे परिवार का निवास नहीं रहेगा, बल्कि समाज-सेवा, राष्ट्रीय एकता और रचनात्मक चिंतन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन जाएगा।
यह घर हमारे परिवार की प्रत्येक महत्वपूर्ण स्मृति का साक्षी है। मेरे बड़े भाई राणा जी और उनकी धर्मपत्नी भी इसी घर में रहे। उनके दोनों बच्चों का जन्म भी इसी घर में हुआ। मेरा विवाह हुआ तो मेरी पत्नी श्रीमती कृष्णा कांता राय पहली बार इसी घर में आईं। मेरी दोनों पुत्रियों सुलभा और संघमित्रा और मेरे पुत्र उत्कर्ष का जन्म यहीं हुआ, उनका लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा यहीं हुई। मेरी दोनों बेटियों का विवाह इसी घर से हुआ और बाद में मेरे पुत्र का विवाह भी इसी घर में सम्पन्न हुआ और उसकी पत्नी के रूप में आकांक्षा यहां आई। इस घर ने हमारे परिवार की कई पीढ़ियों की हँसी, आँसू, संघर्ष और सफलताओं को अपने भीतर संजोया है।
मेरे माता-पिता का स्नेह, बड़े भाई का मार्गदर्शन और मेरी बड़ी बहन अरुणा का इस घर के प्रति विशेष लगाव आज भी इसकी हर दीवार में महसूस होता है। उनके बच्चों की किलकारियाँ भी इस घर की स्मृतियों का हिस्सा हैं।
धीरे-धीरे यह घर सामाजिक और राष्ट्रीय गतिविधियों का केंद्र बन गया। श्रद्धेय निर्मला देशपांडे, डॉ. सईदा हमीद, डॉ. मोहिनी गिरी, अरुणा आसिफ़अली, डॉ. विभा पार्थसारथी, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्री सीताराम केसरी, श्री गुलाम नबी आज़ाद, चौधरी बीरेन्द्र सिंह, राधा बहन भट्ट, श्री सुब्बाराव, स्वामी अग्निवेश सहित अनेक राष्ट्रीय और सामाजिक विभूतियों ने इस घर को अपने आगमन से गौरवान्वित किया।
मेरे पूज्य ससुर, श्री गणेश लाल माली (संसद सदस्य) का इस घर से विशेष आत्मीय संबंध रहा। वे जब भी आते, घर का वातावरण स्नेह और अनुभवों से भर उठता। इसी प्रकार प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक प्रोफेसर देवेन्द्र यादव, उनके पुत्र योगेन्द्र यादव तथा उनके सहयोगी कामरेड दिलीप सिंह का भी इस घर में नियमित आना-जाना रहा। यहीं अनेक सामाजिक और लोकतांत्रिक आंदोलनों तथा जनसरोकारों पर गंभीर चर्चाएँ होती थीं।
आर्य समाज के तत्वावधान में चारों वेदों के पारायण, यज्ञ और प्रवचन भी समय-समय पर इसी घर में आयोजित हुए। आचार्य वेदभूषण जी, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, प्रोफेसर शेर सिंह तथा अनेक विद्वानों ने अपने ज्ञान से इस घर को आलोकित किया।
मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण सामाजिक यात्रा का केंद्र भी यही घर रहा। माता सीता रानी सेवा संस्था का मुख्यालय इसी घर में स्थापित हुआ। इसी संस्था द्वारा संचालित परिवार परामर्श केंद्र में वर्षों तक हजारों विवादग्रस्त परिवारों के मामलों का शांतिपूर्ण समाधान हुआ। टूटते परिवारों को जोड़ने, महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों को न्याय और सम्मान दिलाने का जो कार्य यहाँ से प्रारम्भ हुआ, वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इस घर की दीवारों ने केवल हमारे परिवार की खुशियाँ नहीं देखीं, बल्कि असंख्य परिवारों के जीवन में लौटती मुस्कान भी देखी है।
आज जब कभी मन शहर की भीड़भाड़ छोड़कर किसी शांत स्थान पर बसने का विचार करता है, तब पिता जी के शब्द फिर कानों में गूँजते हैं—
"बेटा, पानीपत छोड़कर कहीं मत जाना। हम कलंदर साहब के आगोश में हैं।"
उनके ये शब्द मेरे लिए जीवन-दर्शन बन गए हैं। मुझे लगता है कि यह घर केवल ईंट और पत्थरों से नहीं बना, बल्कि इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म, समाज-सेवा और पूर्वजों के आशीर्वाद से निर्मित हुआ है।
महान शायर हाली पानीपती का यह शेर मेरे मन की भावना को पूर्ण अभिव्यक्ति देता है—
"हरगिज़ न लूँ बहिश्त, तेरी एक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले।"
सचमुच, यदि मुझसे कोई पूछे कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी धरोहर क्या है, तो मैं निस्संकोच कहूँगा—मेरा घर। यह केवल मेरा निवास नहीं, बल्कि मेरे पूर्वजों की विरासत, मेरे माता-पिता के संस्कार, मेरे परिवार के प्रेम, समाज-सेवा की साधना, राष्ट्रीय एकता के प्रयास और असंख्य प्रेरक स्मृतियों का जीवंत तीर्थ है। संसार के किसी भी कोने में चला जाऊँ, मेरा मन अंततः इसी घर की चौखट पर लौट आता है, क्योंकि यही मेरा वास्तविक घर, मेरी पहचान और मेरी आत्मा का निवास है।
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