जर्मनी : इतिहास, विचार और मानवता से संवाद
पाँच दिवसीय जर्मनी प्रवास की भूमिका
— राम मोहन राय
इन दिनों हम लगभग पाँच दिनों के प्रवास पर जर्मनी में हैं। जर्मनी सदैव से भारतीयों के लिए आकर्षण, जिज्ञासा और प्रेरणा का केंद्र रहा है। यह केवल यूरोप की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से एक नहीं, बल्कि दर्शन, साहित्य, विज्ञान, संगीत, समाज-सुधार और आधुनिक लोकतंत्र की महान परंपराओं का भी देश है। विश्व के बौद्धिक इतिहास में जर्मनी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
इस धरती ने ऐसे अनेक महान दार्शनिक, चिंतक, वैज्ञानिक और साहित्यकार दिए जिन्होंने मानव सभ्यता के विकास को नई दिशा प्रदान की। इमैनुएल कांट ने नैतिक दर्शन और विवेक की नई परिभाषा दी, हेगेल ने इतिहास और विचार की गति को समझने का नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, कार्ल मार्क्स ने सामाजिक और आर्थिक न्याय की अवधारणाओं को विश्वव्यापी विमर्श का विषय बनाया, जबकि फ़्रेडरिक नीत्शे ने स्थापित मान्यताओं को चुनौती देकर स्वतंत्र चिंतन का मार्ग प्रशस्त किया।
साहित्य के क्षेत्र में योहान वोल्फगांग फॉन गोएथे और फ़्रेडरिक शिलर ने विश्व साहित्य को अमूल्य धरोहर प्रदान की। विज्ञान में अल्बर्ट आइंस्टीन, मैक्स प्लांक, वर्नर हाइज़ेनबर्ग और विल्हेम रॉन्टगेन जैसे महान वैज्ञानिकों ने आधुनिक विज्ञान की नींव को और अधिक सुदृढ़ बनाया। संगीत की दुनिया में बीथोवेन, योहान सेबास्टियन बाख और ब्राह्म्स आज भी अमर हैं। आधुनिक राजनीति में कोनराड एडेनॉवर, विली ब्रांट, हेल्मुट कोल और एंजेला मर्केल ने युद्धग्रस्त जर्मनी को विश्व के सबसे सफल लोकतांत्रिक और समृद्ध राष्ट्रों में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यदि समाज-सुधार की बात करें तो मार्टिन लूथर का नाम सबसे पहले स्मरण होता है। सोलहवीं शताब्दी में उन्होंने चर्च की रूढ़ियों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो सुधार आंदोलन प्रारंभ किया, उसने पूरे ईसाई जगत को झकझोर दिया और प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन का जन्म हुआ। भारत में जिस प्रकार राजा राममोहन राय, महात्मा ज्योतिबा फुले, महर्षि दयानंद सरस्वती और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने समाज को नई दिशा दी, उसी प्रकार यूरोप में मार्टिन लूथर ने धार्मिक और सामाजिक चेतना का नया अध्याय लिखा।
लेकिन जर्मनी का इतिहास केवल उपलब्धियों का इतिहास नहीं है; यह मानवता को चेतावनी देने वाला इतिहास भी है। एडॉल्फ हिटलर के शासनकाल में नाज़ीवाद, नस्लीय श्रेष्ठता और उग्र राष्ट्रवाद ने पूरी दुनिया को विनाश की आग में झोंक दिया। यह इतिहास हमें बताता है कि जब राष्ट्रवाद मानवता से ऊपर उठ जाता है और घृणा राजनीति का आधार बन जाती है, तब परिणाम केवल विनाश होता है।
प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) में लगभग 1.5 से 2 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई और यूरोप की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। इसके बाद भी मानवता ने सबक नहीं सीखा और द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) आरंभ हो गया, जिसमें लगभग 7 से 8.5 करोड़ लोगों ने अपने प्राण गंवाए। इनमें लगभग 60 लाख यहूदियों का नाज़ी शासन द्वारा योजनाबद्ध नरसंहार (होलोकॉस्ट) किया गया। करोड़ों लोग बेघर हुए, असंख्य नगर खंडहर बन गए और पूरी दुनिया ने युद्ध की विभीषिका का दर्द झेला।
आज का जर्मनी उसी इतिहास से सीख लेकर शांति, लोकतंत्र, मानवाधिकार और सह-अस्तित्व का समर्थक बनकर विश्व के सामने खड़ा है। यही इस देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि जिसने युद्ध का सबसे भयावह रूप देखा, वही आज शांति और यूरोपीय एकता का अग्रदूत है।
मेरे लिए यह यात्रा विशेष रूप से भावनात्मक भी है। वर्ष 1987 में मुझे भारत के एक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में तत्कालीन पूर्वी जर्मनी (German Democratic Republic – GDR) आने का अवसर मिला था। उस समय जर्मनी दो भागों में विभाजित था। पश्चिमी जर्मनी Federal Republic of Germany (FRG) के नाम से जाना जाता था, जिसकी राजधानी बॉन थी, जबकि पूर्वी जर्मनी एक अलग समाजवादी राष्ट्र था।
उस समय मैं पूर्वी जर्मनी में आया था, लेकिन मन में हमेशा यह इच्छा बनी रही कि कभी पश्चिमी जर्मनी और विशेष रूप से बर्लिन को भी विस्तार से देखूँ। इतिहास बदला, 1989 में बर्लिन की दीवार गिरी, 1990 में जर्मनी का पुनः एकीकरण हुआ, और आज एक नया, आधुनिक और समृद्ध जर्मनी पूरी दुनिया के सामने है।
इससे पहले मुझे कोलोन, अटा गुफा (Atta Höhle), विंटरबर्ग, बॉन तथा अन्य नगरों में जाने का अवसर मिला है। इस बार मेरी सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि मेरी जीवनसंगिनी भी मेरे साथ हैं। हम दोनों मिलकर बर्लिन की ऐतिहासिक धरोहरों, संग्रहालयों, स्मारकों, सांस्कृतिक स्थलों और आधुनिक विकास को निकट से समझने का प्रयास करेंगे।
हमारा उद्देश्य केवल पर्यटन नहीं है। हम इस यात्रा के माध्यम से इतिहास से सीखना, वर्तमान को समझना और भविष्य के लिए प्रेरणा प्राप्त करना चाहते हैं। गांधीजी का विश्वास था कि स्थायी शांति केवल सत्य, अहिंसा और मानवता के मार्ग से ही संभव है। जर्मनी का इतिहास भी यही संदेश देता है कि घृणा और हिंसा अंततः विनाश का कारण बनती हैं, जबकि संवाद, लोकतंत्र और मानवीय संवेदनाएँ किसी भी राष्ट्र को महान बनाती हैं।
आने वाले पाँच दिनों में हम बर्लिन और उसके आसपास के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण करेंगे। इस यात्रा के अनुभव, इतिहास के विविध प्रसंग और यहाँ के समाज से मिली प्रेरणाएँ समय-समय पर आप सभी मित्रों के साथ साझा करता रहूँगा।
आप सभी के स्नेह, शुभकामनाओं और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ। आशा है कि यह यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि इतिहास, मानवता और शांति की खोज की एक सार्थक यात्रा सिद्ध होगी।
(2)
अध्याय : बर्लिन की पहली सुबह — आत्मीयता, अनुशासन और प्रकृति का सान्निध्य
बर्लिन की धरती पर हमारा पहला पड़ाव स्पांडाउ (Spandau) रेलवे स्टेशन था। प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते ही हमारे आत्मीय मेजबान श्री राजेन्द्र चोपड़ा मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत करने के लिए उपस्थित थे। विदेश में किसी अपने का इस प्रकार स्नेहपूर्वक स्वागत करना मन को एक अनोखा विश्वास और अपनापन प्रदान करता है। यात्रा की सारी थकान मानो उसी क्षण कम हो गई।
स्टेशन से उनके निवास तक पहुँचने के लिए हमें दो बार मेट्रो बदलनी पड़ी। इस छोटे-से सफर में ही बर्लिन की आधुनिक, स्वच्छ और समयनिष्ठ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का पहला परिचय मिल गया। हर यात्री पूरी शालीनता और अनुशासन के साथ अपनी यात्रा कर रहा था। यह दृश्य जर्मन समाज की कार्यसंस्कृति और नागरिक चेतना का परिचायक था।
जब हम उनके घर पहुँचे, तब उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मीता चोपड़ा आत्मीय मुस्कान के साथ हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं। घर में प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे हम किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बीच आ गए हों। बाहर की ठंडी हवा और भीतर घर का स्नेहिल वातावरण मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था।
शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। दिनभर की लंबी यात्रा के कारण हम अत्यंत थके हुए थे। बिना किसी औपचारिकता के हम सीधे भोजन की मेज़ पर आ बैठे। श्रीमती मीता चोपड़ा ने भारतीय शैली का अत्यंत स्वादिष्ट और स्नेह से परिपूर्ण रात्रिभोज तैयार किया था। विदेश में भारतीय भोजन का स्वाद केवल स्वाद ही नहीं देता, बल्कि अपने देश और अपनी संस्कृति की स्मृतियों को भी ताज़ा कर देता है। भोजन के प्रत्येक व्यंजन में भारतीय आतिथ्य और आत्मीयता की सुगंध समाई हुई थी।
भोजन के उपरांत हम अधिक देर तक जाग नहीं सके। यात्रा की थकान इतनी अधिक थी कि शीघ्र ही गहरी नींद ने हमें अपनी आगोश में ले लिया।
मेरी वर्षों पुरानी आदत है कि मैं प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही उठ जाता हूँ। अगले दिन भी ऐसा ही हुआ। सुबह की ताज़गी ने मुझे बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया। मैं अकेला ही आसपास के क्षेत्र को देखने के उद्देश्य से पैदल चल पड़ा।
बर्लिन की सुबह अद्भुत रूप से शांत, स्वच्छ और अनुशासित थी। कुछ ही दूरी पर दो विशाल खेल मैदान दिखाई दिए, जहाँ अनेक बच्चे पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ विभिन्न खेलों का अभ्यास कर रहे थे। उनके प्रशिक्षक भी पूरी तन्मयता से उन्हें मार्गदर्शन दे रहे थे। बच्चों के लिए खेल और स्वास्थ्य के प्रति ऐसा समर्पण देखकर मन प्रसन्न हो उठा।
थोड़ा आगे बढ़ने पर एक विस्तृत और शांत नदी दिखाई दी। उसके ऊपर दो सुंदर पुल बने हुए थे—एक सड़क यातायात के लिए और दूसरा रेलवे के लिए। पुलों से गुजरती रेल और सड़क पर व्यवस्थित रूप से चलते वाहन आधुनिक जीवन की गति का परिचय दे रहे थे, जबकि नीचे शांत बहती नदी प्रकृति की शाश्वत स्थिरता का संदेश दे रही थी। यह दृश्य मानो आधुनिकता और प्रकृति के अद्भुत संतुलन का प्रतीक था।
मैं काफी दूर तक नदी के किनारे-किनारे चलता रहा। स्वच्छ जल में उगते सूर्य की किरणें झिलमिला रही थीं। शीतल हवा के झोंके, पक्षियों का मधुर कलरव, किनारों पर लहराते वृक्ष और चारों ओर फैली हरियाली मन को गहन शांति प्रदान कर रहे थे। उस क्षण मुझे महात्मा गांधी का यह विचार स्मरण हो आया कि प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है, किन्तु उसके लालच की नहीं। वास्तव में, प्रकृति के साथ संतुलित जीवन ही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
लगभग एक घंटे के प्रातः भ्रमण के बाद जब मैं वापस लौटा, तब घर में नाश्ता तैयार था। हम सबने साथ बैठकर आत्मीय वातावरण में नाश्ता किया। बातचीत के दौरान दिनभर के कार्यक्रम की रूपरेखा बनी। इसके बाद हम तैयार हुए और बर्लिन के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक जीवन को निकट से देखने के उद्देश्य से अपने पहले भ्रमण पर निकल पड़े।
बर्लिन की यह पहली सुबह केवल एक नए नगर का परिचय नहीं थी। यह आत्मीय मेजबानी, अनुशासित जीवन, स्वच्छ पर्यावरण, प्रकृति के सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा अनुभव थी, जिसने मेरी यात्रा को एक विशेष अर्थ प्रदान किया। आज भी उस सुबह को स्मरण करता हूँ तो ऐसा लगता है कि बर्लिन ने अपने शांत वातावरण और आत्मीय लोगों के माध्यम से मेरा स्वागत केवल एक अतिथि के रूप में नहीं, बल्कि एक मित्र के रूप में किया था।
(3)
बर्लिन का सीनियर सिटीजन होम : सक्रिय वृद्धावस्था का प्रेरणादायी मॉडल
बर्लिन प्रवास के दौरान मुझे जर्मनी की सामाजिक व्यवस्था को निकट से देखने का एक अत्यंत प्रेरणादायी अवसर प्राप्त हुआ। हमारे मेजबान श्री राजेन्द्र चोपड़ा ने बताया कि वे और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मीता चोपड़ा सप्ताह में चार-चार घंटे स्थानीय सीनियर सिटीजन होम (Senior Citizens' Centre) में स्वैच्छिक सेवा (Voluntary Service) करते हैं। यह जानकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई कि भारतीय मूल के लोग अपने कर्म और सेवा-भाव से जर्मन समाज में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जिस दिन हम वहाँ गए, उस दिन श्रीमती मीता चोपड़ा की सेवा-पाली थी। वे प्रातः ही अपने दायित्व के निर्वहन के लिए केंद्र पहुँच गईं। कुछ समय बाद मैं, मेरी पत्नी तथा श्री राजेन्द्र चोपड़ा बस द्वारा वहाँ पहुँचे। भवन के बाहर लगा बोर्ड देखकर ज्ञात हुआ कि यह केंद्र बर्लिन के टेम्पेलहोफ़-शोनेबर्ग (Tempelhof–Schöneberg) जिला प्रशासन के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित है। जर्मन भाषा में इसे Seniorenfreizeitstätte अर्थात वरिष्ठ नागरिक मनोरंजन एवं गतिविधि केंद्र कहा जाता है।
यह केंद्र केवल बुजुर्गों के बैठने का स्थान नहीं, बल्कि सक्रिय, सम्मानजनक और आनंदमय वृद्धावस्था का जीवंत उदाहरण है। प्रतिदिन आसपास के वरिष्ठ नागरिक यहाँ एकत्रित होकर चाय-कॉफी के साथ आपस में मिलते-जुलते हैं, समाचार-पत्र एवं पुस्तकें पढ़ते हैं, शतरंज तथा अन्य बौद्धिक खेल खेलते हैं, संगीत सुनते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं और नई भाषाएँ सीखने का भी प्रयास करते हैं। जर्मनी में वृद्धावस्था को बोझ नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से समृद्ध एक सक्रिय चरण के रूप में देखा जाता है।
हमने केंद्र के विभिन्न कक्षों का अवलोकन किया। लगभग पचास से अधिक वरिष्ठ नागरिक अलग-अलग समूहों में अपनी-अपनी गतिविधियों में व्यस्त थे। एक कक्ष में कुछ लोग इतालवी भाषा सीख रहे थे, तो दूसरे कक्ष में सामाजिक और समसामयिक विषयों पर चर्चा चल रही थी। कहीं पुस्तक-पठन हो रहा था तो कहीं मित्रतापूर्ण बातचीत का वातावरण था। प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर संतोष, आत्मविश्वास और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
जब वहाँ उपस्थित लोगों को यह ज्ञात हुआ कि हम गांधी ग्लोबल फैमिली के प्रतिनिधि हैं, तो वातावरण में एक नई उत्सुकता भर गई। अनेक वरिष्ठ नागरिक हमारे पास आए और महात्मा गांधी के जीवन, उनके सत्य, अहिंसा और विश्व-शांति के संदेश तथा गांधी ग्लोबल फैमिली की गतिविधियों के विषय में जानने लगे। भाषा का अंतर अवश्य था, परंतु श्री राजेन्द्र चोपड़ा तथा केंद्र की अधीक्षिका ने जर्मन और अंग्रेज़ी के माध्यम से हमारे संवाद का अत्यंत प्रभावी अनुवाद किया।
मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ उपस्थित लगभग सभी वरिष्ठ नागरिक महात्मा गांधी के जीवन और विचारों से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने बताया कि अपने छात्र जीवन में उन्होंने गांधीजी के बारे में विस्तार से अध्ययन किया था और आज भी उनके विचारों को विश्व शांति के लिए अत्यंत प्रासंगिक मानते हैं। उनके प्रश्नों से स्पष्ट था कि गांधीजी के प्रति उनका सम्मान केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वैचारिक और मानवीय भी है।
मैंने उन्हें बताया कि महात्मा गांधी का स्वप्न केवल भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि भारत स्वतंत्र होकर संपूर्ण विश्व की सेवा करे और सत्य, अहिंसा तथा मानवता के मार्ग पर चलकर विश्व-शांति का संदेश दे। गांधी ग्लोबल फैमिली आज इसी भावना को लेकर विश्व के विभिन्न देशों में संवाद, सद्भाव और अहिंसा का कार्य कर रही है।
केंद्र की अधीक्षिका ने भी विशेष रुचि लेकर गांधीजी के जीवन और गांधी ग्लोबल फैमिली के कार्यों की जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर मैंने उन्हें महात्मा गांधी का एक सुंदर चित्र भेंट किया। उन्होंने अत्यंत सम्मान और प्रसन्नता के साथ उस चित्र को स्वीकार किया। उनके चेहरे पर झलकती आत्मीयता मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं थी।
संवाद के उपरांत सभी वरिष्ठ नागरिकों ने हमारे साथ सामूहिक छायाचित्र भी खिंचवाया। इसके बाद हमें पूरे केंद्र का विस्तृत भ्रमण कराया गया। वहाँ एक विशाल सभागार था, जहाँ समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, व्याख्यान और सामुदायिक सभाएँ आयोजित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त कई बड़े गतिविधि-कक्ष थे, एक सुव्यवस्थित पुस्तकालय था, जहाँ विभिन्न विषयों की पुस्तकें और अनेक समाचार-पत्र उपलब्ध थे। एक सुंदर कैफेटेरिया भी था, जहाँ चाय, कॉफी और पौष्टिक अल्पाहार अत्यंत रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता था, ताकि प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक बिना किसी आर्थिक चिंता के वहाँ समय व्यतीत कर सके।
इस केंद्र का वातावरण देखकर मुझे लगा कि यदि समाज अपने वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान, संवाद, सक्रियता और सामाजिक सहभागिता के ऐसे अवसर प्रदान करे, तो वृद्धावस्था भी जीवन का अत्यंत सुखद और सृजनात्मक काल बन सकती है। जर्मनी की यह व्यवस्था वास्तव में अनुकरणीय है। भारत जैसे विशाल देश में भी यदि ऐसे अधिक से अधिक वरिष्ठ नागरिक केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो लाखों बुजुर्गों के जीवन में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास और सामाजिक अपनापन लौट सकता है।
बर्लिन का यह अनुभव मेरी जर्मनी यात्रा की सबसे प्रेरक स्मृतियों में से एक बन गया। यहाँ मैंने केवल एक संस्थान नहीं देखा, बल्कि यह अनुभव किया कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों को कितना सम्मान, सुरक्षा और सक्रिय जीवन प्रदान करता है। जर्मनी का यह सीनियर सिटीजन होम वास्तव में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और गरिमामय वृद्धावस्था का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
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बर्लिन में गूंजा महात्मा गांधी का सत्य एवं अहिंसा का संदेश
गांधी ग्लोबल फैमिली, जर्मनी द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी में टोपुज़ ओज़लेम को "महात्मा गांधी युवा सेवा दूत सम्मान"
बर्लिन (जर्मनी), 28 जुलाई। गांधी ग्लोबल फैमिली (GGF), जर्मनी के तत्वावधान में बर्लिन के वरिष्ठ एवं अग्रणी नागरिकों के साथ महात्मा गांधी के जीवन, विचार एवं संदेश पर एक प्रेरक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े जर्मन एवं भारतीय नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर संस्था की निदेशक टोपुज़ ओज़लेम विशेष रूप से उपस्थित रहीं।
गांधी ग्लोबल फैमिली के महासचिव राम मोहन राय ने अपने उद्बोधन में कहा कि महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के ऐसे महान उपासक थे जिन्होंने सत्याग्रह जैसा अचूक अस्त्र भारत की गुलाम जनता को प्रदान किया। सत्य, नैतिकता और आत्मबल के आधार पर उन्होंने देशवासियों को संगठित किया, जिसके परिणामस्वरूप निहत्थी भारतीय जनता ने अपने अदम्य साहस और जनशक्ति के बल पर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त कर स्वतंत्रता प्राप्त की। उन्होंने कहा कि गांधीजी का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता केवल भारतवासियों के लिए नहीं, बल्कि विश्व की पीड़ित, शोषित और वंचित मानवता की सेवा के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि महात्मा गांधी केवल भारत के राष्ट्रपिता ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के नैतिक नेतृत्व के प्रतीक हैं। उनकी पहचान केवल पुस्तकों या इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके जीवन, संघर्ष और कर्म ने उन्हें विश्वमानव का दर्जा दिलाया है। गांधी आज भी भारत के इतिहास, दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि हैं तथा पूरी दुनिया में भारत की पहचान का महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं।
वक्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि जर्मनी में अनेक स्थानों पर महात्मा गांधी की प्रतिमाएँ एवं स्मारक स्थापित हैं तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनके जीवन-दर्शन और विचारों का अध्ययन एवं शोध किया जाता है। वर्तमान समय में, जब विश्व हिंसा, युद्ध और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब गांधीजी का सत्य, अहिंसा, शांति, संवाद और सह-अस्तित्व का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
कार्यक्रम का आयोजन जर्मन-भारतीय समाजसेवी राजेंद्र चोपड़ा एवं मीता चोपड़ा ने किया। समारोह के दौरान निदेशक टोपुज़ ओज़लेम को समाज में शांति, सद्भाव एवं मानवीय मूल्यों के प्रसार में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए "महात्मा गांधी युवा सेवा दूत सम्मान" से सम्मानित किया गया। सम्मान ग्रहण करते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है और गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप मानव सेवा एवं विश्व शांति के लिए कार्य करना उनके लिए गर्व और प्रेरणा का विषय रहेगा।
कार्यक्रम का समापन विश्व शांति, सद्भाव, मानव एकता तथा गांधीजी के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। कार्यक्रम में माता सीतारानी सेवा संस्था, पानीपत की अध्यक्ष कृष्णा कांता भी उपस्थित रहीं.
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