केटी कोटी (Keti Koti): दासता की जंजीरों से मुक्ति का उत्सव और मानव समानता का संदेश
केटी कोटी (Keti Koti): दासता की जंजीरों से मुक्ति का उत्सव और मानव समानता का संदेश
— नीदरलैंड की यात्रा से एक प्रत्यक्ष अनुभव
आज (1 जुलाई) मुझे नीदरलैंड के एम्स्टर्डम स्थित म्यूज़ियमप्लेन (Museumplein) में आयोजित केटी कोटी (Keti Koti) के विशाल अंतरराष्ट्रीय उत्सव में सम्मिलित होने का अवसर मिला। यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि मानव गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिए किए गए ऐतिहासिक संघर्ष की जीवंत अभिव्यक्ति थी।
'केटी कोटी' का अर्थ है—"टूटी हुई जंजीरें"। यह दिवस उन लाखों अफ्रीकी मूल के स्त्री-पुरुषों और बच्चों की स्मृति को समर्पित है जिन्हें सदियों तक गुलाम बनाकर यूरोप की उपनिवेशों में अमानवीय जीवन जीने को विवश किया गया।
हजारों लोग—अश्वेत, श्वेत, एशियाई, भारतीय, सूरीनामी, कैरेबियाई और अनेक अन्य देशों के नागरिक—रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में इस उत्सव में एकत्रित हुए। पूरा वातावरण संगीत, नृत्य, संस्कृति और स्वतंत्रता के उल्लास से भरा हुआ था। चारों ओर विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ दे रहे थे। सैकड़ों स्टॉलों पर भोजन, हस्तशिल्प, वस्त्र और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दे रही थी। लोगों के उत्साह को देखकर ऐसा लगा मानो यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता की सामूहिक चेतना का पर्व हो।
प्रदर्शित इतिहास ने झकझोर दिया
उत्सव स्थल पर लगे एक बड़े ऐतिहासिक पोस्टर ने गहरी संवेदना उत्पन्न की। उसमें दास व्यापार और उसके अंत का क्रमबद्ध विवरण दिया गया था। उसके अनुसार—
- लगभग 1 करोड़ 30 लाख अफ्रीकी लोगों को पकड़कर स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैंड, फ्रांस और नीदरलैंड के उपनिवेशों में गुलाम बनाकर भेजा गया।
- लगभग 1 करोड़ 5 लाख लोग ही इस अमानवीय समुद्री यात्रा में जीवित बच सके।
- 3 जून 1621 को डच वेस्ट इंडिया कंपनी (WIC) ने सूरीनाम में दास व्यापार पर नियंत्रण स्थापित किया।
- लगभग दो शताब्दियों तक यह त्रिकोणीय दास व्यापार चलता रहा।
- 1 जुलाई 1863 को नीदरलैंड ने औपचारिक रूप से दास प्रथा समाप्त की, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मिली।
- तथाकथित "मुक्त" लोगों को 10 वर्ष तक और बंधुआ श्रम करने के लिए विवश किया गया।
- 1 जुलाई 1873 को लगभग 45,275 लोगों को वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
- गुलामों को कुछ नहीं मिला, बल्कि गुलाम रखने वाले मालिकों को प्रत्येक गुलाम के बदले 300 गिल्डर का मुआवज़ा दिया गया।
- कुल मिलाकर लगभग 1 करोड़ 20 लाख गिल्डर (आज के लगभग 20 करोड़ यूरो के बराबर) सरकार ने गुलाम मालिकों को दिए।
- इतना ही नहीं, मुक्त किए गए लोगों पर कई वर्षों तक विशेष कर भी लगाया गया।
- अंततः 19 दिसंबर 2022 को नीदरलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्क रुट्टे ने डच सरकार की ओर से दास प्रथा के लिए औपचारिक क्षमा याचना की।
यह इतिहास केवल सूरीनाम या नीदरलैंड का इतिहास नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अंतःकरण पर अंकित एक गहरा घाव है।
भारत की याद क्यों आई?
इस उत्सव में भाग लेते हुए बार-बार भारत का इतिहास स्मरण हो आया। लगभग दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया। उन्होंने अपने उपनिवेशवाद को "सभ्यता का मिशन" बताया और भारतीयों को पिछड़ा एवं असभ्य सिद्ध करने का प्रयास किया। यही मानसिकता अफ्रीका और कैरेबियाई देशों के लोगों के साथ भी अपनाई गई।
दुनिया के अनेक हिस्सों में गोरे लोगों ने अश्वेतों को केवल त्वचा के रंग के कारण हीन समझा। अमेरिकी चिंतक डॉ. डब्ल्यू. ई. बी. डू बोइस ने इसे "रंगभेद" की सबसे बड़ी समस्या बताया था। दूसरी ओर कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के माध्यम से शोषण की व्याख्या की।
भारत में सामाजिक यथार्थ इससे भी अधिक जटिल रहा। यहाँ औपनिवेशिक दासता के साथ-साथ जातिगत भेदभाव भी सदियों तक समाज को विभाजित करता रहा। दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मंदिरों, कुओं, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित रखा गया।
ऐसे समय में डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर ने सामाजिक न्याय, समानता और मानव अधिकारों का महान संघर्ष छेड़ा। भारतीय संविधान के माध्यम से उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श स्थापित किए।
क्षमा और आत्मस्वीकृति का साहस
नीदरलैंड सरकार द्वारा अपने अतीत की गलतियों को स्वीकार करना और सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगना एक महत्वपूर्ण नैतिक कदम है। इतिहास बदला नहीं जा सकता, लेकिन इतिहास से सीख लेकर भविष्य अवश्य बदला जा सकता है।
दुर्भाग्य से भारत को अभी तक ब्रिटिश शासन की ओर से वैसी स्पष्ट और औपचारिक क्षमा याचना प्राप्त नहीं हुई है, जैसी दास प्रथा के संदर्भ में नीदरलैंड ने की। इतिहास के घाव केवल आर्थिक क्षतिपूर्ति से नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकार करने और न्यायपूर्ण स्मृति के निर्माण से भरते हैं।
नई दुनिया का सपना
केटी कोटी केवल अतीत की स्मृति नहीं है। यह भविष्य की दिशा भी है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।
आज जब दुनिया जाति, रंग, नस्ल, धर्म और आर्थिक असमानताओं से जूझ रही है, तब केटी कोटी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
महात्मा गांधी, बाबा साहब अम्बेडकर, डॉ. डू बोइस, कार्ल मार्क्स और निर्मला देशपांडे जैसे विचारकों का सपना भी यही था कि मनुष्य को मनुष्य होने के कारण सम्मान मिले।
केटी कोटी हमें यही प्रेरणा देता है कि हम ऐसी दुनिया का निर्माण करें जहाँ किसी मनुष्य की पहचान उसकी जाति, रंग, नस्ल या जन्म से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से हो।
टूटी हुई जंजीरें केवल इतिहास की घटना नहीं हैं; वे भविष्य के लिए हमारी सामूहिक प्रतिज्ञा हैं।
राम मोहन राय,
Amsterdam, Netherlands.
01.07.2026
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