My trip to the Belin -2026
रेल यात्रा मुझे सदैव आकर्षित करती रही है। भारत के लगभग हर हिस्से में मैंने रेल से लंबी यात्राएँ की हैं, किंतु एक देश से दूसरे देश तक रेल द्वारा यात्रा करने का अनुभव बिल्कुल अलग होता है। अब तक मुझे तीन बार अंतरराष्ट्रीय रेल यात्रा करने का अवसर मिला है। इन तीनों यात्राओं ने मुझे केवल नए देशों से ही नहीं, बल्कि सीमाओं, विश्वास और मानवता के बदलते स्वरूप से भी परिचित कराया।
मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय रेल यात्रा अमृतसर से लाहौर की थी। दोनों शहरों के बीच की दूरी मात्र लगभग 30 किलोमीटर है, किंतु इस छोटी-सी दूरी को तय करने में लगभग छह घंटे लग गए। अटारी स्टेशन पर पूरी ट्रेन खाली करवाई गई। प्रत्येक यात्री के पासपोर्ट, वीजा और अन्य दस्तावेजों की गहन जाँच हुई। कई प्रकार के प्रश्न पूछे गए, जिनसे सामान्य और सम्मानित यात्री भी असहज महसूस कर सकता था।
जब ट्रेन वाघा पहुँची, जो अटारी से कुछ ही किलोमीटर दूर है, वहाँ भी पूरी प्रक्रिया दोबारा दोहराई गई। फिर से सभी यात्रियों को ट्रेन से उतरना पड़ा, दस्तावेजों की जाँच हुई और लंबी पूछताछ के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति मिली। अंततः हम रात लगभग साढ़े नौ बजे लाहौर रेलवे स्टेशन पहुँचे। यह अनुभव इस बात का प्रतीक था कि राजनीतिक सीमाएँ कभी-कभी लोगों के बीच अनावश्यक मानसिक दूरियाँ भी पैदा कर देती हैं।
मेरी दूसरी अंतरराष्ट्रीय रेल यात्रा स्विट्ज़रलैंड से इटली के मिलान तक की थी। यह अनुभव पहले से बिल्कुल भिन्न था। ट्रेन अपनी गति से चलती रही। सीमा कब आई और कब पार हो गई, इसका पता ही नहीं चला। न ट्रेन रुकी और न ही किसी प्रकार की औपचारिकता से यात्रियों को गुजरना पड़ा। केवल कुछ यात्रियों के दस्तावेज चलती ट्रेन में ही देखे गए। ऐसा लगा मानो हम एक ही देश के भीतर यात्रा कर रहे हों।
हाल ही में मुझे तीसरी बार एक देश से दूसरे देश रेल द्वारा जाने का अवसर मिला। हम सुबह आठ बजे नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम से जर्मनी की राजधानी बर्लिन के लिए रवाना हुए। पूरी यात्रा के दौरान कहीं भी यह अनुभव नहीं हुआ कि हम एक देश छोड़कर दूसरे देश में प्रवेश कर चुके हैं। न कोई इमिग्रेशन काउंटर, न कोई लंबी कतार और न ही कोई विशेष जाँच। सीमा इतनी सहजता से पार हुई कि उसका एहसास तक नहीं हुआ।
यह परिवर्तन यूरोपीय संघ और शेंगेन व्यवस्था की देन है। आज यूरोप के अनेक देशों ने साझा विश्वास के आधार पर अपनी सीमाओं को सहयोग का माध्यम बना दिया है। एक समान शेंगेन वीजा, अनेक देशों में साझा मुद्रा (यूरो) और बिना रोक-टोक आवागमन ने पूरे यूरोप को शांति, सहयोग और आर्थिक विकास का उत्कृष्ट उदाहरण बना दिया है।
इतिहास का यह भी एक रोचक और प्रेरणादायक तथ्य है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने सबसे पहले नीदरलैंड पर ही आक्रमण किया था। कभी युद्ध और घृणा के प्रतीक रहे यही देश आज मित्रता, विश्वास और साझे भविष्य के प्रतीक बन चुके हैं। यह परिवर्तन बताता है कि यदि राष्ट्र चाहें तो कटु इतिहास को पीछे छोड़कर नई शुरुआत कर सकते हैं।
यूरोप का यह अनुभव दक्षिण एशिया के लिए भी प्रेरणास्रोत हो सकता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अन्य पड़ोसी देशों के बीच भी यदि विश्वास और सहयोग का वातावरण बने तो करोड़ों लोगों का जीवन सरल हो सकता है।
यह धारणा भी पुनर्विचार की मांग करती है कि कठोर वीजा और सीमा नियंत्रण से ही सुरक्षा सुनिश्चित होती है। असामाजिक और आतंकवादी तत्व तो अक्सर अवैध रास्ते तलाश लेते हैं। सबसे अधिक कठिनाई उन शांतिप्रिय नागरिकों को होती है, जो अपने परिजनों से मिलने, व्यापार करने, शिक्षा प्राप्त करने, पर्यटन करने या सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से यात्रा करना चाहते हैं।
मेरा सपना है कि एक दिन दक्षिण एशिया में भी सीमाएँ विभाजन की नहीं, बल्कि सहयोग और सद्भाव की प्रतीक बनें। लोग बिना भय और अनावश्यक कठिनाइयों के एक-दूसरे से मिल सकें। व्यापार बढ़े, पर्यटन फले-फूले, सांस्कृतिक आदान-प्रदान मजबूत हो और युवा पीढ़ी एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सके।
आगाज़-ए-दोस्ती जैसी शांति यात्राओं का उद्देश्य भी यही है कि सीमाएँ दिलों के बीच न रहें। विश्व शांति केवल सरकारों के समझौतों से नहीं, बल्कि लोगों के बीच बढ़ते विश्वास, संवाद और मित्रता से स्थापित होती है।
मेरी इन तीन रेल यात्राओं ने मुझे यही सिखाया है कि जहाँ सीमाएँ कठोर होती हैं, वहाँ दूरियाँ बढ़ती हैं; और जहाँ विश्वास होता है, वहाँ सीमाएँ केवल मानचित्रों में रह जाती हैं, लोगों के दिलों में नहीं।
— राम मोहन राय
महासचिव, गांधी ग्लोबल फैमिली
निदेशक, निर्मला देशपांडे संस्थान.
(बर्लिन, जर्मनी/25.07.2026
Comments
Post a Comment