राइखस्टाग की सीढ़ियों पर खड़े होकर इतिहास से संवाद /26.07.2026
राइखस्टाग की सीढ़ियों पर खड़े होकर इतिहास से संवाद
— राम मोहन राय
बर्लिन के ऐतिहासिक अलेक्ज़ांडरप्लात्स से हमने मेट्रो पकड़ी और कुछ ही समय बाद जर्मनी के लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक—राइखस्टाग (Reichstag) अर्थात जर्मन संसद भवन—के सामने खड़े थे। इतिहास से मेरा विशेष लगाव रहा है, इसलिए इस भवन को देखने की उत्सुकता मन में पहले से ही थी। जैसे ही संसद भवन की पहली झलक सामने आई, उसकी भव्यता ने मन को अभिभूत कर दिया।
विशाल पत्थरों से निर्मित यह ऐतिहासिक इमारत अपनी गरिमा, सौंदर्य और गंभीरता के कारण दूर से ही आकर्षित करती है। चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियाँ, ऊँचे स्तंभ, विशाल प्रवेश द्वार और उसके ऊपर लहराते जर्मनी के राष्ट्रीय ध्वज इस भवन की लोकतांत्रिक गरिमा का परिचय देते हैं। ऐसा लगा मानो यह भवन केवल ईंट और पत्थरों से नहीं, बल्कि जर्मनी के संघर्ष, पीड़ा, पुनर्निर्माण और लोकतांत्रिक चेतना की कहानी से निर्मित हुआ हो।
इन सीढ़ियों को देखकर मन अनायास ही इतिहास के पन्नों में चला गया। कल्पना करने लगा कि इसी धरती पर कभी नाज़ीवाद का उदय हुआ होगा। इन्हीं रास्तों से सत्ता के मद में चूर नेता गुज़रे होंगे और इसी शहर में तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने अपने विचारों से लाखों लोगों को प्रभावित किया। यद्यपि हिटलर संसद भवन की सीढ़ियों से नियमित रूप से भाषण देने के लिए नहीं जाना जाता, फिर भी बर्लिन का यह पूरा क्षेत्र उस दौर की घटनाओं का साक्षी रहा है। इस वातावरण में खड़े होकर इतिहास की आहट स्पष्ट सुनाई देती है।
संसद भवन के सामने फैला विशाल लॉन और खुला मैदान देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे दिल्ली का बोट क्लब और रामलीला मैदान याद आ गया, जहाँ कभी विशाल राजनीतिक और सामाजिक रैलियाँ हुआ करती थीं। किंतु राइखस्टाग के सामने का यह विस्तृत परिसर उससे भी अधिक विशाल और सुव्यवस्थित प्रतीत हुआ। आज यहाँ पर्यटक टहलते हैं, बच्चे खेलते हैं और लोग खुले वातावरण में लोकतंत्र की इस विरासत का आनंद लेते हैं। यह दृश्य बताता है कि जहाँ कभी युद्ध और विभाजन की छाया थी, वहीं आज शांति और नागरिक स्वतंत्रता का वातावरण है।
हमने संसद भवन का चारों ओर से अवलोकन किया। हर कोण से इसकी स्थापत्य कला अद्भुत प्रतीत होती है। सबसे अधिक आकर्षित किया इसकी प्रसिद्ध काँच की विशाल गुंबद (Glass Dome) ने। आधुनिक वास्तुकार सर नॉर्मन फॉस्टर द्वारा निर्मित यह पारदर्शी गुंबद लोकतंत्र की पारदर्शिता और जनता की सर्वोच्चता का प्रतीक है। घुमावदार सीढ़ियों से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते हुए जब पूरा बर्लिन सामने दिखाई देता है, तो ऐसा लगता है मानो इतिहास और वर्तमान एक साथ हमारी आँखों के सामने खड़े हों। नीचे संसद की कार्यवाही और ऊपर जनता—यह व्यवस्था इस विचार को साकार करती है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है।
संसद भवन से बाहर निकलते ही सामने जर्मनी के चांसलर (प्रधानमंत्री) का कार्यालय तथा शासन के विभिन्न उच्च पदाधिकारियों के कार्यालय दिखाई दिए। यह दृश्य मुझे नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक की याद दिला गया, जहाँ से भारत का शासन संचालित होता है। दोनों देशों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में समानता और भिन्नता को समझना अपने आप में एक रोचक अनुभव था।
इतिहास मेरे लिए सदैव केवल बीते हुए समय का विवरण नहीं रहा। मेरा विश्वास है कि इतिहास केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण की प्रेरणा है। जब हम इतिहास को गंभीरता से समझते हैं, तभी हम वर्तमान की चुनौतियों का सही समाधान खोज पाते हैं।
राइखस्टाग के सामने खड़े होकर मेरे मन में बार-बार एक ही विचार उठ रहा था कि तानाशाही कभी स्थायी नहीं होती। भय, हिंसा और घृणा के बल पर कुछ समय के लिए सत्ता तो प्राप्त की जा सकती है, लेकिन मनुष्यता का हृदय नहीं जीता जा सकता। हिटलर ने जर्मनी को शक्ति का सपना दिखाया, पर अंततः वही विचारधारा करोड़ों लोगों की मृत्यु, असंख्य परिवारों के विनाश और स्वयं जर्मनी की त्रासदी का कारण बनी। उसने केवल विश्व को युद्ध की आग में नहीं झोंका, बल्कि अपने ही देश के लोगों के जीवन में पीड़ा, निराशा और अवसाद भर दिया।
आज वही जर्मनी विश्व के सामने लोकतंत्र, शांति, मानवाधिकार और विकास का उदाहरण बनकर खड़ा है। यह परिवर्तन हमें सिखाता है कि घृणा की राजनीति अंततः विनाश का मार्ग है, जबकि लोकतंत्र, संवाद और मानवीय मूल्यों का मार्ग ही स्थायी शांति और समृद्धि का आधार बनता है।
राइखस्टाग की सीढ़ियों से लौटते समय मेरे मन में एक गहरी अनुभूति थी—सभ्यताएँ युद्ध से नहीं, विचारों से महान बनती हैं; और राष्ट्रों की वास्तविक शक्ति उनके हथियारों में नहीं, बल्कि उनके लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं में निहित होती है।
मेरी जर्मनी यात्रा का यह पड़ाव केवल एक ऐतिहासिक भवन का भ्रमण नहीं था, बल्कि इतिहास से मिली एक जीवंत शिक्षा थी—यदि मानवता को सुरक्षित रखना है, तो हमें तानाशाही नहीं, लोकतंत्र; घृणा नहीं, सहिष्णुता; और युद्ध नहीं, शांति का मार्ग चुनना होगा। यही राइखस्टाग की सबसे बड़ी सीख है, और यही इस यात्रा की सबसे अमूल्य स्मृति।
Ram Mohan Rai,
Berlin, Germany/27.07.2026
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