बर्लिन का सीनियर सिटीजन होम : सक्रिय वृद्धावस्था का प्रेरणादायी मॉडल / 27.07.2027
बर्लिन प्रवास के दौरान मुझे जर्मनी की सामाजिक व्यवस्था को निकट से देखने का एक अत्यंत प्रेरणादायी अवसर प्राप्त हुआ। हमारे मेजबान श्री राजेन्द्र चोपड़ा ने बताया कि वे और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मीता चोपड़ा सप्ताह में चार-चार घंटे स्थानीय सीनियर सिटीजन होम (Senior Citizens' Centre) में स्वैच्छिक सेवा (Voluntary Service) करते हैं। यह जानकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई कि भारतीय मूल के लोग अपने कर्म और सेवा-भाव से जर्मन समाज में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जिस दिन हम वहाँ गए, उस दिन श्रीमती मीता चोपड़ा की सेवा-पाली थी। वे प्रातः ही अपने दायित्व के निर्वहन के लिए केंद्र पहुँच गईं। कुछ समय बाद मैं, मेरी पत्नी तथा श्री राजेन्द्र चोपड़ा बस द्वारा वहाँ पहुँचे। भवन के बाहर लगा बोर्ड देखकर ज्ञात हुआ कि यह केंद्र बर्लिन के टेम्पेलहोफ़-शोनेबर्ग (Tempelhof–Schöneberg) जिला प्रशासन के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित है। जर्मन भाषा में इसे Seniorenfreizeitstätte अर्थात वरिष्ठ नागरिक मनोरंजन एवं गतिविधि केंद्र कहा जाता है।
यह केंद्र केवल बुजुर्गों के बैठने का स्थान नहीं, बल्कि सक्रिय, सम्मानजनक और आनंदमय वृद्धावस्था का जीवंत उदाहरण है। प्रतिदिन आसपास के वरिष्ठ नागरिक यहाँ एकत्रित होकर चाय-कॉफी के साथ आपस में मिलते-जुलते हैं, समाचार-पत्र एवं पुस्तकें पढ़ते हैं, शतरंज तथा अन्य बौद्धिक खेल खेलते हैं, संगीत सुनते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं और नई भाषाएँ सीखने का भी प्रयास करते हैं। जर्मनी में वृद्धावस्था को बोझ नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से समृद्ध एक सक्रिय चरण के रूप में देखा जाता है।
हमने केंद्र के विभिन्न कक्षों का अवलोकन किया। लगभग पचास से अधिक वरिष्ठ नागरिक अलग-अलग समूहों में अपनी-अपनी गतिविधियों में व्यस्त थे। एक कक्ष में कुछ लोग इतालवी भाषा सीख रहे थे, तो दूसरे कक्ष में सामाजिक और समसामयिक विषयों पर चर्चा चल रही थी। कहीं पुस्तक-पठन हो रहा था तो कहीं मित्रतापूर्ण बातचीत का वातावरण था। प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर संतोष, आत्मविश्वास और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
जब वहाँ उपस्थित लोगों को यह ज्ञात हुआ कि हम गांधी ग्लोबल फैमिली के प्रतिनिधि हैं, तो वातावरण में एक नई उत्सुकता भर गई। अनेक वरिष्ठ नागरिक हमारे पास आए और महात्मा गांधी के जीवन, उनके सत्य, अहिंसा और विश्व-शांति के संदेश तथा गांधी ग्लोबल फैमिली की गतिविधियों के विषय में जानने लगे। भाषा का अंतर अवश्य था, परंतु श्री राजेन्द्र चोपड़ा तथा केंद्र की अधीक्षिका टोपुज़ ओज़लेम ने जर्मन और अंग्रेज़ी के माध्यम से हमारे संवाद का अत्यंत प्रभावी अनुवाद किया।
मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ उपस्थित लगभग सभी वरिष्ठ नागरिक महात्मा गांधी के जीवन और विचारों से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने बताया कि अपने छात्र जीवन में उन्होंने गांधीजी के बारे में विस्तार से अध्ययन किया था और आज भी उनके विचारों को विश्व शांति के लिए अत्यंत प्रासंगिक मानते हैं। उनके प्रश्नों से स्पष्ट था कि गांधीजी के प्रति उनका सम्मान केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वैचारिक और मानवीय भी है।
मैंने उन्हें बताया कि महात्मा गांधी का स्वप्न केवल भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि भारत स्वतंत्र होकर संपूर्ण विश्व की सेवा करे और सत्य, अहिंसा तथा मानवता के मार्ग पर चलकर विश्व-शांति का संदेश दे। गांधी ग्लोबल फैमिली आज इसी भावना को लेकर विश्व के विभिन्न देशों में संवाद, सद्भाव और अहिंसा का कार्य कर रही है।
केंद्र की अधीक्षिका ने भी विशेष रुचि लेकर गांधीजी के जीवन और गांधी ग्लोबल फैमिली के कार्यों की जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर मैंने उन्हें महात्मा गांधी का एक सुंदर चित्र भेंट किया। उन्होंने अत्यंत सम्मान और प्रसन्नता के साथ उस चित्र को स्वीकार किया। उनके चेहरे पर झलकती आत्मीयता मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं थी।
संवाद के उपरांत सभी वरिष्ठ नागरिकों ने हमारे साथ सामूहिक छायाचित्र भी खिंचवाया। इसके बाद हमें पूरे केंद्र का विस्तृत भ्रमण कराया गया। वहाँ एक विशाल सभागार था, जहाँ समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, व्याख्यान और सामुदायिक सभाएँ आयोजित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त कई बड़े गतिविधि-कक्ष थे, एक सुव्यवस्थित पुस्तकालय था, जहाँ विभिन्न विषयों की पुस्तकें और अनेक समाचार-पत्र उपलब्ध थे। एक सुंदर कैफेटेरिया भी था, जहाँ चाय, कॉफी और पौष्टिक अल्पाहार अत्यंत रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता था, ताकि प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक बिना किसी आर्थिक चिंता के वहाँ समय व्यतीत कर सके।
इस केंद्र का वातावरण देखकर मुझे लगा कि यदि समाज अपने वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान, संवाद, सक्रियता और सामाजिक सहभागिता के ऐसे अवसर प्रदान करे, तो वृद्धावस्था भी जीवन का अत्यंत सुखद और सृजनात्मक काल बन सकती है। जर्मनी की यह व्यवस्था वास्तव में अनुकरणीय है। भारत जैसे विशाल देश में भी यदि ऐसे अधिक से अधिक वरिष्ठ नागरिक केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो लाखों बुजुर्गों के जीवन में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास और सामाजिक अपनापन लौट सकता है।
बर्लिन का यह अनुभव मेरी जर्मनी यात्रा की सबसे प्रेरक स्मृतियों में से एक बन गया। यहाँ मैंने केवल एक संस्थान नहीं देखा, बल्कि यह अनुभव किया कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों को कितना सम्मान, सुरक्षा और सक्रिय जीवन प्रदान करता है। जर्मनी का यह सीनियर सिटीजन होम वास्तव में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और गरिमामय वृद्धावस्था का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
Ram Mohan Rai ,
Berlin, 27.07.2026
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