बर्लिन की दीवार: विभाजन से एकता तक—मेरी 39 वर्षों की यात्रा का पूर्ण चक्र /27.07.2026
बर्लिन की दीवार: विभाजन से एकता तक—मेरी 39 वर्षों की यात्रा का पूर्ण चक्र
— राम मोहन राय
राइखस्टाग (जर्मन संसद भवन) का शांत और गरिमामय वातावरण अपने हृदय में संजोकर हम पुनः मेट्रो से आगे बढ़े। हमारा अगला पड़ाव था—पूर्वी बर्लिन (East Berlin) का वह ऐतिहासिक क्षेत्र, जहाँ कभी जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (GDR) की राजधानी धड़कती थी। जैसे ही हम स्टेशन पर उतरे, ऐसा लगा मानो समय अचानक पीछे लौट गया हो। स्मृतियों के द्वार खुल गए और वर्ष 1987 की मेरी पहली बर्लिन यात्रा चलचित्र की भाँति आँखों के सामने घूमने लगी।
स्टेशन से कुछ दूर चलते ही हम उस स्थान पर पहुँचे जहाँ कभी बर्लिन की दीवार खड़ी थी—वह दीवार जिसने केवल एक शहर को नहीं, बल्कि लाखों दिलों को बाँट दिया था। यह ईंट-पत्थरों की साधारण दीवार नहीं थी; यह अविश्वास, भय, वैमनस्य और वैचारिक संघर्ष का प्रतीक थी। इसने एक ही संस्कृति, एक ही भाषा और एक ही परिवार के लोगों को दो हिस्सों में बाँट दिया था।
कितने ही परिवार ऐसे थे जिनके माता-पिता एक ओर रह गए और बच्चे दूसरी ओर। भाई इधर था तो बहन उधर। कोई रिश्तेदार मिलने गया और लौट न सका। वर्षों तक लोग अपने प्रियजनों को केवल यादों में ही देख पाते थे। दीवार के दोनों ओर रहने वाले लोगों के हृदय में एक ही आकांक्षा थी—काश! यह दीवार एक दिन टूट जाए और हम फिर से एक हो जाएँ। लेकिन उस समय के शासकों के बीच इतना गहरा अविश्वास और वैमनस्य था कि किसी को कल्पना भी नहीं थी कि यह दीवार कभी गिर सकती है।
मुझे आज भी वर्ष 1987 का वह दृश्य स्पष्ट रूप से याद है, जब मैंने इस दीवार को पहली बार देखा था। तब यह एक अभेद्य दीवार थी। इधर से उधर जाना तो दूर, एक-दूसरे को देख पाना भी लगभग असंभव था। ऊँची दीवारें, कंटीले तार, प्रहरी चौकियाँ, सशस्त्र सैनिक, निगरानी टावर और बीच में सुरक्षा क्षेत्र—सब कुछ यह बताने के लिए पर्याप्त था कि मनुष्य ने मनुष्य के बीच कितनी कठोर सीमाएँ खड़ी कर दी थीं।
लेकिन इतिहास का सबसे सुंदर सत्य यही है कि कोई भी दीवार हमेशा के लिए नहीं रहती।
केवल दो वर्ष बाद, 1989 में, वह क्षण आया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। बर्लिन की दीवार गिर गई। लोग एक-दूसरे से गले मिले। वर्षों बाद बिछड़े परिवार फिर से एक हुए। आँसू भी थे, मुस्कान भी थी, और एक नए इतिहास का जन्म भी।
1987 में जब मैं यहाँ से लौटा था, तब मन में एक छोटी-सी इच्छा थी—क्या कभी ऐसा समय आएगा जब मैं स्वतंत्र रूप से पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन दोनों को देख सकूँगा?
समय ने उस इच्छा को भी पूरा कर दिया।
27 जुलाई 2026 को मैं उसी स्थान पर खड़ा था, जहाँ कभी विभाजन की दीवार थी। आज वहाँ दीवार के स्थान पर खुले रास्ते हैं। जहाँ कभी कंटीले तार थे, वहाँ अब पर्यटक निश्चिंत होकर घूमते हैं। जहाँ कभी सैनिकों की चौकियाँ थीं, वहाँ आज मित्रता की मुस्कानें हैं। जहाँ कभी भय था, वहाँ आज स्वतंत्रता का उत्सव है।
दीवार का जो हिस्सा आज भी सुरक्षित रखा गया है, वह लगभग एक मील तक फैला हुआ है। उस पर विश्वभर के कलाकारों ने शांति, स्वतंत्रता, भाईचारे और मानव एकता के सुंदर चित्र उकेरे हैं। रंग-बिरंगी कलाकृतियाँ मानो यह संदेश देती हैं कि घृणा की दीवारों पर भी प्रेम के रंग चढ़ाए जा सकते हैं।
इन चित्रों को देखते-देखते मेरा मन भावुक हो उठा। मेरे भीतर केवल जर्मनी का इतिहास नहीं, बल्कि पूरे विश्व का भविष्य बोल रहा था।
मन में एक ही प्रार्थना उठी—
काश! दक्षिण एशिया में भी जो कृत्रिम सीमाएँ, अविश्वास और वैमनस्य की दीवारें खड़ी हैं, वे भी एक दिन समाप्त हों। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और पूरे दक्षिण एशिया के लोग शांति, सद्भाव और भाईचारे के साथ मिलकर रह सकें। सीमाएँ रहें, पर दिलों के बीच दीवारें न रहें।
मेरे लिए यह केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं थी। यह 39 वर्षों की एक अधूरी यात्रा का पूर्ण होना था। 1987 में मैंने केवल विभाजित बर्लिन देखा था; 2026 में मैंने एकीकृत बर्लिन देखा। उस समय दीवारें थीं, आज रास्ते हैं। तब भय था, आज विश्वास है। तब बंदूकें थीं, आज कलाकारों की तूलिकाएँ हैं। तब नफरत की दीवारें थीं, आज शांति के संदेश हैं।
इसी ऐतिहासिक स्थल पर हमने कुछ क्षण मौन होकर विश्व शांति की कामना की। हमने वैदिक शांति मंत्र का सामूहिक पाठ किया—
"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः..."
और फिर पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ नारा लगाया—
"विश्व शांति अमर रहे!"
"जय जगत!"
उस क्षण मुझे लगा कि महात्मा गांधी, दीदी निर्मला देशपांडे और विश्व शांति के सभी साधकों का सपना यहीं साकार होता दिखाई दे रहा है।
बर्लिन की दीवार ने मुझे एक अमूल्य शिक्षा दी—दुनिया की सबसे ऊँची दीवारें भी मनुष्य की स्वतंत्रता की आकांक्षा से बड़ी नहीं हो सकतीं। सत्ता दीवारें बना सकती है, लेकिन प्रेम उन्हें गिरा देता है।
इसी विश्वास के साथ मैं बर्लिन से लौटा कि एक दिन पूरी दुनिया में घृणा की हर दीवार टूटेगी, संवाद के नए द्वार खुलेंगे, और मानवता एक परिवार के रूप में आगे बढ़ेगी।
यही बर्लिन की सबसे बड़ी सीख है। यही मेरी इस यात्रा की सबसे अनमोल स्मृति है।
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