ब्रांडेनबर्ग गेट : विभाजन से एकता तक की यात्रा /Berlin, Germany. 26.07.2026
होलोकॉस्ट स्मारक से निकलकर हम कुछ ही दूरी पर स्थित ब्रांडेनबर्ग गेट (Brandenburg Gate) पहुँचे। यह केवल बर्लिन का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जर्मनी का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। इसका निर्माण 1788 से 1791 के बीच प्रशिया के सम्राट फ्रेडरिक विलियम द्वितीय के आदेश पर वास्तुकार कार्ल गोटहार्ड लैंगहांस ने कराया था। इसके शीर्ष पर स्थापित चार घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ (Quadriga) में शांति की देवी विराजमान हैं। आज यह द्वार जर्मनी की एकता, लोकतंत्र और स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है।
इस ऐतिहासिक स्थल पर खड़े होकर मेरी स्मृतियाँ अचानक 1987 में पहुँच गईं। लगभग चार दशक पहले जब मैं पहली बार बर्लिन आया था, तब जर्मनी दो भागों—पूर्वी जर्मनी (East Germany) और पश्चिमी जर्मनी (West Germany)—में विभाजित था। उस समय मैंने इस द्वार को पूर्वी बर्लिन की ओर से देखा था। सामने कंटीले तार, सैनिकों की चौकसी और बर्लिन की दीवार मानव इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में से एक का प्रतीक थी। उस समय इस द्वार से होकर सामान्य नागरिकों का आना-जाना लगभग असंभव था।
आज उसी ब्रांडेनबर्ग गेट के पश्चिमी भाग में खड़ा होकर मैं एक नए जर्मनी को देख रहा था—एक ऐसा जर्मनी, जहाँ विभाजन की दीवारें गिर चुकी थीं और लोग स्वतंत्र होकर इस ऐतिहासिक द्वार से गुजर रहे थे। मेरे लिए यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि इतिहास के एक बड़े परिवर्तन का साक्षी बनने जैसा अनुभव था।
विश्व हिटलर को उसकी नृशंसता, नस्लवाद और द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण घृणा की दृष्टि से देखता है। यह स्वाभाविक भी है। परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी के लोगों ने जो दशकों तक कृत्रिम विभाजन का दर्द सहा, उसे भी वे उतना ही अमानवीय मानते हैं। लाखों परिवार बिछड़ गए, मित्र अलग हो गए और एक ही भाषा, संस्कृति, इतिहास तथा सभ्यता वाले लोग राजनीतिक विचारधाराओं की दीवार के दोनों ओर खड़े कर दिए गए।
सन् 1989 में जब बर्लिन की दीवार गिरी और 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी का पुनः एकीकरण हुआ, तब केवल एक देश ही नहीं जुड़ा, बल्कि मानवता ने यह भी सिद्ध कर दिया कि कृत्रिम दीवारें स्थायी नहीं होतीं। आज बर्लिन की दीवार इतिहास के संग्रहालयों में सिमट गई है, किन्तु उसके सबक आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं।
मेरे मन में सहज ही प्रश्न उठा—क्या एक ही संस्कृति, एक ही भाषा, एक ही इतिहास और एक ही विरासत को धर्म, राजनीति अथवा विचारधारा के नाम पर स्थायी रूप से बाँटा जा सकता है? इतिहास का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा विभाजन नहीं, बल्कि मिलन है।
ब्रांडेनबर्ग गेट के सामने ही विश्वप्रसिद्ध होटल एडलॉन केम्पिंस्की (Hotel Adlon Kempinski) स्थित है, जहाँ अनेक राष्ट्राध्यक्ष और विश्व नेता ठहरते रहे हैं। कुछ दूरी पर संयुक्त राज्य अमेरिका का विशाल दूतावास भी है, जहाँ अमेरिकी ध्वज गर्व से लहरा रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय के बाद जर्मनी के पुनर्निर्माण में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही, परन्तु आज प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक नागरिक की सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि वह किसी बाहरी दबाव या शर्त के बिना अपनी शासन व्यवस्था स्वयं निर्धारित कर सके। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ भी यही है कि अंतिम निर्णय जनता का हो।
वहीं सामने दूर दिखाई देता बर्लिन टेलीविज़न टॉवर (Fernsehturm) मुझे उतना ही आकर्षक लगा, जितना 1987 में लगा था। उसके निकट स्थित रेलवे और मेट्रो स्टेशन से जर्मनी के विभिन्न भागों के लिए तेज़ गति की रेलगाड़ियाँ लगातार चलती रहती हैं। आधुनिक जर्मनी का यह सुव्यवस्थित परिवहन तंत्र उसके अनुशासन, योजना और प्रगति का परिचायक है।
ब्रांडेनबर्ग गेट के सामने खड़े होकर मुझे लगा कि भारत सहित सम्पूर्ण विश्व के लिए जर्मनी के इतिहास में अनेक शिक्षाएँ छिपी हैं। पहली शिक्षा यह कि अंध राष्ट्रवाद (Blind Nationalism) किसी भी राष्ट्र के दीर्घकालीन स्वास्थ्य के लिए हितकारी नहीं होता। जब राष्ट्रवाद मानवता से ऊपर उठ जाता है, तब वह विनाश का कारण बन सकता है। दूसरी शिक्षा यह कि कृत्रिम विभाजन कभी स्थायी नहीं होते। यदि जनता के हृदय में प्रेम जीवित है तो दीवारें एक दिन अवश्य गिरती हैं।
उर्दू के प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का यह शेर यहाँ अनायास स्मरण हो आया—
"दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।"
यही शेर भारत, दक्षिण एशिया और सम्पूर्ण विश्व के लिए भी एक गहरा संदेश देता है। मतभेद हो सकते हैं, परन्तु घृणा इतनी नहीं होनी चाहिए कि भविष्य में मेल-मिलाप का मार्ग ही बंद हो जाए।
ब्रांडेनबर्ग गेट से विदा लेते समय मेरे मन में महात्मा गांधी का यह विचार बार-बार गूँज रहा था कि "सच्ची विजय किसी शत्रु को पराजित करने में नहीं, बल्कि उसे मित्र बनाने में है।" इतिहास की यही सबसे बड़ी सीख है और शायद मानवता का भविष्य भी इसी में सुरक्षित है।
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