नानू की पोटली से निकली बचपन की कहानियाँ
मेरे प्यारे नाती- नातिन,
जब मैं तुम्हें ये कहानियाँ सुनाऊँगा तो शायद तुम्हें लगेगा कि नानू भी कभी बच्चा था!
आज जब तुम मुझे देखते हो तो शायद तुम्हें एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जो बहुत कुछ जानता-समझता है, गंभीर बातें करता है, लोगों से मिलता है और अपने काम में व्यस्त रहता है। लेकिन मेरे भीतर कहीं एक छोटा-सा बच्चा आज भी रहता है—जो शरारत करता था, खेलता था, झूठ बोलकर बच निकलने की कोशिश करता था, डाँट खाता था, कभी प्यार पाता था और कभी अपनी किसी छोटी-सी उपलब्धि पर बहुत खुश हो जाता था।
उसी बच्चे को मैंने इन कहानियों में फिर से खोजने की कोशिश की है।
ये कहानियाँ मेरे जीवन के उन दिनों की हैं, जब मुझे अपनी दुनिया बहुत बड़ी लगती थी और मेरी उम्र बहुत छोटी थी। लगभग चार वर्ष की उम्र से लेकर चौदह वर्ष तक के वे दिन, जिन्हें मेरी स्मृति ने अपने भीतर कहीं सुरक्षित रखा है। कुछ घटनाएँ मुझे बिल्कुल साफ-साफ याद हैं, कुछ धुंधली हैं और कुछ को शायद समय ने अपनी कल्पना का थोड़ा रंग दे दिया है। लेकिन इन सबमें एक चीज बिल्कुल सच्ची है—उन दिनों का मेरा मन।
मैंने इन कहानियों को किसी इतिहास की तरह लिखने की कोशिश नहीं की है। न ही ये मेरे जीवन की गंभीर घटनाओं का ब्योरा हैं। ये तो मेरे बचपन की वही छोटी-बड़ी शरारतें हैं, जिन पर कभी घरवालों ने डाँटा, कभी किसी ने हँसकर छोड़ दिया, कभी प्यार से समझाया और कभी मेरी किसी नटखट हरकत पर मुझे शाबाशी भी मिली।
कभी कोई खेल था, कभी दोस्तों की चुहलबाजी, कभी स्कूल की कोई घटना, कभी घर की कोई छोटी-सी बात और कभी ऐसा काम, जिसे करते समय मुझे बहुत होशियारी लग रही थी, लेकिन बाद में पता चला कि मेरी होशियारी सबको पहले ही समझ आ गई थी!
शायद यही बचपन है।
बचपन में हम छोटी-छोटी बातों में बड़ी खुशियाँ खोज लेते हैं। एक पतंग, एक कंचा, एक खिलौना, कोई नया कपड़ा, दोस्तों के साथ खेल, स्कूल से छुट्टी, घर में मिली थोड़ी-सी आज़ादी—सब कुछ अपने आप में एक उत्सव बन जाता है। और हमारी शरारतें भी हमारी अपनी भाषा होती हैं।
इन कहानियों को लिखते समय मेरा मन कई बार उसी उम्र में लौट गया। मुझे लगा जैसे मैं फिर से वही छोटा बच्चा हूँ और मेरे सामने मेरे माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, शिक्षक और मोहल्ले के वे तमाम लोग खड़े हैं जिन्होंने मेरे बचपन को बनाया। कुछ चेहरे बहुत साफ दिखाई देते हैं, कुछ यादों की धुंध में हैं, लेकिन उनकी आवाजें आज भी सुनाई देती हैं।
और फिर मुझे लगा कि इन कहानियों को केवल अपने पास क्यों रखा जाए?
इन्हें तुम्हें सुनाया जाना चाहिए।
मैं चाहता हूँ कि जब तुम इन कहानियों को पढ़ो या सुनो तो ऐसा महसूस हो कि नानू सामने बैठा है और तुम्हें अपनी बचपन की बातें सुना रहा है। कहीं वह हँस रहा है, कहीं अपनी गलती छिपाने की कोशिश कर रहा है, कहीं पुरानी शरारत पर शर्मिंदा हो रहा है और कहीं उस बच्चे पर खुद ही प्यार आ रहा है, जो कभी वह हुआ करता था।
लेकिन मेरी एक और इच्छा है।
इन कहानियों को केवल बच्चे ही न पढ़ें। मैं चाहता हूँ कि बड़े भी इन्हें पढ़ें। क्योंकि बड़े होते-होते हम अपने भीतर के बच्चे को कहीं बहुत गहरे दबा देते हैं। हम इतने गंभीर हो जाते हैं कि कभी-कभी ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे हमने बचपन कभी जिया ही नहीं था।
इन कहानियों को पढ़ते हुए शायद किसी पिता को अपना बचपन याद आए, किसी माँ को अपने बच्चे की शरारत, किसी दादा-दादी को अपने घर के आँगन में खेलते बच्चे और किसी बड़े आदमी को अपने भीतर छिपा वह छोटा बच्चा दिखाई दे, जिसे उसने वर्षों से आवाज़ ही नहीं दी।
इसलिए यह पुस्तक केवल मेरे बचपन की कहानियों का संग्रह नहीं है। यह मेरी कोशिश है कि बचपन की वह दुनिया, जो समय के साथ हमसे दूर होती जाती है, शब्दों में थोड़ी देर और जीवित रहे।
हो सकता है मेरी कुछ बातें तुम्हें मज़ेदार लगें, कुछ पर तुम हँसो, कुछ पर कहो—“अरे, नानू ने ऐसा भी किया था!” और शायद किसी कहानी के बाद तुम अपने मम्मी-पापा या दादा-दादी से पूछ बैठो—“आप बचपन में क्या करते थे?”
अगर ऐसा हुआ, तो मैं समझूँगा कि मेरी कहानियाँ सफल हो गईं।
क्योंकि बचपन केवल एक उम्र नहीं है।
बचपन हमारे भीतर बची हुई वह जगह है जहाँ हम बिना किसी बनावट के अपने सबसे सच्चे रूप में रहते हैं।
आओ, इस पुस्तक के पन्ने पलटते हैं और मेरे साथ उस समय में चलते हैं जब मेरी उम्र चार साल थी। वहाँ से चौदह साल तक का रास्ता बहुत लंबा नहीं है—बस यादों की एक छोटी-सी पगडंडी है।
उस पगडंडी पर कभी धूल उड़ती है, कभी बारिश होती है, कभी हम गिरते हैं, कभी दौड़ते हैं और कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर हँसते हैं।
और उस पगडंडी के आखिर में शायद तुम्हें तुम्हारा नानू नहीं,
बल्कि एक छोटा-सा बच्चा मिलेगा।
वही बच्चा इन कहानियों का असली नायक है।
— राम मोहन राय
नानू
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समर्पण
मेरे प्यारे नाती-नातिनों—
अयांश, अद्विका और श्रेयम के नाम।
तुम्हारे लिए यह केवल कहानियों की किताब नहीं है।
यह उस नानू की पोटली है
जिसमें उसने अपने बचपन की कुछ हँसी,
कुछ शरारतें, कुछ आँसू,
कुछ डाँट, कुछ प्यार
और बहुत सारी यादें बाँधकर रखी थीं।
जब कभी तुम्हें लगे कि नानू हमेशा से बड़ा और समझदार ही रहा होगा,
तो इस पोटली को खोल लेना।
तुम्हें उसमें एक छोटा-सा नानू मिलेगा—
जो तुम्हारी ही तरह शरारती था,
तुम्हारी ही तरह सवाल पूछता था,
तुम्हारी ही तरह डाँट खाता था
और तुम्हारी ही तरह छोटी-छोटी बातों में बहुत खुश हो जाता था।
तुम्हारा नानू
राम मोहन●●●●
1.पहली पोटली : मेरा घर और मेरी बहन
तुम्हें पता है नानू का घर कैसा था?
हमारे घर में पाँच लोग थे—मेरे माता-पिता और हम तीन भाई-बहन। मेरे बड़े भाई का नाम मदन मोहन था, लेकिन घर में सब उन्हें प्यार से “राना "कहते थे। मेरी छोटी बहन का नाम अरुणा था, जिसे प्यार से “मुन्नी कहा जाता था। और घर में एक और प्यारा नाम था—“कूकू”।
मेरे पिता पानीपत नगर पालिका में काम करते थे और मेरी माँ सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहती थीं। हमारा घर बहुत बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसका वातावरण बहुत खुला था। वहाँ बच्चों के लिए बहुत-सी जगह थी—खेलने की, हँसने की, शरारत करने की और अपनी छोटी-सी दुनिया बनाने की।
लेकिन इस घर में मेरे लिए सबसे खास थी मेरी बड़ी बहन अरुणा।
माँ मुझे बताती थीं कि जब मैं बहुत छोटा था, मेरे बाल बेहद मुलायम थे। अरुणा को मेरे वे मुलायम बाल बहुत अच्छे लगते थे। वह मुझे अपनी गोद में लेकर घंटों बैठी रहती। फिर बड़े प्यार से मेरे बालों में कंघी करती और उनमें तेल लगा देती।
उसे शायद लगता था कि नानू के बाल जितने घुँघराले और सुंदर होंगे, उसका छोटा भाई उतना ही अच्छा लगेगा!
लेकिन अरुणा केवल मेरे बाल सँवारने वाली बहन नहीं थी। वह मेरे लिए जैसे छोटी-सी माँ थी—हालाँकि उस समय वह खुद भी एक छोटी बच्ची ही थी।
एक घटना तो हमारे घर में आज भी याद की जाती है।
मैं तब केवल पाँच महीने का था और ऊपर के कमरे में सो रहा था। अरुणा की उम्र उस समय लगभग पाँच साल थी।
पता नहीं उसके छोटे-से मन में क्या आया।
उसने मुझे उठाया और गोद में लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
सोचो बच्चों —पाँच साल की बच्ची की गोद में पाँच महीने का बच्चा!
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरती रही।
जब माँ ने उसे देखा तो उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
उन्हें एक पल को तो बहुत चिंता हुई—“कहीं दोनों बच्चे गिर न जाएँ!”
लेकिन अरुणा ने न जाने कहाँ से इतना आत्मविश्वास जुटाया था कि वह मुझे सुरक्षित गोद में लेकर नीचे आ गई।
माँ के लिए यह दृश्य आश्चर्य और डर—दोनों का था। लेकिन अरुणा के लिए शायद यह बिल्कुल सामान्य बात थी।
उसे विश्वास था कि वह अपने छोटे भाई को संभाल सकती है।
और शायद यहीं से मुझे लगता है कि अरुणा ने मेरे जीवन में एक बहुत बड़ी बात रख दी थी—विश्वास की ताकत।
वह मानती थी कि हम चाहे कितने ही छोटे क्यों न हों, यदि लोग हम पर विश्वास करने लगें और हम उस विश्वास को निभा सकें, तो हम अपने लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
बड़े होकर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस पाँच साल की बच्ची को जीवन की यह बात शायद हम बड़े लोगों से पहले ही समझ आ गई थी।
विश्वास उम्र नहीं देखता।
और शायद इसी विश्वास ने मेरे बचपन को भी बहुत कुछ दिया।
अरुणा मुझे अपनी गोद में लेकर मेरे बाल सँवारती थी, मुझे सीढ़ियों से उठाकर नीचे लाती थी, मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखती थी—और मैं?
मैं तो बस उसका छोटा भाई था, जिसे यह सब बहुत अच्छा लगता था।
आज जब मैं तुम्हें यह कहानी सुना रहा हूँ, तो सोचता हूँ—
अगर पाँच साल की अरुणा पाँच महीने के अपने भाई को इतनी सावधानी से संभाल सकती थी, तो शायद हम सबके भीतर अपनी उम्र से कहीं बड़ा बनने की क्षमता होती है।
बस किसी को हम पर विश्वास करना चाहिए।
और हमें उस विश्वास को टूटने नहीं देना चाहिए।
यही मेरे बचपन की पहली पोटली में रखी एक बहुत प्यारी याद है।
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2.नानू की पोटली
हम छोटे थे तो दुनिया की सबसे प्यारी जगह हमारे लिए कोई महल या खिलौनों की दुकान नहीं थी। वह जगह थी—नानी का घर।
जैसे ही पता चलता कि नानी के घर जाना है, हम खुशी से उछल पड़ते।
“माँ, कब चलेंगे?”
“अभी तो सुबह हुई है!”
“तो दोपहर कब होगी?”
“दोपहर के बाद।”
“दोपहर कब आएगी?”
माँ हँसकर कहतीं, “तुम लोगों को नानी के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है?”
हम एक साथ चिल्लाते—
“क्योंकि वहाँ नानी रहती हैं!”
नानी की उम्र उस समय लगभग अस्सी वर्ष रही होगी। चेहरे पर उम्र की रेखाएँ थीं, मगर बच्चों को देखते ही उनकी आँखें चमक उठती थीं।
हमारे पाँच मामा थे और लगभग सभी अपने परिवारों के साथ एक ही बड़े घर में रहते थे। मामा के बच्चे भी थे। हम जब वहाँ पहुँचते तो घर में ऐसा लगता जैसे किसी ने बच्चों का मेला लगा दिया हो।
“तू मेरी गेंद क्यों ले गया?”
“मैंने नहीं ली!”
“झूठ बोल रहा है!”
“अच्छा, पकड़ मुझे!”
और फिर दोनों भागते हुए आँगन में गायब।
कहीं कोई कंचे खेल रहा था, कोई लट्टू घुमा रहा था, कोई पेड़ के नीचे बैठकर गप्पें मार रहा था।
हम पंद्रह-बीस बच्चे होते और पूरा घर हमारी आवाजों से गूँजता रहता।
लेकिन इस शोर में भी नानी की आवाज हमें पहचान लेती थी।
“अरे, सीता के बच्चे आ गए क्या?”
हम दौड़कर नानी के पास पहुँचते।
“नानी!”
“आ गए मेरे बच्चे?”
“हाँ!”
“इतने सारे?”
“हम बहुत सारे हैं नानी!”
नानी हँसतीं—
“हाँ, मेरे घर में तो आज पूरा गाँव आ गया है।”
फिर वह धीरे से हमारी तरफ देखतीं और आँख मारकर कहतीं—
“इधर आओ… तुम्हारे लिए कुछ रखा है।”
हमारी आँखें तुरंत बड़ी हो जातीं।
“क्या रखा है?”
“बताऊँगी तो सबको पता चल जाएगा।”
“किसी को नहीं बताएँगे!”
“पक्का?”
“पक्का!”
नानी हमें धीरे-धीरे अपने पास बुलातीं। फिर किसी कोने में रखा एक बर्तन खोलतीं।
और हमारी आँखें चमक उठतीं—
“चूरमा!”
देसी घी से लबालब चूरमा!
हममें से कोई पूछता—
“नानी, इतना घी?”
नानी कहतीं—
“तुम बच्चे हो, घी नहीं खाओगे तो क्या बूढ़े खाएँगे?”
हम खिलखिलाकर हँस पड़ते।
फिर नानी थोड़ा-थोड़ा चूरमा हमारी हथेलियों में रखतीं।
“धीरे खाना।”
“नानी, और दो!”
“पहले यह तो खत्म करो।”
“नानी, उसे मत देना, वह बहुत खाता है!”
“चुप कर! सबको मिलेगा।”
और अगर बाहर से कोई बच्चा आवाज लगाता—
“नानी! हमें भी चूरमा चाहिए!”
तो हम तुरंत चुप हो जाते।
नानी मुस्कुराकर कहतीं—
“अरे, तुम लोगों के लिए भी है। पहले ये मेरे नन्हे मेहमान तो खा लें।”
हम नानी की ओर देखकर मुस्कुराते और मन ही मन सोचते—
नानी सबसे अच्छी हैं!
उस समय हमें कहाँ मालूम था कि नानी हमारे लिए चूरमा क्यों छिपाकर रखती हैं।
हमें तो बस इतना पता था कि नानी के हाथ का चूरमा सबसे स्वादिष्ट है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वह चूरमा सिर्फ चूरमा नहीं था।
वह नानी की प्रतीक्षा थी।
वह हमारी खुशी थी।
वह उनकी ममता थी।
और सबसे बढ़कर—उनका आशीर्वाद था।
आज भी कभी देसी घी की खुशबू आती है तो लगता है जैसे नानी का वही आँगन सामने है।
जैसे बच्चे फिर से दौड़ रहे हैं।
कोई चिल्ला रहा है—
“मेरी गेंद दे!”
कोई कह रहा है—
“नानी, मुझे भी चूरमा चाहिए!”
और नानी अपनी प्यारी-सी मुस्कान के साथ कह रही हैं—
“आओ मेरे बच्चों… सबके लिए है।”
जीवन में हम बहुत कुछ भूल जाते हैं। कितने घर बदले, कितने लोग मिले, कितने शहर देखे—सबकी यादें धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती हैं।
लेकिन नानी का घर…
नानी की गोद…
उनकी आवाज…
और देसी घी से भरी वह छोटी-सी चूरमे की पोटली
इनकी याद कभी धुंधली नहीं होती।
शायद इसलिए कि उस पोटली में चूरमा कम था,
नानी का प्यार बहुत ज्यादा था।
और वह प्यार इतना था कि—
एक बचपन ही नहीं, पूरी जिंदगी मीठी हो गई।
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3.🚲 नानी के घर की दो साइकिलें और मेरी एक छोटी-सी हार
जब हम छोटे थे, तो हमें सबसे ज्यादा इंतज़ार रहता था—नानी के घर जाने का!
नानी का घर हमारे लिए किसी खेल के मैदान से कम नहीं था। वहाँ हमारे पाँचों मामाओं के परिवार रहते थे। उनके बच्चे भी थे और हम सब मिलाकर लगभग 15–20 बच्चे हो जाते थे। कोई हमसे बड़ा, कोई छोटा और कोई हमारी ही उम्र का।
जैसे ही हम नानी के घर पहुँचते, ऐसा लगता जैसे घर में बच्चों का मेला लग गया हो।
“चलो-चलो, बाहर चलते हैं!”
“आज क्या खेलेंगे?”
“साइकिल चलाएँगे!”
और बस, साइकिल का नाम सुनते ही हम सबकी आँखों में चमक आ जाती।
लेकिन समस्या यह थी कि साइकिलें थीं केवल दो—एक बड़ी और एक छोटी।
और साइकिल चलाने वाले?
हम लगभग पंद्रह!
अब आप ही सोचिए, दो साइकिल और पंद्रह बच्चे!
साइकिल की बारी लगती थी। कोई एक चक्कर लगाकर आता और दूसरा तुरंत चिल्लाता—
“अब मेरी बारी!”
“नहीं, पहले मेरी!”
“तुम तो अभी चला कर आए हो!”
और जब बड़ी मुश्किल से मेरी बारी आती, तो मैं खुशी से साइकिल पर बैठता।
लेकिन मैं छोटा था।
जैसे ही मैं एक चक्कर पूरा करता, कोई बड़ा बच्चा पीछे से आवाज लगाता—
“बस! अब मेरी बारी!”
मैं कहता—
“अरे, अभी तो मैंने ठीक से चलाई भी नहीं!”
लेकिन मेरी कौन सुनता!
वह मुझसे साइकिल ले लेता और मैं बेचारा खड़ा होकर दूसरों को साइकिल चलाते देखता रहता।
वह दिन, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया
एक दिन मैंने ठान लिया—
“आज मैं साइकिल अच्छी तरह सीखकर ही रहूँगा!”
मैं साइकिल लेकर धीरे-धीरे चलाने लगा।
पहले तो सब ठीक चल रहा था।
मैं मन ही मन खुश हो रहा था—
“वाह! मैं भी साइकिल चला सकता हूँ!”
लेकिन तभी साइकिल थोड़ी डगमगाई।
मैंने संभालने की कोशिश की।
साइकिल इधर गई, मैं उधर गया...
और फिर—
धड़ाम!
मैं जमीन पर गिर पड़ा।
मेरे घुटने छिल गए। चोट भी लगी।
मैंने घुटने की तरफ देखा और मेरी आँखों में आँसू आ गए।
मैं रोता हुआ घर पहुँचा।
“माँऽऽऽ!”
माँ ने घबराकर पूछा—
“क्या हुआ बेटा?”
मैंने रोते हुए अपना घुटना दिखाया।
माँ ने प्यार से मुझे बैठाया, घाव साफ किया और पट्टी बाँध दी।
माँ की गोद में बैठकर तो मुझे बहुत अच्छा लगा, लेकिन उस दिन मेरे मन में एक डर बैठ गया—
“साइकिल बहुत खतरनाक है। मैं अब साइकिल नहीं चलाऊँगा।”
और सच मानिए, बच्चों...
मैंने फिर कभी साइकिल चलाना सीखा ही नहीं।
आज भी कभी-कभी अफसोस होता है
आज जब मैं पीछे मुड़कर अपने बचपन को देखता हूँ तो सोचता हूँ—
काश! उस दिन मैं डरता नहीं।
काश! मैंने अपने घुटने पर लगी पट्टी को देखकर यह नहीं सोचा होता कि मैं साइकिल नहीं चला सकता।
काश! मैंने अगले दिन फिर साइकिल उठाई होती।
शायद पहली बार फिर गिरता।
शायद दूसरी बार भी गिरता।
लेकिन तीसरी, चौथी या पाँचवीं बार?
शायद मैं साइकिल चलाना सीख जाता।
और कौन जाने...
शायद आज मैं एक बहुत अच्छा साइकिलिस्ट होता!
इस बात का मुझे आज भी थोड़ा अफसोस है।
लेकिन उस छोटी-सी घटना ने मुझे जिंदगी की एक बहुत बड़ी सीख दी।
🌟 मेरे प्यारे बच्चों, तुम मेरी गलती मत दोहराना
मेरे प्यारे नाती-पोते और नातिनों,
मैं तुमसे आज अपने अनुभव से एक बात कहना चाहता हूँ—
जिंदगी में कभी हार मत मानना।
अगर पहली कोशिश में असफल हो जाओ तो दोबारा कोशिश करना।
दूसरी बार भी असफल हो जाओ तो तीसरी बार कोशिश करना।
गिर जाओ तो उठ जाना।
चोट लगे तो पट्टी बाँध लेना।
थोड़ा रो भी लेना—इसमें कोई बुराई नहीं है।
लेकिन...
अपने सपने को मत छोड़ना।
क्योंकि गिरना असफलता नहीं है।
गिरकर दोबारा खड़े न होना असली हार है।
याद रखना—
«“हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती।”»
और मेरी जिंदगी का साइकिल वाला वह छोटा-सा किस्सा मुझे आज भी यही बताता है कि कभी-कभी हमारी सबसे बड़ी हार किसी और से नहीं, हमारे अपने डर से होती है।
इसलिए मेरे बच्चों—
डरो मत, कोशिश करो।
गिरो तो उठो।
हारो तो फिर लड़ो।
और जब तक मंजिल न मिल जाए, चलते रहो।
क्योंकि जिंदगी में सफलता उन्हें ही मिलती है जो कहते हैं—
“मैं गिर सकता हूँ, लेकिन हार नहीं मानूँगा!”
और हाँ...
अगर कभी तुम साइकिल चलाते हुए गिर जाओ तो मेरी कहानी याद करना।
घुटने पर पट्टी बाँधना...
और फिर से साइकिल चलाना! 🚲❤️
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4.🌸 छुट्टियों का होमवर्क और मास्टर जी की वह सीख
मेरे प्यारे बच्चों,
जब मैं अपने बचपन को याद करता हूँ तो सबसे पहले मुझे अपने नानी के घर की याद आती है। वैसे तो मेरे पाँच मामा थे, लेकिन हमारा सबसे ज्यादा आना-जाना मेरे तीसरे मामा, ओंकार स्वरूप जी के घर होता था।
मामा ही नहीं, हमारी मामी सावित्री देवी भी हमारे लिए बहुत खास थीं। मामी का स्वभाव बहुत ही मधुर, सरल और प्यार से भरा हुआ था। हम उनके घर जाने वाले होते तो उन्हें पहले से ही पता रहता था कि बच्चे आने वाले हैं।
हम पहुँचते ही मामी मुस्कुराकर कहतीं—
“आ गए मेरे बच्चे! थक गए होंगे? पहले कुछ खा लो।”
हम कहते—
“मामी, भूख तो बहुत लगी है!”
मामी हँसकर कहतीं—
“मुझे पता है, तुम्हें हमेशा भूख लगी रहती है!”
फिर हमारे खाने और सोने का अलग-अलग इंतजाम पहले से ही कर दिया जाता था। हमें ऐसा लगता था जैसे हम नानी के घर नहीं, बल्कि किसी छोटे-से राजा के महल में आए हैं।
मामा के घर उनकी एक बेटी थी—सुनीता।
सुनीता मेरी लगभग हमउम्र थी और उसे मुझसे बहुत स्नेह था। हम दोनों साथ खेलते, साथ बातें करते और सबसे मजेदार बात—छुट्टियों में साथ बैठकर अपना स्कूल का काम करते।
लेकिन यहीं से शुरू होती है हमारी एक ऐसी कहानी, जिसे मैं आज भी नहीं भूल पाया हूँ।
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📚 “चलो, आज होमवर्क कर लेते हैं!”
छुट्टियाँ शुरू हुईं।
स्कूल बंद।
सुबह देर तक सोना।
दिनभर खेलना।
और शाम को घूमना।
एक दिन सुनीता ने मेरी कॉपी उठाई और बोली—
“चलो, अपना होमवर्क करते हैं।”
मैंने कहा—
“हाँ, चलो करते हैं।”
हम दोनों बैठ गए।
कुछ सवाल किए।
थोड़ा लिखा।
फिर मैंने घड़ी की तरफ देखा और कहा—
“बस, आज इतना काफी है।”
सुनीता बोली—
“लेकिन अभी तो बहुत सारा काम बाकी है!”
मैंने बड़े विश्वास से कहा—
“अरे, छुट्टियाँ तो अभी बहुत लंबी हैं। आज 1-2 दिन ही तो हुए हैं।”
सुनीता ने पूछा—
“तो बाकी कब करेंगे?”
मैंने कहा—
“कल करेंगे।”
सुनीता ने पूछा—
“पक्का?”
मैंने कहा—
“हाँ, बिल्कुल पक्का!”
लेकिन...
वह “कल” कभी नहीं आया।
अगले दिन सुनीता फिर बोली—
“चलो, आज होमवर्क कर लेते हैं।”
मैंने कहा—
“आज रहने दो। अभी तो छुट्टियों के बहुत दिन बाकी हैं।”
वह बोली—
“कल स्कूल तो नहीं जाना है!”
मैंने कहा—
“इसीलिए तो! आराम से करेंगे।”
फिर हम खेलने निकल गए।
एक दिन बीता।
दो दिन बीते।
पाँच दिन बीते।
दस दिन बीत गए।
और हमारा होमवर्क?
वहीं का वहीं!
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😄 “अभी तो बहुत छुट्टियाँ बाकी हैं!”
एक दिन सुनीता ने फिर कहा—
“तुम्हारा होमवर्क हुआ?”
मैंने कहा—
“नहीं।”
“क्यों?”
“अभी तो छुट्टियाँ बाकी हैं!”
कुछ दिन बाद उसने फिर पूछा—
“अब तो कर लो।”
मैं बोला—
“कल से पक्का शुरू करेंगे।”
सुनीता हँसकर बोली—
“तुम्हारा ‘कल’ कब आएगा?”
मैंने कहा—
“बहुत जल्दी!”
लेकिन बच्चों, मेरा वह “बहुत जल्दी” भी नहीं आया।
हम दोनों कभी खेल में लग जाते, कभी बातचीत में, कभी इधर-उधर घूमने में।
और देखते-देखते छुट्टियों के आखिरी दिन आ गए।
अब अचानक मुझे याद आया—
“अरे! मेरा तो पूरा होमवर्क बाकी है!”
मैंने कॉपी खोली।
सुनीता ने भी अपनी कॉपी खोली।
हम दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
मैंने घबराकर कहा—
“अब क्या होगा?”
सुनीता बोली—
“मैंने तो अपना कर लिया है।”
मैंने कहा—
“इतना सारा काम एक दिन में कैसे होगा?”
वह बोली—
“मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था!”
मैं चुप हो गया।
उस रात मुझे नींद भी ठीक से नहीं आई।
बार-बार मन में एक ही बात घूम रही थी—
“कल स्कूल में मास्टर जी होमवर्क देखेंगे... मेरा होमवर्क तो पूरा ही नहीं है!”
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😟 स्कूल का वह डरावना दिन
अगली सुबह स्कूल जाने का समय आया।
बाकी बच्चे बड़े उत्साह से अपनी कॉपियाँ लेकर स्कूल जा रहे थे।
कोई कह रहा था—
“देखो, मैंने पूरा होमवर्क किया है!”
कोई अपनी कॉपी दिखा रहा था—
“मेरी कॉपी देखो, कितनी साफ है!”
लेकिन मैं?
मैं चुपचाप बैठा था।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
मैं सोच रहा था—
“आज तो बहुत डाँट पड़ेगी।”
मास्टर जी कक्षा में आए।
उन्होंने कहा—
“बच्चों, सब अपना-अपना होमवर्क निकालो।”
पूरी कक्षा में कॉपियाँ खुलने लगीं।
फड़-फड़-फड़...
सब बच्चे अपनी कॉपियाँ निकाल रहे थे।
मैंने भी धीरे-धीरे अपनी कॉपी खोली, लेकिन उसमें अधूरा काम देखकर मेरा सिर झुक गया।
मास्टर जी एक-एक करके बच्चों की कॉपियाँ देखने लगे।
फिर मेरी बेंच के पास आए।
उन्होंने पूछा—
“तुमने अपना होमवर्क किया?”
मैंने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“नहीं, मास्टर जी...”
मास्टर जी ने फिर पूछा—
“क्यों?”
मैं चुप रहा।
मुझे शर्म आ रही थी।
आँखें नीचे थीं।
मुझे लग रहा था कि पूरी कक्षा मुझे ही देख रही है।
उस समय सचमुच मुझे बहुत अपमान और पीड़ा महसूस हुई।
मैं सोच रहा था—
“काश! मैंने उस दिन थोड़ा-सा काम कर लिया होता।”
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❤️ मास्टर जी ने डाँटा नहीं, समझाया
लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत मास्टर जी ने मुझे बहुत प्यार से देखा।
उन्होंने कहा—
“बेटा, गलती हो गई। लेकिन इस गलती से सीखना जरूरी है।”
मैंने धीरे से उनकी तरफ देखा।
मास्टर जी बोले—
“तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे बड़ी गलती क्या हुई?”
मैंने सिर हिलाकर कहा—
“नहीं, मास्टर जी।”
उन्होंने कहा—
“तुमने आज का काम कल पर छोड़ दिया।”
मैं चुपचाप सुनता रहा।
उन्होंने कहा—
“तुमने सोचा—कल कर लूँगा।”
फिर बोले—
“कल आया तो तुमने कहा—परसों कर लूँगा।”
बच्चे हँसने लगे।
मास्टर जी भी मुस्कुराए और बोले—
“और परसों आया तो तुमने कहा—अभी तो छुट्टियाँ बाकी हैं!”
पूरी कक्षा हँस पड़ी।
मैं भी हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
फिर मास्टर जी ने बहुत गंभीर होकर कहा—
“लेकिन बेटा, याद रखना—जो आदमी हर काम के लिए ‘कल’ का इंतजार करता रहता है, उसका बहुत-सा काम कभी पूरा नहीं होता।”
उन्होंने बोर्ड पर लिखा—
“आज का काम कल पर मत छोड़ो।”
फिर मेरी तरफ देखकर बोले—
“अगर आज का काम आज कर लोगे, तो कल तुम्हारे पास नई चीज सीखने और खेलने का समय होगा।”
उन्होंने आगे कहा—
“और अगर आज का काम कल पर छोड़ते रहोगे, तो एक दिन इतना काम इकट्ठा हो जाएगा कि तुम्हें डर लगने लगेगा।”
फिर उन्होंने बहुत प्यारी बात कही—
“बेटा, कल कभी आता नहीं है। जब कल आता है, तो वह ‘आज’ बन जाता है। इसलिए जो करना है, आज ही करो।”
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🌱 वह सीख जिंदगी भर साथ रही
बच्चों, उस दिन मैं घर वापस आया तो मेरे मन में मास्टर जी की बातें घूम रही थीं।
मैंने सोचा—
“अगर मैंने रोज थोड़ा-थोड़ा काम किया होता तो आज मुझे इतनी शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ती।”
और तभी मैंने मन में एक बात गाँठ बाँध ली—
“आज का काम आज ही करना है।”
मेरे प्यारे बच्चों,
तुम्हें भी मेरी यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए।
अगर स्कूल का काम मिला है तो उसे टालो मत।
अगर कोई अच्छी किताब पढ़नी है तो कहो मत—
“कल पढ़ूँगा।”
अगर किसी से प्यार से बात करनी है तो मत सोचो—
“बाद में बात कर लूँगा।”
अगर किसी की मदद करनी है तो मत कहो—
“कल कर दूँगा।”
क्योंकि “कल” के भरोसे रहने से कई अच्छे काम अधूरे रह जाते हैं।
और सबसे बड़ी बात—
आज का छोटा-सा काम कल के बड़े बोझ से बचा लेता है।
इसलिए मेरे प्यारे अद्विका, अयांश, श्रेयम और मेरे सभी नाती-पोते और नातिनों—
जब भी तुम्हारा मन कहे—
“चलो, यह काम कल करेंगे...”
तुरंत अपने आप से पूछना—
“अगर मैं आज कर सकता हूँ, तो कल क्यों?”
और फिर मुस्कुराकर कहना—
“कल का इंतजार क्यों करें?
जो करना है, आज ही करेंगे!” 🌸
याद रखो—
आज का काम आज करो,
कल का काम भी समय आने पर कर लो,
लेकिन काम को टालते मत रहो।
क्योंकि समय किसी के लिए रुकता नहीं है।
जो बच्चा समय की कद्र करना सीख जाता है, वह धीरे-धीरे अपने जीवन की बहुत बड़ी मुश्किलों को भी आसानी से जीतना सीख जाता है।
और मुझे यह सीख मिली थी—
एक छोटी-सी कॉपी, अधूरे होमवर्क और एक बहुत अच्छे मास्टर जी से।
वह होमवर्क तो अधूरा रह गया था...
लेकिन मास्टर जी की सीख मेरी जिंदगी में कभी अधूरी नहीं रही। ❤️
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5.🥒 सुनीता का प्रयोग और मेरी एक बड़ी वैज्ञानिक सीख
मेरी ममेरी बहन सुनीता बड़ी चंचल लड़की थी। उसकी सबसे अच्छी बात यह थी कि वह किसी बात को यूँ ही मान लेने वालों में से नहीं थी। वह हर बात को अपने ढंग से समझना चाहती थी और मौका मिलते ही उसका व्यावहारिक प्रयोग भी कर डालती थी।
हम दोनों लगभग हमउम्र थे, इसलिए साथ रहते हुए खूब बातें होती थीं।
एक दिन घर में खीरा, अमरूद और दूसरी सब्जियाँ आईं। मैंने न जाने कहाँ से सुनी हुई एक बात सुनीता को बड़े विश्वास के साथ बतानी शुरू कर दी।
मैंने कहा—
“सुनीता, तुम्हें पता है? खीरा खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए।”
सुनीता ने मेरी ओर देखा और पूछा—
“क्यों?”
मैंने कहा—
“बस, ऐसा ही कहते हैं। खीरा खाने के बाद पानी पीने से तबीयत खराब हो सकती है।”
सुनीता कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“अच्छा! ऐसा क्यों होता है?”
मैंने कहा—
“मुझे नहीं पता। लेकिन बड़े लोग कहते हैं, तो सही ही कहते होंगे।”
सुनीता ने मेरी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा—
“सिर्फ इसलिए कि कोई कहता है, हमें मान लेना चाहिए?”
मैंने कहा—
“शायद!”
सुनीता बोली—
“नहीं भाई साहब! पहले पता तो लगाओ कि बात सही भी है या नहीं।”
मैंने कहा—
“लेकिन अगर सच में कुछ हो गया तो?”
वह हँसकर बोली—
“तो फिर पता चल जाएगा!”
मैंने उसे समझाते हुए कहा—
“देखो, तुम ऐसा मत करना। खीरा खाने के बाद पानी मत पीना।”
वह बोली—
“ठीक है, ठीक है!”
लेकिन उसकी आँखों में मुझे कुछ शरारत दिखाई दे रही थी।
🥒 और फिर हुआ प्रयोग!
सुनीता ने खीरा खाया।
मैं उसे ध्यान से देख रहा था।
उसने एक टुकड़ा खाया, फिर दूसरा।
मैंने पूछा—
“बस करो, पानी मत पीना!”
वह बोली—
“क्यों?”
मैंने कहा—
“अभी बताया तो था!”
वह बोली—
“हाँ, बताया था। लेकिन मैं देखना चाहती हूँ कि सचमुच कुछ होता भी है या नहीं।”
खीरा खत्म करने के बाद वह उठी और सीधे पानी के बर्तन के पास चली गई।
मैं घबरा गया।
“अरे सुनीता! रुको!”
वह पीछे मुड़कर बोली—
“क्यों?”
मैंने कहा—
“पानी मत पीना!”
वह बोली—
“क्यों नहीं?”
मैंने कहा—
“तुम्हें कुछ हो जाएगा!”
वह हँसने लगी—
“अच्छा? क्या हो जाएगा?”
मैं बोला—
“मुझे नहीं पता, लेकिन कहते हैं कि पेट खराब हो जाएगा।”
सुनीता ने पानी का गिलास उठाया और बोली—
“तो आज देखते हैं।”
मैंने कहा—
“मत पियो!”
वह बोली—
“तुम डरते क्यों हो?”
और उसने आराम से पानी पी लिया।
मैं उसे घूरता रह गया।
“अब?”
वह बोली—
“अब क्या?”
मैंने कहा—
“तुम्हारा पेट?”
वह बोली—
“बिल्कुल ठीक!”
मैंने पूछा—
“कुछ हुआ नहीं?”
वह हँसकर बोली—
“नहीं!”
फिर उसने मजाक में पूछा—
“तुम्हें कुछ हुआ?”
मैंने कहा—
“मुझे क्यों होगा?”
वह बोली—
“क्योंकि तुम तो पानी पीते हुए मुझे देखकर डर रहे थे!”
हम दोनों जोर से हँस पड़े।
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🔬 लेकिन उस दिन मुझे एक बड़ी बात समझ आई
उस समय हम बच्चे थे। हमें विज्ञान की बहुत ज्यादा समझ नहीं थी। लेकिन सुनीता की उस छोटी-सी शरारत ने मुझे जिंदगी की एक बड़ी सीख दी।
आज जब मैं उस घटना को याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि किसी बात को केवल इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए कि उसे बहुत लोग कहते हैं।
हाँ, दूसरों के अनुभवों का सम्मान जरूर करना चाहिए।
अगर माँ कुछ कहती हैं, दादी कुछ बताती हैं, कोई शिक्षक कोई बात समझाता है या कोई बड़ा अपने अनुभव से हमें सावधान करता है, तो हमें उसकी बात ध्यान से सुननी चाहिए।
लेकिन उसके बाद एक सवाल पूछना भी जरूरी है—
“ऐसा क्यों?”
यही सवाल हमें अंधविश्वास से निकालकर विज्ञान की ओर ले जाता है।
सुनीता ने भी तो यही किया था।
उसने मेरी बात सुनी।
फिर पूछा—
“क्यों?”
जब उसे संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो उसने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया।
आज विज्ञान हमें बताता है कि खीरा या अमरूद खाने के बाद पानी पीना अपने-आप में कोई ऐसी सिद्ध बात नहीं है कि इससे सामान्यतः नुकसान होगा। हाँ, किसी व्यक्ति को किसी खास भोजन से व्यक्तिगत परेशानी हो सकती है, लेकिन उसे एक सार्वभौमिक नियम मान लेना ठीक नहीं।
इसलिए बच्चों, उस दिन की बात को मैं आज एक सुंदर वैज्ञानिक सूत्र की तरह याद करता हूँ—
"बात चाहे किसी ने भी कही हो,
उसे आँख बंद करके मत मानो।
पहले पूछो—“क्यों?”
फिर तर्क समझो, प्रमाण खोजो
और विज्ञान की कसौटी पर परखो।"
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🌱 मेरे प्यारे बच्चों, सवाल पूछने से मत डरना
मेरे प्यारे अद्विका, अयांश, श्रेयम और मेरे सभी नाती-पोते और नातिनों,
मैं चाहता हूँ कि तुम सुनीता की तरह जिज्ञासु बनो।
जब कोई कहे—
“ऐसा ही होता है।”
तो विनम्रता से पूछो—
“लेकिन ऐसा क्यों होता है?”
जब कोई कहे—
“यह मत करो, इससे नुकसान होगा।”
तो पूछो—
“क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण या प्रमाण है?”
जब कोई कहे—
“हमारे जमाने से ऐसा ही होता आया है।”
तो यह मत कहो कि वह गलत है।
बस इतना पूछो—
“क्या हम यह जान सकते हैं कि ऐसा क्यों होता है?”
याद रखो—
सवाल करना बदतमीजी नहीं है।
सवाल करना सीखने की शुरुआत है।
और विज्ञान की शुरुआत भी तो एक सवाल से ही होती है—
“क्यों?”
सुनीता ने उस दिन शायद खेल-खेल में पानी पीकर एक छोटा-सा प्रयोग किया था।
लेकिन आज मुझे लगता है कि उसने मुझे एक बहुत बड़ी बात सिखाई थी—
अनुभव का सम्मान करो,
पर अपनी बुद्धि का इस्तेमाल भी करो।
विश्वास करो, लेकिन आँखें बंद करके नहीं।
सवाल पूछो, प्रमाण खोजो और सत्य को पहचानो।**
यही वैज्ञानिक सोच है।
और अगर मेरे बच्चे अपने जीवन में यह एक आदत डाल लें कि—
“जो सुनूँगा, उसे समझूँगा;
जो समझूँगा, उसे तर्क से परखूँगा;
और जो सत्य होगा, उसे पूरे विश्वास से स्वीकार करूँगा,”
तो मुझे विश्वास है कि वे न केवल अच्छे विद्यार्थी बनेंगे, बल्कि समझदार, विवेकशील और जिम्मेदार इंसान भी बनेंगे।
और हाँ, सुनीता...
अगर तुम आज भी यह कहानी पढ़ रही हो, तो मैं मानता हूँ—
उस दिन खीरा मैंने खाया था,
पानी तुमने पिया था,
लेकिन वैज्ञानिक सीख हम दोनों ने साथ-साथ ली थी! ❤️
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6.पिताजी के कंधों पर भारत माता
“पिताजी, मुझे भी कंधे पर बैठाओ!”
चार साल का मैं उछलते हुए बोला।
पिताजी मुस्कराए और मुझे अपने कंधों पर उठा लिया।
“अरे वाह! आज तो मेरी सवारी सबसे पहले तैयार हो गई!”
मेरे बड़े भाई और बहन भी दौड़कर आ गए।
“पिताजी, अब मेरी बारी!”
“नहीं, पहले मेरी!”
“नहीं, आज मैं पहले बैठूँगा!”
हम तीनों में होड़ लग गई।
पिताजी हँसते हुए बोले, “अच्छा-अच्छा, सबकी बारी आएगी। आखिर मैं तुम तीनों का पिताजी हूँ!”
फिर शुरू हुई हमारी रोज की ‘पिताजी की सवारी’।
पिताजी मुझे कंधे पर बैठाकर आँगन में चक्कर लगाने लगे।
अचानक उन्होंने जोर से नारा लगाया—
“भारत माता की जय!”
मैंने भी पूरी ताकत से चिल्लाया—
“भारत माता की जय!”
भाई और बहन भी चिल्लाने लगे—
“भारत माता की जय!”
पिताजी ने अगला नारा लगाया—
“महात्मा गांधी की जय!”
हम तीनों—
“महात्मा गांधी की जय!”
फिर पिताजी बोले—
“महर्षि दयानंद की जय!”
हमने फिर जोर से आवाज लगाई—
“महर्षि दयानंद की जय!”
आँगन हमारी आवाजों से गूँज उठा।
कुछ देर बाद पिताजी ने मुझे नीचे उतारा और भाई को कंधे पर बैठा लिया।
मैंने पूछा, “पिताजी, रोज-रोज हम ये नारे क्यों लगाते हैं?”
पिताजी मुस्कराए।
“तुम्हें पता है भारत माता कौन हैं?”
मैंने तुरंत कहा, “हाँ! भारत माता एक माँ हैं।”
“लेकिन कहाँ रहती हैं?”
मैं चुप हो गया।
पिताजी ने कहा, “भारत माता केवल कोई जमीन, नदी, पहाड़ या समुद्र नहीं हैं। भारत माता तो इस देश के लोग हैं—जो मेहनत करते हैं, खेतों में अन्न उगाते हैं, घर बनाते हैं, कपड़े सिलते हैं, पढ़ाते हैं और देश को आगे बढ़ाते हैं।”
भाई ने पूछा, “तो क्या किसान भी भारत माता हैं?”
“हाँ।”
बहन ने पूछा, “मजदूर भी?”
“बिल्कुल!”
मैंने उत्साह से पूछा, “और हम?”
पिताजी हँस पड़े।
“हाँ, तुम भी! लेकिन अभी तुम्हारा सबसे बड़ा काम है—अच्छे बच्चे बनना।”
हम सब खिलखिलाकर हँस पड़े।
फिर पिताजी ने कहा, “तुम्हें महात्मा गांधी के बारे में पता है?”
भाई बोला, “वे आजादी की लड़ाई लड़ते थे।”
“हाँ,” पिताजी ने कहा, “लेकिन उन्होंने लड़ाई तलवार से नहीं, सत्य और अहिंसा से लड़ी। उन्होंने लोगों को सिखाया कि बिना हिंसा के भी बड़े से बड़ा परिवर्तन किया जा सकता है।”
बहन ने पूछा, “और महर्षि दयानंद?”
पिताजी बोले, “उन्होंने हमें अपने देश और अपनी संस्कृति पर विश्वास करना सिखाया। उनका संदेश था कि अपना शासन अपने हाथ में होना सबसे अच्छा है।”
मैंने पूछा, “तो पिताजी, क्या दूसरे देशों के लोग अच्छे नहीं होते?”
पिताजी ने मुझे प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“क्यों नहीं! दुनिया के हर देश में अच्छे लोग हैं। हमें अपने देश से प्रेम करना चाहिए, लेकिन दूसरे देशों और उनके लोगों से भी प्रेम और सम्मान करना चाहिए।”
मैं उनकी बात सुनता रहा।
फिर अचानक बोला—
“पिताजी, अब मुझे फिर कंधे पर बैठाओ!”
पिताजी हँस पड़े।
“अच्छा, चलो! लेकिन इस बार नारा तुम लगाओगे।”
मैं उनके कंधे पर चढ़ गया और पूरी ताकत से चिल्लाया—
“भारत माता की जय!”
भाई और बहन ने भी साथ दिया—
“भारत माता की जय!”
उस दिन हमें क्या मालूम था कि पिताजी के कंधों पर बैठकर हम केवल आँगन का चक्कर नहीं लगा रहे थे।
वे हमारे मन में देशप्रेम, भाईचारे, इंसानियत और सबके सम्मान के छोटे-छोटे बीज बो रहे थे।
बचपन में हमें पिताजी के कंधे सबसे ऊँचे लगते थे।
आज लगता है—
वे कंधे सचमुच बहुत ऊँचे थे, क्योंकि उन्होंने हमें ऊँचा सोचने की सीख दी थी।
प्यारे बच्चो!
देश से प्यार करना केवल “भारत माता की जय” बोलना नहीं है। देश से सच्चा प्यार तब होता है, जब हम अपने आसपास के लोगों से प्यार करें, सबका सम्मान करें और किसी के साथ भेदभाव न करें।
जो बच्चा अपने दोस्त की मदद करता है, सबके साथ मिल-जुलकर रहता है, मेहनत करता है, सच बोलता है और अपने देश को साफ-सुंदर रखने की कोशिश करता है—वह भी अपने देश की सेवा करता है।
याद रखो—
हम सब अलग-अलग हो सकते हैं,
लेकिन हमारा देश एक है।
सबसे प्यार करो,
सबका सम्मान करो,
मिल-जुलकर रहो
और अपने भारत को बेहतर बनाओ।
यही है सच्चा देशप्रेम।
नानू की पोटली
मेरी पहली पाठशाला और स्कूल जाने की खुशी
एक दिन मैं अपने नाती-नातिन के साथ बैठा था। बातों-बातों में एक ने अचानक पूछा—
“नानू, जब आप छोटे थे तो क्या आपके समय में भी स्कूल होते थे?”
मैं मुस्कराया। बचपन की गलियों में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुल गया।
नानू: “हाँ बेटा, स्कूल तो होते थे, लेकिन आज जैसे बड़े-बड़े स्कूल नहीं। हमारे समय में नियमित स्कूल में दाखिला लगभग सात साल की उम्र में होता था।”
“तो सात साल से पहले बच्चे क्या करते थे?”
मैंने कहा—
नानू: “उस समय छोटे बच्चों के लिए आज जैसे क्रेच या प्री-स्कूल नहीं होते थे। मोहल्ले में ही छोटी-छोटी पाठशालाएँ चलती थीं। कोई अपने घर में बच्चों को बैठाकर पढ़ाता था तो कोई किसी सार्वजनिक स्थान पर।”
“क्या आप भी ऐसी पाठशाला में जाते थे?”
मैं हँस पड़ा।
नानू: “हाँ, बिल्कुल! हमारे घर के पास ही कलावती जैन की पाठशाला थी। फिर मैं मास्टर नानू राम की पाठशाला में जाने लगा, जो कबीर चोरा में चलती थी। वहाँ हम जैसे छोटे-छोटे बच्चे बैठते थे—गिनती सीखते, पहाड़े बोलते और अक्षरों की पहचान करते।”
“नानू, तब आपकी पढ़ाई भी खेल जैसी होती होगी?”
नानू: “हाँ, पढ़ाई में खेल का आनंद भी था और खेल में पढ़ाई का मजा भी। लेकिन असली स्कूल तो सात साल की उम्र में शुरू हुआ।”
“कौन-सा स्कूल?”
मैंने गर्व से कहा—
नानू: “मेरा दाखिला आर्य प्राइमरी स्कूल, घेर अराइयां में हुआ।”
“और पहले दिन क्या हुआ था?”
यह सवाल सुनते ही मेरे चेहरे पर बचपन की वही खुशी लौट आई।
नानू: “वह दिन मुझे आज भी याद है। मेरे दाखिले की खुशी में घरवालों ने बूंदी की मिठाई मँगवाई थी। वह मिठाई स्कूल के बच्चों में बाँटी गई और सबको मेरा परिचय कराया गया। मुझे लगा जैसे मैं कोई बहुत बड़ा आदमी बन गया हूँ!”
तीनों बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।
“फिर तो आपको स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता होगा!”
मैंने थोड़ा गंभीर होकर कहा—
नानू: “अरे नहीं! स्कूल जाना किस बच्चे को शुरू-शुरू में अच्छा लगता है?”
“मुझे भी कभी-कभी स्कूल जाने का मन नहीं करता।”
नानू: “बस, यही तो बात है! हमारे समय के बच्चे भी स्कूल जाने से बचने के बहाने बनाया करते थे। घरवाले कभी किसी आने वाली चीज का लालच देते, कभी कोई खाने की चीज दिलाने का वादा करते।”
“और आपको कौन-सा लालच दिया जाता था?”
मैंने मुस्कराकर कहा—
नानू: “मेरी माँ के पास इससे भी प्यारा तरीका था। वह मुझे एक गीत सुनाती थीं। उस गीत में पढ़ाई का महत्व बताया जाता था।”
मैंने बच्चों को देखते हुए धीरे-धीरे गुनगुनाया—
“लिखोगे-पढ़ोगे राजा बनोगे,
सितारों से ऊँचा तुम्हारा होगा नाम।
जो बच्चे पढ़ते नहीं,
इज्जत किसी की करते नहीं।”
सभी बच्चों की आँखों में चमक आ गई।
“बस इतना सुनकर आप स्कूल चले जाते थे?”
नानू: “हाँ बिटिया! माँ की आवाज में इतना प्यार और विश्वास होता था कि मैं हँसता हुआ, खेलता हुआ, कूदता हुआ स्कूल की ओर चल पड़ता था।”
कुछ क्षण के लिए मैं चुप हो गया।
मेरे सामने जैसे फिर वही पुराना घर था, माँ की आवाज थी, हाथ पकड़कर स्कूल ले जाने वाला बचपन था और मन में अनगिनत सपने थे।
“नानू, आपको अपने स्कूल के दिन आज भी इतने अच्छे क्यों लगते हैं?”
मैंने तीनों को अपने पास बुलाकर कहा—
नानू: “क्योंकि बेटा, वे दिन सुविधाओं से नहीं, प्यार से भरे हुए थे। हमारे पास आज जैसी चीजें नहीं थीं, लेकिन माँ-बाप का स्नेह था, गुरु का सम्मान था और सीखने की उत्सुकता थी।”
“तो आपकी माँ की बात आपको हमेशा याद रही?”
नानू: “हाँ। शायद उसी समय मन में यह बात बैठ गई थी कि पढ़ाई केवल किताबें पढ़ना नहीं है। पढ़ाई हमें अच्छा इंसान बनाती है—हमें सोचने, समझने और दूसरों का सम्मान करने की सीख देती है।”
मैंने सभी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा—
नानू: “मेरे प्यारे बच्चों, आज तुम्हारे पास पढ़ने के लिए बहुत अच्छी किताबें हैं, अच्छे स्कूल हैं और ज्ञान पाने के अनगिनत साधन हैं। इन सुविधाओं को कभी बोझ मत समझना। इन्हें अपना सौभाग्य समझना।”
“तो हमें स्कूल को खुशी-खुशी जाना चाहिए?”
नानू: “बिल्कुल! क्योंकि स्कूल केवल परीक्षा पास करने की जगह नहीं है। वह तुम्हारे सपनों की पहली सीढ़ी है।”
“और अगर पढ़ाई मुश्किल लगे?”
मैंने मुस्कराकर कहा—
नानू: “तो अपनी नानू की पोटली से एक बात निकाल लेना—मुश्किल पढ़ाई से भागना नहीं, उसे समझने की कोशिश करना। आज की छोटी मेहनत ही कल की बड़ी सफलता बनती है।”
तीनों ने एक साथ कहा—
“नानू, अब हम पढ़ाई से नहीं भागेंगे!”
मैं हँस पड़ा।
और मन ही मन सोचने लगा—
समय कितना बदल गया है, लेकिन बचपन की मासूमियत, माँ का प्यार और शिक्षा का महत्व कभी नहीं बदलता।
बच्चों के लिए नानू की सीख
पढ़ाई को बोझ नहीं, अवसर समझो।
हर दिन कुछ नया सीखो, बड़ों का सम्मान करो और अपने सपनों को मेहनत से पूरा करो।
क्योंकि ज्ञान वह रोशनी है, जो जीवन की राह हमेशा उजली करती है।
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7.नानू की पोटली
मेरी पहली पाठशाला और स्कूल जाने की खुशी
एक दिन मैं अपने के साथ बैठा था। बातों-बातों में एक ने अचानक पूछा—
“नानू, जब आप छोटे थे तो क्या आपके समय में भी स्कूल होते थे?”
मैं मुस्कराया। बचपन की गलियों में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुल गया।
नानू: “हाँ बेटा, स्कूल तो होते थे, लेकिन आज जैसे बड़े-बड़े स्कूल नहीं। हमारे समय में नियमित स्कूल में दाखिला लगभग सात साल की उम्र में होता था।”
: “तो सात साल से पहले बच्चे क्या करते थे?”
मैंने कहा—
नानू: “उस समय छोटे बच्चों के लिए आज जैसे क्रेच या प्री-स्कूल नहीं होते थे। मोहल्ले में ही छोटी-छोटी पाठशालाएँ चलती थीं। कोई अपने घर में बच्चों को बैठाकर पढ़ाता था तो कोई किसी सार्वजनिक स्थान पर।”
“क्या आप भी ऐसी पाठशाला में जाते थे?”
मैं हँस पड़ा।
नानू: “हाँ, बिल्कुल! हमारे घर के पास ही कलावती जैन की पाठशाला थी। फिर मैं मास्टर नानू राम की पाठशाला में जाने लगा, जो कबीर चोरा में चलती थी। वहाँ हम जैसे छोटे-छोटे बच्चे बैठते थे—गिनती सीखते, पहाड़े बोलते और अक्षरों की पहचान करते।”
“नानू, तब आपकी पढ़ाई भी खेल जैसी होती होगी?”
नानू: “हाँ, पढ़ाई में खेल का आनंद भी था और खेल में पढ़ाई का मजा भी। लेकिन असली स्कूल तो सात साल की उम्र में शुरू हुआ।”
“कौन-सा स्कूल?”
मैंने गर्व से कहा—
नानू: “मेरा दाखिला आर्य प्राइमरी स्कूल, घेर अराइयांघेर अराइयां। में हुआ।”
“और पहले दिन क्या हुआ था?”
यह सवाल सुनते ही मेरे चेहरे पर बचपन की वही खुशी लौट आई।
नानू: “वह दिन मुझे आज भी याद है। मेरे दाखिले की खुशी में घरवालों ने बूंदी की मिठाई मँगवाई थी। वह मिठाई स्कूल के बच्चों में बाँटी गई और सबको मेरा परिचय कराया गया। मुझे लगा जैसे मैं कोई बहुत बड़ा आदमी बन गया हूँ!”
तीनों बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।
“फिर तो आपको स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता होगा!”
मैंने थोड़ा गंभीर होकर कहा—
नानू: “अरे नहीं! स्कूल जाना किस बच्चे को शुरू-शुरू में अच्छा लगता है?”
“मुझे भी कभी-कभी स्कूल जाने का मन नहीं करता।”
नानू: “बस, यही तो बात है! हमारे समय के बच्चे भी स्कूल जाने से बचने के बहाने बनाया करते थे। घरवाले कभी किसी आने वाली चीज का लालच देते, कभी कोई खाने की चीज दिलाने का वादा करते।”
“और आपको कौन-सा लालच दिया जाता था?”
मैंने मुस्कराकर कहा—
नानू: “मेरी माँ के पास इससे भी प्यारा तरीका था। वह मुझे एक गीत सुनाती थीं। उस गीत में पढ़ाई का महत्व बताया जाता था।”
मैंने बच्चों को देखते हुए धीरे-धीरे गुनगुनाया—
“लिखोगे-पढ़ोगे राजा बनोगे,
सितारों से ऊँचा तुम्हारा होगा नाम।
जो बच्चे पढ़ते नहीं,
इज्जत किसी की करते नहीं।”
अद्विका की आँखों में चमक आ गई।
अद्विका: “बस इतना सुनकर आप स्कूल चले जाते थे?”
नानू: “हाँ बिटिया! माँ की आवाज में इतना प्यार और विश्वास होता था कि मैं हँसता हुआ, खेलता हुआ, कूदता हुआ स्कूल की ओर चल पड़ता था।”
कुछ क्षण के लिए मैं चुप हो गया।
मेरे सामने जैसे फिर वही पुराना घर था, माँ की आवाज थी, हाथ पकड़कर स्कूल ले जाने वाला बचपन था और मन में अनगिनत सपने थे।
अयांश: “नानू, आपको अपने स्कूल के दिन आज भी इतने अच्छे क्यों लगते हैं?”
मैंने तीनों को अपने पास बुलाकर कहा—
नानू: “क्योंकि बेटा, वे दिन सुविधाओं से नहीं, प्यार से भरे हुए थे। हमारे पास आज जैसी चीजें नहीं थीं, लेकिन माँ-बाप का स्नेह था, गुरु का सम्मान था और सीखने की उत्सुकता थी।”
श्रेयम: “तो आपकी माँ की बात आपको हमेशा याद रही?”
नानू: “हाँ। शायद उसी समय मन में यह बात बैठ गई थी कि पढ़ाई केवल किताबें पढ़ना नहीं है। पढ़ाई हमें अच्छा इंसान बनाती है—हमें सोचने, समझने और दूसरों का सम्मान करने की सीख देती है।”
मैंने अद्विका, अयांश और श्रेयम के सिर पर हाथ रखते हुए कहा—
नानू: “मेरे प्यारे बच्चों, आज तुम्हारे पास पढ़ने के लिए बहुत अच्छी किताबें हैं, अच्छे स्कूल हैं और ज्ञान पाने के अनगिनत साधन हैं। इन सुविधाओं को कभी बोझ मत समझना। इन्हें अपना सौभाग्य समझना।”
अद्विका: “तो हमें स्कूल को खुशी-खुशी जाना चाहिए?”
नानू: “बिल्कुल! क्योंकि स्कूल केवल परीक्षा पास करने की जगह नहीं है। वह तुम्हारे सपनों की पहली सीढ़ी है।”
अयांश: “और अगर पढ़ाई मुश्किल लगे?”
मैंने मुस्कराकर कहा—
नानू: “तो अपनी नानू की पोटली से एक बात निकाल लेना—मुश्किल पढ़ाई से भागना नहीं, उसे समझने की कोशिश करना। आज की छोटी मेहनत ही कल की बड़ी सफलता बनती है।”
तीनों ने एक साथ कहा—
“नानू, अब हम पढ़ाई से नहीं भागेंगे!”
मैं हँस पड़ा।
और मन ही मन सोचने लगा—
समय कितना बदल गया है, लेकिन बचपन की मासूमियत, माँ का प्यार और शिक्षा का महत्व कभी नहीं बदलता।
बच्चों के लिए नानू की सीख
पढ़ाई को बोझ नहीं, अवसर समझो।
हर दिन कुछ नया सीखो, बड़ों का सम्मान करो और अपने सपनों को मेहनत से पूरा करो।
क्योंकि ज्ञान वह रोशनी है, जो जीवन की राह हमेशा उजली करती है।
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8.नानू की पोटली
मंत्रों से मिली भाषा की पहली सीख
“नानू, आपको संस्कृत इतनी अच्छी तरह कैसे आती है?”
बच्चों का यह सवाल सुनकर नानू कुछ देर चुप रहे। उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई और आँखों में जैसे बचपन की कोई पुरानी तस्वीर उतर आई।
“बेटी, संस्कृत मैंने किताबों से बाद में सीखी थी,” नानू बोले, “लेकिन उसकी पहली पाठशाला किताब नहीं, मेरा अपना घर था।”
एक ने तुरंत पूछा—
“आपके घर में भी स्कूल चलता था क्या?”
नानू हँस पड़े।
“नहीं रे! लेकिन मेरी माताजी का बनाया हुआ वातावरण किसी पाठशाला से कम नहीं था।”
फिर नानू ने अपने बचपन की गठरी खोलनी शुरू की।
“हमारा परिवार आर्य समाज के विचारों से प्रभावित था। तुम्हारी परनानी रोज सुबह हवन करती थीं। जैसे ही हवन की अग्नि प्रज्वलित होती, पूरा घर वेदों के संस्कृत मंत्रों से गूंज उठता। मंत्रों का उच्चारण होता, अग्नि में आहुतियाँ डाली जातीं और घर का वातावरण एक अलग ही शांति से भर जाता।”
दूसरे ने पूछा—
“क्या तब आपको उन मंत्रों का अर्थ भी मालूम था?”
“अर्थ?” नानू मुस्कुराए, “अर्थ तो बहुत बाद में समझ आया। उस समय तो मुझे केवल मंत्रों की ध्वनि अच्छी लगती थी। मैं माताजी के पास बैठकर उन्हें सुनता रहता। सुनते-सुनते न जाने कब वे मंत्र मेरे मन में बस गए।”
“कितने साल के थे आप?” नातिन ने पूछा।
“शायद सात-आठ साल का।”
“इतनी छोटी उम्र में आपको मंत्र याद हो गए?”
“हाँ,” नानू ने कहा, “और यही मेरी जिंदगी की एक छोटी-सी घटना बाद में मेरे लिए बड़ी पूँजी बन गई।”
छोटा-सा यजमान
कुछ समय बाद मेरा दाखिला आर्य प्राइमरी स्कूल में हुआ। वह भी आर्य समाज का विद्यालय था। वहाँ प्रत्येक शनिवार को साप्ताहिक यज्ञ होता था।
जब अध्यापकों को पता चला कि इस छोटे-से बच्चे को हवन के बहुत-से मंत्र कंठस्थ हैं, तो उन्होंने मुझे यज्ञ करवाने की जिम्मेदारी देनी शुरू कर दी।
सोचो, एक छोटा-सा बच्चा सामने बैठा है और बड़े-बड़े लोग उसके पीछे मंत्र दोहरा रहे हैं!
नानू यह कहते हुए हँस पड़े।
“तब मुझे बड़ा गर्व होता था। लगता था कि मैं भी कोई बहुत बड़ा काम कर रहा हूँ।”
नाती ने शरारत से पूछा—
“नानू, आपको डर नहीं लगता था?”
“बिल्कुल नहीं! क्योंकि मुझे मंत्र याद थे। हाँ, अगर कोई पूछ देता कि इसका अर्थ क्या है, तो शायद मेरी बोलती बंद हो जाती!”
सभी बच्चे हँस पड़े।
लेकिन नानू की आवाज अब थोड़ी गंभीर हो गई।
“उस समय मुझे कहाँ मालूम था कि ये मंत्र केवल मेरी स्मृति को मजबूत नहीं कर रहे, बल्कि मेरे दिमाग को भाषा की एक नई दुनिया से परिचित करा रहे हैं।”
रटने से समझने तक
“जब मैं बड़ा हुआ और संस्कृत पढ़ना शुरू किया, तो मुझे संस्कृत कठिन नहीं लगी। शब्दों के रूप, वाक्य की बनावट और व्याकरण के नियम मुझे जल्दी समझ आने लगे।”
“और आठवीं कक्षा में,” नानू ने आगे कहा, “हमारे संस्कृत पाठ्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय था। उसके श्लोक मुझे जल्दी याद हो गए। केवल याद ही नहीं हुए, धीरे-धीरे उनके अर्थ और व्याकरण को समझने में भी मुझे आनंद आने लगा।”
“तो नानू, आप बचपन में मंत्र रटते थे और बाद में समझने लगे?”
“बिल्कुल! और यही बात मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ। रटना हमेशा बुरा नहीं होता, यदि वह समझ की पहली सीढ़ी बन जाए। बचपन में मेरे लिए वे मंत्र केवल याद करने की चीज थे। लेकिन वही अभ्यास आगे चलकर भाषा को समझने की क्षमता में बदल गया।”
रूस में संस्कृत का साथ
नानू ने थोड़ी देर रुककर कहा—
“और फिर एक दिन मुझे इसका एक और बड़ा लाभ मिला।”
“कहाँ?” बच्चों ने एक साथ पूछा।
“सन् 1980 में मैं रूस गया। वहाँ मुझे रूसी भाषा सीखनी थी। नई भाषा थी, नए शब्द थे, नया देश था। लेकिन मुझे रूसी सीखने में अपेक्षा से बहुत कम कठिनाई हुई।”
“क्यों?” आद्विका ने पूछा।
“क्योंकि रूसी भाषा में भी शब्दों के रूप और व्याकरणिक परिवर्तन बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। संस्कृत पढ़ने के कारण मुझे भाषा के व्याकरणिक ढाँचे को समझने की आदत पहले से थी। इसलिए रूसी के शब्द-रूप और वाक्य-विन्यास को समझना मेरे लिए कुछ आसान हो गया।”
बच्चों ने तुरंत निष्कर्ष निकाल दिया—
“तो संस्कृत ने आपको रूसी भाषा सिखा दी!”
नानू ने हँसते हुए उसके सिर पर हाथ रखा।
“नहीं बेटा। संस्कृत ने मुझे रूसी भाषा नहीं सिखाई। संस्कृत ने मुझे भाषा सीखने का तरीका सिखाया।”
तीनों बच्चे एकदम शांत हो गए।
नानू ने कहा—
“यही मेरी पोटली की आज की सबसे कीमती बात है।”
नानू की सीख
“मेरे प्यारे बच्चों,” नानू बोले, “किसी भी भाषा को केवल परीक्षा पास करने के लिए मत पढ़ो। उसे उसकी जड़ तक जाकर समझो। उसके शब्दों को समझो, उसके व्याकरण को समझो, उसके वाक्यों की बनावट को समझो और यह जानने की कोशिश करो कि उस भाषा में लोग अपने विचारों और भावनाओं को किस तरह व्यक्त करते हैं।”
“जब तुम किसी एक भाषा को गहराई से समझ लेते हो, तो दूसरी भाषाएँ सीखने के लिए तुम्हारे भीतर एक मजबूत आधार तैयार हो जाता है।”
नातिन ने पूछा—
“तो हमें कितनी भाषाएँ सीखनी चाहिए, नानू?”
नानू ने मुस्कुराकर कहा—
“जितनी सीख सको, उतनी सीखो। लेकिन संख्या से ज्यादा जरूरी है गहराई।”
फिर उन्होंने बच्चों की ओर देखकर कहा—
“और एक बात हमेशा याद रखना—बचपन में सीखी हुई कोई अच्छी बात कभी व्यर्थ नहीं जाती। हो सकता है उसका लाभ आज दिखाई न दे, लेकिन जीवन के किसी मोड़ पर वही छोटी-सी सीख तुम्हारी बड़ी ताकत बन जाए।”
नानू की बात पूरी हुई तो कुछ क्षण के लिए सब शांत रहे।
उसने धीरे से कहा—
“नानू, आपकी पहली भाषा की किताब तो आपकी माताजी थीं।”
नानू की आँखें नम-सी हो गईं।
उन्होंने कहा—
“हाँ बेटी… मेरी पहली किताब मेरी माताजी थीं, मेरी पहली पाठशाला मेरा घर था और मेरे पहले शिक्षक वे संस्कृत मंत्र थे, जिन्हें मैं बचपन में बिना अर्थ जाने दोहराया करता था।”
और नानू ने अपनी पोटली की एक और गाँठ खोल दी—
एक छोटी-सी बचपन की स्मृति, जो जीवन भर की सीख बन गई थी।
बच्चों के लिए सरल संदेश
किसी भी भाषा को केवल बोलना मत सीखो, उसे समझना सीखो।
एक भाषा की गहराई से सीखी हुई समझ दूसरी भाषाओं के दरवाजे खोल सकती है।
और बचपन में सीखी हुई कोई भी अच्छी बात छोटी नहीं होती—वही आगे चलकर आपकी बड़ी ताकत बन सकती है।
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9.नानू की पोटली
माँ की वह अनसुनी जिद
“नानू, क्या आप बचपन से ही अपनी माताजी के साथ आर्य समाज मंदिर जाते थे?”
आद्विका के इस सवाल पर नानू के चेहरे पर बचपन की एक शरारती मुस्कान तैर गई।
“हाँ बेटी! शायद चार-पाँच साल की उम्र से ही मैं माताजी के साथ आर्य समाज मंदिर के साप्ताहिक सत्संग में जाने लगा था।”
आयांश ने उत्सुकता से पूछा—
“तो आपको सत्संग बहुत अच्छा लगता होगा?”
नानू हँस पड़े।
“सच बताऊँ? उस उम्र में मेरा ध्यान सत्संग से ज्यादा रास्ते में आने वाली हलवाई की दुकानों पर रहता था!”
तीनों बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।
नानू ने आगे कहा—
“मेरी माताजी आगे-आगे चलतीं और मैं उनके पीछे-पीछे दौड़ता रहता। जैसे ही रास्ते में कोई हलवाई की दुकान आती, मेरी नजर सीधे कड़ाही पर चली जाती—कहीं गरम-गरम पकौड़े तल रहे हैं, कहीं समोसे सजे हैं और कहीं रंग-बिरंगी मिठाइयाँ मेरी ओर देखकर जैसे मुझे बुला रही हों!”
“फिर आप क्या करते थे?” श्रेयम ने पूछा।
“बस, फिर शुरू हो जाती मेरी जिद।”
नानू ने बच्चों की ओर देखकर उसी अंदाज में कहा—
‘माँ, ये दिलवा दो… वो मिठाई दिलवा दो… एक समोसा ले लो…!’
माँ समझातीं—
“बेटा, बाजार की चीजें हमेशा अच्छे तेल या घी में नहीं बनतीं। ये चीजें हम घर पर भी बना सकते हैं। घर की बनी चीज साफ-सुथरी और अच्छी होती है।”
लेकिन उस उम्र में मुझे माँ की बात कहाँ समझ आती थी!
मैं और जोर लगाता—
“नहीं! मुझे तो यही चाहिए!”
और जब माँ मेरी बात नहीं मानतीं तो मैं सड़क पर ही बैठ जाता। हाथ-पाँव पटकता और ऐसा लगता जैसे मैंने वहीं अपना धरना लगा दिया हो।
आद्विका हँसते हुए बोली—
“फिर नानी आपको मना लेती थीं?”
नानू ने सिर हिलाया—
“नहीं! यही तो मेरी कहानी की सबसे मजेदार बात है। मेरी माँ मुझे मनाने के लिए न मिठाई खरीदती थीं, न मेरी जिद के आगे झुकती थीं। वे मेरी तरफ देखतीं भी नहीं थीं। चुपचाप आगे बढ़ती रहतीं।”
“और आप?”
“मैं कुछ देर सड़क पर बैठा रहता… फिर देखता कि माँ तो काफी आगे निकल गईं। अब जिद बड़ी थी या माँ का साथ—यह फैसला मुझे खुद करना पड़ता था!”
बच्चे फिर हँस पड़े।
नानू ने मुस्कुराते हुए कहा—
“आखिर मैं उठता, दौड़कर माँ के पास जाता और फिर उनके पीछे चल पड़ता।”
कुछ क्षण के लिए नानू शांत हो गए। फिर उन्होंने बहुत आत्मीय स्वर में कहा—
“बच्चों, आज जब मैं पीछे मुड़कर अपने बचपन को देखता हूँ तो समझ में आता है कि उस समय मेरी माँ ने मुझे बहुत बड़ी सीख दी थी।”
आयांश ने पूछा—
“क्या?”
“उन्होंने मुझे यह सिखाया कि माता-पिता का प्यार बच्चों की हर जिद पूरी कर देना नहीं है।”
उन्होंने बच्चों की ओर देखते हुए कहा—
“माँ मुझसे बहुत प्यार करती थीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि मेरी हर माँग पूरी कर दें। जहाँ उन्हें लगता था कि मेरी जिद मेरे हित में नहीं है, वहाँ वे प्यार से समझाती थीं और जरूरत पड़ने पर मेरी जिद को अनसुना भी कर देती थीं।”
श्रेयम बोला—
“लेकिन नानू, उस समय आपको बुरा तो लगता होगा?”
“बहुत!” नानू हँसे। “उस समय मुझे लगता था कि माँ मेरी बात नहीं मानतीं। लेकिन बड़े होने पर समझ आया कि वह मेरी बात नहीं, मेरे हित को मानती थीं।”
आद्विका ने धीरे से कहा—
“तो माँ का ‘नहीं’ भी कभी-कभी प्यार होता है?”
नानू की आँखों में स्नेह उतर आया।
“बिल्कुल बेटी! माता-पिता का हर ‘हाँ’ प्यार नहीं होता और हर ‘नहीं’ कठोरता नहीं होती। कई बार उनका ‘नहीं’ ही सबसे सच्चा प्यार होता है। वे बच्चों को केवल खुश करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अच्छा, स्वस्थ और जिम्मेदार इंसान बनाने के लिए भी निर्णय लेते हैं।”
फिर नानू ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“इसलिए मेरे प्यारे बच्चों, जब कभी मम्मी-पापा तुम्हारी कोई जिद पूरी न करें, तो तुरंत यह मत समझ लेना कि वे तुमसे प्यार नहीं करते। हो सकता है, उस समय वे तुम्हें वह दे रहे हों जो तुम्हें अच्छा नहीं, बल्कि सही लगे।”
थोड़ी देर रुककर नानू मुस्कुराए—
“और हाँ… अगर कभी रास्ते में गरम-गरम समोसे दिख जाएँ, तो मेरी तरह सड़क पर धरना मत देना!”
बच्चे ठहाका लगाकर हँस पड़े।
नानू भी हँसते हुए बोले—
“क्योंकि उस धरने में जीत हमेशा मेरी माँ की ही होती थी!”
🌱 नानू की पोटली से सीख
माता-पिता का प्यार केवल हमारी इच्छाएँ पूरी करने में नहीं, बल्कि हमें सही रास्ता दिखाने में भी है।
हर जिद पूरी हो जाए, यह जरूरी नहीं।
कभी-कभी प्यार भरा ‘नहीं’ हमारे जीवन का सबसे बड़ा उपहार होता है।
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10.
नानू की पोटली से — “राजा के दो सींग”
नाती-नातिनों के साथ एक पुरानी याद का संवाद
शाम का समय था। मैं अपने नाती-नातिनों के साथ बैठा था। बातें करते-करते अचानक मुझे अपने बचपन की एक कहानी याद आ गई। मैंने बच्चों की ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा—
नानू: “बच्चो, आज मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाऊँगा, जो मुझे मेरी माँ ने सुनाई थी। सोचो, यह बात आज से साठ साल से भी ज्यादा पुरानी है, लेकिन कहानी मुझे आज भी ज्यों की त्यों याद है।”
नाती: “सच नानू! इतनी पुरानी कहानी आपको अभी तक याद है?”
नानू: “हाँ बेटा! कुछ बातें कानों से नहीं, सीधे दिल में उतर जाती हैं। यह भी उन्हीं में से एक है।”
बच्चे मेरे पास और सिमटकर बैठ गए।
नातिन: “तो फिर जल्दी सुनाइए नानू!”
मैंने कहानी शुरू की—
बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में धिनक नाम का एक नाई रहता था। लोग उसे प्यार से नहीं, बल्कि उसकी आदत के कारण ‘धिनक नाई’ कहते थे। उसकी एक बड़ी कमजोरी थी—उसे कोई भी बात पता चल जाए, तो वह उसे अपने तक रख ही नहीं पाता था।
एक दिन धिनक नाई राजा की हजामत और बाल काटने के लिए राजमहल पहुँचा। बाल काटते-काटते अचानक उसकी नजर राजा के सिर पर पड़ी।
वह हक्का-बक्का रह गया।
राजा के सिर पर दो सींग थे!
राजा ने उसकी आँखों में डर देखा और गंभीर आवाज में कहा—
राजा: “धिनक! तुमने जो देखा है, वह किसी को नहीं बताना। अगर तुमने किसी से यह बात कही, तो तुम्हारी गर्दन कटवा दी जाएगी।”
धिनक की हालत खराब हो गई।
नानू: “बच्चो, सोचो, धिनक के लिए यह कितना मुश्किल रहा होगा। एक तरफ राजा का डर और दूसरी तरफ उसकी पुरानी आदत—हर बात दूसरों को बताने की!”
नाती: “फिर उसने किसी को बताया?”
नानू: “सीधे किसी इंसान को बताने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। लेकिन मन में बात इतनी जोर से घूम रही थी कि वह बेचैन रहने लगा।”
आखिर एक दिन वह गाँव से बाहर एक पेड़ के पास गया। इधर-उधर देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा।
फिर पेड़ के तने से मुँह लगाकर धीरे से बोला—
धिनक: “राजा के... दो सींग हैं!”
यह कहकर उसका मन कुछ हल्का हो गया।
वह घर लौट आया।
समय बीतता गया।
एक दिन राजा का जन्मदिन आया। पूरे राज्य में बड़ा उत्सव हुआ। दूर-दूर से प्रसिद्ध गायक और वादक बुलाए गए। महल में भव्य संगीत सभा सजी।
सारंगी बजने लगी—
“राजा के दो सींग ...”
फिर हारमोनियम ने सुर छेड़ा—
“किसने कहा, किसने कहा...”
तबले ने ताल पकड़ी—
“धिनक नाई... धिनक नाई...”
महफिल में अचानक सन्नाटा छा गया।
राजा समझ गया कि उसका रहस्य बाहर आ चुका है।
धिनक नाई को बुलाया गया और उसे कठोर दंड दिया गया।
मैंने कहानी समाप्त की तो बच्चे कुछ देर चुप रहे।
नातिन: “लेकिन नानू, उसने तो किसी आदमी को नहीं बताया था। उसने तो सिर्फ पेड़ से कहा था!”
मैं मुस्कुराया।
नानू: “बिल्कुल! लेकिन यही तो कहानी की सीख है। मनुष्य के मुँह से निकली बात कब, कहाँ और किस रूप में फैल जाए, कोई नहीं जानता।”
नाती: “तो अगर कोई हमें अपनी कोई निजी बात बताए तो?”
मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।
नानू: “तो उसे अपने दिल में रखना चाहिए। अगर वह बात दूसरों तक पहुँचाने के लिए नहीं कही गई है, तो उसे आगे बताना विश्वास तोड़ना है।”
नातिन: “और किसी की चुगली भी नहीं करनी चाहिए?”
नानू: “बिल्कुल नहीं। किसी की अनुपस्थिति में उसके बारे में ऐसी बात करना, जिससे उसकी बदनामी हो, चुगली है। और याद रखो—किसी का विश्वास जीतने में बहुत समय लगता है, लेकिन उसे तोड़ने में केवल एक वाक्य काफी होता है।”
बच्चे चुपचाप मेरी बात सुन रहे थे।
मैंने धीरे से कहा—
“बच्चो, मेरी माँ ने मुझे यह कहानी शायद साठ साल से भी पहले सुनाई थी। उस समय मैं बहुत छोटा था। तब मुझे यह केवल राजा और धिनक नाई की मजेदार कहानी लगी थी। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ समझ आया कि माँ ने उस कहानी में मुझे जीवन का बहुत बड़ा संस्कार दे दिया था—
जो बात तुम्हें विश्वास में बताई जाए, उसे संभालकर रखना।
हर सुनी हुई बात आगे मत पहुँचाना।
और किसी की कमजोरी या निजी बात को कभी मनोरंजन मत बनाना।”
नानू की बात सुनकर नाती ने मुस्कुराते हुए कहा—
नाती: “नानू, अब अगर आप हमें कोई गुप्त बात बताएँगे, तो हम धिनक नाई नहीं बनेंगे!”
मैं हँस पड़ा।
नानू: “बस, मेरी पोटली के अच्छे राजदार बने रहना!” ❤️
🌱 बच्चों के लिए छोटी-सी सीख
“हर सुनी हुई बात कहने के लिए नहीं होती।
विश्वास एक अनमोल चीज है—उसे संभालकर रखना चाहिए।
जो बात किसी ने भरोसे से कही हो, उसे आगे फैलाना नहीं, बल्कि अपने दिल में सुरक्षित रखना चाहिए।”
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11.
इमली का बीज और मेरी साँस
नानू के बचपन का एक ऐसा खेल, जिसे वे आज तक नहीं भूल पाए
“नानू, आपके बचपन में भी बच्चे खेलते थे?”
अद्विका ने एक दिन नानू से अचानक पूछा।
नानू हँस पड़े।
“अरे बेटा! हमारे बचपन के खेल तो तुम्हारे खेलों से बिल्कुल अलग थे। न मोबाइल था, न वीडियो गेम और न इतने तरह के खिलौने। हमारे खिलौने तो कभी कोड़ियाँ होती थीं, कभी पत्थर, कभी कंचे और कभी इमली के बीज!”
“इमली के बीज?” आयांश की आँखें चमक उठीं।
“हाँ! और इन्हीं इमली के बीजों ने एक दिन मुझे ऐसा सबक सिखाया, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया।”
श्रेयम तुरंत नानू के पास खिसक आया।
“क्या हुआ था?”
नानू कुछ क्षण चुप रहे। जैसे बहुत पीछे छूट गया अपना बचपन उनकी आँखों के सामने फिर से उतर आया हो।
“हम बच्चे इमली के बीज से एक खेल खेलते थे। बीज को छिपाना होता था और दूसरे बच्चों को उसे ढूँढ़ना होता था। कोई अपनी जेब में छिपाता, कोई कमीज में, कोई नेकर में। फिर सब एक-दूसरे को ढूँढ़ते।”
“तो इसमें मुश्किल क्या थी?” अद्विका ने पूछा।
नानू मुस्कुराए।
“मुश्किल तब पैदा हुई जब तुम्हारे नानू ने अपनी अक्ल कुछ ज्यादा ही दौड़ा दी!”
तीनों बच्चे हँस पड़े।
नानू ने कहा—
“मुझे लगा कि सब लोग जेब, कमीज और नेकर में तो बीज ढूँढ़ ही लेते हैं। मैंने सोचा, क्यों न इसे ऐसी जगह छिपाया जाए जहाँ कोई सोच भी न सके।”
आयांश ने उत्सुकता से पूछा—
“कहाँ?”
नानू ने धीरे से कहा—
“मैंने इमली का बीज अपनी नाक में दबा लिया।”
“नाक में!” तीनों बच्चे एक साथ चिल्लाए।
नानू भी हँस पड़े।
“हाँ, उस समय मुझे लगा था कि मैंने बहुत चालाकी की है। लेकिन अगले ही पल मेरी सारी चालाकी धरी की धरी रह गई। इमली का बीज नाक के भीतर चला गया और मुझे साँस लेने में बहुत परेशानी होने लगी।”
अब बच्चों के चेहरे पर हँसी नहीं थी।
“फिर?” श्रेयम ने धीरे से पूछा।
“फिर पूरे मोहल्ले में हड़कंप मच गया। एक नौजवान लड़का मुझे गोद में उठाकर पास के सिविल अस्पताल ले गया। उन दिनों वही हमारे लिए सबसे बड़ा और सबसे नजदीकी अस्पताल था।”
नानू की आवाज थोड़ी धीमी हो गई।
“वहाँ डॉक्टर हरि सिंह थे। उन्होंने मुझे देखा और स्थिति समझते ही कहा—‘लगता है, इमली का बीज नाक में छिपाया है!’”
“फिर उन्होंने क्या किया?” अद्विका ने पूछा।
“एक छोटी-सी चिमटी से बहुत सावधानी से वह बीज बाहर निकाला।”
नानू ने गहरी साँस ली।
“और जैसे ही वह बीज बाहर आया... मेरी साँस में साँस आई।”
कमरे में कुछ पल के लिए बिल्कुल शांति छा गई।
नानू ने बच्चों की ओर देखा।
“उस दिन डॉक्टर हरि सिंह ने मुझे डाँटा नहीं। उन्होंने मुझे एक ऐसी बात समझाई जो जिंदगी भर मेरे काम आई।”
“क्या बात?” आयांश ने पूछा।
नानू बोले—
“उन्होंने कहा—
‘खेलो, खूब खेलो। लेकिन ऐसा खेल मत खेलो जिससे तुम्हारे जीवन को नुकसान पहुँच सकता हो।’”
नानू ने आगे कहा—
“उन्होंने समझाया कि अगर तैरना नहीं आता तो गहरे पानी में छलाँग नहीं लगानी चाहिए। आग से खेलना नहीं चाहिए। सड़क पर लापरवाही से नहीं खेलना चाहिए। और शरीर के किसी हिस्से में ऐसी चीज नहीं छिपानी चाहिए, जो अंदर जाकर नुकसान कर सके।”
अद्विका ने नानू का हाथ पकड़ लिया।
“नानू, आपको उस दिन डर लगा था?”
नानू कुछ क्षण चुप रहे।
“बहुत।”
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“लेकिन उस डर ने मुझे जिंदगी भर के लिए समझदार बना दिया।”
“कैसे?” श्रेयम ने पूछा।
“मैंने उस दिन मन में एक गाँठ बाँध ली—खतरा मोल लेना बहादुरी नहीं है, अगर वह खतरा हमारी जान पर बन आए।”
आयांश ने कहा—
“तो क्या खेल में बिल्कुल भी रिस्क नहीं लेना चाहिए?”
नानू मुस्कुराए।
“थोड़ा रोमांच और चुनौती तो खेल का हिस्सा है बेटा। लेकिन समझदार इंसान वही है जो जोखिम और बेवकूफी के बीच का फर्क समझे।”
उन्होंने तीनों बच्चों को अपने पास बुलाया और प्यार से कहा—
“तुम खूब खेलो, दौड़ो, कूदो, हारो, जीतो और जिंदगी का आनंद लो। लेकिन अपनी सुरक्षा को कभी खेल मत समझना।”
अद्विका ने मुस्कुराकर कहा—
“नानू, अब हम इमली का बीज नाक में छिपाकर तो बिल्कुल नहीं खेलेंगे!”
नानू जोर से हँस पड़े।
“बस! मेरी कहानी सुनाने का मकसद पूरा हो गया।”
और उस शाम नानू की पोटली से निकली एक छोटी-सी इमली की गुठली तीनों बच्चों के मन में जिंदगी भर के लिए एक बड़ी सीख छोड़ गई।
🌱 नानू की पोटली से सीख
खेलना जीवन की खुशी है,
लेकिन सुरक्षा जीवन की जिम्मेदारी।
हिम्मत रखो, नए काम सीखो, चुनौतियाँ स्वीकार करो—
लेकिन ऐसा जोखिम कभी मत लो जिसकी कीमत तुम्हारी जान या स्वास्थ्य हो।
याद रखो—
“सच्ची बहादुरी खतरे में कूदना नहीं,
समझदारी से खतरे को पहचानना है।”
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12.🌼 नानू, आप तो आर्य समाजी हैं! 🌼
कृष्ण से मेरा बचपन का रिश्ता
जन्माष्टमी का दिन था। घर में चारों ओर उत्सव का वातावरण था। कहीं कृष्ण के जन्म की बातें हो रही थीं, कहीं झूले सजाए जा रहे थे और कहीं मधुर भजन सुनाई दे रहे थे।
मेरे नाती-नातिन मेरे पास आकर बैठ गए। सब के मन में जैसे कोई सवाल कुलबुला रहा था।
आखिर नाती ने पूछ ही लिया—
“नानू, एक बात पूछें?”
“हाँ-हाँ, पूछो।”
“आज जन्माष्टमी है। लेकिन आप तो आर्य समाजी हैं न? फिर क्या आप भी जन्माष्टमी मनाते हैं?”
मैं उनकी ओर देखकर मुस्कुराया।
“बिल्कुल मनाता हूँ!”
दोनों की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
“सच में?”
मैंने दोनों को अपने पास खींच लिया।
“हाँ बेटा। मैं आर्य समाजी हूँ, लेकिन कृष्ण मेरे बहुत प्रिय हैं।”
“क्यों?” नातिन ने तुरंत पूछा।
मैंने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
“मेरे लिए कृष्ण केवल किसी एक धर्म के भगवान नहीं हैं। वे एक योगीराज थे, एक आप्त पुरुष थे—ऐसे महान पुरुष जिन्होंने सत्य, धर्म और कर्तव्य का मार्ग दिखाया। उन्होंने गीता के माध्यम से मनुष्य को कर्म करने, कठिन परिस्थितियों में भी अपना कर्तव्य निभाने और सत्य के साथ खड़े रहने की प्रेरणा दी।”
नाती कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला—
“लेकिन नानू, जब आप छोटे थे, तब भी कृष्ण आपको अच्छे लगते थे?”
मैं हँस पड़ा।
“अरे! तब तो कहानी ही कुछ और थी।”
दोनों मेरे और पास आ गए।
मैंने कहा—
“जब मैं मुश्किल से चार-पाँच साल का था, तब हमारे घर में भी जन्माष्टमी मनाई जाती थी। हमारे घर में एक छोटा-सा झूला लगा रहता था। मैं उसे बड़े मन से सजाता। उसमें कृष्ण जी का चित्र रखता और फिर बड़े प्यार से झूला झुलाता।”
“और जानते हो?”
“क्या नानू?”
“हमारे पड़ोस के लोग भी आ जाते थे। कोई झूला झुलाता, कोई कृष्ण के दर्शन करता और कोई बस हमारे साथ उस खुशी में शामिल हो जाता। छोटा-सा घर था, लेकिन उन दिनों लगता था जैसे पूरा मोहल्ला हमारा परिवार बन गया हो।”
नातिन मुस्कुराई।
“तो नानू, आप भी कृष्ण को झूला झुलाते थे?”
“हाँ, बिल्कुल!”
फिर मैंने कहा—
“बच्चों, मेरे लिए त्योहारों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है। त्योहार हमें अलग-अलग पहचान के नाम पर बाँटते नहीं, बल्कि प्रेम से एक-दूसरे के पास लाते हैं। ये हमारी संस्कृति, हमारी खुशियों और हमारे मिल-जुलकर रहने की परंपरा के प्रतीक हैं।”
नाती ने फिर पूछा—
“और अब भी आपको कृष्ण इतने पसंद हैं?”
मैंने हँसकर कहा—
“अब तो और भी ज्यादा!”
“जहाँ-जहाँ मैं जाता हूँ, अगर मुझे कृष्ण का कोई सुंदर चित्र, मूर्ति या उनकी कोई स्मृति दिखाई देती है, तो मैं उसे अपने साथ ले आता हूँ।”
“कितनी सारी चीजें हैं आपके पास?”
“तुम जब पानीपत आओगे, तब मैं तुम्हें अपना कृष्ण-संग्रह दिखाऊँगा।”
“मेरे पास मथुरा, वृंदावन, द्वारिका, हरिद्वार, बद्रीनाथ और कृष्ण से जुड़े अनेक स्थानों से लाई हुई तस्वीरें और स्मृतियाँ हैं।”
फिर अचानक मुझे अपनी एक यात्रा याद आ गई।
“एक बार मैं कराची गया था। वहाँ एक दुकान में मुझे कृष्ण की एक छोटी-सी मूर्ति दिखाई दी। पता नहीं क्यों, उसे देखते ही मन में आया—इसे तो अपने साथ ले जाना चाहिए।”
“फिर आपने खरीद ली?”
“हाँ!”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
मैंने कहा—
“देखो, कृष्ण से मेरा रिश्ता शायद इसी तरह का है। बचपन में मैंने उन्हें एक छोटे-से झूले में बैठाकर झुलाया था और आज भी जहाँ कहीं उनकी कोई सुंदर छवि मिलती है, मैं उसे अपने पास सहेज लेता हूँ।”
नातिन ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“नानू, कृष्ण आपके सबसे प्यारे हैं?”
मैंने बिना कुछ सोचे कहा—
“हाँ, मेरे बच्चों। कृष्ण मेरे सबसे प्रिय हैं।”
कुछ क्षण के लिए हम तीनों चुप हो गए।
फिर मैंने दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा—
“लेकिन याद रखना, कृष्ण को प्यार करने का मतलब केवल उनकी तस्वीर रखना या जन्माष्टमी पर झूला झुलाना नहीं है।”
“फिर क्या है नानू?”
“उनसे कुछ सीखना भी है।”
“क्या?”
“सत्य के लिए खड़े होना। अपना कर्तव्य निभाना। मुश्किल समय में घबराना नहीं। लोगों को आपस में जोड़ना। और सबसे बढ़कर—अपने जीवन में प्रेम और इंसानियत को जगह देना।”
नाती ने मुस्कुराकर कहा—
“तो इस जन्माष्टमी पर हम भी कृष्ण से कुछ सीखेंगे।”
“हाँ।”
“क्या सीखेंगे?”
मैंने दोनों को अपनी बाँहों में भर लिया।
“यही कि हम जहाँ जाएँ, वहाँ थोड़ा-सा प्रेम छोड़कर आएँ और किसी को दुखी करके न लौटें।”
दोनों ने सिर हिलाया।
और मुझे लगा जैसे मेरे बचपन का वह छोटा-सा झूला फिर से आँखों के सामने झूल रहा हो।
उस झूले में कृष्ण का चित्र था।
पास में मैं था—चार-पाँच साल का एक छोटा-सा बच्चा।
और आज उसी झूले की स्मृति मेरे नाती-नातिनों के साथ मेरे जीवन में फिर लौट आई थी।
शायद यही तो संस्कारों की असली यात्रा है—
जो बचपन में हमें मिला, वह प्रेम बनकर अगली पीढ़ी तक पहुँच जाए।
🌿 नानू की पोटली से बच्चों के लिए संदेश
त्योहार किसी को बाँटने के लिए नहीं, सबको जोड़ने के लिए होते हैं।
महापुरुषों को केवल याद मत करो—उनके अच्छे विचारों को अपने जीवन में उतारो।
सत्य, प्रेम, सेवा, साहस और इंसानियत—यही जीवन की सबसे सुंदर पूजा है।
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13.🌿 नानू, क्या आप दूसरे धर्मों से नफरत करते हैं?
धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं
आज न जाने मेरे नाती-नातिनों के मन में क्या आया था। सुबह से ही सवाल पर सवाल किए जा रहे थे। जन्माष्टमी की बात चल ही रही थी कि अचानक नाती ने मेरी तरफ देखा और बोला—
“नानू, आप हिंदू हो न?”
मैंने कहा—
“हाँ भई, हूँ तो।”
वह फिर बोला—
“तो आप मुसलमानों से नफरत करते हो?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“अरे! यह क्या सवाल हुआ?”
वह बोला—
“तो ईसाइयों से करते हो?”
नातिन भी बीच में बोल पड़ी—
“और सिखों से?”
मैं हँस पड़ा।
“तुम लोगों ने तो आज नानू की परीक्षा लेने की ठान ली है!”
दोनों हँसने लगे।
मैंने कहा—
“नहीं बेटा, मैं किसी से नफरत नहीं करता।”
नाती ने तुरंत पूछा—
“लेकिन क्यों? आप तो हिंदू हो।”
मैंने कहा—
“हाँ, मैं हिंदू हूँ। आर्य समाजी हूँ। लेकिन इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मैं दूसरे धर्मों से नफरत करूँ।”
फिर मैंने दोनों को अपने पास बैठाया और कहा—
“एक बात याद रखना—धर्म का काम जोड़ना है, तोड़ना नहीं। जो हमें दूसरे इंसान से नफरत करना सिखाए, उसमें धर्म की भावना कहाँ रह गई?”
नातिन कुछ सोचने लगी। फिर बोली—
“लेकिन नानू, आपको यह बात कैसे पता चली?”
मैंने कहा—
“मुझे यह बात किताबों से कम और अपने बचपन से ज्यादा पता चली है।”
दोनों मेरी तरफ देखने लगे।
मैंने कहना शुरू किया—
“हमारे घर के पीछे एक मुस्लिम परिवार रहता था। वहाँ एक बुजुर्ग थे—अल्लाह बख्श। उनकी पत्नी को हम प्यार से अम्मा कहते थे।”
नाती ने पूछा—
“वो आपकी रिश्तेदार थीं?”
“नहीं बेटा, रिश्तेदार तो नहीं थीं।”
“फिर अम्मा क्यों कहते थे?”
मैं मुस्कुराया।
“क्योंकि वह हमें अपने बच्चों की तरह प्यार करती थीं।”
“तुम्हारी परनानी”—मैंने कहा—“यानी मेरी माँ, सामाजिक कामों में बहुत लगी रहती थीं। किसी की मदद करनी है, किसी के घर जाना है, किसी बीमार की खबर लेनी है—वह निकल पड़ती थीं।”
“ऐसे में हम बच्चों को कौन संभालता था?”
नातिन ने तुरंत कहा—
“अम्मा!”
“हाँ!”
मैं हँस पड़ा।
“अम्मा हमें खाना खिलाती थीं, हमारी देखभाल करती थीं। सच कहूँ, हमारे लिए तो वह अम्मा ही थीं। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि वह मुसलमान हैं और हम हिंदू हैं।”
नाती कुछ देर चुप रहा। फिर बोला—
“तो बचपन में आपको यह पता ही नहीं था कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान?”
“पता तो था बेटा, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।”
मैंने उसकी पीठ थपथपाई।
“और हमारे घर के पास एक गुरुद्वारा भी था।”
नातिन बोली—
“आप गुरुद्वारे भी जाते थे?”
“हाँ, खूब जाते थे।”
“सुबह-सुबह वहाँ से गुरबाणी की आवाज आती थी। बहुत अच्छी लगती थी। हम तैयार होते और गुरुद्वारे चले जाते। वहाँ मत्था टेकते और फिर वापस घर आ जाते।”
नाती ने पूछा—
“और मंदिर?”
“अरे, वह भी था! हमारे घर के पास ही देवी मंदिर था। वहाँ भी जाते थे, दर्शन करते थे।”
“और हज़रत बू अली शाह कलंदर की दरगाह भी बहुत दूर नहीं थी।”
नातिन ने आँखें बड़ी करके पूछा—
“वहाँ भी जाते थे?”
“हाँ बेटा, वहाँ भी जाते थे।”
“तो आपका बचपन बड़ा मजेदार था!”
मैं हँसा।
“मजेदार ही नहीं, बहुत सुंदर था।”
फिर मैंने कहा—
“हम तो जैसे मंदिर, गुरुद्वारे और दरगाह—तीनों के बीच पले-बढ़े थे। किसी ने हमें नहीं सिखाया कि यह जगह तुम्हारी है और वह जगह किसी दूसरे की।”
नाती ने पूछा—
“फिर दादाजी पानीपत छोड़ने से क्यों मना करते थे?”
मैं कुछ पल के लिए रुक गया।
“अच्छा, यह बात भी तुम्हें बतानी पड़ेगी।”
“मुझे कई बार पानीपत से बाहर जाकर रहने का मौका मिला था। तब मेरे पिता कहा करते थे—”
मैंने पिता की आवाज की नकल करते हुए कहा—
“बेटा, पानीपत मत छोड़ना।”
नाती हँस पड़ा—
“क्यों?”
मैंने कहा—
“वह कहते थे—”
“तुम तो कलंदर साहब के आगोश में हो।”
नातिन ने तुरंत पूछा—
“आगोश मतलब?”
“गोद... अपनी बाँहों में लेने जैसा।”
“उनका मतलब था कि तुम ऐसी जगह पले हो जहाँ चारों ओर अपनापन है। यह माहौल छोड़कर मत जाना।”
कुछ क्षण के लिए मैं चुप हो गया।
मुझे अपना बचपन याद आ रहा था।
फिर मैंने धीरे से कहा—
“शायद उस समय मैं इन बातों को उतना समझता नहीं था। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे माता-पिता और मेरा शहर मुझे बहुत बड़ी सीख दे रहे थे।”
नाती ने पूछा—
“क्या सीख?”
मैंने कहा—
“यही कि धर्म अलग हो सकता है, लेकिन इंसान अलग नहीं होता।”
“पूजा का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन दुख और खुशी सबके एक जैसे होते हैं।”
“नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन आँसू सबके खारे होते हैं और मुस्कान सबकी प्यारी।”
नातिन चुपचाप मेरा हाथ पकड़कर बैठी थी।
मैंने कहा—
“इसीलिए मैं कहता हूँ—हमारा धर्म एक है और वह है मानवता का धर्म।”
“हमारा समाज एक है—भाईचारे का समाज।”
“और हमारी बिरादरी?”
नाती मुस्कुराया।
“इंसानियत की बिरादरी!”
मैंने कहा—
“बस! यही बात समझनी है।”
फिर नातिन ने धीरे से पूछा—
“नानू, लेकिन आजकल तो लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं। आपको डर नहीं लगता?”
मैं कुछ पल चुप रहा।
“सच कहूँ? कई बार घबरा जाता हूँ।”
दोनों मेरी तरफ देखने लगे।
“जब नफरत की बातें सुनता हूँ, हिंसा देखता हूँ, लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा होते देखता हूँ, तो मन दुखी होता है।”
“लेकिन फिर मुझे अपना बचपन याद आता है।”
“अल्लाह बख्श और अम्मा याद आते हैं।”
“गुरुद्वारे से आती गुरबाणी याद आती है।”
“देवी मंदिर की घंटियाँ याद आती हैं।”
“और कलंदर साहब की दरगाह याद आती है।”
मैंने दोनों बच्चों को अपने पास खींच लिया।
“तब मुझे लगता है—नहीं, यह भारत की असली तस्वीर नहीं हो सकती। हमारी असली ताकत तो साथ रहने में है।”
नाती ने पूछा—
“तो जो लोग नफरत करते हैं, क्या वे धार्मिक नहीं हैं?”
मैंने बहुत धीरे से कहा—
“धर्म का नाम लेना और धार्मिक होना—दो अलग बातें हैं बेटा।”
“जो इंसान मंदिर में पूजा करता है लेकिन बाहर निकलकर दूसरे इंसान से नफरत करता है, उसे अपने भीतर झाँकना चाहिए।”
“जो मस्जिद में जाता है, गुरुद्वारे जाता है, चर्च जाता है या कहीं भी प्रार्थना करता है—लेकिन किसी दूसरे इंसान को छोटा समझता है, वह धर्म की आत्मा को अभी समझ नहीं पाया।”
फिर मैंने दोनों से कहा—
“तुम्हें बड़ा होकर बहुत कुछ बनना है। लेकिन उससे पहले एक चीज जरूर बनना—एक अच्छा इंसान।”
नातिन ने पूछा—
“बस इतना?”
मैं हँस पड़ा।
“बस इतना नहीं, सबसे मुश्किल काम यही है!”
नाती बोला—
“और हम किसी से नफरत नहीं करेंगे।”
मैंने कहा—
“हाँ। धर्म देखकर नहीं, जाति देखकर नहीं, प्रदेश देखकर नहीं, रंग देखकर नहीं।”
“हाँ, अगर कोई गलत काम करे तो उसके गलत काम का विरोध जरूर करना। अन्याय के सामने चुप मत रहना। लेकिन किसी की पहचान देखकर उससे नफरत मत करना।”
दोनों ने सिर हिलाया।
नातिन मेरी गोद में आकर बैठ गई।
“नानू, क्या हम सब एक हैं?”
मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“हाँ बेटा। सबसे पहले हम सब इंसान हैं। बाकी पहचानें बाद में आती हैं।”
और मुझे लगा, आज नानू की पोटली में बचपन की एक और गाँठ खुल गई है।
उसमें अम्मा का प्यार था।
अल्लाह बख्श की याद थी।
गुरुद्वारे की गुरबाणी थी।
देवी मंदिर की घंटियाँ थीं।
कलंदर साहब की दरगाह थी।
और इन सबके बीच मेरा बचपन था—एक ऐसा बचपन जिसने मुझे बिना किसी बड़े उपदेश के सिखा दिया था कि—
इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं,
प्रेम से बड़ी कोई पूजा नहीं,
और भाईचारे से सुंदर कोई समाज नहीं।
🌼 नानू की पोटली से
बच्चों, धर्म को अपने दिल में रखो, दीवार मत बनाओ।
किसी की जाति, धर्म, रंग या जगह देखकर उसके बारे में फैसला मत करो।
गलत बात का विरोध करो, लेकिन इंसान से नफरत मत करो।
और जीवन में सबसे पहले—एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश करो।
क्योंकि अंत में हमारी सबसे बड़ी पहचान यही है—हम इंसान हैं।
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14.✈️ नानू, क्या आपने भी सपना देखा था?
एक छोटे बच्चे का बड़ा सपना
एक दिन मैं अपने नाती-नातिनों के साथ बैठा था। उन्हें देखते-देखते मुझे अपना बचपन याद आ गया।
मैंने कहा—
“बच्चों, तुम्हें पता है, जब मैं तुम्हारी उम्र से भी बहुत छोटा था, कोई चार-पाँच साल का, तब मुझे हवाई जहाज बहुत अच्छा लगता था।”
नाती ने तुरंत पूछा—
“नानू, तब आप हवाई जहाज में बैठते थे?”
मैं हँस पड़ा।
“अरे नहीं! तब तो मैं उसे दूर से देखता था।”
“कहाँ?”
“आसमान में!”
मैंने कहा—
“जब हमारे शहर पानीपत के ऊपर से कोई हवाई जहाज उड़ता था, तो उसकी आवाज बहुत दूर तक सुनाई देती थी।”
“जैसे ही हमें जहाज की आवाज सुनाई देती, मैं और मोहल्ले के दूसरे बच्चे बाहर निकल आते।”
नातिन ने पूछा—
“फिर क्या करते थे?”
मैंने हँसकर कहा—
“आसमान की ओर देखते और जहाज ढूँढ़ते।”
“जैसे ही जहाज दिखाई देता, हम उसके पीछे-पीछे सड़क पर दौड़ने लगते।”
नाती हँसने लगा।
“लेकिन नानू, आप जहाज के पीछे कैसे दौड़ सकते थे? वह तो बहुत ऊपर उड़ रहा होता था!”
“हमें भी पता था कि वह ऊपर उड़ रहा है।”
“लेकिन बच्चों को कौन समझाए!”
“हमें लगता था कि शायद हम दौड़ते रहें तो जहाज भी हमें दिखाई देता रहेगा।”
नातिन बोली—
“फिर वह कहाँ जाता था?”
“धीरे-धीरे बहुत दूर चला जाता था। पहले बड़ा दिखाई देता, फिर छोटा होता जाता... और आखिर में आँखों से गायब हो जाता।”
“और हम वहीं खड़े होकर उसे देखते रहते।”
मैं कुछ देर चुप हुआ और फिर बोला—
“उस समय मेरे मन में एक बात आती थी।”
“क्या?”
“मैं सोचता था—क्या मैं कभी हवाई जहाज में बैठ पाऊँगा?”
नाती ने पूछा—
“आपको लगता था कि आप बैठेंगे?”
मैं मुस्कुराया।
“पता नहीं। हमारे घर की हालत ऐसी नहीं थी कि मैं सोच पाता कि कभी जहाज में बैठूँगा।”
“लेकिन मन तो मन है न! वह सपना देखता रहता था।”
नातिन ने उत्सुक होकर पूछा—
“फिर नानू, आप सच में जहाज में बैठे?”
मैंने कहा—
“हाँ, बैठे!”
दोनों खुशी से बोल पड़े—
“कब?”
“सन् 1980 में।”
“मुझे सोवियत संघ जाने का मौका मिला। जब मैं पहली बार हवाई जहाज में बैठा, तो मुझे अपना बचपन याद आ गया।”
“मुझे लगा जैसे पानीपत की सड़क पर दौड़ता हुआ वह छोटा-सा बच्चा आज खुद जहाज में बैठ गया है।”
नातिन ने पूछा—
“नानू, तब आपको बहुत खुशी हुई होगी?”
“बहुत!”
“लेकिन बच्चों, मेरी खुशी सिर्फ जहाज में बैठने की नहीं थी।”
“फिर किस बात की थी?”
“इस बात की कि मेरा एक छोटा-सा सपना सच हो गया था।”
फिर मैंने दोनों को पास बुलाकर कहा—
“इसलिए मेरी एक बात हमेशा याद रखना—सपना देखना कभी गलत नहीं होता।”
नाती बोला—
“लेकिन नानू, हर सपना तो पूरा नहीं होता!”
“सही बात है।”
“हर सपना अपने आप पूरा नहीं होता। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है।”
“समय देना पड़ता है।”
“कई बार इंतजार करना पड़ता है।”
“और कभी-कभी बहुत मुश्किलें भी आती हैं।”
नातिन ने पूछा—
“तो क्या करना चाहिए?”
मैंने कहा—
“कोशिश करते रहना चाहिए।”
“और अपने काम में अनुशासन रखना चाहिए। यानी जो करना है, उसे समय पर और मन लगाकर करना चाहिए।”
नाती ने पूछा—
“आपका सपना सिर्फ जहाज में बैठना था?”
“नहीं बेटा।”
“मेरा एक और बड़ा सपना था—दूर-दूर के देशों में जाना। वहाँ के लोगों को देखना, उनसे मिलना, उनकी जिंदगी समझना और दुनिया के बारे में जानना।”
“धीरे-धीरे वह सपना भी पूरा हुआ।”
दोनों मेरी तरफ बड़े ध्यान से देख रहे थे।
मैंने कहा—
“इसलिए तुम भी सपने देखो।”
“छोटे सपने भी और बड़े सपने भी।”
“लेकिन सपने के साथ मेहनत जरूर जोड़ना।”
नातिन ने पूछा—
“और अगर सपना बहुत मुश्किल हो?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“तो मेहनत थोड़ी और बढ़ा देना।”
दोनों हँस पड़े।
मैंने कहा—
“और अगर पहली बार में सफलता न मिले, तो उदास मत होना। फिर कोशिश करना।”
“क्योंकि पता नहीं, आज तुम्हारी आँखों में जो छोटा-सा सपना है, वही कल तुम्हारी जिंदगी की सबसे प्यारी कहानी बन जाए।”
मैंने बच्चों को अपने पास खींच लिया।
“याद रखना—”
“सपना देखो, मेहनत करो और आगे बढ़ते रहो।”
फिर मैंने आसमान की ओर देखा।
मुझे अपना बचपन फिर दिखाई देने लगा।
पानीपत की सड़क...
चार-पाँच साल का एक छोटा-सा बच्चा...
और आसमान में उड़ता हुआ एक हवाई जहाज।
उस समय मैं जहाज के पीछे दौड़ रहा था।
आज सोचता हूँ—
जहाज तो बहुत दूर चला गया था,
लेकिन वह मेरे मन में एक सपना छोड़ गया था।
और वही सपना एक दिन मुझे सचमुच आसमान तक ले गया।
🌱 नानू की पोटली से
बच्चों, सपने देखना मत छोड़ना।
मेहनत करना मत छोड़ना।
मुश्किल आए तो हिम्मत मत हारना।
क्योंकि आज का छोटा सपना ही कल की बड़ी खुशी बन सकता है।
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15.जय जवान, जय किसान — नानू के बचपन की आवाज़
आयांश: नानू, आप लोग रोज़ “जय जवान, जय किसान” का नारा क्यों लगाते थे?
नानू: बेटा, यह नारा हमारे बचपन के मन में बहुत गहराई से बस गया था।
वह समय आज से बहुत अलग था। हमारा देश नया-नया आज़ाद हुआ था। देश को अपने पैरों पर खड़ा करना था। हमारे जवान देश की सीमाओं की रक्षा करते थे और हमारे किसान खेतों में दिन-रात मेहनत करके देश के लिए अन्न पैदा करते थे।
आदिवका: तो शास्त्री जी ने जवान और किसान—दोनों को एक साथ क्यों याद किया?
नानू: क्योंकि शास्त्री जी जानते थे कि देश की ताकत केवल सीमा पर खड़े जवान से नहीं, बल्कि खेत में मेहनत करने वाले किसान से भी बनती है।
जब देश पर कठिन समय आया, तब शास्त्री जी ने देशवासियों से साहस और अनुशासन के साथ खड़े होने का आह्वान किया। उनका संदेश था—
“जय जवान, जय किसान!”
यह छोटा-सा नारा हम बच्चों को बहुत बड़ा लगता था।
हम गली में निकलते और अपनी छोटी-सी टोली बनाकर जोर से बोलते—
“भारत माता की जय!”
फिर कोई बच्चा तिरंगा ऊपर उठाकर कहता—
“जय जवान!”
दूसरा बच्चा तुरंत जवाब देता—
“जय किसान!”
और फिर सब बच्चे एक साथ चिल्लाते—
“महात्मा गांधी की जय!”
“ऋषि दयानन्द की जय!”
हमारे चेहरे खुशी से चमक उठते।
श्रेयं: नानू, उस समय आपको देश के बारे में इतनी बातें कौन बताता था?
नानू: बेटा, घर का वातावरण ही ऐसा था। बड़ों की बातें सुनते-सुनते, स्कूल में पढ़ते-पढ़ते और देशभक्ति के गीतों तथा नारों से हमारे मन में देश के लिए प्यार पैदा होता गया।
हमें लगता था कि हम छोटे हैं तो क्या हुआ—हम भी अपने देश के लिए कुछ कर सकते हैं।
हमारे पास खिलौनों की जगह कभी तिरंगा होता, कभी कोई छोटी-सी माला और कभी हाथ से बनाया हुआ कागज का झंडा।
और मैं धोती-कुर्ता पहनकर आगे-आगे चलता और मन ही मन सोचता—
“एक दिन मैं भी देश के लिए कुछ बड़ा काम करूँगा।”
आदिवका: नानू, आपका वह सपना पूरा हुआ?
नानू: बेटा, सपने कभी एक दिन में पूरे नहीं होते। वे धीरे-धीरे हमारे जीवन की राह बनाते हैं।
मेरे बचपन के वे छोटे-छोटे खेल, शास्त्री जी के प्रति मेरा सम्मान और देश के लिए कुछ करने की इच्छा—इन सबने मेरे मन पर गहरा असर डाला।
आज भी जब मैं “जय जवान, जय किसान” सुनता हूँ, तो मुझे अपना वह छोटा-सा बचपन याद आ जाता है—धोती-कुर्ता पहने एक नन्हा-सा बच्चा, गले में सुनहरी माला और चारों ओर तिरंगा लिए बच्चों की टोली!
आयांश: नानू, तब तो आप सचमुच बहुत बड़े नेता लगते होंगे!
नानू: (हँसते हुए) हाँ, हमें तो लगता ही था कि हम बहुत बड़े नेता हैं। लेकिन असली नेता बनने के लिए केवल हाथ जोड़कर चलना काफी नहीं होता। उसके लिए ईमानदारी, मेहनत, सादगी और दूसरों के लिए कुछ करने का जज़्बा चाहिए।
🌱 नानू की पोटली से सीख
बच्चों, देश केवल नेताओं से नहीं बनता।
देश जवानों की बहादुरी, किसानों की मेहनत, बच्चों के सपनों और हर नागरिक के अच्छे कामों से बनता है।
इसलिए हमेशा याद रखना—
“अच्छे सपने देखो, मेहनत करो और अपने देश के लिए कुछ अच्छा करने की कोशिश करो।”
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16.“गिरि, गिरि से ऊँचा तेरा मस्तक!”
आदिवका: नानू, आपने स्कूल में पढ़ते हुए ऐसा क्या किया था, जिसे आप आज भी याद करते हैं?
नानू: बेटा, मेरी जिंदगी में आठवीं कक्षा का समय बहुत खास था। उस समय मेरी उम्र केवल तेरह साल थी। मैं जैन हाई स्कूल से बदलकर आर्य सीनियर सेकेंडरी स्कूल, पानीपत में आठवीं कक्षा में पढ़ने लगा था।
आयांश: नानू, आपने स्कूल क्यों बदला?
नानू: इसके पीछे भी एक प्यारी-सी कहानी है। तुम्हारे परनानू ने वर्ष 1928 से 1948 तक जैन हाई स्कूल में पढ़ाया था। उन्हीं के कारण मेरा दाखिला बचपन में उस स्कूल में हुआ था।
हमारा परिवार आर्य समाजी था। उसी समय श्री नित्यानंद जी सिरसा से पानीपत आकर आर्य स्कूल के प्रधानाचार्य बने। वे मेरी माताजी को बहन कहते थे और हम उन्हें प्यार से मामा जी कहते थे।
उनकी प्रेरणा से मेरा दाखिला आर्य स्कूल में हुआ।
और बच्चों, यह वही स्कूल था जिसका 1947 से पहले नाम हाली मुस्लिम हाई स्कूल था।
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आर्य स्कूल में खुलने लगे मेरे पंख
आर्य स्कूल में आकर जैसे मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक नया आकाश मिल गया।
स्कूल में रोज संध्या-हवन होता था। मुझे बचपन से ही हवन के वेद-मंत्र याद थे। हमारे धर्म शिक्षक श्री मथुरा प्रसाद शास्त्री जी ऐसे बच्चों को बहुत प्रोत्साहित करते थे, जिन्हें वेद-मंत्र याद होते थे।
और मैं तो इस मामले में आगे रहता था!
धीरे-धीरे पढ़ाई में भी मेरा मन लगने लगा। मेहनत की और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में मैंने राज्य स्तर की मेरिट सूची में स्थान प्राप्त किया।
श्रेयं: वाह नानू! तो आप पढ़ाई में भी अच्छे थे और दूसरे कामों में भी आगे रहते थे?
नानू: हाँ बेटा। मेरे अनुभव ने मुझे एक बात सिखाई—
जो बच्चे पढ़ाई के साथ खेल, भाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दूसरी अच्छी गतिविधियों में भाग लेते हैं, वे अक्सर पढ़ाई में भी बहुत अच्छा करते हैं।
क्योंकि ऐसी गतिविधियों से आत्मविश्वास बढ़ता है और मन खुलता है।
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पहली भाषण प्रतियोगिता और पहली जीत
सन् 1971 में स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद जी दंडी स्वामी की निर्वाण शताब्दी मनाई जा रही थी।
इस अवसर पर हमारे स्कूल में राज्यस्तरीय भाषण प्रतियोगिता रखी गई।
मुझे भाषण सुनना और बोलना बहुत पसंद था, लेकिन मैंने पहले कभी किसी भाषण प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया था।
एक दिन मथुरा प्रसाद शास्त्री जी ने कहा—
“राम मोहन, तुम इस प्रतियोगिता में जरूर भाग लो।”
मैं थोड़ा घबरा गया।
आदिवका: नानू, आपको डर लग रहा था?
नानू: बहुत!
लेकिन शास्त्री जी ने मेरी हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने भाषण लिखा और मुझे समझाया—
“तुम्हें बस अच्छी तरह याद करना है और मंच पर पूरे विश्वास से बोलना है।”
मैंने भाषण रटना शुरू किया।
भाषण की शुरुआत संस्कृत के शब्दों से होती थी। आज इतने वर्षों बाद भी वह शुरुआत मुझे बिल्कुल याद है—
“संस्तपते सभायश्च, अदयं तत्र भवतां समक्षे महर्षि दयानंदस्य गुरुः दंडी विरजानंदस्य स्वरूपमाख्यातुमुत्सहे। आशासे च श्रीमन्तां सावधानमनसामाकर्षिष्यति।”
इसके बाद मेरा भाषण शुरू होता।
कुल 26 प्रतियोगियों ने भाषण दिए। सभी बहुत अच्छे वक्ता थे।
मैं तो पहली बार प्रतियोगिता में उतरा था।
मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।
लेकिन मैंने अपने गुरु की बात याद रखी और पूरे साहस से बोलता गया।
और फिर परिणाम आया...
मैं प्रथम आया था!
आयांश: सचमुच नानू?
नानू: हाँ बेटा! वह मेरी पहली भाषण प्रतियोगिता थी और पहली ही बार मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया।
उस दिन मेरे अंदर एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ।
फिर मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
किसी भी भाषण प्रतियोगिता में जाता तो पूरी मेहनत करता और अक्सर शीर्ष स्थान प्राप्त करता।
बाद में मथुरा प्रसाद शास्त्री जी के जाने के बाद श्री चंद्र प्रकाश सत्यार्थी जी और श्री दीप चंद निर्मोही जी मेरी भाषण की तैयारी करवाते रहे।
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तेरह साल का “बाल सभा अध्यक्ष”
स्कूल में हर शनिवार को बाल सभा, यानी आर्य कुमार सभा, भी होती थी।
मैं उसमें कभी मंत्री तो कभी प्रधान की भूमिका निभाता रहा।
पढ़ना, लिखना, भाषण देना और बच्चों के कार्यक्रम करवाना—इन सबका मुझे बहुत शौक हो गया था।
इसी दौरान देश में भी बहुत महत्वपूर्ण घटनाएँ हो रही थीं।
उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसे बड़े फैसले लिए।
कांग्रेस में भी उस समय दो गुट बन गए थे। राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। एक ओर एन. संजीव रेड्डी थे और दूसरी ओर वी. वी. गिरि।
जब वी. वी. गिरि राष्ट्रपति चुने गए, तो मुझे बहुत खुशी हुई।
मैंने उन्हें बधाई पत्र भेजा।
और बच्चों, सोचो क्या हुआ?
कुछ समय बाद मुझे राष्ट्रपति जी की ओर से हस्ताक्षर किया हुआ जवाबी पत्र मिला!
श्रेयं: नानू! राष्ट्रपति जी ने आपको पत्र भेजा?
नानू: हाँ बेटा!
उस पत्र ने मेरे बाल मन में जैसे नया उत्साह भर दिया।
मैंने सोचा—
“क्यों न हम राष्ट्रपति जी से मिलकर उन्हें बधाई दें?”
मैंने भारतीय बाल सभा की ओर से राष्ट्रपति भवन में मिलने का समय माँगा।
और फिर एक दिन राष्ट्रपति भवन से हमारे पास बुलावा आ गया!
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राष्ट्रपति भवन की ओर
अब मैं केवल तेरह साल का बच्चा नहीं था। मैं भारतीय बाल सभा का अध्यक्ष भी था।
मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी।
हमारे साथ कौन-कौन बच्चे जाएँगे?
राष्ट्रपति जी को क्या भेंट देंगे?
हमें दिल्ली कौन लेकर जाएगा?
बहुत सोच-विचार के बाद मैंने अपने चार साथियों को चुना—
रविंद्र बजाज, सतीश पुनियानी, सुरेंद्र आर्य और हरिओम।
लेकिन हमें दिल्ली लेकर जाए कौन?
आखिर स्कूल के सेवक श्री राम लाल जी हमारे साथ दिल्ली जाने के लिए तैयार हुए।
अब एक और सवाल था—
राष्ट्रपति जी को भेंट में क्या दिया जाए?
तभी श्री दीप चंद निर्मोही जी ने हमारे लिए एक कविता लिखने का फैसला किया।
हमने एक चार्ट पेपर लिया। एक पेंटर से कविता सुंदर अक्षरों में लिखवाई और उसे फ्रेम करवाया।
अब हमारा उपहार तैयार था।
हम तेरह साल के बच्चे, हाथ में वह कविता लिए, राष्ट्रपति भवन जाने के लिए तैयार थे।
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राष्ट्रपति भवन में नानू
जब हम राष्ट्रपति भवन पहुँचे तो मुझे आज भी वह दिन किसी सपने जैसा लगता है।
हमारे सामने देश के राष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरि थे।
हमने उन्हें अपनी भेंट दी।
उस भेंट पर लिखी कविता आज भी मेरे मन में वैसे ही बसी है—
**“ऐ गिरि, गिरि से ऊँचा तेरा मस्तक,
सागर सी गहराई मन की।
सत्य, अहिंसा, शील, शांति ही,
सुंदरता है तेरे तन की।
लेकिन जब इस पावन भू की अन्यायी से ठन जाती है,
तभी वीरवर शीला-सी तेरी छाती तन जाती है।
भारत माँ का अमर पूत तू,
जीवन सुरभित ज्यो चंदन वन।
हम बच्चे करते अभिनंदन,
अभिनंदन, शत-शत अभिनंदन!”**
आदिवका: नानू, क्या आपको उस समय डर नहीं लगा?
नानू: डर तो लगा था बेटा। आखिर सामने देश के राष्ट्रपति थे!
लेकिन मेरे मन में एक और भावना थी—गर्व की।
मैं सोच रहा था—
“कल तक मैं गली में बच्चों के साथ खेलते हुए भाषण देता था और आज राष्ट्रपति भवन में खड़ा हूँ!”
उस दिन मुझे समझ में आया कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन सपने और हौसले छोटे नहीं होने चाहिए।
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🌱 नानू की पोटली से सीख
बच्चों, तेरह साल की उम्र में मैंने जो सीखा, वह आज भी मेरे साथ है—
डर लगे तो भी कोशिश करो।
मौका मिले तो आगे बढ़कर जिम्मेदारी लो।
गुरु की सीख पर भरोसा करो।
पढ़ाई के साथ अपनी प्रतिभा को भी निखारो।
कभी मत सोचो कि “मैं तो अभी छोटा हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ?”
क्योंकि बड़े-बड़े काम करने के लिए हमेशा बड़ी उम्र जरूरी नहीं होती।
तेरह साल का एक बच्चा भी मेहनत, साहस और आत्मविश्वास के बल पर राष्ट्रपति भवन तक पहुँच सकता है।
और उस दिन से मेरे मन में यह विश्वास और मजबूत हो गया—
“अगर हिम्मत हो, मेहनत हो और मन में अच्छा सपना हो, तो उम्र कभी रास्ते की दीवार नहीं बनती।”
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17.
“गिरि, गिरि से ऊँचा तेरा मस्तक!”
आदिवका: नानू, आपने स्कूल में पढ़ते हुए ऐसा क्या किया था, जिसे आप आज भी याद करते हैं?
नानू: बेटा, मेरी जिंदगी में आठवीं कक्षा का समय बहुत खास था। उस समय मेरी उम्र केवल तेरह साल थी। मैं जैन हाई स्कूल से बदलकर आर्य सीनियर सेकेंडरी स्कूल, पानीपत में आठवीं कक्षा में पढ़ने लगा था।
आयांश: नानू, आपने स्कूल क्यों बदला?
नानू: इसके पीछे भी एक प्यारी-सी कहानी है। तुम्हारे परनानू ने वर्ष 1928 से 1948 तक जैन हाई स्कूल में पढ़ाया था। उन्हीं के कारण मेरा दाखिला बचपन में उस स्कूल में हुआ था।
हमारा परिवार आर्य समाजी था। उसी समय श्री नित्यानंद जी सिरसा से पानीपत आकर आर्य स्कूल के प्रधानाचार्य बने। वे मेरी माताजी को बहन कहते थे और हम उन्हें प्यार से मामा जी कहते थे।
उनकी प्रेरणा से मेरा दाखिला आर्य स्कूल में हुआ।
और बच्चों, यह वही स्कूल था जिसका 1947 से पहले नाम हाली मुस्लिम हाई स्कूल था।
आर्य स्कूल में खुलने लगे मेरे पंख
आर्य स्कूल में आकर जैसे मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक नया आकाश मिल गया।
स्कूल में रोज संध्या-हवन होता था। मुझे बचपन से ही हवन के वेद-मंत्र याद थे। हमारे धर्म शिक्षक श्री मथुरा प्रसाद शास्त्री जी ऐसे बच्चों को बहुत प्रोत्साहित करते थे, जिन्हें वेद-मंत्र याद होते थे।
और मैं तो इस मामले में आगे रहता था!
धीरे-धीरे पढ़ाई में भी मेरा मन लगने लगा। मेहनत की और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में मैंने राज्य स्तर की मेरिट सूची में स्थान प्राप्त किया।
श्रेयं: वाह नानू! तो आप पढ़ाई में भी अच्छे थे और दूसरे कामों में भी आगे रहते थे?
नानू: हाँ बेटा। मेरे अनुभव ने मुझे एक बात सिखाई—
जो बच्चे पढ़ाई के साथ खेल, भाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दूसरी अच्छी गतिविधियों में भाग लेते हैं, वे अक्सर पढ़ाई में भी बहुत अच्छा करते हैं।
क्योंकि ऐसी गतिविधियों से आत्मविश्वास बढ़ता है और मन खुलता है।
पहली भाषण प्रतियोगिता और पहली जीत
सन् 1971 में स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद जी दंडी स्वामी की निर्वाण शताब्दी मनाई जा रही थी।
इस अवसर पर हमारे स्कूल में राज्यस्तरीय भाषण प्रतियोगिता रखी गई।
मुझे भाषण सुनना और बोलना बहुत पसंद था, लेकिन मैंने पहले कभी किसी भाषण प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया था।
एक दिन मथुरा प्रसाद शास्त्री जी ने कहा—
“राम मोहन, तुम इस प्रतियोगिता में जरूर भाग लो।”
मैं थोड़ा घबरा गया।
आदिवका: नानू, आपको डर लग रहा था?
नानू: बहुत!
लेकिन शास्त्री जी ने मेरी हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने भाषण लिखा और मुझे समझाया—
“तुम्हें बस अच्छी तरह याद करना है और मंच पर पूरे विश्वास से बोलना है।”
मैंने भाषण रटना शुरू किया।
भाषण की शुरुआत संस्कृत के शब्दों से होती थी। आज इतने वर्षों बाद भी वह शुरुआत मुझे बिल्कुल याद है—
“संस्तपते सभायश्च, अदयं तत्र भवतां समक्षे महर्षि दयानंदस्य गुरुः दंडी विरजानंदस्य स्वरूपमाख्यातुमुत्सहे। आशासे च श्रीमन्तां सावधानमनसामाकर्षिष्यति।”
इसके बाद मेरा भाषण शुरू होता।
कुल 26 प्रतियोगियों ने भाषण दिए। सभी बहुत अच्छे वक्ता थे।
मैं तो पहली बार प्रतियोगिता में उतरा था।
मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।
लेकिन मैंने अपने गुरु की बात याद रखी और पूरे साहस से बोलता गया।
और फिर परिणाम आया...
मैं प्रथम आया था!
आयांश: सचमुच नानू?
नानू: हाँ बेटा! वह मेरी पहली भाषण प्रतियोगिता थी और पहली ही बार मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया।
उस दिन मेरे अंदर एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ।
फिर मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
किसी भी भाषण प्रतियोगिता में जाता तो पूरी मेहनत करता और अक्सर शीर्ष स्थान प्राप्त करता।
बाद में मथुरा प्रसाद शास्त्री जी के जाने के बाद श्री चंद्र प्रकाश सत्यार्थी जी और श्री दीप चंद निर्मोही जी मेरी भाषण की तैयारी करवाते रहे।
तेरह साल का “बाल सभा अध्यक्ष”
स्कूल में हर शनिवार को बाल सभा, यानी आर्य कुमार सभा, भी होती थी।
मैं उसमें कभी मंत्री तो कभी प्रधान की भूमिका निभाता रहा।
पढ़ना, लिखना, भाषण देना और बच्चों के कार्यक्रम करवाना—इन सबका मुझे बहुत शौक हो गया था।
इसी दौरान देश में भी बहुत महत्वपूर्ण घटनाएँ हो रही थीं।
उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसे बड़े फैसले लिए।
कांग्रेस में भी उस समय दो गुट बन गए थे। राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। एक ओर एन. संजीव रेड्डी थे और दूसरी ओर वी. वी. गिरि।
जब वी. वी. गिरि राष्ट्रपति चुने गए, तो मुझे बहुत खुशी हुई।
मैंने उन्हें बधाई पत्र भेजा।
और बच्चों, सोचो क्या हुआ?
कुछ समय बाद मुझे राष्ट्रपति जी की ओर से हस्ताक्षर किया हुआ जवाबी पत्र मिला!
श्रेयं: नानू! राष्ट्रपति जी ने आपको पत्र भेजा?
नानू: हाँ बेटा!
उस पत्र ने मेरे बाल मन में जैसे नया उत्साह भर दिया।
मैंने सोचा—
“क्यों न हम राष्ट्रपति जी से मिलकर उन्हें बधाई दें?”
मैंने भारतीय बाल सभा की ओर से राष्ट्रपति भवन में मिलने का समय माँगा।
और फिर एक दिन राष्ट्रपति भवन से हमारे पास बुलावा आ गया!
राष्ट्रपति भवन की ओर
अब मैं केवल तेरह साल का बच्चा नहीं था। मैं भारतीय बाल सभा का अध्यक्ष भी था।
मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी।
हमारे साथ कौन-कौन बच्चे जाएँगे?
राष्ट्रपति जी को क्या भेंट देंगे?
हमें दिल्ली कौन लेकर जाएगा?
बहुत सोच-विचार के बाद मैंने अपने चार साथियों को चुना—
रविंद्र बजाज, सतीश पुनियानी, सुरेंद्र आर्य और हरिओम।
लेकिन हमें दिल्ली लेकर जाए कौन?
आखिर स्कूल के सेवक श्री राम लाल जी हमारे साथ दिल्ली जाने के लिए तैयार हुए।
अब एक और सवाल था—
राष्ट्रपति जी को भेंट में क्या दिया जाए?
तभी श्री दीप चंद निर्मोही जी ने हमारे लिए एक कविता लिखने का फैसला किया।
हमने एक चार्ट पेपर लिया। एक पेंटर से कविता सुंदर अक्षरों में लिखवाई और उसे फ्रेम करवाया।
अब हमारा उपहार तैयार था।
हम तेरह साल के बच्चे, हाथ में वह कविता लिए, राष्ट्रपति भवन जाने के लिए तैयार थे।
राष्ट्रपति भवन में नानू
जब हम राष्ट्रपति भवन पहुँचे तो मुझे आज भी वह दिन किसी सपने जैसा लगता है।
हमारे सामने देश के राष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरि थे।
हमने उन्हें अपनी भेंट दी।
उस भेंट पर लिखी कविता आज भी मेरे मन में वैसे ही बसी है—
**“ऐ गिरि, गिरि से ऊँचा तेरा मस्तक,
सागर सी गहराई मन की।
सत्य, अहिंसा, शील, शांति ही,
सुंदरता है तेरे तन की।
लेकिन जब इस पावन भू की अन्यायी से ठन जाती है,
तभी वीरवर शीला-सी तेरी छाती तन जाती है।
भारत माँ का अमर पूत तू,
जीवन सुरभित ज्यो चंदन वन।
हम बच्चे करते अभिनंदन,
अभिनंदन, शत-शत अभिनंदन!”**
आदिवका: नानू, क्या आपको उस समय डर नहीं लगा?
नानू: डर तो लगा था बेटा। आखिर सामने देश के राष्ट्रपति थे!
लेकिन मेरे मन में एक और भावना थी—गर्व की।
मैं सोच रहा था—
“कल तक मैं गली में बच्चों के साथ खेलते हुए भाषण देता था और आज राष्ट्रपति भवन में खड़ा हूँ!”
उस दिन मुझे समझ में आया कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन सपने और हौसले छोटे नहीं होने चाहिए।
🌱 नानू की पोटली से सीख
बच्चों, तेरह साल की उम्र में मैंने जो सीखा, वह आज भी मेरे साथ है—
डर लगे तो भी कोशिश करो।
मौका मिले तो आगे बढ़कर जिम्मेदारी लो।
गुरु की सीख पर भरोसा करो।
पढ़ाई के साथ अपनी प्रतिभा को भी निखारो।
कभी मत सोचो कि “मैं तो अभी छोटा हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ?”
क्योंकि बड़े-बड़े काम करने के लिए हमेशा बड़ी उम्र जरूरी नहीं होती।
तेरह साल का एक बच्चा भी मेहनत, साहस और आत्मविश्वास के बल पर राष्ट्रपति भवन तक पहुँच सकता है।
और उस दिन से मेरे मन में यह विश्वास और मजबूत हो गया—
“अगर हिम्मत हो, मेहनत हो और मन में अच्छा सपना हो, तो उम्र कभी रास्ते की दीवार नहीं बनती।”
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18.एक चिट्ठी, जिसने सात साल के बच्चे का दिल जीत लिया
आयांश: नानू, आपने प्रधानमंत्री शास्त्री जी को पहली बार चिट्ठी क्यों लिखी थी?
नानू: बेटा, उस समय मैं केवल सात साल का था। सन् 1965 था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल था। चारों तरफ देश की सुरक्षा और सीमा पर लड़ रहे जवानों की बातें होती थीं। मैं छोटा जरूर था, लेकिन घर का वातावरण ऐसा था कि देश में क्या हो रहा है, उसकी कुछ-कुछ समझ मुझे भी थी।
दीवाली का समय था। बाजार में घूमते-घूमते मेरी नजर एक छोटे-से खिलौना टैंक पर पड़ी। वह मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं उसे खरीदकर घर ले आया।
उस टैंक की खास बात यह थी कि उसे जमीन पर रगड़ने से उसमें से चिंगारी निकलती थी।
मैं उसे बार-बार चलाता और चिंगारी देखकर मेरे बाल मन में न जाने कैसी-कैसी कल्पनाएँ उठतीं।
तभी मेरे मन में एक विचार आया—
“जब देश के जवान असली टैंकों के साथ सीमा पर लड़ रहे हैं, तो मेरे पास भी एक टैंक है। अगर देश को मेरी जरूरत हो तो मैं भी क्यों न लड़ूँ?”
मैंने अपने मन की यह बात पिताजी को बताई।
उन्होंने मेरी बात का मजाक नहीं उड़ाया। बल्कि प्यार से मेरा उत्साह बढ़ाया।
बस, मेरे बाल मन को जैसे पंख लग गए।
मैंने तय कर लिया कि मैं सीधे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी को चिट्ठी लिखूँगा।
मेरे पास न कोई सुंदर कागज था, न लिफाफा।
मैंने छह पैसे का एक पोस्टकार्ड खरीदा।
फिर अपने नन्हे हाथों से, अपनी समझ के अनुसार, प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा—
“मेरे पास एक टैंक है। अगर देश की रक्षा के लिए मेरी और मेरे टैंक की जरूरत हो तो मैं सीमा पर जाने के लिए तैयार हूँ।”
पत्र लिखते समय मेरे मन में यही था कि प्रधानमंत्री जी मेरी बात पढ़ेंगे और शायद कहेंगे—
“राम मोहन, तैयार रहो। देश को तुम्हारी जरूरत पड़ सकती है।”
मैंने वह पोस्टकार्ड डाक में डाल दिया।
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फिर शुरू हुआ इंतज़ार...
चिट्ठी डालने के बाद मैं रोज डाकिए की राह देखने लगा।
सुबह स्कूल जाता तो मन में यही रहता—
“आज शायद प्रधानमंत्री जी का जवाब आ जाए!”
दोपहर में घर लौटता तो सबसे पहले पूछता—
“डाक आई?”
कई दिन बीत गए।
एक दिन अचानक डाकिया मेरे नाम की चिट्ठी लेकर आया।
मैंने लिफाफा हाथ में लिया तो मेरी धड़कन जैसे तेज हो गई।
“क्या प्रधानमंत्री जी ने सचमुच मुझे जवाब दिया है?”
मैंने काँपते हाथों से पत्र खोला।
और जैसे ही पढ़ा, मेरी आँखों में चमक आ गई।
उसमें लिखा था—
“प्रिय राम मोहन,
हमें अपनी भारतीय सेना पर गर्व है। परन्तु फिर भी आपकी और आपके टैंक की जरूरत पड़ी तो आपको बुला लेंगे।
आपका,
लाल बहादुर”
कुछ पल के लिए मैं चुप रह गया।
फिर खुशी से उछल पड़ा।
“पिताजी! प्रधानमंत्री जी ने मुझे जवाब दिया है!”
मैं बार-बार उस पत्र को पढ़ता।
फिर उसमें लिखे “प्रिय राम मोहन” शब्दों को देखता।
मेरे लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि देश के प्रधानमंत्री ने मुझे “प्रिय” कहकर संबोधित किया था।
सात साल के उस बच्चे के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी?
उस दिन से मेरे मन में शास्त्री जी केवल देश के प्रधानमंत्री नहीं रहे।
वे मेरे अपने हो गए।
मैं पूरे मोहल्ले में वह पत्र लेकर घूमता रहा।
जिसे मिलता, उसे बड़े गर्व से बताता—
“देखो, शास्त्री जी ने मुझे चिट्ठी लिखी है। यह उनके अपने हाथ के हस्ताक्षर हैं!”
और फिर मैं बड़े विश्वास से कहता—
“अब लाल बहादुर शास्त्री जी मेरे दोस्त हैं!”
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एक और चिट्ठी... और एक अधूरा इंतज़ार
कुछ दिन बाद मेरे मन में अपने उस नए दोस्त से मिलने की इच्छा जागी।
मैंने फिर हिम्मत की और शास्त्री जी को एक पत्र लिखा—
“मैं आपसे मिलना चाहता हूँ। मुझे मिलने का समय दीजिए।”
इस बार जवाब प्रधानमंत्री जी के निजी सचिव श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव की ओर से आया।
उसमें बताया गया कि प्रधानमंत्री जी बातचीत के लिए ताशकंद गए हैं। उनके लौटने पर मुझे मिलने का समय दिया जाएगा।
मेरे लिए यह जवाब भी किसी वादे जैसा था।
अब मैं एक और इंतज़ार करने लगा—
“शास्त्री जी ताशकंद से लौटेंगे... फिर मैं उनसे मिलूँगा।”
मैं मन ही मन सोचता—
“जब मैं उनसे मिलूँगा तो अपना वह खिलौना टैंक भी दिखाऊँगा और कहूँगा—देखिए, मैं अभी भी तैयार हूँ!”
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद से वह खबर आई, जिसने पूरे देश को रुला दिया।
मेरे प्रिय शास्त्री जी अब इस दुनिया में नहीं थे।
मेरा सात साल का मन उस समय शायद मृत्यु का अर्थ पूरी तरह नहीं समझता था।
लेकिन इतना जरूर समझ गया था—
मेरा दोस्त अब कभी वापस नहीं आएगा।
और सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि—
“मैं अपने दोस्त से मिल भी नहीं पाया।”
वह मुलाकात, जिसका इंतज़ार मैंने एक बच्चे की तरह किया था, हमेशा के लिए अधूरी रह गई।
वर्षों बाद जब मैं ताशकंद पहुँचा और उस जगह जाकर बैठा जहाँ शास्त्री जी ने अपनी अंतिम साँस ली थी, तो मेरे मन में वही पुराना पोस्टकार्ड, वही जवाब और वही सात साल का बच्चा फिर से जीवित हो उठा।
तब मुझे लगा—
कुछ चिट्ठियाँ कागज पर लिखी जाती हैं,
लेकिन उनकी स्याही दिल पर उतर जाती है।
शास्त्री जी का वह पत्र मेरे लिए ऐसी ही चिट्ठी थी।
वह एक प्रधानमंत्री का जवाब नहीं था—
वह एक बड़े आदमी का एक छोटे बच्चे के सपने को दिया हुआ सम्मान था।
और शायद इसीलिए, इतने वर्षों बाद भी,
“प्रिय राम मोहन...”
से शुरू होने वाली वह चिट्ठी मेरे लिए आज भी मेरे बचपन की सबसे अनमोल धरोहर है।
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19.हमारा अपना बाल चुनाव
एक दिन नानू अपनी पोटली खोलकर बचपन की यादें सुना रहे थे। आसपास बैठे सभी बच्चे बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
एक बच्चे ने पूछा—
“नानू, क्या आपके बचपन में भी चुनाव होते थे?”
नानू मुस्कुराए—
“हाँ बच्चों! चुनाव तो होते थे, लेकिन हमारे बचपन के चुनावों की अपनी ही कहानी है।”
“मेरी माँ स्वतंत्रता सेनानी थीं और सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों में बहुत सक्रिय रहती थीं। मेरे पिता शिक्षाविद थे और महिला कांग्रेस, पानीपत के अध्यक्ष भी रहे। इसलिए हमारे घर में बचपन से ही देश, समाज और राजनीति की बातें होती रहती थीं।”
“जब विधानसभा या लोकसभा के चुनाव आते, तो घर का वातावरण बिल्कुल बदल जाता। माँ-पिताजी और उनके साथी चुनाव प्रचार में व्यस्त हो जाते। हम छोटे बच्चे भी कहाँ पीछे रहने वाले थे!”
बच्चे उत्सुक होकर बोले—
“आप क्या करते थे नानू?”
नानू हँसते हुए बोले—
“हमारे हाथों में छोटे-छोटे झंडे और बैनर होते। हम मोहल्ले में निकल पड़ते। कोई नारा लगाता—
‘जिंदाबाद! जिंदाबाद!’
तो कोई कहता—
‘वोट दीजिए!’”
“मैं उस समय केवल चार-पाँच साल का था। बहुत-सी बातें समझ में नहीं आती थीं, लेकिन चुनाव का यह माहौल मुझे बहुत आकर्षित करता था।”
फिर एक दिन मेरे मन में एक अनोखा सवाल आया—
“बड़े लोगों का ही चुनाव क्यों होता है? बच्चों का चुनाव क्यों नहीं हो सकता?”
बस, फिर हमने तय कर लिया कि चुनाव तो हमारा भी होगा!
चुनाव खत्म होते ही हम मोहल्ले और आसपास के बच्चों को इकट्ठा करते और अपना ‘बाल चुनाव’ शुरू कर देते।
वोटर लिस्ट बनती।
उम्मीदवार खड़े होते।
प्रचार होता।
छोटे-छोटे भाषण होते।
फिर मतदान होता और अंत में वोटों की गिनती!
जीतने वाला बहुत खुश होता और हारने वाला थोड़ी देर उदास।
फिर कोई बच्चा पूछता—
“नानू, हारने वाले से दोस्ती रहती थी?”
नानू हँसते हुए बोले—
“अरे, बिल्कुल रहती थी! थोड़ी देर बाद सब फिर साथ खेलने लगते थे। उस समय हमें पता ही नहीं था कि हम खेल-खेल में लोकतंत्र का कितना बड़ा पाठ सीख रहे हैं।”
बच्चे चौंककर बोले—
“लोकतंत्र का पाठ?”
“हाँ बच्चों। हमें धीरे-धीरे समझ आने लगा कि चुनाव सिर्फ जीतने का खेल नहीं है। सबको अपनी पसंद बताने का अधिकार है। दूसरों की पसंद का सम्मान करना चाहिए। जीतने वाले को घमंड नहीं करना चाहिए और हारने वाले को निराश नहीं होना चाहिए।”
“इसी खेल ने आगे चलकर हमारे मन में एक बड़ा विचार पैदा किया। हमने बच्चों को संगठित किया। पहले हमारी संस्था का नाम ‘बाल कांग्रेस’ रखा गया और बाद में हमने उसका नाम ‘भारतीय बाल सभा’ कर दिया। मुझे उसका अध्यक्ष बनने का अवसर मिला।”
“हम चाहते थे कि बच्चे केवल खेलें ही नहीं, बल्कि अपने देश और समाज के बारे में भी सोचें।”
एक बच्चे ने पूछा—
“नानू, आप लोगों को यह विचार कहाँ से मिला?”
नानू कुछ पल चुप रहे, फिर बोले—
“स्वतंत्रता आंदोलन में बच्चों की भूमिका की कहानियाँ हमें बहुत प्रेरित करती थीं। इलाहाबाद की वानर सेना के बच्चों ने भी आजादी के आंदोलन में संदेश पहुँचाने और प्रचार-प्रसार में अपनी भूमिका निभाई थी। हमें लगता था कि हम भी अपने छोटे-से तरीके से देश और समाज के लिए कुछ कर सकते हैं।”
“हमारी भारतीय बाल सभा भी ऐसा ही एक छोटा-सा प्रयोग थी। उसके माध्यम से हम बच्चों में सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने की कोशिश करते थे।”
बच्चों ने पूछा—
“क्या सचमुच इतनी छोटी उम्र में देश के बारे में समझ आने लगी थी?”
नानू ने प्यार से कहा—
“बच्चों, पूरी समझ तो नहीं थी, लेकिन सवाल पूछने लगे थे। और मेरा मानना है कि अच्छे नागरिक बनने की शुरुआत भी यहीं से होती है—जब बच्चा सवाल पूछता है, अपने आसपास की दुनिया को समझना चाहता है और दूसरों के बारे में सोचता है।”
“भारतीय बाल सभा ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। मैंने सीखा कि देश केवल नेताओं से नहीं बनता। देश उसके नागरिकों से बनता है।”
“मैंने सीखा—
दूसरों की बात सुनना चाहिए,
अपनी बात शांति से कहनी चाहिए,
जीत में विनम्र रहना चाहिए,
हार को स्वीकार करना चाहिए
और सबसे बढ़कर अपने देश और समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए।”
बच्चे बहुत ध्यान से सुन रहे थे।
नानू ने आगे कहा—
“शायद इसी बाल सभा ने मेरे भीतर देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो मेरे मन में देश के बड़े नेताओं से संवाद करने की इच्छा पैदा हुई। मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी से पत्र-व्यवहार किया।”
“और जब मैं लगभग चौदह वर्ष का हुआ, तो बाल सभा के अपने साथियों के साथ मिलकर तत्कालीन राष्ट्रपति वी. वी. गिरि जी से मिलने का अवसर भी मिला।”
बच्चे आश्चर्य से बोले—
“नानू! इतनी छोटी उम्र में राष्ट्रपति से मिलने गए?”
नानू मुस्कुराए—
“हाँ बच्चों। शायद उस समय हमारे भीतर उम्र से ज्यादा उत्साह था और यह विश्वास भी कि बच्चे अगर कुछ अच्छा करना चाहें तो उन्हें छोटा समझकर रोकना नहीं चाहिए।”
फिर नानू ने सभी बच्चों को अपने पास बुलाया और बोले—
“मेरी पोटली की यह याद मुझे आज भी बताती है कि बचपन केवल खेलने और पढ़ने का समय नहीं है। यही वह उम्र है जब अच्छे विचारों के बीज मन में बोए जाते हैं।”
“और याद रखना—अच्छा नागरिक बनने के लिए बड़ा होना जरूरी नहीं। अच्छे विचार, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान—इनकी शुरुआत बचपन से ही हो सकती है।”
सभी बच्चे मुस्कुराने लगे।
एक बच्चे ने धीरे से पूछा—
“नानू, अब हम भी बाल चुनाव कर सकते हैं?”
नानू खिलखिलाकर हँसे—
“क्यों नहीं! लेकिन एक शर्त है।”
सभी बच्चे एक साथ बोले—
“क्या?”
नानू ने कहा—
“जो जीतेगा, वह घमंड नहीं करेगा और जो हारेगा, वह नाराज़ नहीं होगा। चुनाव के बाद दोनों एक-दूसरे को गले लगाएंगे।”
सभी बच्चे हँस पड़े।
और नानू की पोटली में बचपन की वह छोटी-सी कहानी फिर जीवंत हो उठी—
एक खेल, जिसने एक बच्चे को लोकतंत्र समझाया और धीरे-धीरे उसे एक जिम्मेदार नागरिक बनने की राह दिखाई।
बच्चों के लिए सीख
अच्छे नागरिक बनने की शुरुआत बचपन से होती है।
सवाल पूछो, दूसरों का सम्मान करो, जीत में विनम्र रहो और हार में हिम्मत मत खोओ।
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20.बचपन के छोटे-छोटे कारोबार और मेहनत की सीख
“नानू, क्या आपने बचपन में कभी काम भी किया था?”
बच्चों के इस सवाल पर मैं हँस पड़ा।
“काम? अरे, तुम लोगों को बताऊँ तो शायद विश्वास ही न हो!”
हमारी गली में मेरे हमउम्र एक लड़का रहता था—जग्गी, जिसे हम गोपाल भी कहते थे। उसके पिता चौराहे पर गोलगप्पे की रेहड़ी लगाते थे। जग्गी हमारे साथ स्कूल में पढ़ता था और स्कूल से लौटकर अपने पिता के काम में हाथ भी बँटाता था।
मैं अक्सर उसके घर चला जाता। उसके पिता को गोलगप्पे तैयार करते देखता और फिर उनके साथ चौराहे तक पहुँच जाता।
मैं मन ही मन सोचता—
“वाह! कितना मजेदार काम है! गोलगप्पे बेचो, पैसे भी कमाओ और खाने को भी मिलें!”
और मैंने तय कर लिया—
“बड़ा होकर मैं भी गोलगप्पे बेचूँगा!”
बच्चों, बचपन की दुनिया कितनी सीधी-सादी होती है। जिस काम में हमें मजा दिखाई दे, वही सबसे अच्छा काम लगता है।
उस समय छोटे बच्चे स्कूल से लौटकर आइस कैंडी भी बेचा करते थे। एक बड़ा-सा डिब्बा लेकर वे गली-गली घूमते और आवाज लगाते—
“आइस कैंडी ले लो!”
मुझे यह काम भी बहुत अच्छा लगता। कभी-कभी मैंने माता-पिता की अनुमति के बिना छिपकर यह काम करने की कोशिश भी की।
मैं सोचता—
“इसे बेचो, पैसे कमाओ और जो बच जाए, उसे खा लो। इससे अच्छा धंधा और क्या होगा!”
छुट्टियों में हम घर पर मीठी इमली और गोंद कतीरा तैयार करते और अपने चबूतरे पर बैठकर बेचते। मन में एक ही इच्छा होती—
“अगर कुछ पैसे मिल जाएँ तो अपनी फीस और जेब खर्च के लिए माता-पिता से पैसे नहीं माँगने पड़ेंगे।”
तब मुझे यह नहीं मालूम था कि इसे आत्मनिर्भरता कहते हैं। मैं तो बस इतना जानता था कि अपने हाथ से कमाए हुए पैसे बहुत अच्छे लगते हैं।
कभी-कभी छुट्टियों में मेरी ममेरी बहन सुनीता भी आ जाती। फिर हमारी छोटी-सी टीम बन जाती।
हम पुरानी कापियों और अखबारों से लिफाफे बनाते। दिनभर मेहनत करते और फिर उन्हें बाजार में बेच आते।
एक दिन कुछ पैसे बचे तो हमने सोचा—
“क्यों न आज कुछ ठंडा पिया जाए?”
बर्फ लेकर आए। दूध में चीनी और रूह-अफज़ा का शर्बत मिलाया, उसमें बर्फ डाली और सबके लिए बराबर-बराबर गिलास भर दिए।
अब शुरू हुआ हमारा मुकाबला—
“देखते हैं, कौन सबसे पहले पीता है!”
मैं तो अपना गिलास गटागट पी जाता। लेकिन मुन्नी और सुनीता बड़ी चालाक थीं। वे गिलास मुँह से लगाकर ऐसा दिखातीं जैसे बहुत तेजी से पी रही हों, लेकिन असल में धीरे-धीरे पीती रहतीं।
मैं कहता—
“अरे! तुम दोनों अभी तक नहीं पी पाईं?”
वे हँसकर कहतीं—
“कुकु, तुम तो हमेशा जल्दी करते हो!”
और फिर मुझे चिढ़ाते हुए अपना शर्बत पीतीं।
फिर एक दिन दुनिया थोड़ी बड़ी हो गई
बच्चों, बचपन में हमें लगता था कि यह सब हमारे ही घर और हमारी ही गली की बात है। लेकिन कई साल बाद मुझे समझ आया कि मेहनत करके अपनी पढ़ाई और जरूरतों का खर्च निकालने की इच्छा केवल हमारी नहीं थी।
वर्ष 1980 में जब मैं ताशकंद गया, तो वहाँ मैंने देखा कि छुट्टियों में विद्यार्थी खेतों में जाते थे। वे कपास की चुगाई करते और अपनी मेहनत से पैसे कमाते। उन पैसों से वे अपनी पढ़ाई और दूसरे व्यक्तिगत खर्च पूरे करने में मदद लेते थे।
मैं उन्हें देखकर ठिठक गया।
मुझे अपना बचपन याद आ गया—जग्गी के पिता की गोलगप्पे की रेहड़ी, आइस कैंडी का डिब्बा, मीठी इमली, गोंद कतीरा, अखबारों के लिफाफे और हमारा छोटा-सा चबूतरा।
मैंने सोचा—
“अरे! हम तो बचपन में खेल-खेल में जो करते थे, दुनिया के दूसरे हिस्सों में बच्चे उसे जीवन की जिम्मेदारी समझकर करते हैं।”
तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की भाषा पूरी दुनिया में एक जैसी होती है।
बाद में समझ आया कि विकासशील देशों के बहुत से बच्चे और विद्यार्थी अपनी पढ़ाई के साथ छोटे-मोटे काम करके अपने खर्च में हाथ बँटाते रहे हैं। हमारे बचपन का वह छोटा-सा अनुभव भी इसी बड़ी मानवीय परंपरा का हिस्सा था—मेहनत करो, कुछ सीखो और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करो।
मैंने बच्चों से कहा—
“इसलिए बच्चों, किसी मेहनत को कभी छोटा मत समझना। काम का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन उससे मिलने वाली सीख और आत्मसम्मान बहुत बड़ा हो सकता है।”
एक बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा—
“लेकिन नानू, अगर आप सच में बड़े होकर गोलगप्पे बेचते तो?”
मैं भी हँस पड़ा—
“तो शायद आज तुम सब मुझे ‘गोलगप्पे वाले नानू’ कह रहे होते!”
सारे बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।
और मैं सोचने लगा—
हमारे पास साधन कम थे, लेकिन सीखने और खुश होने के रास्ते बहुत थे।
यही तो बचपन था—
छोटे-छोटे काम, छोटे-छोटे सपने और उनसे मिलने वाली जिंदगी की बड़ी-बड़ी सीख।
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21.🌿 घूमना भी तो पढ़ना है!
नानू की पोटली से बचपन की दो यात्राएँ
एक शाम नानू अपने नाती-नातिन के साथ बैठे थे। बाहर हल्की-सी हवा चल रही थी। बच्चे नानू की पुरानी यादों की पोटली खुलने का इंतज़ार कर रहे थे।
अद्विका: नानू, आज पोटली में से कौन-सी कहानी निकलेगी?
नानू मुस्कुराए।
नानू: आज की कहानी किताबों की नहीं, रास्तों की है।
आयांश: रास्तों की?
नानू: हाँ! मेरे बचपन में घूमना मेरे लिए किसी खेल से कम नहीं था। मैं मुश्किल से छह-सात साल का रहा होऊँगा, लेकिन मन हमेशा घर की चारदीवारी से बाहर जाने को करता था। दूसरे शहर कैसे होंगे? वहाँ के लोग कैसे होंगे? वहाँ की बड़ी-बड़ी इमारतें, मंदिर और ऐतिहासिक जगहें कैसी होंगी—इन सवालों से मेरा छोटा-सा मन हमेशा भरा रहता था।
दो शहर तो मेरे मन में खास जगह बनाए हुए थे—हरिद्वार और अमृतसर।
हरिद्वार का नाम सुनते ही मुझे गंगा मैया याद आती थीं और अमृतसर का नाम आते ही स्वर्ण मंदिर।
लेकिन मैं सोचता था—
“इतनी दूर जाएँ तो जाएँ कैसे?”
तभी एक दिन किस्मत ने मेरे लिए रास्ता खोल दिया।
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🚌 पहली यात्रा — हरिद्वार
हमारे पड़ोस में श्री हरीशचंद्र भटनागर रहते थे। उनका विवाह हरिद्वार में तय हुआ। बारात बस से जानी थी और हमारे परिवार को भी बारात में आने का निमंत्रण मिला।
घर के बड़े लोगों ने जाने में ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया।
लेकिन मेरे लिए तो यह सुनहरा मौका था!
मैंने अपनी बड़ी बहन मुन्नी, जो उस समय लगभग दस वर्ष की थी, को समझाना शुरू किया—
मैं: मुन्नी चलो न हरिद्वार!
दीदी: लेकिन कैसे जाएँगे?
मैं: अरे, बारात के साथ बस में जाएँगे। आने-जाने का किराया भी नहीं लगेगा। खाने और रहने का भी इंतजाम होगा। और सबसे बड़ी बात—हम गंगा में स्नान करेंगे!
मेरी बात सुनकर मुन्नी भी तैयार हो गईं।
और इस तरह दो छोटे बच्चे—एक लगभग सात साल का और दूसरी दस साल की—हरिद्वार जाने वाली बारात की बस में बैठ गए।
उस समय की यात्रा आज जैसी आरामदायक नहीं थी। रास्ता लंबा था, बस धीरे-धीरे चलती थी। लेकिन हमारे लिए हर किलोमीटर एक नया रोमांच था।
खिड़की से बाहर खेत भागते दिखाई देते, गाँव आते-जाते और हम दोनों उत्सुकता से रास्ता देखते रहते।
कई घंटों के सफर के बाद जब हरिद्वार आया तो ऐसा लगा जैसे कोई सपना सच हो गया हो।
हम विष्णु धर्मशाला में ठहरे। वहाँ खाने-पीने और रहने का अच्छा इंतजाम था।
लेकिन मेरा मन तो किसी और चीज के लिए बेचैन था—
गंगा देखने के लिए!
जब बाराती गंगा की ओर चले तो मैं भी उनके साथ हो लिया।
गंगा को पहली बार अपनी आँखों के सामने देखकर मेरे बालमन में कैसी खुशी हुई होगी, यह आज भी सोचता हूँ तो मन भर आता है।
गंगा की कल-कल करती धारा, ठंडी हवा और चारों ओर श्रद्धा का वातावरण—सब कुछ मेरे लिए नया था।
मैंने गंगा स्नान किया और फिर बारातियों के साथ दूसरे धार्मिक स्थानों के दर्शन भी किए।
उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि किसी जगह को उसके बारे में सुनने से ज्यादा अच्छा है, उसे अपनी आँखों से देखना।
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🌅 दूसरी यात्रा — अमृतसर
कुछ समय बाद हमारे परिवार के एक सदस्य श्री रघुबीर सिंह सैनी का विवाह अमृतसर में तय हुआ।
फिर बारात जाने की तैयारी होने लगी।
लेकिन इस बार भी घर से कोई जाने को तैयार नहीं था।
मैंने फिर सोचा—
“अमृतसर जाने का ऐसा मौका भला कैसे छोड़ दूँ?”
मैंने अपना एक छोटा-सा झोला उठाया। उसमें एक जोड़ी कपड़े रखे और बारात की बस में जा बैठा।
सुबह बस चली और शाम तक हम अमृतसर पहुँच गए।
रात में शादी हुई। खूब चहल-पहल रही।
लेकिन अगले दिन सुबह मेरी आँख खुली तो मेरे मन में एक ही विचार था—
“अमृतसर आकर अगर सिर्फ शादी में शामिल होकर वापस चले गए, तो मैंने क्या देखा?”
सर्दियों की सुबह थी। ठंड बहुत थी। बाकी लोग अभी सो रहे थे।
लेकिन मेरे अंदर घूमने की उत्सुकता इतनी तेज थी कि ठंड भी मुझे रोक नहीं सकी।
मैं चुपचाप धर्मशाला से बाहर निकल आया।
कुछ दूर जाने पर एक रिक्शावाला दिखाई दिया।
मैंने उससे कहा—
मैं: भैया, मुझे अमृतसर घुमा दोगे?
उसने शायद सोचा होगा कि यह छोटा-सा बच्चा अकेला कहाँ घूमने निकला है!
मैंने उससे कहा कि मुझे स्वर्ण मंदिर, दुर्गियाना मंदिर और जलियाँवाला बाग देखना है।
उस जमाने में एक रुपये की भी अच्छी कीमत हुआ करती थी। रिक्शावाले ने मुझसे एक रुपये में घूमाने की बात तय कर ली।
वह मुझे अपने बच्चे की तरह रिक्शे पर बैठाकर शहर घुमाने निकल पड़ा।
सबसे पहले मैं स्वर्ण मंदिर पहुँचा।
उसकी सुंदरता देखकर मेरी आँखें जैसे ठहर गईं।
फिर हम दुर्गियाना मंदिर गए और उसके बाद जलियाँवाला बाग।
मैं उस समय बहुत छोटा था। इतिहास की पूरी समझ नहीं थी, लेकिन जलियाँवाला बाग का नाम और वहाँ का वातावरण मेरे बालमन में एक गहरी छाप छोड़ गया।
करीब दो घंटे बाद रिक्शावाला मुझे वापस धर्मशाला ले आया।
मैं बहुत खुश था।
मैंने उस दिन अमृतसर को सिर्फ देखा नहीं था—मैंने उसे महसूस किया था।
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📚 मेरी पहली खुली पाठशाला
श्रेय : आपको इतनी छोटी उम्र में घूमने का इतना शौक क्यों था?
नानू कुछ पल चुप रहे। फिर मुस्कुराकर बोले—
नानू: शायद मेरे मन में बचपन से ही यह जिज्ञासा थी कि दुनिया कितनी बड़ी है और उसमें जानने के लिए कितना कुछ है।
हरिद्वार की यात्रा ने मुझे प्रकृति और आस्था से मिलाया।
अमृतसर की यात्रा ने मुझे धर्म, संस्कृति और इतिहास से परिचित कराया।
और इन यात्राओं ने मुझे एक बहुत बड़ी बात सिखाई—
“घूमना भी तो पढ़ना है।”
किताब में हम पढ़ते हैं कि गंगा हरिद्वार में बहती है।
लेकिन गंगा के किनारे खड़े होकर उसकी लहरों को देखना कुछ और ही अनुभव है।
किताब में हम स्वर्ण मंदिर का चित्र देख सकते हैं।
लेकिन उसके सामने खड़े होकर उसकी सुंदरता महसूस करना कुछ और है।
किताब में हम जलियाँवाला बाग का इतिहास पढ़ सकते हैं।
लेकिन उस धरती पर खड़े होकर इतिहास को महसूस करना मन पर अलग ही असर डालता है।
अद्विका: तो नानू, आपकी पढ़ाई सिर्फ स्कूल में नहीं हुई?
नानू हँस पड़े।
नानू: बिल्कुल नहीं! मेरी एक पाठशाला स्कूल थी और दूसरी पाठशाला थी—यह पूरी दुनिया।
मैंने रास्तों से सीखा, लोगों से सीखा, शहरों से सीखा, मंदिरों से सीखा, इतिहास से सीखा और प्रकृति से सीखा।
शायद इसीलिए बचपन से ही मेरे मन में यह बात बैठ गई—
“किताबें हमें बताती हैं कि दुनिया कैसी है,
और यात्राएँ हमें दुनिया को अपनी आँखों से समझना सिखाती हैं।”
नानू ने बच्चों की ओर प्यार से देखा।
नानू: इसलिए बच्चों, खूब पढ़ो—किताबें भी और दुनिया भी।
जब मौका मिले तो यात्रा करो। नई जगह देखो, नए लोगों से मिलो, उनके जीवन और संस्कृति को समझो। क्योंकि—
🌏 “जीवन की कुछ सबसे बड़ी किताबें कागज पर नहीं, रास्तों पर लिखी होती हैं।”
बच्चे चुपचाप नानू को देखते रहे।
उन्हें पहली बार लगा कि नानू की बचपन की यात्राएँ केवल घूमने की कहानियाँ नहीं थीं।
वे उनकी जिंदगी की पहली पाठशाला थीं।
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22.❤️ खून का रंग एक ही होता है
नानू की पोटली से इंसानियत का पहला पाठ
एक दिन नानू अपने नाती-नातिन के साथ बैठे थे। पुरानी यादों की पोटली खुली तो नानू कुछ देर चुप रहे। फिर उनके चेहरे पर एक मीठी-सी मुस्कान आई।
अद्विका: नानू, आज क्या याद आ गया?
नानू: आज तुम्हें अपने बचपन की एक ऐसी बात बताऊँगा, जिसे मैं आज भी नहीं भूल पाया हूँ। उस घटना ने मुझे बहुत छोटी उम्र में ही एक बड़ी बात सिखा दी थी—इंसानियत की कोई जाति या मजहब नहीं होता।
आयांश: ऐसा क्या हुआ था, नानू?
नानू: हमारे घर के पीछे एक परिवार रहता था। उस घर में हाफिज अल्लाह बख्श रहते थे । वे बहुत ही नेक और शानदार इंसान थे। इस्लाम के बारे में उन्हें गहरी जानकारी थी और धार्मिक जीवन में उनकी बहुत गहरी आस्था थी।
हमारे घर और उनके घर के बीच बहुत अपनापन था।
मैं तब मुश्किल से पाँच साल का था और मेरी बड़ी बहन लगभग नौ साल की। हमारी माँ को जब कभी बाहर जाना होता, तो वह हमें हाफिज जी के घर छोड़ जातीं।
हम वहाँ घंटों रहते—खाते, पीते, खेलते और खूब प्यार पाते।
हमारे लिए वह घर पड़ोसी का घर नहीं था। वह भी जैसे हमारा अपना ही घर था।
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🪟 एक दिन खिड़की पर...
हाफिज जी के कमरे में एक खिड़की थी, जो बाहर गली की ओर खुलती थी।
एक दिन मैं उसी खिड़की पर बैठ गया। मैंने खिड़की के ऊपरी हिस्से को पकड़ रखा था और बाहर झाँककर गली देख रहा था।
पता नहीं कब मुझे हल्की-सी झपकी आ गई।
और अचानक...
धड़ाम!
मैं नीचे गिर पड़ा।
मेरे सिर के पिछले हिस्से में गहरी चोट लगी और खून बहने लगा।
हाफिज साहब ने जब मुझे देखा तो घबरा गए।
हाफिज जी : अरे राम मोहन को बहुत चोट लग गई है!
उन्होंने बिना एक पल गँवाए मुझे उठाया और डॉक्टर के पास ले जाने के लिए दौड़ पड़े।
मेरे पिताजी के पुराने विद्यार्थी डॉ. मदन हमारे पड़ोस के बहुत प्रसिद्ध डॉक्टर थे। हाफिज जी उन्हें जानते भी थे।
एक बात और बड़ी मजेदार थी।
हाफिज जी खादी के एकदम सफेद, साफ-सुथरे कपड़े पहनने का बहुत शौक था। उस दिन भी उन्होंने चमकता हुआ सफेद कुर्ता-पायजामा पहन रखा था।
लेकिन मुझे गोद में उठाकर जब वे डॉक्टर के पास पहुँचे, तब तक उनके सफेद कपड़ों का रंग ही बदल गया था!
मेरे सिर से बहता खून उनके कुर्ते-पायजामे पर लग गया था।
आयांश: फिर क्या हुआ नानू?
नानू: डॉ. मदन ने तुरंत मेरा इलाज किया। सिर में टाँके लगाए, इंजेक्शन लगाया और पट्टी बाँध दी।
हाफिज साहब तब तक मेरे पास ही खड़े रहे।
उनकी चिंता देखकर ऐसा लगता था जैसे चोट मुझे नहीं, उनके अपने बच्चे को लगी हो।
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❤️ अम्मा की चिंता
शाम को जब मेरी माँ घर लौटीं तो उन्होंने देखा कि मैं हाफिज साहब के बिस्तर पर सो रहा हूँ और मेरे सिर पर पट्टी बँधी हुई है।
माँ घबरा गईं।
माँ: अरे! राम मोहन को इतनी चोट कैसे लगी?
जब उन्हें पूरी बात पता चली तो उन्होंने हाफिज साहब और उनकी पत्नी से कहा—
माँ: आपको इतनी चोट लगने की बात मुझे बतानी चाहिए थी। मैं भी तो उसकी माँ हूँ!
हाफिज साहब और उनकी पत्नी ने प्यार से कहा—
“हम भी तो उसके नाना-नानी जैसे हैं। आपको परेशान क्यों करते?”
नानू यह कहते-कहते कुछ पल के लिए रुक गए।
बच्चे भी चुप हो गए।
फिर नानू ने धीरे से कहा—
नानू: बच्चों, उस दिन मैं बहुत छोटा था। शायद उस समय इन बातों का पूरा अर्थ नहीं समझता था। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस दिन मैंने इंसानियत का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ लिया था।
हाफिज साहब मुसलमान थे और हम हिंदू परिवार से थे।
हमारे पूजा-पाठ अलग थे। हमारी धार्मिक परंपराएँ अलग थीं।
लेकिन...
दर्द एक था।
चिंता एक थी।
प्यार एक था।
और मेरे सिर से बहने वाले खून का रंग भी वही था।
अद्विका: यानी नानू, प्यार के लिए धर्म अलग होना कोई मायने नहीं रखता?
नानू ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
नानू: बिल्कुल नहीं बिटिया।
इंसानियत सबसे पहले आती है।
उस दिन हाफिज साहब ने यह नहीं देखा कि मैं किस धर्म का बच्चा हूँ। उन्होंने सिर्फ इतना देखा कि एक बच्चा घायल है और उसे मदद की जरूरत है।
और शायद यही सच्चे धर्म की पहचान है।
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🌹 नानू की सीख
आयांश: नानू, तो आपने उस दिन क्या सीखा?
नानू: मैंने सीखा कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते।
कभी-कभी पड़ोसी अपने हो जाते हैं।
कभी कोई दोस्त भाई जैसा बन जाता है।
कभी कोई बुजुर्ग अपने दादा-दादी जैसा प्यार देने लगता है।
और सबसे बड़ा रिश्ता है—इंसान का इंसान से रिश्ता।
नानू ने बच्चों को पास बुलाया और कहा—
“बच्चों, याद रखना—खून का रंग सबका एक होता है और आँसू भी सबके नमकीन होते हैं। इसलिए किसी इंसान को उसके धर्म, जाति या भाषा से नहीं, उसके दिल और उसके व्यवहार से पहचानना।”
अद्विका और आयांश चुपचाप नानू से लिपट गए।
नानू की आँखों में उस पुराने दिन की याद चमक रही थी।
एक छोटी-सी चोट ने उनके सिर पर तो पट्टी बाँधी थी,
लेकिन उसी घटना ने उनके मन में इंसानियत का एक ऐसा दीप जला दिया था,
जो आज भी जल रहा था।
🌼 बच्चों के लिए संदेश
सच्चा धर्म वही है, जो हमें दूसरे इंसान के दुख में उसके साथ खड़ा होना सिखाए।
मजहब अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत सबकी एक होती है।
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23.
नानू, भगवान एक हैं तो नाम इतने क्यों?
एक शाम बच्चे मेरे पास आकर बैठ गए। अचानक एक ने पूछा—
“नानू, आर्य समाज क्या होता है? हमने इसका नाम तो सुना है, लेकिन हमें पता नहीं कि यह क्या है।”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“चलो, आज नानू की पोटली से इसी सवाल का जवाब निकालते हैं।”
“नानू, पहले यह बताओ कि धर्म क्या होता है?”
मैंने कहा—
“बच्चों, धर्म का मतलब केवल हिन्दू, मुसलमान, सिख या ईसाई होना नहीं है। धर्म का असली मतलब है—अच्छी बातों को अपने जीवन में अपनाना।
सच बोलना, प्रेम करना, दया करना, किसी को दुख न देना, जरूरतमंद की मदद करना और शांति से रहना—ये सब धर्म की बातें हैं।”
“तो फिर आर्य समाज क्या है?”
“आर्य समाज सनातन वैदिक परंपरा से जुड़ा एक सुधार आंदोलन है। इसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। वे चाहते थे कि लोग वेदों की शिक्षाओं को समझें और अंधविश्वास, रूढ़ियों और पाखंड से दूर रहें। आर्य समाज एक निराकार ईश्वर में विश्वास करता है।”
एक बच्चे ने तुरंत पूछा—
“लेकिन नानू, अगर भगवान एक हैं, तो कोई उन्हें भगवान कहता है, कोई अल्लाह और कोई वाहेगुरु—ऐसा क्यों?”
मैंने कहा—
“क्योंकि दुनिया में रहने वाले लोग अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी परंपराएँ भी अलग-अलग हैं। इसलिए वे ईश्वर को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
तुम मुझे क्या-क्या कहते हो?”
बच्चे हँसने लगे—
“नानू!”
मैंने कहा—
“और सुलभा, संघमित्रा और उत्कर्ष मुझे क्या कहते हैं?”
“पापा!”
“तुम्हारी नानी मुझे क्या कहती हैं?”
“पति!”
“और मेरी माँ मुझे क्या कहती थीं?”
“बेटा!”
मैंने कहा—
“तो क्या मैं हर नाम से अलग-अलग आदमी हो गया?”
बच्चे जोर से हँस पड़े—
“नहीं नानू, आप तो एक ही हो!”
“बस, यही बात ईश्वर के बारे में भी समझो। नाम अनेक हो सकते हैं, लेकिन ईश्वर एक ही है।”
एक बच्चे ने फिर पूछा—
“तो नानू, क्या एक भगवान दूसरे भगवान से ज्यादा अच्छे हैं?”
मैंने कहा—
“जब ईश्वर एक ही है, तो यह सवाल ही नहीं उठता कि कौन-सा भगवान अच्छा है और कौन-सा कम अच्छा। हम मनुष्य अपने-अपने विश्वास और भाषा के अनुसार उन्हें अलग-अलग नाम देते हैं।”
फिर बच्चे ने थोड़ा सोचकर पूछा—
“नानू, जो रोज पूजा नहीं करते? हवन नहीं करते? मंदिर या गुरुद्वारे नहीं जाते? क्या भगवान उनसे कम प्यार करते हैं?”
मैंने बच्चों को अपने पास खींच लिया और कहा—
“नहीं बेटा, बिल्कुल नहीं।
क्या माँ अपने बच्चे से इसलिए कम प्यार करती है कि बच्चे ने आज उसे प्रणाम नहीं किया?”
“नहीं!”
“फिर ईश्वर अपने बच्चों से ऐसा क्यों करेगा?
कोई रोज पूजा करे, कोई सप्ताह में एक दिन करे और कोई कभी पूजा न करे—ईश्वर का प्यार किसी के लिए कम या ज्यादा नहीं होता।
पूजा, प्रार्थना और हवन हमारे मन को शांत करने के सुंदर तरीके हो सकते हैं। लेकिन अच्छे इंसान बनने के लिए केवल पूजा करना ही जरूरी नहीं है।”
एक बच्चा बोला—
“तो फिर भगवान को क्या अच्छा लगता है?”
मैंने प्यार से कहा—
“मुझे लगता है, भगवान से भी ज्यादा हमें यह देखना चाहिए कि हम इंसानों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
अगर हम सच बोलते हैं, किसी को दुख नहीं देते, भूखे को खाना देते हैं, दुखी का हाथ पकड़ते हैं और सबके साथ प्रेम करते हैं—तो हमारा जीवन अपने-आप सुंदर हो जाता है।”
बच्चे चुपचाप सुन रहे थे।
मैंने कहा—
“और एक बात याद रखना। ईश्वर निराकार है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि ईश्वर हमारी पूजा से खुश और पूजा न करने से नाराज हो जाता है।
अच्छे काम करने पर असली खुशी हमारे अपने मन में पैदा होती है। हमें भीतर से संतोष मिलता है। यही बहुत बड़ी बात है।”
मैंने बच्चों के सिर पर हाथ रखा और कहा—
“नानू की पोटली से आज बस इतनी-सी बात याद रखना—
धर्म हमें बाँटने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए है।
ईश्वर के नाम अनेक हैं, लेकिन ईश्वर एक है।
पूजा के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन प्रेम का रास्ता सबके लिए एक है।
और ईश्वर का प्यार—सबके लिए बराबर है।
अगर हम सचमुच ईश्वर को मानते हैं, तो सबसे सुंदर पूजा यही होगी कि हम एक-दूसरे से प्रेम करें।”
बच्चों ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराए।
एक ने धीरे से कहा—
“नानू, तो किसी को उसके भगवान के नाम से नहीं, उसके अच्छे कामों से पहचानना चाहिए?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“बिल्कुल! अब तुमने नानू की पूरी पोटली खोल ली।”
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