नानू की पोटली
नानू की पोटली से निकली बचपन की कहानियाँ
अद्विका, ayaansh, श्रेयम और मेरे प्यारे नाती-पोतों,
जब मैं तुम्हें ये कहानियाँ सुनाऊँगा तो शायद तुम्हें लगेगा कि नानू भी कभी बच्चा था!
आज जब तुम मुझे देखते हो तो शायद तुम्हें एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जो बहुत कुछ जानता-समझता है, गंभीर बातें करता है, लोगों से मिलता है और अपने काम में व्यस्त रहता है। लेकिन मेरे भीतर कहीं एक छोटा-सा बच्चा आज भी रहता है—जो शरारत करता था, खेलता था, झूठ बोलकर बच निकलने की कोशिश करता था, डाँट खाता था, कभी प्यार पाता था और कभी अपनी किसी छोटी-सी उपलब्धि पर बहुत खुश हो जाता था।
उसी बच्चे को मैंने इन कहानियों में फिर से खोजने की कोशिश की है।
ये कहानियाँ मेरे जीवन के उन दिनों की हैं, जब मुझे अपनी दुनिया बहुत बड़ी लगती थी और मेरी उम्र बहुत छोटी थी। लगभग चार वर्ष की उम्र से लेकर चौदह वर्ष तक के वे दिन, जिन्हें मेरी स्मृति ने अपने भीतर कहीं सुरक्षित रखा है। कुछ घटनाएँ मुझे बिल्कुल साफ-साफ याद हैं, कुछ धुंधली हैं और कुछ को शायद समय ने अपनी कल्पना का थोड़ा रंग दे दिया है। लेकिन इन सबमें एक चीज बिल्कुल सच्ची है—उन दिनों का मेरा मन।
मैंने इन कहानियों को किसी इतिहास की तरह लिखने की कोशिश नहीं की है। न ही ये मेरे जीवन की गंभीर घटनाओं का ब्योरा हैं। ये तो मेरे बचपन की वही छोटी-बड़ी शरारतें हैं, जिन पर कभी घरवालों ने डाँटा, कभी किसी ने हँसकर छोड़ दिया, कभी प्यार से समझाया और कभी मेरी किसी नटखट हरकत पर मुझे शाबाशी भी मिली।
कभी कोई खेल था, कभी दोस्तों की चुहलबाजी, कभी स्कूल की कोई घटना, कभी घर की कोई छोटी-सी बात और कभी ऐसा काम, जिसे करते समय मुझे बहुत होशियारी लग रही थी, लेकिन बाद में पता चला कि मेरी होशियारी सबको पहले ही समझ आ गई थी!
शायद यही बचपन है।
बचपन में हम छोटी-छोटी बातों में बड़ी खुशियाँ खोज लेते हैं। एक पतंग, एक कंचा, एक खिलौना, कोई नया कपड़ा, दोस्तों के साथ खेल, स्कूल से छुट्टी, घर में मिली थोड़ी-सी आज़ादी—सब कुछ अपने आप में एक उत्सव बन जाता है। और हमारी शरारतें भी हमारी अपनी भाषा होती हैं।
इन कहानियों को लिखते समय मेरा मन कई बार उसी उम्र में लौट गया। मुझे लगा जैसे मैं फिर से वही छोटा बच्चा हूँ और मेरे सामने मेरे माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, शिक्षक और मोहल्ले के वे तमाम लोग खड़े हैं जिन्होंने मेरे बचपन को बनाया। कुछ चेहरे बहुत साफ दिखाई देते हैं, कुछ यादों की धुंध में हैं, लेकिन उनकी आवाजें आज भी सुनाई देती हैं।
और फिर मुझे लगा कि इन कहानियों को केवल अपने पास क्यों रखा जाए?
इन्हें तुम्हें सुनाया जाना चाहिए।
मैं चाहता हूँ कि जब तुम इन कहानियों को पढ़ो या सुनो तो ऐसा महसूस हो कि नानू सामने बैठा है और तुम्हें अपनी बचपन की बातें सुना रहा है। कहीं वह हँस रहा है, कहीं अपनी गलती छिपाने की कोशिश कर रहा है, कहीं पुरानी शरारत पर शर्मिंदा हो रहा है और कहीं उस बच्चे पर खुद ही प्यार आ रहा है, जो कभी वह हुआ करता था।
लेकिन मेरी एक और इच्छा है।
इन कहानियों को केवल बच्चे ही न पढ़ें। मैं चाहता हूँ कि बड़े भी इन्हें पढ़ें। क्योंकि बड़े होते-होते हम अपने भीतर के बच्चे को कहीं बहुत गहरे दबा देते हैं। हम इतने गंभीर हो जाते हैं कि कभी-कभी ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे हमने बचपन कभी जिया ही नहीं था।
इन कहानियों को पढ़ते हुए शायद किसी पिता को अपना बचपन याद आए, किसी माँ को अपने बच्चे की शरारत, किसी दादा-दादी को अपने घर के आँगन में खेलते बच्चे और किसी बड़े आदमी को अपने भीतर छिपा वह छोटा बच्चा दिखाई दे, जिसे उसने वर्षों से आवाज़ ही नहीं दी।
इसलिए यह पुस्तक केवल मेरे बचपन की कहानियों का संग्रह नहीं है। यह मेरी कोशिश है कि बचपन की वह दुनिया, जो समय के साथ हमसे दूर होती जाती है, शब्दों में थोड़ी देर और जीवित रहे।
हो सकता है मेरी कुछ बातें तुम्हें मज़ेदार लगें, कुछ पर तुम हँसो, कुछ पर कहो—“अरे, नानू ने ऐसा भी किया था!” और शायद किसी कहानी के बाद तुम अपने मम्मी-पापा या दादा-दादी से पूछ बैठो—“आप बचपन में क्या करते थे?”
अगर ऐसा हुआ, तो मैं समझूँगा कि मेरी कहानियाँ सफल हो गईं।
क्योंकि बचपन केवल एक उम्र नहीं है।
बचपन हमारे भीतर बची हुई वह जगह है जहाँ हम बिना किसी बनावट के अपने सबसे सच्चे रूप में रहते हैं।
आओ, इस पुस्तक के पन्ने पलटते हैं और मेरे साथ उस समय में चलते हैं जब मेरी उम्र चार साल थी। वहाँ से चौदह साल तक का रास्ता बहुत लंबा नहीं है—बस यादों की एक छोटी-सी पगडंडी है।
उस पगडंडी पर कभी धूल उड़ती है, कभी बारिश होती है, कभी हम गिरते हैं, कभी दौड़ते हैं और कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर हँसते हैं।
और उस पगडंडी के आखिर में शायद तुम्हें तुम्हारा नानू नहीं,
बल्कि एक छोटा-सा बच्चा मिलेगा।
वही बच्चा इन कहानियों का असली नायक है।
— राम मोहन राय
नानू
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समर्पण
मेरे प्यारे नाती-नातिनों—
अयांश, अद्विका और श्रेयम के नाम।
तुम्हारे लिए यह केवल कहानियों की किताब नहीं है।
यह उस नानू की पोटली है
जिसमें उसने अपने बचपन की कुछ हँसी,
कुछ शरारतें, कुछ आँसू,
कुछ डाँट, कुछ प्यार
और बहुत सारी यादें बाँधकर रखी थीं।
जब कभी तुम्हें लगे कि नानू हमेशा से बड़ा और समझदार ही रहा होगा,
तो इस पोटली को खोल लेना।
तुम्हें उसमें एक छोटा-सा नानू मिलेगा—
जो तुम्हारी ही तरह शरारती था,
तुम्हारी ही तरह सवाल पूछता था,
तुम्हारी ही तरह डाँट खाता था
और तुम्हारी ही तरह छोटी-छोटी बातों में बहुत खुश हो जाता था।
तुम्हारा नानू
राम मोहन●●●●
पहली पोटली : मेरा घर और मेरी बहन
अयांश, तुम्हें पता है नानू का घर कैसा था?
हमारे घर में पाँच लोग थे—मेरे माता-पिता और हम तीन भाई-बहन। मेरे बड़े भाई का नाम मदन मोहन था, लेकिन घर में सब उन्हें प्यार से **“राना "**कहते थे। मेरी छोटी बहन का नाम अरुणा था, जिसे प्यार से “मुन्नी कहा जाता था। और घर में एक और प्यारा नाम था—“कूकू”।
मेरे पिता पानीपत नगर पालिका में काम करते थे और मेरी माँ सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहती थीं। हमारा घर बहुत बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसका वातावरण बहुत खुला था। वहाँ बच्चों के लिए बहुत-सी जगह थी—खेलने की, हँसने की, शरारत करने की और अपनी छोटी-सी दुनिया बनाने की।
लेकिन इस घर में मेरे लिए सबसे खास थी मेरी बड़ी बहन अरुणा।
माँ मुझे बताती थीं कि जब मैं बहुत छोटा था, मेरे बाल बेहद मुलायम थे। अरुणा को मेरे वे मुलायम बाल बहुत अच्छे लगते थे। वह मुझे अपनी गोद में लेकर घंटों बैठी रहती। फिर बड़े प्यार से मेरे बालों में कंघी करती और उनमें तेल लगा देती।
उसे शायद लगता था कि नानू के बाल जितने घुँघराले और सुंदर होंगे, उसका छोटा भाई उतना ही अच्छा लगेगा!
लेकिन अरुणा केवल मेरे बाल सँवारने वाली बहन नहीं थी। वह मेरे लिए जैसे छोटी-सी माँ थी—हालाँकि उस समय वह खुद भी एक छोटी बच्ची ही थी।
एक घटना तो हमारे घर में आज भी याद की जाती है।
मैं तब केवल पाँच महीने का था और ऊपर के कमरे में सो रहा था। अरुणा की उम्र उस समय लगभग पाँच साल थी।
पता नहीं उसके छोटे-से मन में क्या आया।
उसने मुझे उठाया और गोद में लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
सोचो अयांश—पाँच साल की बच्ची की गोद में पाँच महीने का बच्चा!
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरती रही।
जब माँ ने उसे देखा तो उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
उन्हें एक पल को तो बहुत चिंता हुई—“कहीं दोनों बच्चे गिर न जाएँ!”
लेकिन अरुणा ने न जाने कहाँ से इतना आत्मविश्वास जुटाया था कि वह मुझे सुरक्षित गोद में लेकर नीचे आ गई।
माँ के लिए यह दृश्य आश्चर्य और डर—दोनों का था। लेकिन अरुणा के लिए शायद यह बिल्कुल सामान्य बात थी।
उसे विश्वास था कि वह अपने छोटे भाई को संभाल सकती है।
और शायद यहीं से मुझे लगता है कि अरुणा ने मेरे जीवन में एक बहुत बड़ी बात रख दी थी—विश्वास की ताकत।
वह मानती थी कि हम चाहे कितने ही छोटे क्यों न हों, यदि लोग हम पर विश्वास करने लगें और हम उस विश्वास को निभा सकें, तो हम अपने लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
बड़े होकर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस पाँच साल की बच्ची को जीवन की यह बात शायद हम बड़े लोगों से पहले ही समझ आ गई थी।
विश्वास उम्र नहीं देखता।
और शायद इसी विश्वास ने मेरे बचपन को भी बहुत कुछ दिया।
अरुणा मुझे अपनी गोद में लेकर मेरे बाल सँवारती थी, मुझे सीढ़ियों से उठाकर नीचे लाती थी, मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखती थी—और मैं?
मैं तो बस उसका छोटा भाई था, जिसे यह सब बहुत अच्छा लगता था।
आज जब मैं तुम्हें यह कहानी सुना रहा हूँ, तो सोचता हूँ—
अगर पाँच साल की अरुणा पाँच महीने के अपने भाई को इतनी सावधानी से संभाल सकती थी, तो शायद हम सबके भीतर अपनी उम्र से कहीं बड़ा बनने की क्षमता होती है।
बस किसी को हम पर विश्वास करना चाहिए।
और हमें उस विश्वास को टूटने नहीं देना चाहिए।
यही मेरे बचपन की पहली पोटली में रखी एक बहुत प्यारी याद है।
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