17 अक्टूबर: मेरा जन्मदिन, दीदी की स्मृतियाँ और जीवन का एक अनोखा संयोग

 17 अक्टूबर: मेरा जन्मदिन, दीदी की स्मृतियाँ और जीवन का एक अनोखा संयोग

राममोहन राय की कलम से

मेरे जीवन में 17 अक्टूबर केवल जन्मदिन की एक तारीख नहीं, बल्कि स्मृतियों, आत्मीयता, प्रेरणा और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा एक विशेष दिन है। मुझे अपने जन्मदिन से बड़ा कोई त्योहार कभी नहीं लगा। जब भी नए साल का कैलेंडर या डायरी हाथ में आती, मैं सबसे पहले 17 अक्टूबर की तारीख को रेखांकित करता था। लेकिन समय के साथ इस तारीख का महत्व मेरे लिए केवल व्यक्तिगत खुशी तक सीमित नहीं रहा।

सन् 1985 में जब मेरा परिचय दीदी निर्मला देशपांडे जी से हुआ, तब मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि उनका जन्मदिन भी 17 अक्टूबर ही है। उनका जन्म 17 अक्टूबर, 1929 को नागपुर में हुआ था। उस दिन से मैंने अपना जन्मदिन मानो उन्हें समर्पित कर दिया। जब तक वे हमारे बीच रहीं, मेरी दिनचर्या का एक आत्मीय हिस्सा यह था कि सुबह उठते ही सबसे पहले उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ देता। वे भी मुझे स्नेहपूर्वक आशीर्वाद देतीं। जन्मदिन की इस पारस्परिक शुभकामना में जो आत्मीयता थी, वह मेरे लिए किसी अनमोल निधि से कम नहीं थी।

क्या यह महज इत्तफाक था कि मेरे जन्मदिन का रिश्ता उस व्यक्तित्व से जुड़ गया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन शांति, सद्भाव, अहिंसा और समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया था? मेरे लिए तो यह संयोग धीरे-धीरे एक भावनात्मक संबंध और जीवन की प्रेरणा बन गया।

● एक तारीख, अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व

बाद में जब इस तारीख के बारे में और जानकारी मिली, तो पता चला कि 17 अक्टूबर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान का भी जन्म हुआ था। हमारे शहर पानीपत के प्रसिद्ध अभिनेता राजेंद्र गुप्ता और हमारी प्रिय अन्नपूर्णा भाभीजी, तृप्ता वर्मा का जन्मदिन भी इसी दिन आता है।

निस्संदेह, 17 अक्टूबर को मेरे जैसे लाखों लोग पैदा हुए होंगे। जन्म लेना अपने आप में कोई असाधारण उपलब्धि नहीं है, लेकिन कुछ लोग अपने विचारों, कर्मों और जीवन-संघर्ष से अपने समय की सीमाओं को लाँघकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। सर सैयद अहमद खान और दीदी निर्मला देशपांडे जैसे व्यक्तित्व इसी श्रेणी में आते हैं।

ऐसे ही लोगों के लिए किसी शायर की ये पंक्तियाँ याद आती हैं—

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

ऐसे व्यक्तित्व किसी एक परिवार, शहर या समुदाय की धरोहर नहीं होते; वे पूरी मानवता की साझा विरासत बन जाते हैं।

 ●जन्मतिथि का एक कानूनी प्रसंग

मेरी जन्मतिथि को लेकर भी जीवन में एक दिलचस्प प्रसंग रहा है। आठवीं कक्षा में मेरे प्रमाणपत्र में जन्मतिथि गलत दर्ज हो गई थी। इसके बावजूद मेरे मन में अपनी वास्तविक जन्मतिथि को लेकर हमेशा स्पष्टता रही।

सन् 1982 में जब मैंने  पानीपत विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया, तो मैंने अपनी मैट्रिकुलेशन के प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि के अनुसार अपनी आयु दर्शाई थी, ताकि मेरी पात्रता पर कोई प्रश्न न उठे। लेकिन विपक्षियों ने नगर पालिका के जन्म अभिलेख की प्रति निकलवाकर प्रस्तुत कर दी। मैंने अपनी ओर से यह भी कहा कि मेरे पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों में 3 अप्रैल की तारीख दर्ज है, लेकिन उस समय निर्वाचन अधिकारियों ने नगर पालिका के अभिलेख को आधार माना और मेरा नामांकन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि मेरी जन्मतिथि 17 अक्टूबर है।

इस घटना ने मेरे जीवन में एक विचित्र मोड़ ला दिया। जिस तारीख को मैं वर्षों से अपनी जन्मतिथि मानता और मनाता आया था, वह कानूनी विवाद के बीच भी मेरे जीवन का एक स्थायी हिस्सा बनी रही। इस तरह 17 अक्टूबर से मेरा रिश्ता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि एक कानूनी प्रसंग से भी जुड़ गया।

● जब मेरा जन्मदिन अनेक बच्चों का भी जन्मदिन बन गया

दीदी निर्मला देशपांडे जी से जुड़ी स्मृतियों और अपने जन्मदिन के प्रति आत्मीयता के बीच एक दिन मेरे मन में विचार आया कि जन्मतिथि से अनजान उन बच्चों के लिए क्या किया जाए, जो हमारे पानीपत स्थित हाली अपना स्कूल में दाखिला लेने आते हैं।

हमारे स्कूल में मेहनतकश परिवारों के अनेक होनहार बच्चे शिक्षा प्राप्त करने आते हैं। इनमें से कई बच्चों के पास न आधार कार्ड होता है, न जन्म प्रमाणपत्र और न ही माता-पिता को उनकी सही जन्मतिथि का पता होता है। ऐसे में स्कूल के लिए उनका प्रवेश संबंधी रिकॉर्ड तैयार करना भी एक व्यावहारिक समस्या बन जाता था।

हमने विचार-विमर्श करके वर्ष के कुछ ऐसे दिन निर्धारित किए, जिनका संबंध देश के महान समाज सुधारकों और राष्ट्रीय नेताओं से है। इनमें शामिल थे—

 ●3 जनवरी — सावित्रीबाई फुले की जयंती

●23 जनवरी — नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती
● 28 सितम्बर- शहीद भगत सिंह का जन्मदिन 

●2 अक्टूबर — महात्मा गांधी की जयंती

 ●17 अक्टूबर — दीदी निर्मला देशपांडे जी का जन्मदिन

 ●14 नवंबर — पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन

 ●19 नवंबर — इंदिरा गांधी का जन्मदिन

जब किसी बच्चे की वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं होता था, तो निर्धारित तारीखों में से एक तारीख उसके स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज कर दी जाती थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों के लिए प्रवेश प्रक्रिया को सरल बनाना था, न कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि का दावा करना।

धीरे-धीरे इसका एक बहुत सुंदर और भावनात्मक पहलू सामने आया। जब भी 17 अक्टूबर को मैं कहता कि आज मेरा जन्मदिन है, तो प्रार्थना सभा में खड़े कई बच्चे खुशी से बोल उठते—“आज तो हमारा भी जन्मदिन है!”

उनकी यह बात सुनकर मेरे चेहरे पर सहज मुस्कान आ जाती। जिस दिन को मैंने दीदी की स्मृति में अपने जन्मदिन के रूप में विशेष महत्व दिया था, वह दिन अब स्कूल के अनेक बच्चों के लिए भी खुशी का दिन बन गया था। मुझे लगता कि जन्मदिन की खुशी का इससे सुंदर विस्तार और क्या हो सकता है! एक व्यक्तिगत उत्सव अनजाने में बच्चों के साथ साझा खुशी का अवसर बन गया।

● इस बार अमेरिका में जन्मदिन: हवन, प्रार्थना और परिवार का स्नेह

इस वर्ष 17 अक्टूबर को मेरा जन्मदिन मनाने का अवसर कुछ अलग और विशेष रहा। इन दिनों मैं अपनी बेटी सुलभा राय सांखला, जो अमेरिका में अधिवक्ता एवं अटॉर्नी हैं, के घर आया हुआ हूँ। परिवार के बीच जन्मदिन मनाने का आनंद अपने आप में अनूठा था।

परिवार के सदस्यों ने मिलकर हवन किया, प्रार्थना की और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। शाम को केक काटकर जन्मदिन की खुशियाँ साझा कीं। वैदिक मंत्रों की पवित्रता, परिवार का स्नेह और अपनों की उपस्थिति ने इस अवसर को यादगार बना दिया।

जीवन के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अनेक स्मृतियाँ मन में उमड़ने लगती हैं। जीवन में जो कुछ अच्छा मिला, उसके लिए परिवार, मित्रों, साथियों और उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता का भाव जागता है, जिन्होंने समय-समय पर स्नेह और सहयोग दिया। सबसे बढ़कर, दीदी निर्मला देशपांडे जी की स्मृतियाँ मन को प्रेरित करती हैं कि जीवन का मूल्य केवल अपनी खुशियों में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में खुशी और उम्मीद बाँटने में भी है।

मेरे लिए जन्मदिन केवल एक वर्ष और बढ़ जाने का अवसर नहीं है। यह अपने जीवन, अपने संकल्पों और अपने सामाजिक दायित्वों को फिर से याद करने का दिन है। और जब इस दिन में दीदी की स्मृतियाँ, महान व्यक्तित्वों की प्रेरणा, स्कूल के बच्चों की मुस्कान और परिवार का स्नेह एक साथ जुड़ जाएँ, तो इसकी खुशी और भी गहरी हो जाती है।

मेरे लिए 17 अक्टूबर अब केवल मेरी जन्मतिथि नहीं है। यह दीदी निर्मला देशपांडे जी की स्मृतियों, सेवा और सद्भाव के संकल्प, बच्चों की साझा खुशियों तथा परिवार के प्रेम का उत्सव है।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आगे का जीवन भी इसी तरह प्रेम, सद्भाव, ईमानदारी, मेहमाननवाजी और मानवसेवा के भाव के साथ बीते। मेरी खुशियाँ दूसरों की खुशियों से जुड़ी रहें और जीवन की सार्थकता समाज के प्रति अपने दायित्व निभाने में बनी रहे।

यही मेरे जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार है और यही मेरी सच्ची जन्मदिन-उत्सव की भावना।
राम मोहन राय. 
BELLVIEW, USA/17.10.2026

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