हरिजन सेवक संघ पर मेरी बात — विरोध नहीं, आत्ममंथन
हरिजन सेवक संघ पर मेरी बात — विरोध नहीं, आत्ममंथन
अक्सर मित्र पूछते हैं कि मैं हरिजन सेवक संघ के चित्रों के साथ ही अपनी टिप्पणियाँ क्यों करता हूँ और क्या मैं संघ को ही निशाना बना रहा हूँ?
मेरा उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
मेरा सरोकार केवल हरिजन सेवक संघ से नहीं, बल्कि सभी गांधीवादी संस्थाओं के चरित्र, कार्यप्रणाली और गांधीजी के मूल उद्देश्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से है। हरिजन सेवक संघ का उल्लेख इसलिए अधिक होता है क्योंकि इससे मेरा संबंध लगभग चार दशक पुराना है।
सन् 1987 में दीदी निर्मला देशपांडे जी ने मुझे हरिजन सेवक संघ से जोड़ा। पंजाब, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के अनेक साथियों को भी उन्होंने संघ से जोड़ा और उसकी मजबूती के लिए काम करने को प्रेरित किया। शंकर कुमार सान्याल, लक्ष्मी दास, मंगत राम सिंघल जी, एस.पी. वर्मा, डॉ. पवन थापर, रमेश भाई जैसे अनेक साथी भी दीदी के प्रयासों से संघ से जुड़े।
मैं स्वयं संघ के बोर्ड और कार्यकारिणी का सदस्य, हरियाणा का प्रांतीय सचिव तथा प्रांतीय अध्यक्ष रहा हूँ। मैंने संघ के लिए काम किया है, इसलिए आज उसकी स्थिति देखकर मेरी चिंता स्वाभाविक है।
मेरी चिंता इतनी गहरी क्यों है?
क्योंकि हरिजन सेवक संघ कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह महात्मा गांधी द्वारा स्थापित संस्था है और गांधीजी की उस सोच का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध काम करना केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रायश्चित, आत्मशुद्धि और निस्वार्थ सेवा का कार्य था।
आज जब संस्था में गुटबंदी, मुकदमेबाजी, चुनावों को लेकर विवाद, पारदर्शिता की कमी और चापलूसी जैसी प्रवृत्तियों की चर्चा होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
मेरा सवाल किसी व्यक्ति से नहीं है।
मेरा सवाल व्यवस्था और प्रवृत्ति से है।
क्या किसी गांधीवादी संस्था में पद व्यक्ति की प्रतिष्ठा बचाने का माध्यम बनना चाहिए?
क्या संस्था के इतिहास और उद्देश्यों से अपरिचित लोगों को केवल व्यक्तिगत समीकरणों के आधार पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ दी जानी चाहिए?
क्या वर्षों तक संस्था के लिए समर्पित भाव से काम करने वाले कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा सकती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या गांधीजी के नाम पर चलने वाली संस्था में निर्णयों और वित्तीय गतिविधियों की पूरी पारदर्शिता नहीं होनी चाहिए?
यदि किसी विद्यालय में बच्चों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो उनका समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए। भवन, पद, प्रतिष्ठा और प्रचार बाद की बातें हैं।
गांधीजी की संस्था में गांधी सबसे ऊपर होने चाहिए
मुझे किसी पद की इच्छा नहीं है। मेरा किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत विरोध नहीं है।
मैं केवल यह चाहता हूँ कि हरिजन सेवक संघ फिर से अपनी गांधीवादी आत्मा के अनुरूप खड़ा हो।
संस्था में लोकतंत्र हो।
निर्णयों में पारदर्शिता हो।
कार्यकर्ताओं का सम्मान हो।
योग्यता और समर्पण को महत्व मिले।
आय-व्यय का स्पष्ट हिसाब हो।
और सबसे बढ़कर—गांधीजी के अंतिम व्यक्ति की सेवा का भाव केंद्र में हो।
मेरी बातों को विरोध समझने के बजाय आत्ममंथन का अवसर समझा जाए।
क्योंकि—
मैं हरिजन सेवक संघ को कमजोर नहीं करना चाहता; मैं उसे मजबूत देखना चाहता हूँ।
मैं संस्था पर अधिकार नहीं चाहता;
मैं उसकी गांधीवादी विरासत की रक्षा चाहता हूँ।
मैं किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं हूँ;
मैं उन प्रवृत्तियों के विरुद्ध हूँ जो गांधीवादी संस्थाओं को भीतर से कमजोर करती हैं।
और यदि किसी को मेरी बात कठोर लगती है, तो मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ—
जिस संस्था से आपका चार दशक का संबंध हो, उसकी गिरती हुई स्थिति देखकर चुप रहना भी तो संभव नहीं।
सत्य, पारदर्शिता और आत्ममंथन से ही गांधी की संस्थाएँ जीवित रहेंगी।
— राम मोहन राय
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
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